Avlokan Discourses of Shri Devchand bhai Shah The book Search Photographs About

Dravya Drashti Jineshwar

5 November 2000 · Bol 54 · 28 minutes

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Recitations restored to their canonical wording: Mangalacharan — Mangalam Bhagavan Viro, Mangalacharan — Sarva Mangala Mangalyam, Namokar mantra, Omkar bindu sainyuktam, Samaysar mangalacharan.

0:12णमो अरिहंताणं णमो सिद्धाणं णमो आयरियाणं णमो उवज्झायाणं

0:19णमो लोए सव्व साहूणं नमः समयसाराय

0:24स्वानुभूत्या चकासते । चित्स्वभावाय भावाय

0:30सर्वभावान्तरच्छिदे मंगलं भगवान वीरो,

0:35मंगलं गौतमो गणी। मंगलं कुन्दकुन्दार्यो,

0:40जैनधर्मोऽस्तु मंगलम्॥ सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं

0:45सर्वकल्याणकारकम। प्रधानं सर्वधर्माणां

0:51जैनं जयति शासनम॥ बिंदु संयुक्तम ॐकारबिन्दुसंयुक्तं

0:56नित्यं ध्यायन्ति योगिनः।

0:57कामदं मोक्षदं चैव ॐकाराय नमो नमः श्री द्रव्य दृष्टि ठीलेश्वर। पूज्य

1:00कान्जी स्वामी की रचना number

1:0154। हे योगी, देह में परमात्मा

1:07का निवास होने पर भी इस देह में

1:13स्थित परमात्मा को तुम

1:18क्यों नहीं देखते?

1:22क्यों नहीं देखता?

1:27उस परमात्मा के दर्शन से, तेरे पूर्व उपार्जित कर्म चूर चूर हो जाएंगे।

1:34और तू निर्वाण को प्राप्त हो जाएगा। महान पुरुष मिलने आए हो,

1:41और सामान्य बालक आदि के साथ बातें करने में लग जाए, तो वह महापुरुष का अपमान है।

1:48उसी प्रकार तीन लोक का उत्कृष्ट तत्व ऐसा नीच परमात्मा।

1:53देह में विद्यमान होने पर भी उसे तू देखता नहीं है।

1:59और पर प्रपंच की जानकारी में पड़कर निज परमात्मा का अपमान कर रहा है।

2:06क्या करना और क्या नहीं करना गलती बताइए। जीव की गलती क्या?

2:11इतना sentence है वो आत्मसिद्धि में एक ही line है पहली line।

2:15जे स्वरूप समझा बिना। आम हो रूपान। तो स्वरूप है वो अपना जो स्वरूप है

2:19वो परमात्मा तत्व। है वो अपना जो स्वरूप है वो परमात्मा तत्व है।

2:23जन्म मरण से रहित, राग द्वेष से रहित, अनंत गुणों का भंडार स्वयं है।

2:29वो विराजमान कहाँ है? कहाँ ढूँढेंगे उसको? शरीर के बाहर नहीं।

2:34शरीर के अंदर देखो 3 गुफा में आया था, शरीर के अंदर ही है।

2:39तो अनुभव प्रकाश में 3 गुफा के पीछे आत्मा विराजमान है,

2:46परमेश्वर विराजमान है। एक तो ये शरीर की गुफा है।

2:50एक तो शरीर की गुफा है। अंदर में है ब्रह्म कर्म की गुफा। तीसरी गुफा है भाव कर्म

2:55राग द्वेष के भाव। वो राग द्वेष के पर्दे के पीछे भगवान

3:00है। 3 गुफा को पार करना। तो मैं तो ढूंढने निकला body में कहीं मिला नहीं।

3:05तो वापस जा रहा था। तो बोले नहीं नहीं कहाँ जा रहे हो?

3:09तो मैं भगवान को ढूंढने अंदर गया देखा मैं पूरा body

3:12में एक एक कण को। तो मेरे को मिला नहीं। आप तो कहते हो कि

3:14देह में निवास है। आप तो कहते हो

3:16कि देह में निवास है तो देह में कहाँ लिखा मेरे को तो

3:19कहीं दिखता नहीं ना इधर है ना इधर है।

3:22बोले यहाँ से बाहर तो कहीं भी नहीं है। इसके अंदर में दूसरी गुफा है। द्रव्य कर्मक

3:29आठों कर्मों की। उसके पीछे विराजमान है भाव कर्मक। तो द्रव्य कर्मक की गुफा माने क्या?

3:35कि हम चुपचाप बैठेंगे तो भी विचार आते हैं। क्योंकि पूर्व कर्म में जैसा हमने

3:41कर्म किया है उस अनुसार

3:42उड़े आता है। भाव भी सभी हम... भाव भी सभी हम करते हैं ऐसा नहीं।

3:48जितने भी भाव हैं, हम चुपचाप बैठेंगे तो भी आएंगे। इतना heavy है।

3:53इसका मतलब क्या? द्रव्य कर्मों की मौजूदगी है।

3:57कुछ करना नहीं, कुछ करना,

3:59कुछ नहीं करना दोनों से हट जाएंगे,

4:00चुपचाप बैठोगे ना तो भी आप बैठोगे नहीं, मन नहीं बैठेगा।

4:04और कुछ ना कुछ चलेगा। ये बताता है कि द्रव्य कर्मों की मौजूदगी है।

4:11इसके पास, अभी इसमें joint होंगे तब क्या होता है? joint कैसे होना?

4:16अरे ऐसा खराब भाव क्यों आया?

4:18ऐसा नहीं अच्छा भाव होना चाहिए। ये joint हुआ इसका नाम भाव कर्म।

4:23प्रसंग के साथ joint हो गए। आया और चले गया वो तो आया तो चले जाने के लिए आया है।

4:28जो भी कर्मों का उदय आता है मन में विकल्प आते हैं

4:31वो कोई टिकते थोड़े हैं। अभी एक विकल्प कल दूसरा 1 second के बाद पलट

4:35जाता है दूसरा विकल्प। 1 second के बाद तीसरा विकल्प। अगर हम सिर्फ जानने देखने रह गए।

4:42तो बच गए। और जानने देखने नहीं हुए।

4:45और उसमें involve हुए कि ये भाव अच्छा है ये भाव बुरा है ऐसा करना है ऐसा नहीं करना।

4:50ये भाव कर्म आ गया। बस ये भाव कर्म के पर्दे के पीछे भगवान विराजमान है।

4:56अगर भाव कर्म नहीं होवे तो भगवान दिख जाएंगे। भगवान को देखना आसान। तो

5:02हमारे को involve नहीं होवे नहीं तो

5:05राग द्वेष के भाव नहीं होवे कोई वितराग अवस्था हो

5:08जाएगी। तो वितराग अवस्था में... हो जाए। वितराक

5:09अवस्था में ही वितराक प्रभु के

5:10दर्शन होते हैं। अंधों को सूर्य नहीं दिखता है।

5:14आंख वाले को ही सूर्य दिखता

5:17है। ऐसे वितराक परमेश्वर का दर्शन करने के लिए हम भी वितराक चाहिए।

5:22हम रात पेश करें और हमको भगवान का दर्शन करना है कैसे होगा ये? हमको

5:26दुनिया की उथल-पुथल करना है।

5:28कुछ करना है कुछ नहीं करना है।

5:30शांति से बैठना ही नहीं है 1 second के लिए।

5:33चुपचाप बैठे हैं तो भी कुछ काम नहीं है तो भी कुछ ना कुछ सोचना है। हमको सोचना है।

5:38अपने आप विचार आवे वो द्रव्य कर्म। हम सोचे वो, हम involve होवे वो, तो भाग।

5:46पूरी गलती हमारी है। तो भाव कर्म तो हमारी

5:50अजागृति के कारण, अज्ञानता के कारण, मोह में फंसने के कारण होते

5:55हैं। अगर हम मोह में नहीं फंसे, चुपचाप देखना है तमाशा।

6:00भगवान शिव भगवान क्या

6:01देखते हैं? शिव ज्ञान में। पूरी दुनिया को देखते हैं लेकिन हैरान नहीं होते। दुनिया

6:06को देखते हैं लेकिन है राग द्वेष

6:07कहाँ से? हम तो प्रणीत हैं। पूरी दुनिया

6:09को देखते हैं। अपने भूतकाल के कई अनंत माँ-बाप, अनंत

6:13माई-बाप, सगे-संबंधी, मित्र-वज्र, दुश्मन-वज्र सबको देखते हैं। दुश्मनों को देखते हैं।

6:19तकलीफ होती है। अपने माँ-बाप को देख लेते हैं।

6:23वो दुखी है तो, घर-गृहस्थी में कोई होंगे तो दुखी होते हैं। राग द्वेष का नाम नहीं

6:29लिया। हमको भगवान बनना है तो अभी से practice ऐसी करनी है। भगवान... ऐसे

6:32करनी है। भगवान सर्वश्रेष्ठा है। ये तो भगवान

6:35की एक ही गलती है हम गलतियों के और करना है।

6:38लेकिन हम उनकी चाल पे practice शुरू कर दें अभी से। कि हमको कोई भी प्रसंग आ जाए।

6:44हमको इंजॉय नहीं आना है। अच्छा बुरा कुछ नहीं बुरा चीज बुरा नहीं

6:49क्रोध बुरा है सारी दुनिया कहती है।

6:51अध्ययन दर्शन कहता है क्रोध एक ज्ञान का ध्येय है। वो अच्छा भी नहीं है बुरा

6:56भी नहीं है। वो आपको कुछ नुकसान नहीं करता।

6:59परमेश्वर को कुछ नुकसान नहीं करता है आपसे

7:01देखा जाए। आपको नुकसान नहीं करता है, आपको बेकाफ हैरान करता है। कोई दुश्मन आपको

7:05हैरान नहीं करता है, कोई मित्र आपको support नहीं करता है। मित्र ज्यादा

7:08हो जाएंगे तो आपके आत्मा में गुण की वृद्धि नहीं होती है,

7:10लक्ष्मी अधिकार बढ़ता है तो आपके

7:12गुणों में कुछ नहीं आता है। आत्मा अभिगत नहीं होता है।

7:16और नरक में, नरक में जलेगा तो नरक में। तो

7:19आपका, आपके आत्मा को कुछ भी नहीं होता। परमेश्वर तत्व में।

7:25अवस्था में गलती किया था इसकी सजा काट रहा है लेकिन।

7:29मूल द्रव्य को। मूल द्रव्य को

7:32कुछ भी नहीं होता। पानी गर्म हो सकता है अगर अग्नि का संपर्क है। लेकिन स्वभाव नहीं

7:36बदला। अग्नि चाहे जितनी भी हो,

7:38पानी का स्वभाव बदल सकते हैं। गरम पानी का स्वभाव भी शीतल है। ऐसे

7:46अनुकूल प्रतिकूल स्थिति में, अच्छे बुरे भावों के अंदर, परमात्मा जैसा का वैसा है।

7:53उसको कुछ भी नहीं हुआ। ऐसे परमात्मा कहाँ रहता है?

7:58हे योगी, देह में परमात्मा का निवास है।

8:03ऐसा होने पर भी इस देह में स्थित परमात्मा को तू क्यों नहीं देखता है?

8:09कुछ उसको सुधारना नहीं है कि बिगड़ गया है, काला हो गया है, मैला हो गया है,

8:13रागी हो गया है, द्वेषी हो गया है तो,

8:16पश्चाताप करो, कुछ व्रत नियम लो, कुछ सजा लो अपने आप को,

8:21प्रायश्चित करो तो सुधर जाएगा वो। परमो का मैलापन जो है उसका

8:23निकल जाएगा। और मैलापन जो है उसका निकल जाएगा।

8:27जैसे कपड़ा मैला होता है तो साबुन पानी से साफ करते हैं।

8:30ऐसा यहाँ आत्मा मैला नहीं हुआ है स्वभाव।

8:34इसलिए साबुन पानी, प्रायश्चित, व्रत, तप, नियम की कोई जरूरत नहीं।

8:39देखो इसमें आया व्रत तप भी सहा।

8:41हमें व्रत तप भी नहीं चाहिए। जगत के ऊँचे पद भी नहीं चाहिए, इंद्र, नरेंद्र

8:45के पद को भी हमको सहागा।

8:47मान, दौलत को भी सहागा।

8:50और जो कुछ गतिविधियाँ होती हैं, व्रत तप आदि, वो भी

8:52सहागा। होती हैं व्रत उपवास वो भी स्वाहा। हमको तो सिर्फ परमेश्वर को देखना है।

8:57तुम जैसा बनिए के कारण अरंत माणा।

9:02वीतराग के पथ पर चलने का प्रण लेकर आए। हमको कुछ नहीं है वीतराग बनना है।

9:08राग द्वेष के भाव के बुरे भाव सब स्वाहा कुछ करना नहीं है मुनिगिरी में।

9:14अपने आप होते तो बंद भी नहीं करना है अपने आप होते हैं तो करना है।

9:18क्योंकि आप चुप तो नहीं बैठो।

9:20आपकी भूमिका अनुसार पूर्व कर्म। आपकी भूमिका अनुसार पूर्व कर्म बांधे

9:22हैं जब तक वो खत्म नहीं हो जाएंगे

9:23पूरे तब तक आते रहेंगे इसी माध्यम से।

9:26तो अपने आप। देखिए आप involve हो गए तो प्रभाव करेंगे। अब भगवान कहाँ है?

9:32भाव कर्म के पर्दे के पीछे।

9:36देह में परमात्मा का निवास होने पर भी इस देह में स्थित परमात्मा को

9:40तू क्यों नहीं देखता है?

9:43अब यहाँ नहीं देखेगा तो रात भर सोके ही होगा involve होगा ही होगा।

9:46Involve नहीं होना था फिर भी involve हो गया।

9:49क्यों? Involve होगा। क्यों? कि जो कार्य करना है वो तो करता नहीं। भगवान को

9:53देखेगा, देखने की कोशिश करेगा,

9:55तो राग द्वेष मन में करके खत्म हो जाएगा। लेकिन भगवान को देखने की कोशिश भी नहीं है।

10:01उसका thinking भी नहीं चलता है। और दूसरे प्रपंच में पड़ा है।

10:05तो राग द्वेष बढ़ेंगे और

10:06हम कितना भी बोले कि हमको involve नहीं होना, अच्छा बुरा भाव नहीं करना है।

10:11कुछ ठीक नहीं है, कुछ ठीक नहीं है लेकिन

10:13हम involve होंगे क्यों नहीं हैं? राग द्वेष हो ही

10:17जाएंगे। राक्षस हो ही जाएंगे और जब तक राक्षस रहेंगे अंश मात्र में।

10:21आत्मा का दर्शन नहीं। ऐसे मुनिवर देखे वन में। जाके राग द्वेष

10:28नहीं मन में। मन में भी अगर पाठ से पुता नहीं करो लेकिन मन में ही भी अगर

10:33द्वेष बुद्धि आ जाए। परमात्मा का भाव नहीं। मन से वचन से काय से।

10:39करूं कराऊं अनुमोदना 9 कोटि। एक भी दोष नहीं होना चाहिए।

10:45ना पुण्य भाव होना चाहिए ना पाप का होना चाहिए। पुण्य भाव करो

10:48तो भी खतरा है। 9 कोटि से।

10:51और पाप का भाव होवे तो भी खतरा है। लेकिन बचावे कौन?

10:55क्योंकि खाली तो बैठते नहीं हैं वो। एक

10:57second से। दैव कर्म का उदय चालू है। इसमें जुड़ना भी चालू है।

11:02अच्छा बुरा करना चालू है। एती पे अती पे वह चालू है। एक second के लिए भी बंद नहीं है।

11:08कौन बचावे? अगर हम नक्की करें कि मुझे भगवान को देखना है। तो

11:12मैं यहीं बिराज पाऊँ। देखना है। मैं यहीं विराजमान हूँ। कि कोशिश करो और

11:16कोशिश करते करते वहाँ तक पहुँच जाए।

11:18तो involve नहीं होना, नहीं तो involve होंगे ही होंगे।

11:22दो रास्ते हैं, involve नहीं होने का भावना और उसकी practice।

11:26अपनी भावना की सफलता, मतलब आत्मा का दर्शन, दो ही मांग है। परमात्मा को चाहना,

11:33उसको पाना ऐसी भावना।

11:35उसके लिए कोशिश,

11:36अंतर्मुख होना

11:37मांगता है। कोशिश

11:40में कभी-कभी ऐसा

11:46हो जाता है, उनके घर में कैसेट सुन रहे हैं, मुझे लगता है कोई... घर

11:49में cassette सुन रहे हैं, हमें

11:50लगता है कोई disturb ना करे। ऊपर

11:52से नहीं आए। घरवाले भी सब लेट गए हैं। ऐसा continuously operation ऐसा

11:54होता है। क्योंकि हम चाहते हैं कि हमारी साधना अच्छी हो। और दूसरा हमारा

11:58अंदर में एक अलग दिशा चल रहा है। कि हमारी साधना में ये सब बाधा डालने वाले हैं। इसलिए

12:02हमारी ये भावना होती है, झूठी इच्छा है। हमको आगे बढ़ना है लेकिन दूसरों को कुचल करके

12:06आगे बढ़ना है। ऐसा मार्ग नहीं

12:07है। दूसरों को हटा करके आगे नहीं बढ़ना है।

12:10दूसरे चारो ओर से हो ना, तो भी हम आगे बढ़ सकते हैं, ऐसा सुंदर मार्ग है।

12:15किसी को हटाना नहीं, किसी को लाना नहीं। ये सब अचु-पचा आप disturb मत करो,

12:21तुम्हारा ध्यान क्यों गया वहां?

12:23इसलिए गया कि हमारे mind में वो घुसा है कि ये सब disturb करता

12:27है। हकीकत में कोई disturb नहीं करता। भगवान को कितना आवाज आ रहा होगा जाने।

12:33हमको भी ये जो ढोल-नगाड़े बजाए तो हमारे ज्ञान में वो

12:36disturb होता है। हम में वो disturb

12:37होता है। भगवान को सारी दुनिया दिखती है कितना disturb होते हैं वो।

12:42लेकिन है जरा भी disturb नहीं। क्यों?

12:45दृष्टि फेर ली। दृष्टि फेर ली तो खत्म हो गई बात।

12:50खाते खाते एकदम मनभावन सा भोजन है।

12:53पहली कोई गर्मी आई तो खाते खाते वो खाने का रस चले गया। देखो दृष्टि बदल गई।

12:58किसका phone होगा? ध्यान वहां चले गया। मुंह में ही है गुलाब जामुन लेकिन रस नहीं है।

13:05ध्यान change। ध्यान change करना, वो ध्यान change करना,

13:08ध्यान बाहर रखना, अंदर रखना, ये

13:09अपने हाथ की बात है।

13:12हाँ, अभी practice नहीं है इसलिए कठिन लगता है, लेकिन practice नहीं तो practice करो।

13:16दूसरों को क्यों हटाते हो? दूसरे की आधार बुद्धि क्यों?

13:20अगर मुक्ति भी किसी के आधार बुद्धि से मिलती हो,

13:23दूसरे के support से मिलती हो, तो ऐसे मुक्ति भी हमको नहीं चाहिए।

13:26बिना support, किसी के भी आधार के बिना, हमको स्वयं अपना मार्ग करना है। माफ़ करना।

13:34इसी के आधार पे हम क्योंकि वो आधार निकल जाएगा तो हम गिर जाएंगे।

13:38और अभी disturb नहीं करेंगे साधना अच्छी होगी अभी disturb करेंगे साधना निकल जाएगी

13:41ऐसी साधना क्या किस काम की? कि

13:44दूसरे कभी भी help कर सके कभी भी disturb नहीं कर सके।

13:48कुछ 3 लोग सारी दुनिया इकट्ठी हो जाए तो भी हमारी साधना में भंग नहीं पड़।

13:53उसका नाम साधना है। थोड़ा बहुत disturbance हो और हमारी साधना में आगे पीछे हो

13:58जाए ये साधना नहीं है। धोखा

14:00है साधना के नाम पे। धोखा है का इतना तनाव। इसलिए

14:02इस मार्ग में हमको किसी को हटाना नहीं, किसी को चुप कराना नहीं,

14:05सामने ही संभाल करो, ठीक है करना।

14:09पूर्व में ऐसे भाव आते हैं क्योंकि हमारी कमजोरी है ना।

14:12कमजोरी हमारी कि हम हमारा ध्यान यहाँ आत्मा में नहीं लगाते।

14:16उसके लिए भी हम दूसरों का आधार चाहते हैं। कि आप खुद पौधा, आप ध्यान मत करो।

14:21फिर बंद क्यों आवाज आता है? हमारी कमजोरी का,

14:26कमजोरी हमारी है और हम गलती किसकी बता रहे हैं? दूसरों

14:30की। ये लोग बात करते हैं ना इसलिए मेरे को ज्ञान

14:32क्षीण हो गया। बिल्कुल गलत बात है। किसी की गलती नहीं है। हमारी स्वयं की कमजोरी है।

14:39अगर दूसरों की गलती समझोगे

14:40तो हमारी गलती है। तो हम सुधर नहीं पाएंगे। क्योंकि दूसरे गलती कर रहे हैं ना

14:45और दूसरे शांत होंगे तभी हमारा काम होगा जब तक बैठे रहो।

14:49नहीं दूसरे कुछ भी करो। support करो चाहे बाधा डालो।

14:53हमको हमारा काम करना है और हम कर सकते हैं। कोई रोकने वाला नहीं

14:58है। ये समझ कर के अभी से वो निकाल देना।

15:00जिसको जितना आवाज करना है करो, जितना आना है, जितने प्रपंच,

15:04आदि, व्याधि, उपाधि जितनी आना है, जितनी आओ। हमको आत्म कल्याण करना है।

15:09हमको किसी की help की जरूरत नहीं है इस मार्ग में।

15:11जहाँ हम परमेश्वर हैं तो किसकी जरूरत है परमेश्वर?

15:14किसी की भी जरूरत नहीं। ये बात कृपा देव ने जब आत्मज्ञान नहीं हुआ।

15:20और आत्मज्ञान होने वाला था 3 महीने के बाद।

15:22तब ये बात हमको अंदर में आ रही बात। अंदर में आ गई बात। देखो

15:28आत्मा की जो हृदय लत्ता होती है वही गोपाल देव की हृदय लत्ता है यहाँ

15:32एक तो हटा ही मत रहो।

15:35ज्यादा क्या कहूँ भूतकाली ने जो भ्रांति किया था और कर्म बांधे और भ्रमण किया।

15:42उसका स्मरण होते ही अब कैसे जिंदा रहना हो चिंता हो पड़ी है। तो कर्म बांधने नहीं

15:47अब भटकना नहीं है लेकिन गलती हो जाती है।

15:51राक्षस द्वेष नहीं करना है लेकिन

15:52हुए बिना रहते नहीं। नहीं लेकिन होय विना रहेते नहीं. अने करम बंधा के

15:55office भोगना पडेगा ए चक्कर निपटाडीने क्यां करुं? केसे जीन्दा रहुं? फरी

16:00न ज जन्मवुं अने फरी

16:02न ज करवुं एवुं जडत्व आत्मामां

16:04प्रकाशे छे. एटले आत्मा कहेता के नहीं fight

16:08करो कुछ भी हप्तो पीछे उडके नहीं देखना है. पण कईक निरूपायता छे

16:13त्यां केम करो? गर्द दशा

16:15है निरूपायता है. सही प्रकार के

16:17बोजा है काम का जिम्मेदारी है. तो ध्यान

16:21उधर उधर बी जाता है. अमारे कुछ मो है कुछ

16:25परिस्थितियां है. के ध्यान बहार जाता है. त्यां हवे केम करवुं? प्रश्न

16:29जवाब जे द्रढता छे ते पूर्ण करवी. जरूर पूर्ण करवी है जतन. पण जे कई

16:35आडुं आवे छे. एने कोरे करवुं पडे छे खसेडवुं पडे छे. तो disturb

16:41करता है अमको बोलना है बेटा

16:42please बंध करो हवे ने एसा करना पडता है. त्यां ज्यां घोंघाट होय वहां से दूर जाना

16:45पडता है. अमको हटना है या

16:46तो अमको हटना है 2 में से एक

16:47बार. हमको हटना है या तो उनको हटाना है

16:50दो में से एक बात अभी करना धरना चालू। हमको हटना है

16:54या उनको हटाना है। इसमें समय चले जाता है, जमा काज जाए,

16:59जीवन चालू जाए, यानी ना दवा दे। जहाँ तक भी यथा योग्य गए ना थाए क्या सुचे,

17:06जब तक हमको आत्मदर्शन नहीं हो, तब तक हमको जीवन को ऐसा व्यर्थ होना नहीं, एक-एक पल का

17:12कीमत लगाना है।

17:14ऐसी दृढ़ता है लेकिन क्या करें? कदापि

17:15कोई रिते... कदापि कोई रीते एमांनुं कई करीए तो एवुं स्थान क्यां छे के ज्यां जईने

17:22रहीए. एसा कोणसा स्थान छे दुनियामां?

17:24के जीसके त्यां जाकरके कोई वित्सरवंश नहीं होय. अर्थात

17:27एवा संतो क्यां छे? असंत की जरूरत पडती है. वित्सरवंश तो

17:32बहोत है. लेकिन माल निकालना हमको आता नहीं है तो हम क्यां करेंगे? हम

17:37दूसरो को हटाने में लग जायेंगे जिंदगी चले रहेंगे. एतुं बेठो एसा करो

17:42एसा करो वित्सरवंश न करो.

17:44पूरा ध्यान क्यां चले लेंगे? पूरा ध्यान क्यां चलेला? ध्यान आना ता इधर ओर गया उधर

17:50बहार. हटाववा करवा. अर्थात एवा संतो

17:52क्यां छे के ज्यां जईने ए दशामां बेसीने पोतपोतानुं. इसमे से बीजा बंध को हटावना

17:58नहीं है साहेब. प्रतिबंध को

17:59नहीं हटावना है, हमको हटावना है. पूरा

18:02change करना है अपने में करना है, दूसरा में नहीं करना है. लेकिन ए कला कोण शीखा है?

18:07इसले कहेते है के एसे संत

18:08कहा है के ज्यां बेट करके. उनसे support

18:12लेते रहे पोषण पामे. त्यारे हवे केम करवुं? सदगुरु भी नहीं

18:17सेम तो. किसको पूछे?

18:19तो अंदरथी आत्मा अवाज देती

18:21है, क्यां अवाज देती है? गमे तेम

18:24हो, गमे एटला दुःख वेठो, गमे एटला परीषह

18:28सेन करो, गमे एटला उपसर्ग सेन करो, गमे एटली व्याधिओ

18:33सेन करो, गमे एटली उपाधिओ आवी पडो, गमे एटली आधिओ आवी पडो, गमे

18:39तो जीवनकाळ एक समय मात्र हो. दुःखकाळ एक समय मात्र. अने

18:44दुर्लक्ष्यो. जिंदगीनी एक समयथी सारो

18:46ओर दुश्मन. निमित्त ज छे. पण एम करवुं ज. तो पण

18:52मारे आत्मकल्याण ज करवुं.

18:53के जे बी चाहे एम

18:56तो जीती इस्ली. के जे बी बळो की करना ताकात

19:00गेइन करना मित्रो को

19:02हटाने नहीं अपने को बळवान

19:05बनाना. ओर भावना बडेगी. के बळ...

19:09तो बलवान हो जाओ भावना बढ़ाना है। आत्म भावना बढ़ाना है। तीनों होते हैं।

19:16अपनी भावना बढ़ेगी हम कमजोर नहीं रहेंगे तो सामने

19:18वाला हार जाएगा। अपनी ही भावना कमजोर रहती है कोई disturb किया।

19:23तो जबरदस्ती किया तो वहां से ही चले गए

19:25आज नहीं जाऊंगा सत्संग। आज आपके साथ चलेंगे देखो। हमारी ही भावना down

19:31है। और कुछ time में adjustment करते तो फिर adjustment भले करो लेकिन सस नहीं

19:37होना है। जो तुम दुख

19:38हो ना। देखो कैसे enter आ रहे

19:39हैं, कैसे पाप किया था सत्संग में नहीं गए। कैसा किया है?

19:44जो करना चाहते हो तो ऐसा नहीं हो,

19:46ऐसा आज्ञा देना पड़ता है, ऐसी जीनी जिंदगी जीना पड़ रहा है।

19:50अपनी मर्जी से हम आत्मज्ञान भी नहीं कर सकते, ऐसा बताया हमने।

19:53ये हमारी गलती है, ये कोई गलती नहीं। हम ही उस मात्रा में।

19:58हमारे ही पूजा में किए गए कर्मों का उदय। कोई control नहीं है, कोई मित्र नहीं है।

20:04तो इसका अफसोस है सत्संग से। तो इसका अफसोस है, सत्संग सुनने का खेद,

20:07भावना नहीं बढ़ने का खेद,

20:08संसार में बार-बार फंस जाते हैं, इसका खेद। तो

20:11हमको होना चाहिए इस तरह की। अगर नहीं होता है तो फिर आप राजी हो

20:17भटकने में।

20:19भटकने में आखिर नहीं होता adjustment करो, सत्संग छोड़ो, भले उनके साथ जी कर जाओ।

20:23लेकिन खट्टा तो होना चाहिए।

20:25अंदर में तकलीफ तो होनी चाहिए। कि मैं क्या हो रहा है, मेरा नुकसान हो रहा है।

20:30मेरी आत्मा का तो नुकसान हो रहा है।

20:32तो नुकसान करते करते नुकसान... तो

20:33नुकसान करते तो नुकसान के भाव

20:34से आप कहीं भी गए। लेकिन नहीं नुकसान नहीं हो रहा हमको, अहित

20:37करने को बोला है, राजद्रोह करने को बोला है,

20:40झगड़ा पंचायत करने को नहीं बोला है। तो क्या राजियों को के जाने को बोला है?

20:46वो भी तो नहीं बोला है। सत्संग छोड़ कर के

20:51घर परिवार के पास में समाज के नियम के अंदर

20:53हमको कहीं जाना-वाना पड़ता है, मेल होना पड़ता है, नहीं चाहते हैं। हम

20:59झगड़ा करके सत्संग में आना नहीं चाहते। झगड़ा करके तो हष्टपुष्ट नहीं था। और

21:03झगड़ा करके आएंगे तो आप ही हमको डांटेंगे।

21:06नहीं आना था एक दिन। तो नहीं आना था। घर में बैठे।

21:12और फिर हम वो बात को ले लिए और फिर क्या

21:14किए adjustment कर लिए। अच्छा नहीं आएंगे यहां पर। लेकिन

21:18नहीं आए तो इसका अफसोस कितना हो रहा है। हष्टपुष्ट है उसका अफसोस कितना हो रहा

21:23है। अगली बात करी। फिर से एक करी। के वियोग में अपन फिर सतपुरुष में रहे।

21:29वियोग में कोई कल्याण। और हम इज्जत करने आते हैं, साथ को छोड़ देते हैं,

21:34वियोग में आते हैं, हमको तकलीफ जरा भी नहीं होती। तो इज्जत करने को आपने ही कहा था ना?

21:40बात यह है।

21:42आपने ही कहा था कि झगड़ा नहीं करना। अब क्या करें? दोनों भाइयों से

21:48मांग लीजिए अगर नहीं समझते।

21:50इसलिए कृपा करके उन्होंने बहुत सुंदर सूत्र दिया हाथ में।

21:54जहां जहां जे जे योग्य थे, वहां वहां। जिससे अपनी आत्मा का फायदा होवे

22:00वैसा काम। गुरु के वचन चारों तरफ हैं, हमको कौन सा वचन उठाना है?

22:05जिससे हमारी आत्मभावना बढ़े, हमको लाभ होवे वैसे वचन उठाना है।

22:10परमात्मा वाले वचन धीरज रखो ऐसा वचन ज्यादा है।

22:14मैं तो लकड़ी खाने को तैयार हो जाओ ऐसा है। सीधी सी बात है। नहीं नहीं हो

22:18जाएगा आपको फ्यूचर में सतम मिल जाएगा तो भी adjustment करना जागृति में रहना।

22:22हम भक्तों के लिए नहीं है। वो तो क्या है कैसा भी करके।

22:28वो तो क्या है कैसे भी करके। कैसे भी करके खड़ाना है ऊपर इसलिए कहते

22:32हैं जीभ नहीं बांटे। स्वामी महाराज को बहुत उदाहरण देता है। यही हम सत्संग में

22:36ही तो बता दिया है ना।

22:38Then सत्संग में ही तो करेंगे।

22:41फिर इसमें बाधा आती है तो अब क्या करेंगे? तो

22:43उसका भी उदाहरण देता है बाधा को adjust करेंगे।

22:46मर जाओगे कहीं।

22:49उसका intention कैसा है इनका ये बात का intention दोनों

22:50बातों का combination उसमें होना चाहिए। दोनों

22:52बातों का combination होना चाहिए। मिश्रण,

22:55एक balancing मिश्रण होना चाहिए।

22:58नमक कम ना होवे तो भी नहीं चले, कम होवे तो नहीं चले,

23:01ज्यादा होवे तो नहीं चले, इसमें कैसा balance रहता है।

23:04ऐसे सद्गुरु की धीरज रखने की बात और पुरजोर करने की बात,

23:08दोनों का मिश्रण ऐसा बिल्कुल बराबर है।

23:11ज्यादा धीरज रखेगा तो भी खो देगा, ज्यादा पुरजोर करके गड़बड़ी करेगा

23:15तो भी खो देगा। Balance में रहना है।

23:18राग और द्वेष से हटकर के balance का मन, इसमें तैयारी रखो।

23:20उसमें तैयारी रखो, काहे की तकलीफ है।

23:23हमको किसी को हटाना नहीं, हमको हमारे को change करना है।

23:27दुनिया को नहीं change करना है, हम अपने को change करेंगे।

23:30ये मार्ग जो है, अपने को change करना

23:34है। यहाँ कहते हैं कि हे

23:35योगी, देह में परमात्मा का निवास होने पर भी उस देह में स्थित परमात्मा को

23:41तुम क्यों नहीं देखते? उस परमात्मा के दर्शन से, ये अंदर में विराजमान है वो,

23:47उसके दर्शन से।

23:49फिर दर्शन सीधा बात और आगे की बात है। फिर दर्शन नजर मिली ना, इससे ही

23:56तेरे पूर्व उपाधि कर्म चूर चूर हो जाएंगे।

24:01तुझे ज्यादा कुछ करने की जरूरत ही नहीं है पुजारी बनने की और व्रत तप करने

24:05की उपवास आदि करने की माला

24:06करने की। क्योंकि नजर में आते ही,

24:09सब शांत। आंख खुलते ही,

24:13प्रकाश। ऐसे ही यहां पर नजर में आते ही। तो ही यहां पर नजर में आते ही पूरे

24:19कर्मों का चूरा चूरा हो जाता

24:21है। और क्या होगा?

24:22तुम निर्वाण को प्राप्त हो। एक बार तू परमात्मा को देख लेगा सिर्फ एक बार।

24:27कितना time के लिए? एक समय के लिए सिर्फ। एक समय मतलब कितना?

24:33एक घंटे का 60 minute। एक एक minute

24:37का 60 second। कितना? 3600। तो एक एक second का

24:42असंख्य होगा। उसको बोलते हैं। उसको बोलते हैं समय। कितना बारीक हो गया।

24:47मोटा स्वरूप पकड़ो ना second का तो

24:48भी 3600 बार एक घंटे में 3600 बार कर सकते हैं आमादा।

24:52मोटा स्वरूप। उसका अगर एक एक को पकड़ो तो

24:56अनगिनत बार कर सकते हो। मतलब कितना झकझोर है कहीं और कुछ नहीं।

25:01कि देखना मात्र।

25:02अंदर में परमात्मा इतना अगर देख गए। इतना समय नहीं मिलता है क्या आपको दिन भर में?

25:07कि हम एक समय नहीं देख पाते हैं।

25:11क्यों नहीं देखते हैं? एक समय की जगह... तो नहीं दे सकता एक समय की जगह। तो बहुत

25:14काम है बहुत भलाई है लेकिन

25:16एक समय में नहीं कर सकते क्या? खाने

25:20को time मिले, पीने को time मिले, नींद लेने का time मिले।

25:23पेपर पढ़ने का time मिले, TV देखने का time मिले।

25:26रेफरेंस करने का, घर व्यवस्था करने का, उसमें से आप एक second भी नहीं निकाल सकते। एक

25:30second भी नहीं। एक second का

25:31असंख्य टुकड़े। देख। इतना ही समय चाहिए इसके ऐसे दर्शन।

25:39इतना ही समय चाहिए इसके ऐसे दर्शन मात्र से ही

25:43तेरे पूर्व उपाजित कर्म चुटकु हो जाएंगे और तू निर्वाण को प्राप्त हो जाएगा

25:48इतनी सी बात। काल बहुत छोटा लगता है

25:51बिल्कुल छोटा और चमत्कार कितना बड़ा होता है। ये एक समय की कीमत कितनी

25:58अनंत जन्म मरण का खातिर। हमेशा के लिए निर्वाण तक

26:02पूर्ण शांति भगवान बन जाएंगे। महान

26:06पुरुष मिलने आए हो और सामान्य बालक आदि के। और सामान्य बालक आदि

26:09के साथ बातें करने में लग जाए समय घुमा देवे।

26:13तो वह महापुरुष का आत्मा है। सुपर आएगा नहीं आपके साथ।

26:17दादाजी हो या film star हो या कोई

26:20प्रधानमंत्री आया हो वो date करे 7-8 घंटा। आपको बैठे रहना है खड़े रहना है।

26:25लेकिन वो आया और आप नींद देवे भला। वो नहीं चाहे।

26:30किसी से बात करे तो नहीं चाहे। वो आया तो उसका स्वागत होना चाहिए।

26:34महान पुरुष मिलने आए और आप इतने बालको... आए हो और

26:36आप इतने बालकों वाली से बात करने में लग जाते हो।

26:40तो वो अपमानित हो जाता है,

26:41मेरी खबर नहीं लेते हो, मैं इतना बड़ा महान आदमी आया हूँ। MLA आया तो भी उसको घर में

26:46आदर-सदर करना पड़ता है, गली में भी आया है।

26:50उसका अगर ऐसा नहीं करते हो तो उसको अपमान ही होता है। तो वो

26:55महापुरुष का अपमान है, उसी प्रकार तीन लोक का नाथ स्वयं

27:00है। देव रमन रमनार के, देव देव देव, देव देव का देव है, परम भगवान।

27:04देई देवा का देव है, परम भगवान।

27:06सुरी लोक का उचित रूप है। सबसे बढ़िया से बढ़िया। ऐसा नहीं फरमाते।

27:13हमारे सामने चिन्मय साहेब जी, श्रील प्रभुपाद जी,

27:17हम चिन्मय साहेब जी के collection में।

27:20सुख धाम अनंत सुसंत चही,

27:27दिन रात रहे तद ध्यान मही। ध्यानमहि

27:34प्रशान्ति अनन्त सुधामयजे

27:41प्रणमु पदते वरते जयते।

27:48प्रणमु पदते वरते जयते। जयते.