Dravya Drashti Jineshwar
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Recitations restored to their canonical wording: Mangalacharan — Mangalam Bhagavan Viro, Mangalacharan — Sarva Mangala Mangalyam, Namokar mantra, Omkar bindu sainyuktam, Samaysar mangalacharan.
0:12णमो अरिहंताणं णमो सिद्धाणं णमो आयरियाणं णमो उवज्झायाणं
0:19णमो लोए सव्व साहूणं नमः समयसाराय
0:24स्वानुभूत्या चकासते । चित्स्वभावाय भावाय
0:30सर्वभावान्तरच्छिदे मंगलं भगवान वीरो,
0:35मंगलं गौतमो गणी। मंगलं कुन्दकुन्दार्यो,
0:40जैनधर्मोऽस्तु मंगलम्॥ सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं
0:45सर्वकल्याणकारकम। प्रधानं सर्वधर्माणां
0:51जैनं जयति शासनम॥ बिंदु संयुक्तम ॐकारबिन्दुसंयुक्तं
0:56नित्यं ध्यायन्ति योगिनः।
0:57कामदं मोक्षदं चैव ॐकाराय नमो नमः श्री द्रव्य दृष्टि ठीलेश्वर। पूज्य
1:00कान्जी स्वामी की रचना number
1:0154। हे योगी, देह में परमात्मा
1:07का निवास होने पर भी इस देह में
1:13स्थित परमात्मा को तुम
1:18क्यों नहीं देखते?
1:22क्यों नहीं देखता?
1:27उस परमात्मा के दर्शन से, तेरे पूर्व उपार्जित कर्म चूर चूर हो जाएंगे।
1:34और तू निर्वाण को प्राप्त हो जाएगा। महान पुरुष मिलने आए हो,
1:41और सामान्य बालक आदि के साथ बातें करने में लग जाए, तो वह महापुरुष का अपमान है।
1:48उसी प्रकार तीन लोक का उत्कृष्ट तत्व ऐसा नीच परमात्मा।
1:53देह में विद्यमान होने पर भी उसे तू देखता नहीं है।
1:59और पर प्रपंच की जानकारी में पड़कर निज परमात्मा का अपमान कर रहा है।
2:06क्या करना और क्या नहीं करना गलती बताइए। जीव की गलती क्या?
2:11इतना sentence है वो आत्मसिद्धि में एक ही line है पहली line।
2:15जे स्वरूप समझा बिना। आम हो रूपान। तो स्वरूप है वो अपना जो स्वरूप है
2:19वो परमात्मा तत्व। है वो अपना जो स्वरूप है वो परमात्मा तत्व है।
2:23जन्म मरण से रहित, राग द्वेष से रहित, अनंत गुणों का भंडार स्वयं है।
2:29वो विराजमान कहाँ है? कहाँ ढूँढेंगे उसको? शरीर के बाहर नहीं।
2:34शरीर के अंदर देखो 3 गुफा में आया था, शरीर के अंदर ही है।
2:39तो अनुभव प्रकाश में 3 गुफा के पीछे आत्मा विराजमान है,
2:46परमेश्वर विराजमान है। एक तो ये शरीर की गुफा है।
2:50एक तो शरीर की गुफा है। अंदर में है ब्रह्म कर्म की गुफा। तीसरी गुफा है भाव कर्म
2:55राग द्वेष के भाव। वो राग द्वेष के पर्दे के पीछे भगवान
3:00है। 3 गुफा को पार करना। तो मैं तो ढूंढने निकला body में कहीं मिला नहीं।
3:05तो वापस जा रहा था। तो बोले नहीं नहीं कहाँ जा रहे हो?
3:09तो मैं भगवान को ढूंढने अंदर गया देखा मैं पूरा body
3:12में एक एक कण को। तो मेरे को मिला नहीं। आप तो कहते हो कि
3:14देह में निवास है। आप तो कहते हो
3:16कि देह में निवास है तो देह में कहाँ लिखा मेरे को तो
3:19कहीं दिखता नहीं ना इधर है ना इधर है।
3:22बोले यहाँ से बाहर तो कहीं भी नहीं है। इसके अंदर में दूसरी गुफा है। द्रव्य कर्मक
3:29आठों कर्मों की। उसके पीछे विराजमान है भाव कर्मक। तो द्रव्य कर्मक की गुफा माने क्या?
3:35कि हम चुपचाप बैठेंगे तो भी विचार आते हैं। क्योंकि पूर्व कर्म में जैसा हमने
3:41कर्म किया है उस अनुसार
3:42उड़े आता है। भाव भी सभी हम... भाव भी सभी हम करते हैं ऐसा नहीं।
3:48जितने भी भाव हैं, हम चुपचाप बैठेंगे तो भी आएंगे। इतना heavy है।
3:53इसका मतलब क्या? द्रव्य कर्मों की मौजूदगी है।
3:57कुछ करना नहीं, कुछ करना,
3:59कुछ नहीं करना दोनों से हट जाएंगे,
4:00चुपचाप बैठोगे ना तो भी आप बैठोगे नहीं, मन नहीं बैठेगा।
4:04और कुछ ना कुछ चलेगा। ये बताता है कि द्रव्य कर्मों की मौजूदगी है।
4:11इसके पास, अभी इसमें joint होंगे तब क्या होता है? joint कैसे होना?
4:16अरे ऐसा खराब भाव क्यों आया?
4:18ऐसा नहीं अच्छा भाव होना चाहिए। ये joint हुआ इसका नाम भाव कर्म।
4:23प्रसंग के साथ joint हो गए। आया और चले गया वो तो आया तो चले जाने के लिए आया है।
4:28जो भी कर्मों का उदय आता है मन में विकल्प आते हैं
4:31वो कोई टिकते थोड़े हैं। अभी एक विकल्प कल दूसरा 1 second के बाद पलट
4:35जाता है दूसरा विकल्प। 1 second के बाद तीसरा विकल्प। अगर हम सिर्फ जानने देखने रह गए।
4:42तो बच गए। और जानने देखने नहीं हुए।
4:45और उसमें involve हुए कि ये भाव अच्छा है ये भाव बुरा है ऐसा करना है ऐसा नहीं करना।
4:50ये भाव कर्म आ गया। बस ये भाव कर्म के पर्दे के पीछे भगवान विराजमान है।
4:56अगर भाव कर्म नहीं होवे तो भगवान दिख जाएंगे। भगवान को देखना आसान। तो
5:02हमारे को involve नहीं होवे नहीं तो
5:05राग द्वेष के भाव नहीं होवे कोई वितराग अवस्था हो
5:08जाएगी। तो वितराग अवस्था में... हो जाए। वितराक
5:09अवस्था में ही वितराक प्रभु के
5:10दर्शन होते हैं। अंधों को सूर्य नहीं दिखता है।
5:14आंख वाले को ही सूर्य दिखता
5:17है। ऐसे वितराक परमेश्वर का दर्शन करने के लिए हम भी वितराक चाहिए।
5:22हम रात पेश करें और हमको भगवान का दर्शन करना है कैसे होगा ये? हमको
5:26दुनिया की उथल-पुथल करना है।
5:28कुछ करना है कुछ नहीं करना है।
5:30शांति से बैठना ही नहीं है 1 second के लिए।
5:33चुपचाप बैठे हैं तो भी कुछ काम नहीं है तो भी कुछ ना कुछ सोचना है। हमको सोचना है।
5:38अपने आप विचार आवे वो द्रव्य कर्म। हम सोचे वो, हम involve होवे वो, तो भाग।
5:46पूरी गलती हमारी है। तो भाव कर्म तो हमारी
5:50अजागृति के कारण, अज्ञानता के कारण, मोह में फंसने के कारण होते
5:55हैं। अगर हम मोह में नहीं फंसे, चुपचाप देखना है तमाशा।
6:00भगवान शिव भगवान क्या
6:01देखते हैं? शिव ज्ञान में। पूरी दुनिया को देखते हैं लेकिन हैरान नहीं होते। दुनिया
6:06को देखते हैं लेकिन है राग द्वेष
6:07कहाँ से? हम तो प्रणीत हैं। पूरी दुनिया
6:09को देखते हैं। अपने भूतकाल के कई अनंत माँ-बाप, अनंत
6:13माई-बाप, सगे-संबंधी, मित्र-वज्र, दुश्मन-वज्र सबको देखते हैं। दुश्मनों को देखते हैं।
6:19तकलीफ होती है। अपने माँ-बाप को देख लेते हैं।
6:23वो दुखी है तो, घर-गृहस्थी में कोई होंगे तो दुखी होते हैं। राग द्वेष का नाम नहीं
6:29लिया। हमको भगवान बनना है तो अभी से practice ऐसी करनी है। भगवान... ऐसे
6:32करनी है। भगवान सर्वश्रेष्ठा है। ये तो भगवान
6:35की एक ही गलती है हम गलतियों के और करना है।
6:38लेकिन हम उनकी चाल पे practice शुरू कर दें अभी से। कि हमको कोई भी प्रसंग आ जाए।
6:44हमको इंजॉय नहीं आना है। अच्छा बुरा कुछ नहीं बुरा चीज बुरा नहीं
6:49क्रोध बुरा है सारी दुनिया कहती है।
6:51अध्ययन दर्शन कहता है क्रोध एक ज्ञान का ध्येय है। वो अच्छा भी नहीं है बुरा
6:56भी नहीं है। वो आपको कुछ नुकसान नहीं करता।
6:59परमेश्वर को कुछ नुकसान नहीं करता है आपसे
7:01देखा जाए। आपको नुकसान नहीं करता है, आपको बेकाफ हैरान करता है। कोई दुश्मन आपको
7:05हैरान नहीं करता है, कोई मित्र आपको support नहीं करता है। मित्र ज्यादा
7:08हो जाएंगे तो आपके आत्मा में गुण की वृद्धि नहीं होती है,
7:10लक्ष्मी अधिकार बढ़ता है तो आपके
7:12गुणों में कुछ नहीं आता है। आत्मा अभिगत नहीं होता है।
7:16और नरक में, नरक में जलेगा तो नरक में। तो
7:19आपका, आपके आत्मा को कुछ भी नहीं होता। परमेश्वर तत्व में।
7:25अवस्था में गलती किया था इसकी सजा काट रहा है लेकिन।
7:29मूल द्रव्य को। मूल द्रव्य को
7:32कुछ भी नहीं होता। पानी गर्म हो सकता है अगर अग्नि का संपर्क है। लेकिन स्वभाव नहीं
7:36बदला। अग्नि चाहे जितनी भी हो,
7:38पानी का स्वभाव बदल सकते हैं। गरम पानी का स्वभाव भी शीतल है। ऐसे
7:46अनुकूल प्रतिकूल स्थिति में, अच्छे बुरे भावों के अंदर, परमात्मा जैसा का वैसा है।
7:53उसको कुछ भी नहीं हुआ। ऐसे परमात्मा कहाँ रहता है?
7:58हे योगी, देह में परमात्मा का निवास है।
8:03ऐसा होने पर भी इस देह में स्थित परमात्मा को तू क्यों नहीं देखता है?
8:09कुछ उसको सुधारना नहीं है कि बिगड़ गया है, काला हो गया है, मैला हो गया है,
8:13रागी हो गया है, द्वेषी हो गया है तो,
8:16पश्चाताप करो, कुछ व्रत नियम लो, कुछ सजा लो अपने आप को,
8:21प्रायश्चित करो तो सुधर जाएगा वो। परमो का मैलापन जो है उसका
8:23निकल जाएगा। और मैलापन जो है उसका निकल जाएगा।
8:27जैसे कपड़ा मैला होता है तो साबुन पानी से साफ करते हैं।
8:30ऐसा यहाँ आत्मा मैला नहीं हुआ है स्वभाव।
8:34इसलिए साबुन पानी, प्रायश्चित, व्रत, तप, नियम की कोई जरूरत नहीं।
8:39देखो इसमें आया व्रत तप भी सहा।
8:41हमें व्रत तप भी नहीं चाहिए। जगत के ऊँचे पद भी नहीं चाहिए, इंद्र, नरेंद्र
8:45के पद को भी हमको सहागा।
8:47मान, दौलत को भी सहागा।
8:50और जो कुछ गतिविधियाँ होती हैं, व्रत तप आदि, वो भी
8:52सहागा। होती हैं व्रत उपवास वो भी स्वाहा। हमको तो सिर्फ परमेश्वर को देखना है।
8:57तुम जैसा बनिए के कारण अरंत माणा।
9:02वीतराग के पथ पर चलने का प्रण लेकर आए। हमको कुछ नहीं है वीतराग बनना है।
9:08राग द्वेष के भाव के बुरे भाव सब स्वाहा कुछ करना नहीं है मुनिगिरी में।
9:14अपने आप होते तो बंद भी नहीं करना है अपने आप होते हैं तो करना है।
9:18क्योंकि आप चुप तो नहीं बैठो।
9:20आपकी भूमिका अनुसार पूर्व कर्म। आपकी भूमिका अनुसार पूर्व कर्म बांधे
9:22हैं जब तक वो खत्म नहीं हो जाएंगे
9:23पूरे तब तक आते रहेंगे इसी माध्यम से।
9:26तो अपने आप। देखिए आप involve हो गए तो प्रभाव करेंगे। अब भगवान कहाँ है?
9:32भाव कर्म के पर्दे के पीछे।
9:36देह में परमात्मा का निवास होने पर भी इस देह में स्थित परमात्मा को
9:40तू क्यों नहीं देखता है?
9:43अब यहाँ नहीं देखेगा तो रात भर सोके ही होगा involve होगा ही होगा।
9:46Involve नहीं होना था फिर भी involve हो गया।
9:49क्यों? Involve होगा। क्यों? कि जो कार्य करना है वो तो करता नहीं। भगवान को
9:53देखेगा, देखने की कोशिश करेगा,
9:55तो राग द्वेष मन में करके खत्म हो जाएगा। लेकिन भगवान को देखने की कोशिश भी नहीं है।
10:01उसका thinking भी नहीं चलता है। और दूसरे प्रपंच में पड़ा है।
10:05तो राग द्वेष बढ़ेंगे और
10:06हम कितना भी बोले कि हमको involve नहीं होना, अच्छा बुरा भाव नहीं करना है।
10:11कुछ ठीक नहीं है, कुछ ठीक नहीं है लेकिन
10:13हम involve होंगे क्यों नहीं हैं? राग द्वेष हो ही
10:17जाएंगे। राक्षस हो ही जाएंगे और जब तक राक्षस रहेंगे अंश मात्र में।
10:21आत्मा का दर्शन नहीं। ऐसे मुनिवर देखे वन में। जाके राग द्वेष
10:28नहीं मन में। मन में भी अगर पाठ से पुता नहीं करो लेकिन मन में ही भी अगर
10:33द्वेष बुद्धि आ जाए। परमात्मा का भाव नहीं। मन से वचन से काय से।
10:39करूं कराऊं अनुमोदना 9 कोटि। एक भी दोष नहीं होना चाहिए।
10:45ना पुण्य भाव होना चाहिए ना पाप का होना चाहिए। पुण्य भाव करो
10:48तो भी खतरा है। 9 कोटि से।
10:51और पाप का भाव होवे तो भी खतरा है। लेकिन बचावे कौन?
10:55क्योंकि खाली तो बैठते नहीं हैं वो। एक
10:57second से। दैव कर्म का उदय चालू है। इसमें जुड़ना भी चालू है।
11:02अच्छा बुरा करना चालू है। एती पे अती पे वह चालू है। एक second के लिए भी बंद नहीं है।
11:08कौन बचावे? अगर हम नक्की करें कि मुझे भगवान को देखना है। तो
11:12मैं यहीं बिराज पाऊँ। देखना है। मैं यहीं विराजमान हूँ। कि कोशिश करो और
11:16कोशिश करते करते वहाँ तक पहुँच जाए।
11:18तो involve नहीं होना, नहीं तो involve होंगे ही होंगे।
11:22दो रास्ते हैं, involve नहीं होने का भावना और उसकी practice।
11:26अपनी भावना की सफलता, मतलब आत्मा का दर्शन, दो ही मांग है। परमात्मा को चाहना,
11:33उसको पाना ऐसी भावना।
11:35उसके लिए कोशिश,
11:36अंतर्मुख होना
11:37मांगता है। कोशिश
11:40में कभी-कभी ऐसा
11:46हो जाता है, उनके घर में कैसेट सुन रहे हैं, मुझे लगता है कोई... घर
11:49में cassette सुन रहे हैं, हमें
11:50लगता है कोई disturb ना करे। ऊपर
11:52से नहीं आए। घरवाले भी सब लेट गए हैं। ऐसा continuously operation ऐसा
11:54होता है। क्योंकि हम चाहते हैं कि हमारी साधना अच्छी हो। और दूसरा हमारा
11:58अंदर में एक अलग दिशा चल रहा है। कि हमारी साधना में ये सब बाधा डालने वाले हैं। इसलिए
12:02हमारी ये भावना होती है, झूठी इच्छा है। हमको आगे बढ़ना है लेकिन दूसरों को कुचल करके
12:06आगे बढ़ना है। ऐसा मार्ग नहीं
12:07है। दूसरों को हटा करके आगे नहीं बढ़ना है।
12:10दूसरे चारो ओर से हो ना, तो भी हम आगे बढ़ सकते हैं, ऐसा सुंदर मार्ग है।
12:15किसी को हटाना नहीं, किसी को लाना नहीं। ये सब अचु-पचा आप disturb मत करो,
12:21तुम्हारा ध्यान क्यों गया वहां?
12:23इसलिए गया कि हमारे mind में वो घुसा है कि ये सब disturb करता
12:27है। हकीकत में कोई disturb नहीं करता। भगवान को कितना आवाज आ रहा होगा जाने।
12:33हमको भी ये जो ढोल-नगाड़े बजाए तो हमारे ज्ञान में वो
12:36disturb होता है। हम में वो disturb
12:37होता है। भगवान को सारी दुनिया दिखती है कितना disturb होते हैं वो।
12:42लेकिन है जरा भी disturb नहीं। क्यों?
12:45दृष्टि फेर ली। दृष्टि फेर ली तो खत्म हो गई बात।
12:50खाते खाते एकदम मनभावन सा भोजन है।
12:53पहली कोई गर्मी आई तो खाते खाते वो खाने का रस चले गया। देखो दृष्टि बदल गई।
12:58किसका phone होगा? ध्यान वहां चले गया। मुंह में ही है गुलाब जामुन लेकिन रस नहीं है।
13:05ध्यान change। ध्यान change करना, वो ध्यान change करना,
13:08ध्यान बाहर रखना, अंदर रखना, ये
13:09अपने हाथ की बात है।
13:12हाँ, अभी practice नहीं है इसलिए कठिन लगता है, लेकिन practice नहीं तो practice करो।
13:16दूसरों को क्यों हटाते हो? दूसरे की आधार बुद्धि क्यों?
13:20अगर मुक्ति भी किसी के आधार बुद्धि से मिलती हो,
13:23दूसरे के support से मिलती हो, तो ऐसे मुक्ति भी हमको नहीं चाहिए।
13:26बिना support, किसी के भी आधार के बिना, हमको स्वयं अपना मार्ग करना है। माफ़ करना।
13:34इसी के आधार पे हम क्योंकि वो आधार निकल जाएगा तो हम गिर जाएंगे।
13:38और अभी disturb नहीं करेंगे साधना अच्छी होगी अभी disturb करेंगे साधना निकल जाएगी
13:41ऐसी साधना क्या किस काम की? कि
13:44दूसरे कभी भी help कर सके कभी भी disturb नहीं कर सके।
13:48कुछ 3 लोग सारी दुनिया इकट्ठी हो जाए तो भी हमारी साधना में भंग नहीं पड़।
13:53उसका नाम साधना है। थोड़ा बहुत disturbance हो और हमारी साधना में आगे पीछे हो
13:58जाए ये साधना नहीं है। धोखा
14:00है साधना के नाम पे। धोखा है का इतना तनाव। इसलिए
14:02इस मार्ग में हमको किसी को हटाना नहीं, किसी को चुप कराना नहीं,
14:05सामने ही संभाल करो, ठीक है करना।
14:09पूर्व में ऐसे भाव आते हैं क्योंकि हमारी कमजोरी है ना।
14:12कमजोरी हमारी कि हम हमारा ध्यान यहाँ आत्मा में नहीं लगाते।
14:16उसके लिए भी हम दूसरों का आधार चाहते हैं। कि आप खुद पौधा, आप ध्यान मत करो।
14:21फिर बंद क्यों आवाज आता है? हमारी कमजोरी का,
14:26कमजोरी हमारी है और हम गलती किसकी बता रहे हैं? दूसरों
14:30की। ये लोग बात करते हैं ना इसलिए मेरे को ज्ञान
14:32क्षीण हो गया। बिल्कुल गलत बात है। किसी की गलती नहीं है। हमारी स्वयं की कमजोरी है।
14:39अगर दूसरों की गलती समझोगे
14:40तो हमारी गलती है। तो हम सुधर नहीं पाएंगे। क्योंकि दूसरे गलती कर रहे हैं ना
14:45और दूसरे शांत होंगे तभी हमारा काम होगा जब तक बैठे रहो।
14:49नहीं दूसरे कुछ भी करो। support करो चाहे बाधा डालो।
14:53हमको हमारा काम करना है और हम कर सकते हैं। कोई रोकने वाला नहीं
14:58है। ये समझ कर के अभी से वो निकाल देना।
15:00जिसको जितना आवाज करना है करो, जितना आना है, जितने प्रपंच,
15:04आदि, व्याधि, उपाधि जितनी आना है, जितनी आओ। हमको आत्म कल्याण करना है।
15:09हमको किसी की help की जरूरत नहीं है इस मार्ग में।
15:11जहाँ हम परमेश्वर हैं तो किसकी जरूरत है परमेश्वर?
15:14किसी की भी जरूरत नहीं। ये बात कृपा देव ने जब आत्मज्ञान नहीं हुआ।
15:20और आत्मज्ञान होने वाला था 3 महीने के बाद।
15:22तब ये बात हमको अंदर में आ रही बात। अंदर में आ गई बात। देखो
15:28आत्मा की जो हृदय लत्ता होती है वही गोपाल देव की हृदय लत्ता है यहाँ
15:32एक तो हटा ही मत रहो।
15:35ज्यादा क्या कहूँ भूतकाली ने जो भ्रांति किया था और कर्म बांधे और भ्रमण किया।
15:42उसका स्मरण होते ही अब कैसे जिंदा रहना हो चिंता हो पड़ी है। तो कर्म बांधने नहीं
15:47अब भटकना नहीं है लेकिन गलती हो जाती है।
15:51राक्षस द्वेष नहीं करना है लेकिन
15:52हुए बिना रहते नहीं। नहीं लेकिन होय विना रहेते नहीं. अने करम बंधा के
15:55office भोगना पडेगा ए चक्कर निपटाडीने क्यां करुं? केसे जीन्दा रहुं? फरी
16:00न ज जन्मवुं अने फरी
16:02न ज करवुं एवुं जडत्व आत्मामां
16:04प्रकाशे छे. एटले आत्मा कहेता के नहीं fight
16:08करो कुछ भी हप्तो पीछे उडके नहीं देखना है. पण कईक निरूपायता छे
16:13त्यां केम करो? गर्द दशा
16:15है निरूपायता है. सही प्रकार के
16:17बोजा है काम का जिम्मेदारी है. तो ध्यान
16:21उधर उधर बी जाता है. अमारे कुछ मो है कुछ
16:25परिस्थितियां है. के ध्यान बहार जाता है. त्यां हवे केम करवुं? प्रश्न
16:29जवाब जे द्रढता छे ते पूर्ण करवी. जरूर पूर्ण करवी है जतन. पण जे कई
16:35आडुं आवे छे. एने कोरे करवुं पडे छे खसेडवुं पडे छे. तो disturb
16:41करता है अमको बोलना है बेटा
16:42please बंध करो हवे ने एसा करना पडता है. त्यां ज्यां घोंघाट होय वहां से दूर जाना
16:45पडता है. अमको हटना है या
16:46तो अमको हटना है 2 में से एक
16:47बार. हमको हटना है या तो उनको हटाना है
16:50दो में से एक बात अभी करना धरना चालू। हमको हटना है
16:54या उनको हटाना है। इसमें समय चले जाता है, जमा काज जाए,
16:59जीवन चालू जाए, यानी ना दवा दे। जहाँ तक भी यथा योग्य गए ना थाए क्या सुचे,
17:06जब तक हमको आत्मदर्शन नहीं हो, तब तक हमको जीवन को ऐसा व्यर्थ होना नहीं, एक-एक पल का
17:12कीमत लगाना है।
17:14ऐसी दृढ़ता है लेकिन क्या करें? कदापि
17:15कोई रिते... कदापि कोई रीते एमांनुं कई करीए तो एवुं स्थान क्यां छे के ज्यां जईने
17:22रहीए. एसा कोणसा स्थान छे दुनियामां?
17:24के जीसके त्यां जाकरके कोई वित्सरवंश नहीं होय. अर्थात
17:27एवा संतो क्यां छे? असंत की जरूरत पडती है. वित्सरवंश तो
17:32बहोत है. लेकिन माल निकालना हमको आता नहीं है तो हम क्यां करेंगे? हम
17:37दूसरो को हटाने में लग जायेंगे जिंदगी चले रहेंगे. एतुं बेठो एसा करो
17:42एसा करो वित्सरवंश न करो.
17:44पूरा ध्यान क्यां चले लेंगे? पूरा ध्यान क्यां चलेला? ध्यान आना ता इधर ओर गया उधर
17:50बहार. हटाववा करवा. अर्थात एवा संतो
17:52क्यां छे के ज्यां जईने ए दशामां बेसीने पोतपोतानुं. इसमे से बीजा बंध को हटावना
17:58नहीं है साहेब. प्रतिबंध को
17:59नहीं हटावना है, हमको हटावना है. पूरा
18:02change करना है अपने में करना है, दूसरा में नहीं करना है. लेकिन ए कला कोण शीखा है?
18:07इसले कहेते है के एसे संत
18:08कहा है के ज्यां बेट करके. उनसे support
18:12लेते रहे पोषण पामे. त्यारे हवे केम करवुं? सदगुरु भी नहीं
18:17सेम तो. किसको पूछे?
18:19तो अंदरथी आत्मा अवाज देती
18:21है, क्यां अवाज देती है? गमे तेम
18:24हो, गमे एटला दुःख वेठो, गमे एटला परीषह
18:28सेन करो, गमे एटला उपसर्ग सेन करो, गमे एटली व्याधिओ
18:33सेन करो, गमे एटली उपाधिओ आवी पडो, गमे एटली आधिओ आवी पडो, गमे
18:39तो जीवनकाळ एक समय मात्र हो. दुःखकाळ एक समय मात्र. अने
18:44दुर्लक्ष्यो. जिंदगीनी एक समयथी सारो
18:46ओर दुश्मन. निमित्त ज छे. पण एम करवुं ज. तो पण
18:52मारे आत्मकल्याण ज करवुं.
18:53के जे बी चाहे एम
18:56तो जीती इस्ली. के जे बी बळो की करना ताकात
19:00गेइन करना मित्रो को
19:02हटाने नहीं अपने को बळवान
19:05बनाना. ओर भावना बडेगी. के बळ...
19:09तो बलवान हो जाओ भावना बढ़ाना है। आत्म भावना बढ़ाना है। तीनों होते हैं।
19:16अपनी भावना बढ़ेगी हम कमजोर नहीं रहेंगे तो सामने
19:18वाला हार जाएगा। अपनी ही भावना कमजोर रहती है कोई disturb किया।
19:23तो जबरदस्ती किया तो वहां से ही चले गए
19:25आज नहीं जाऊंगा सत्संग। आज आपके साथ चलेंगे देखो। हमारी ही भावना down
19:31है। और कुछ time में adjustment करते तो फिर adjustment भले करो लेकिन सस नहीं
19:37होना है। जो तुम दुख
19:38हो ना। देखो कैसे enter आ रहे
19:39हैं, कैसे पाप किया था सत्संग में नहीं गए। कैसा किया है?
19:44जो करना चाहते हो तो ऐसा नहीं हो,
19:46ऐसा आज्ञा देना पड़ता है, ऐसी जीनी जिंदगी जीना पड़ रहा है।
19:50अपनी मर्जी से हम आत्मज्ञान भी नहीं कर सकते, ऐसा बताया हमने।
19:53ये हमारी गलती है, ये कोई गलती नहीं। हम ही उस मात्रा में।
19:58हमारे ही पूजा में किए गए कर्मों का उदय। कोई control नहीं है, कोई मित्र नहीं है।
20:04तो इसका अफसोस है सत्संग से। तो इसका अफसोस है, सत्संग सुनने का खेद,
20:07भावना नहीं बढ़ने का खेद,
20:08संसार में बार-बार फंस जाते हैं, इसका खेद। तो
20:11हमको होना चाहिए इस तरह की। अगर नहीं होता है तो फिर आप राजी हो
20:17भटकने में।
20:19भटकने में आखिर नहीं होता adjustment करो, सत्संग छोड़ो, भले उनके साथ जी कर जाओ।
20:23लेकिन खट्टा तो होना चाहिए।
20:25अंदर में तकलीफ तो होनी चाहिए। कि मैं क्या हो रहा है, मेरा नुकसान हो रहा है।
20:30मेरी आत्मा का तो नुकसान हो रहा है।
20:32तो नुकसान करते करते नुकसान... तो
20:33नुकसान करते तो नुकसान के भाव
20:34से आप कहीं भी गए। लेकिन नहीं नुकसान नहीं हो रहा हमको, अहित
20:37करने को बोला है, राजद्रोह करने को बोला है,
20:40झगड़ा पंचायत करने को नहीं बोला है। तो क्या राजियों को के जाने को बोला है?
20:46वो भी तो नहीं बोला है। सत्संग छोड़ कर के
20:51घर परिवार के पास में समाज के नियम के अंदर
20:53हमको कहीं जाना-वाना पड़ता है, मेल होना पड़ता है, नहीं चाहते हैं। हम
20:59झगड़ा करके सत्संग में आना नहीं चाहते। झगड़ा करके तो हष्टपुष्ट नहीं था। और
21:03झगड़ा करके आएंगे तो आप ही हमको डांटेंगे।
21:06नहीं आना था एक दिन। तो नहीं आना था। घर में बैठे।
21:12और फिर हम वो बात को ले लिए और फिर क्या
21:14किए adjustment कर लिए। अच्छा नहीं आएंगे यहां पर। लेकिन
21:18नहीं आए तो इसका अफसोस कितना हो रहा है। हष्टपुष्ट है उसका अफसोस कितना हो रहा
21:23है। अगली बात करी। फिर से एक करी। के वियोग में अपन फिर सतपुरुष में रहे।
21:29वियोग में कोई कल्याण। और हम इज्जत करने आते हैं, साथ को छोड़ देते हैं,
21:34वियोग में आते हैं, हमको तकलीफ जरा भी नहीं होती। तो इज्जत करने को आपने ही कहा था ना?
21:40बात यह है।
21:42आपने ही कहा था कि झगड़ा नहीं करना। अब क्या करें? दोनों भाइयों से
21:48मांग लीजिए अगर नहीं समझते।
21:50इसलिए कृपा करके उन्होंने बहुत सुंदर सूत्र दिया हाथ में।
21:54जहां जहां जे जे योग्य थे, वहां वहां। जिससे अपनी आत्मा का फायदा होवे
22:00वैसा काम। गुरु के वचन चारों तरफ हैं, हमको कौन सा वचन उठाना है?
22:05जिससे हमारी आत्मभावना बढ़े, हमको लाभ होवे वैसे वचन उठाना है।
22:10परमात्मा वाले वचन धीरज रखो ऐसा वचन ज्यादा है।
22:14मैं तो लकड़ी खाने को तैयार हो जाओ ऐसा है। सीधी सी बात है। नहीं नहीं हो
22:18जाएगा आपको फ्यूचर में सतम मिल जाएगा तो भी adjustment करना जागृति में रहना।
22:22हम भक्तों के लिए नहीं है। वो तो क्या है कैसा भी करके।
22:28वो तो क्या है कैसे भी करके। कैसे भी करके खड़ाना है ऊपर इसलिए कहते
22:32हैं जीभ नहीं बांटे। स्वामी महाराज को बहुत उदाहरण देता है। यही हम सत्संग में
22:36ही तो बता दिया है ना।
22:38Then सत्संग में ही तो करेंगे।
22:41फिर इसमें बाधा आती है तो अब क्या करेंगे? तो
22:43उसका भी उदाहरण देता है बाधा को adjust करेंगे।
22:46मर जाओगे कहीं।
22:49उसका intention कैसा है इनका ये बात का intention दोनों
22:50बातों का combination उसमें होना चाहिए। दोनों
22:52बातों का combination होना चाहिए। मिश्रण,
22:55एक balancing मिश्रण होना चाहिए।
22:58नमक कम ना होवे तो भी नहीं चले, कम होवे तो नहीं चले,
23:01ज्यादा होवे तो नहीं चले, इसमें कैसा balance रहता है।
23:04ऐसे सद्गुरु की धीरज रखने की बात और पुरजोर करने की बात,
23:08दोनों का मिश्रण ऐसा बिल्कुल बराबर है।
23:11ज्यादा धीरज रखेगा तो भी खो देगा, ज्यादा पुरजोर करके गड़बड़ी करेगा
23:15तो भी खो देगा। Balance में रहना है।
23:18राग और द्वेष से हटकर के balance का मन, इसमें तैयारी रखो।
23:20उसमें तैयारी रखो, काहे की तकलीफ है।
23:23हमको किसी को हटाना नहीं, हमको हमारे को change करना है।
23:27दुनिया को नहीं change करना है, हम अपने को change करेंगे।
23:30ये मार्ग जो है, अपने को change करना
23:34है। यहाँ कहते हैं कि हे
23:35योगी, देह में परमात्मा का निवास होने पर भी उस देह में स्थित परमात्मा को
23:41तुम क्यों नहीं देखते? उस परमात्मा के दर्शन से, ये अंदर में विराजमान है वो,
23:47उसके दर्शन से।
23:49फिर दर्शन सीधा बात और आगे की बात है। फिर दर्शन नजर मिली ना, इससे ही
23:56तेरे पूर्व उपाधि कर्म चूर चूर हो जाएंगे।
24:01तुझे ज्यादा कुछ करने की जरूरत ही नहीं है पुजारी बनने की और व्रत तप करने
24:05की उपवास आदि करने की माला
24:06करने की। क्योंकि नजर में आते ही,
24:09सब शांत। आंख खुलते ही,
24:13प्रकाश। ऐसे ही यहां पर नजर में आते ही। तो ही यहां पर नजर में आते ही पूरे
24:19कर्मों का चूरा चूरा हो जाता
24:21है। और क्या होगा?
24:22तुम निर्वाण को प्राप्त हो। एक बार तू परमात्मा को देख लेगा सिर्फ एक बार।
24:27कितना time के लिए? एक समय के लिए सिर्फ। एक समय मतलब कितना?
24:33एक घंटे का 60 minute। एक एक minute
24:37का 60 second। कितना? 3600। तो एक एक second का
24:42असंख्य होगा। उसको बोलते हैं। उसको बोलते हैं समय। कितना बारीक हो गया।
24:47मोटा स्वरूप पकड़ो ना second का तो
24:48भी 3600 बार एक घंटे में 3600 बार कर सकते हैं आमादा।
24:52मोटा स्वरूप। उसका अगर एक एक को पकड़ो तो
24:56अनगिनत बार कर सकते हो। मतलब कितना झकझोर है कहीं और कुछ नहीं।
25:01कि देखना मात्र।
25:02अंदर में परमात्मा इतना अगर देख गए। इतना समय नहीं मिलता है क्या आपको दिन भर में?
25:07कि हम एक समय नहीं देख पाते हैं।
25:11क्यों नहीं देखते हैं? एक समय की जगह... तो नहीं दे सकता एक समय की जगह। तो बहुत
25:14काम है बहुत भलाई है लेकिन
25:16एक समय में नहीं कर सकते क्या? खाने
25:20को time मिले, पीने को time मिले, नींद लेने का time मिले।
25:23पेपर पढ़ने का time मिले, TV देखने का time मिले।
25:26रेफरेंस करने का, घर व्यवस्था करने का, उसमें से आप एक second भी नहीं निकाल सकते। एक
25:30second भी नहीं। एक second का
25:31असंख्य टुकड़े। देख। इतना ही समय चाहिए इसके ऐसे दर्शन।
25:39इतना ही समय चाहिए इसके ऐसे दर्शन मात्र से ही
25:43तेरे पूर्व उपाजित कर्म चुटकु हो जाएंगे और तू निर्वाण को प्राप्त हो जाएगा
25:48इतनी सी बात। काल बहुत छोटा लगता है
25:51बिल्कुल छोटा और चमत्कार कितना बड़ा होता है। ये एक समय की कीमत कितनी
25:58अनंत जन्म मरण का खातिर। हमेशा के लिए निर्वाण तक
26:02पूर्ण शांति भगवान बन जाएंगे। महान
26:06पुरुष मिलने आए हो और सामान्य बालक आदि के। और सामान्य बालक आदि
26:09के साथ बातें करने में लग जाए समय घुमा देवे।
26:13तो वह महापुरुष का आत्मा है। सुपर आएगा नहीं आपके साथ।
26:17दादाजी हो या film star हो या कोई
26:20प्रधानमंत्री आया हो वो date करे 7-8 घंटा। आपको बैठे रहना है खड़े रहना है।
26:25लेकिन वो आया और आप नींद देवे भला। वो नहीं चाहे।
26:30किसी से बात करे तो नहीं चाहे। वो आया तो उसका स्वागत होना चाहिए।
26:34महान पुरुष मिलने आए और आप इतने बालको... आए हो और
26:36आप इतने बालकों वाली से बात करने में लग जाते हो।
26:40तो वो अपमानित हो जाता है,
26:41मेरी खबर नहीं लेते हो, मैं इतना बड़ा महान आदमी आया हूँ। MLA आया तो भी उसको घर में
26:46आदर-सदर करना पड़ता है, गली में भी आया है।
26:50उसका अगर ऐसा नहीं करते हो तो उसको अपमान ही होता है। तो वो
26:55महापुरुष का अपमान है, उसी प्रकार तीन लोक का नाथ स्वयं
27:00है। देव रमन रमनार के, देव देव देव, देव देव का देव है, परम भगवान।
27:04देई देवा का देव है, परम भगवान।
27:06सुरी लोक का उचित रूप है। सबसे बढ़िया से बढ़िया। ऐसा नहीं फरमाते।
27:13हमारे सामने चिन्मय साहेब जी, श्रील प्रभुपाद जी,
27:17हम चिन्मय साहेब जी के collection में।
27:20सुख धाम अनंत सुसंत चही,
27:27दिन रात रहे तद ध्यान मही। ध्यानमहि
27:34प्रशान्ति अनन्त सुधामयजे
27:41प्रणमु पदते वरते जयते।
27:48प्रणमु पदते वरते जयते। जयते.