Avlokan Discourses of Shri Devchand bhai Shah The book Search Photographs About

Shrimad Rajchandra Vachanamrut

10 November 2000 · Patrank 495 · 36 minutes

This recording plays on YouTube but cannot be shown here. That is a restriction on the video itself, not on this page.

Watch it on YouTube

Transcript

Transcribed automatically and lightly corrected. The recording is the authority where they differ.

Recitations restored to their canonical wording: Mangalacharan — Mangalam Bhagavan Viro, Mangalacharan — Sarva Mangala Mangalyam, Namokar mantra, Omkar bindu sainyuktam, Samaysar mangalacharan.

0:00श्रीमद् राजचन्द्र

0:02पत्रांक 495। तारीख

0:0810-11-2000। श्री

0:10देवचंद भाई। णमो अरिहंताणं णमो सिद्धाणं

0:16णमो आयरियाणं णमो उवज्झायाणं णमो लोए सव्व साहूणं

0:23नमः समयसाराय

0:25स्वानुभूत्या चकासते । चित्स्वभावाय भावाय

0:31सर्वभावान्तरच्छिदे मंगलं भगवान वीरो,

0:36मंगलं गौतमो गणी। मंगलं कुन्दकुन्दार्यो,

0:41जैनधर्मोऽस्तु मंगलम्॥ सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं

0:47सर्वकल्याणकारकम। प्रधानं सर्वधर्माणां

0:52जैनं जयति शासनम॥ ॐकारबिन्दुसंयुक्तं

0:57नित्यं ध्यायन्ति योगिनः। कामदं मोक्षदं चैव ॐकाराय

1:04नमो नमः राजचंद्र वचनामृत पत्र

1:09number 495, 495. त्रिभुवनभाई

1:16पर ए पत्र

1:17लखा है, बम्बे से.

1:18श्री त्रिभुवन जे कारण

1:20विशे लख्युं हतुं ते कारण. ते कारणना

1:23विचारमां हजु चित्त छे. अने ते विचार हजु सुधी

1:27चित्त समाधान रूप एटले के पूरो थई शक्यो न होवाथी, तमने

1:32पत्र लखवानुं थयुं नथी. कुछ बात चल रही है उसके बारे में खुलसा मांगे

1:38है लेकिन, कभी कभी बोले तो भी तकलीफ हो जाती है. तो

1:43कैसे बोलना कैसे जवाब देना

1:45हुं? सामने वाला एसा ही पकड सकता है. सामने वाला एसा ही पकड सकता है

1:51एसा भी आशय पकड सकता है.

1:54सही पकडे तो कोई बात नहीं लेकिन उलटा पकडे तो उसका हित हो जाय.

2:00कभी कभी मौन रहेना होता

2:02है. तो विचार हजु सुधी चित्त समाधान

2:05रूप एटले पूरो थई शक्यो न होवाथी तमने पत्र लखवानुं थयुं नथी. वळी कोई

2:11प्रमाद दोष जेवो कई प्रसंग

2:13दोष वर्ते छे. के जेने लीधे

2:16कंई पण परमार्थ वात लखवा संबंधमां चित्त मुंजाई

2:19जाय छे. लकता साव अटकुं थाय छे. प्रमाद दोष प्रसंग बहार में

2:24कुछ भी करना है, प्रमाद

2:26दो बाजु से लेना. आत्मा में

2:29लीनता है तो बहार में प्रमाद है, बहार

2:32में झुकाव है तो आत्मा में प्रमाद है. इनका प्रमाद

2:37बहोत अच्छा है मोक्ष की साधना के लिये. के बहार में प्रमाद

2:42जो भी विचार आता है

2:44करेंगे, देखेंगे, देखेंगे, देखेंगे करके वो

2:47time निकल जाता है. समय पे कोई काम... समय पे

2:49कोई काम पूरे नहीं होते हैं क्योंकि पूरा ध्यान जो है आत्मा की साधना में लगा हुआ है।

2:55तो वड़ी कोई प्रमाद दोष जेवो कहीं प्रसंग दोष बरते छे।

3:00प्रसंग दोष माने के समय पे

3:01काम नहीं होना उसका नाम प्रसंग दोष। In time वायदा किया हो या time पे करना चाहिए

3:07वो उस time पे नहीं होवे उसका नाम प्रसंग दोष।

3:11के जेने लीधे कहीं पर परमार्थावाद लखवा संबंध मा

3:14चित मुंजाई जाया छे। प्रसंग नहीं मिलता है।

3:20आत्मा की बात में लिखा-पढ़ी करना, मुमुक्षुओं को जवाब देना letter-ओं का,

3:26इसमें भी समय नहीं मिलता है। तो और क्या जवाब देना, ऐसे चित्त,

3:31चित्त में उथल-पाथल रहती है। और लिखने का ही छोड़ देते हैं, लगता साव अटक-कुन थायस।

3:38तेमज जे कार्य प्रवृत्ति छे, ते कार्य प्रवृत्ति मा,

3:45अने अ... मां अने अपरमार्थ प्रसंगमां जे कार्यनी प्रवृत्ति छे एमां अने

3:50ते कार्य प्रवृत्तिमां अने अपरमार्थ

3:53प्रसंगमां उदासीन बळ यथायोग्य जाणे माराथी

3:56थतुं नथी एम लागी आवे छे. बहोत

3:59अच्छी अपनी एम कृपाळुदेव की महानता देखो. के वो

4:04अपने जो बोध ईच्छते है जो मुमुक्षु जीव है उनके सामने वो

4:10अपना परिणाम खुल्ला कर दे है. में वो अपना परिणाम खुला कर दिए। मतलब क्या

4:15अपने भी जो दोष हैं वो बता देते हैं, नहीं तो generally गुरु बताते

4:19नहीं अपने दोष। मुमुक्षु अपने दोष बतावे लेकिन गुरु कभी नहीं बतावे,

4:24होवे तो भी नहीं बतावे, लेकिन इनमें

4:26इतनी सरलता है कि अपने दोष बता देते हैं। उनको ऐसा लगता है

4:32कि कार्य प्रवृत्ति जो

4:34उत्पादी प्रसंग है गृह दशा के अंदर, उसमें हम ज्यादा involve हो रहे हैं।

4:39साधना जितनी चलनी चाहिए होती नहीं है। साधना दीतनी

4:42चलनी चाहिए होती नहीं है। तो अपरमार्थ प्रसंग में

4:44जितनी उदासीनता रहनी चाहिए neutralize होना चाहिए।

4:49राग द्वेष नहीं होना चाहिए वो नहीं हो रहा है

4:51कहीं न कहीं राग द्वेष होकर के जुड़ना हो जाता है।

4:54तो अपरमार्थ प्रसंग में उदासीन बड़ यथा योग्य जाणे मारासी तत्वुन्नति।

5:01मैं fight नहीं दे सकता हूँ involve हो जाता हूँ। और राग द्वेष हो जाते हैं।

5:06इसका अवलोकन उनको चालू है जागृति में। और उसका दुख होता है उनको।

5:08ओर उसका दुःख होता है उनको एम लागी आवे छे. एटले उसका दुःख लगता है. अने

5:14पोताना दोष विचारमां पडी जाय पत्र

5:16लखवुं अटकी जाय छे. मेरे में इतने

5:18दोष पडे है तो में क्यां दुसरो को समजाउं

5:22क्यां दुसरो को लखुं. एसा करके अपने दोषो के उपर अवलोकन चलता है चिंतन चलता

5:27है ओर. किसी को आत्मकल्याण के संबंध में कुछ कहेना हो लिखना हो तो रुक जाता है. अने

5:33घणुं करी उपर जे विचारनुं समाधान थयुं नथी. एम लख्युं छे ते

5:37ते ज कारण छे. First

5:403 3 कारण बताया छे एक

5:41तो अभी विचार पूरा हुआ नहीं है जीस संबंध में बात करना है लिखना है. तो

5:45mostly तो वो है के अभी पूरा thinking में ही है अभी पूरा

5:48planning नहीं बना है. दूसरा प्रमाद दोष बरत रहा है. और तीसरा स्वयं में इतने

5:52दोष है के में किशो

5:54को क्या बतावुं एसा करके रूक जाना

5:56होता है. तीन दोष में प्रमुख दोष क्या है

5:58के घणुं करी उपर जे विचारनुं समाधान थयुं नथी एम लख्युं

6:01छे ते ते ज कारण छे. थी एम लिखी हुई है तेज कारण से।

6:08तो वो तो matter अपने को नहीं मालूम कि कौन सी matter है

6:10जिसके बारे में चर्चा करते हैं तो यहाँ तो कोई ज्यादा हम खुलासा नहीं कर सकते हैं।

6:15लेकिन इनकी जीत की स्थिति का ख्याल में आता है

6:18कि साधना करने वाले की जीत की स्थिति कैसे होती है।

6:22कभी-कभी इस प्रकार से प्रसंग भी बनते हैं।

6:24और अवस्था में ऐसा होता है कि उनको भी लगता है कि मेरे में भी बहुत दोष है तो

6:29बहुत उदासीनता आ जाती है। उदासीनता इसलिए आती है कि उदास नहीं रह सकते

6:31हैं। इसलिए आती है कि उदास नहीं रह सकते हैं

6:34प्रसंग में जुड़ जाते हैं वो देख करके वापस उदासीनता आ जाती है

6:39तो अवलोकन करने का फायदा क्या कि हम कहाँ खड़े हैं वो मालूम हो गया

6:44परिणाम का अवलोकन क्यों करना

6:46द्रव्य को ही देखना द्रव्य को देखने से शांति मिलती है तो वही करना दूसरा क्यों करना

6:52अनुभव करना है ना अपने

6:53आत्मा को देखना है ना उसकी आराधना करना है तो अवस्था को

6:55क्यों देखना अवस्था तो क्षणभंगुर है

6:58तो नहीं एकांत में वो बात नहीं लेना। लेना। बिल्कुल अवस्था को

7:02देखोगे नहीं तो हम कहाँ खड़े हैं वो पता कैसे चलेगा?

7:06द्रव्य को देखना है तो निजरा करने के लिए, शांति के लिए, आगे बढ़ने के लिए।

7:11लेकिन आगे बढ़े हैं कि नहीं बढ़े हैं?

7:14कहीं ऐसा ना हो कि हम परिणाम को

7:15देखना तो भूल जावे, जैसा ही परिणाम होने दो, मेरे को क्या करने का है?

7:19मैं तो यही safe हूँ। मेरे स्वरूप में कोई फेरफार नहीं होता है।

7:23जैसा का वैसा पूर्ण परमात्मा हूँ, ऐसा ले लेंगे।

7:26तो द्रव्य पे दृष्टि जानी चाहिए, परे पे से दृष्टि... जानी चाहिए, परयपस

7:32दृष्टि छूट करके। वो भी नहीं जाती है। तो कहाँ चली जाती है? दृष्टि कहीं

7:36ना कहीं तो जाएगी ही जाएगी।

7:37परिणाम पे नहीं है, परिणाम से उठ
00:07:38.1000 --> 00:07:41.683
करके द्रव्य पे नहीं आई है। तो कहाँ जाएगी?

7:41पर पदार्थ में देखने सुनने 5 इंद्रियों के विषय में दृष्टि लग जाएगी।

7:47अब सही चल रहा है कि गलत चल रहा है कैसे पता चले? परिणाम को देखने से ही पता चलेगा।

7:52कि सही चल रहा है कि गलत चल रहा

7:54है। इसीलिए अकेले द्रव्य को ही देखना और परिणाम को नहीं देखना ऐसा नहीं है।

7:58दोनों को ज्ञान हमको होना चाहिए।

8:01साधक दशा के अंदर अभी हम पूर्ण मंजिल पे पहुंचे नहीं हैं, परमात्मा नहीं बने हैं।

8:06तो जितना जितना progress हुआ है,

8:09वो भी देखना है, जितना अभी दोष बाकी है उसको भी देखना है।

8:13ये दोनों का लेखा-जोखा जो है हमारे को परिणाम को देखने से होता है।

8:17इसलिए कृपालु देव दोनों साधना करते थे।

8:21द्रव्य की आराधना, आत्मा की आराधना भी करते

8:23थे, वहां भी दृष्टि जाती थी और

8:24वहां से छूटती थी तो... दृष्टि जाती थी और वहां से छूटती थी तो परिणाम पे आ जाती थी।

8:28और ऐसे परिणाम में परिणाम की बेफकरी होती थी।

8:32और द्रव्य पे दृष्टि नहीं आती थी तो बाद में कहीं involve होता था तो वो

8:34भी परिणाम से मालूम पड़ जाता था।

8:37कि मेरे में अभी भी इतनी गलतियां हो रही हैं। अभी मैं इतना involve हो जाता हूं।

8:41अभी मेरे में वो ताकत नहीं है कि हर प्रसंग के अंदर मैं involve ही ना होऊं।

8:46क्योंकि साधना कर रहे हैं। ग्रस्त दशा है।

8:50तो जो जो घटना घट रही है वो अपने मुमुक्षु को बिल्कुल खुला के देते हैं।

8:55अपने मुमुक्षु को बिल्कुल खुला कर देते

8:59हैं। अब आगे कहते हैं। क्योंकि ये जो गिरना हो

9:01रहा है, परिणाम का गिरना हो

9:03रहा है, उसमें निमित्त रूप जो है हमारा प्रवृत्ति है। मन वचन काया की जो प्रवृत्ति

9:07है। जो हम जिम्मेदारी संभाल के

9:08बैठे हैं दुकान का, घर का, जो भी समाज का।

9:11वो इसमें ज्यादा बाधा रूप। अगर वहां से निवृत्ति मिले तो इतना

9:16जागृति बढ़ने का, समय मिलने का अवकाश मिले।

9:19जो प्रमाद दोष फिर होता है ना वो नहीं होगा।

9:22प्रमाद दोष मिट जाता है, जागृति के लिए समय मिलता है।

9:26तो यहाँ कहते हैं जो कोई भी प्रकारे बने तो। आ त्रास रूप संसार मा

9:32वत्तो व्यवसाय न करवो। आने सत्संग करवो योग्य छे। देखो क्या लिखा है।

9:39क्योंकि इसमें हम फिर involve हुए

9:40बिना नहीं रहते हैं और हमारी जागृति छूटती है। जितना व्यवसाय बढ़ाते हैं।

9:44जरूरी है उतना तो करना ही है। कि मांगने को

9:46नहीं जाना है। अभी हम मुनि नहीं बने हैं। जाना है।

9:48अभी हम मुनि नहीं बने हैं कि हम घर-घर जाकर के आहार लेके आवे खा लेवे।

9:53और हमारे में भी बहुत सारे राग द्वेष के भाव पड़े हैं,

9:56ये खाना है, ये नहीं खाना है, ऐसा ही पड़े हैं।

9:58तभी वो राग पूरा छूटा नहीं है तो फिर अभी मुनि जैसा नहीं ले सकते।

10:03मुनि बनने के बाद कोई ऐसा बोलो कि आज तो मेरे को खट्टा मिला,

10:05आज तो मेरे को तीखा मिला, तबीयत खराब हो गई।

10:08अब इस घर दोबारा नहीं जाना है क्योंकि ये लोग खट्टा बनाते हैं। ऐसा होता है?

10:13जो चाहा था वो तो नहीं दिया और जो नहीं नहीं था वो दिया मेरे को।

10:18देखो। एक तो मुनि बनने के बाद मांग नहीं सकते।

10:21अब तो अभी आजकल के मुनि-मुनि वो देखो तो तो

10:23बातचीत भी हुई है हमारे उनके साथ। वो बोला इतना

10:27यहाँ का हमको जमता नहीं है कभी खट्टा आता है इस घर में उस घर में

10:30तीखा आ जाता है। और हमको तो नहीं जमता है हम तो फिर सब भोला बोल देते हैं कि भैया

10:36बनाना है तो ऐसा बनाओ। ये आगे से phone कर देते हैं।

10:40message भी आते हैं कि आज ये बनाया है तो हम आते हैं आपके पास नहीं तो नहीं आते। देखो।

10:45देखा।

10:46सहन नहीं होता है परिणाम में विचार व्यक्त किया उन्होंने

10:49जब अवलोकन की बात बताई तो उन्होंने

10:51next day जो है अपने परिणाम को बताया।

10:55कि शाम में कहाँ जाना है वो अभी से ही planning

10:57खाते ही planning शुरू होता है शाम में कहाँ जाना आज तो सुबह तो जाके आया।

11:01शाम में कहाँ जाना ये सब दिमाग में आता है।

11:04ऐसे ये कोई मुनिराज की भूमिका नहीं है मुनिराज की भूमिका तो बहुत सर्वश्रेष्ठ होती है।

11:10तो उपयोग जो है खाने पीने में

11:12देखने करने में चले जाता है। पीने पीने में देखने करने में चले जाता है involve हो

11:15जाते हैं गृह दशा के अंदर

11:17तो प्रवृत्ति के कारण सोचने का आत्महित के बारे में ज्यादा वक़्त नहीं मिलता है

11:24तो इनका ये कहना है कि मेरे को भी मेरी साधना में जो रुकावट आती है उसमें ज़्यादातर

11:29ये व्यवसाय है उसकी बहुत बाधा रूप है

11:34दुकान में पूरा ज़िम्मेदारी उनपे डाल दिए थे पूरे

11:37सबसे ज़्यादा अच्छा business नहीं करते थे अच्छा business माने क्या ग्राहक इनके

11:40पास ही पड़ता था। मैंने कहा ग्राहक इनके पास ही पड़ता है। कभी-कभी 3-4 प्रार्थना होवे

11:43लेकिन ग्राहक एक के पास ही आवे।

11:45दूसरे बैठे हों तो बात ही नहीं करते, नहीं है चले जाते हैं।

11:48बाद में आता हूँ करके। ऐसा बनता है। इनकी ज़बान बहुत मीठी,

11:52समझाने का तरीका, धोखाबाज़ी नहीं बिल्कुल। purely ईमानदारी से।

11:57जो धंधा करते थे जिस प्रकार से, इसमें धंधा बढ़ते चले गया।

12:00जितनी ईमानदारी ज़्यादा हो उतना धंधा बढ़ता है। लोगन नहीं आने वाले भी आते

12:03हैं, reference देते हैं। हम

12:05यहाँ से आए इतना फायदा हुआ आप

12:07भी वहाँ जाओ। फायदा होय आप भी वहा जाओ. आपको फायदो. एसा करके 2 से 4, 4 से 16 एसा.

12:13फुरसद नहीं मिलती है. इनका ए कहेना है के जो कोई पण प्रकारे बने

12:19तो आ त्रासरूप संसारमां वधतो

12:21व्यवसाय न करवो. तो क्या करना

12:23फिर खाली बेठे रहेना के नई खाली नहीं

12:27बेठना. सत्संग करवो योग्य छे. ए त्रिभुवनभाई को ए बात

12:31नोन लिखीए. आगे कहेते है. मने एम लागे छे के जीवने मूळपणे

12:36जोता. छे के जीवने मूळपणे जोता जो मुमुक्षुता आवी होय तो.

12:41नित्य प्रत्ये तेनुं संसार बळ

12:43घट्या करे छे. ए मूळ वात कही. वितराग वाणी सुनने के बाद आत्मकल्याण करवानी भावना

12:49जागृत थई छे. तो बढती

12:51नहीं छे ज्यां की वहा है. इसका मूळ कारण क्यां है? के वास्तवमां

12:57जीव को संसार में भी

12:59कई रुचि है. मुमुक्षुता अभी purely

13:01जो होनी चाही 100% की वो नहीं आई है. तो इनको एसा लगता है के मने... तो

13:05इनको ऐसा लगता है कि मुझे

13:06एम लागे छे के जीवने मूढ़पणे जोता

13:09जो मुमुक्षुता आई होय तो। अगर सच्ची आत्मकल्याण की भावना हो तो। Day by day

13:16संसार के आकर्षण में से वो छूट जाता है।

13:19धीरे-धीरे खाने में से रस जाता है, देखने में रस जाता है, सुनने में रस जाता है।

13:24कहीं बेकार का बिना वजह जाना आना होता है उसमें रस होता है, paper पढ़ना छूट जाता है।

13:29जिसमें हमारा कोई प्रयोजन नहीं, पढ़ के second में भूल जाने वाले। ये सब

13:34धीरे-धीरे धीरे-धीरे बिल्कुल zero हो

13:36जाता है। जितना उपयोग फालतू का बाहर जाता है,

13:40जिसमें आत्मा को बिल्कुल फायदा नहीं है, वो सारी activity रुक जाती है अपने आप।

13:44क्योंकि अवलोकन से पता चलता है कि मेरा समय कितना waste हो जा रहा है

13:48बिना प्रयोजन की बातों में, वो सब cut होता है। भावना वाला जो है वो समय बचाता है।

13:54क्योंकि कुछ कार्य तो हम गृहस्थ दशा में हैं तो करना ही पड़ता है, जैसे व्यापार-धंधा

13:58बड़े ज्यादा नहीं बढ़ाओ लेकिन जितना है उतना तो करना पड़ता है। होए उतना तो

14:01करना पड़ता है शारीरिक जो नहाना धोने में उतना भी time जाता है

14:04थोड़ा कुटुंब परिवार में भी थोड़ा बहुत time जाता है

14:09जितना बचाना है उतना बचाना है save करना है क्योंकि हमको

14:12आत्मकल्याण करना है लेकिन ये कौन करेगा

14:15जिसको सही में आत्मकल्याण करना है

14:18वो जीव तो दिन day by day अपनी आत्मकल्याण की प्रवृत्ति को बढ़ाएगा

14:23और संसार की प्रवृत्ति को कम करेगा 10 बजे दुकान खोले

14:27तो उसके बदले 11 बजे खोलेंगे लेकिन सत्संग करके जाएंगे। सत्संग को miss नहीं करना है।

14:32जब जब भी मौका मिले तो।

14:34इसके बीच में भी कभी निवृत्ति में कहीं दो चार दिन आठ दिन जाने का हुआ,

14:38तो मेरा व्यापार में फिर कोई संभालने वाला नहीं है, नुकसान हो जाएगा, ऐसा हो जाएगा।

14:42कि नहीं choice, choice क्या है?

14:46व्यापार धंधा वो पाप का कार्य है और नसीब में है उतना ही मिलता है।

14:49आप दुकान खोल के बैठो तो ग्राहक आता है ऐसा कोई जरूरी नहीं है।

14:52खोलना पड़ता है लेकिन ग्राहक आना नहीं आना,

14:55अपने हाथ में नहीं है। धंधा... अपने हाथ में नहीं है।

15:00धंधा बढ़ना नहीं बढ़ना अपने हाथ

15:02में नहीं है। तो क्या सोचते हैं? Choice करते हैं तो आत्मकल्याण का ज्यादा फायदा

15:06होता है वहां चले जाते हैं।

15:07जात्रा पे चले जाते हैं, निवृत्ति में चले जाते

15:09हैं। थोड़ा नुकसान होता है तो उठा लेते हैं। दुकान 8

15:11दिन बंद रहेंगे तो बंद रहेंगे, क्या खटा-खटा होने वाला है? ऐसा करके

15:15avoid करते हैं, निवृत्ति में ज्यादा पसंद करते हैं। वो किसको कौन करेगा?

15:19जिसको आत्मकल्याण करने की सच्ची भावना है वो ऐसा करेगा।

15:23संसार में धन आदि संपत्ति घटे के...

15:25संसारमां धन आदि संपत्ति घटे के नहीं ते अनियत छे. हम समजो आया यात्रा पे चले गये 8

15:31दिन दुकान बंध रही तो पैसा

15:32कम होना नहीं होना हम आपने हाथ में नहीं

15:35है. अनियत मने क्यां हो सकता है कम भी हो जाये income

15:38हो सकता है बढ भी जावे. दोनो कम बन सकते है. अभी हमारे भरूच में मुमुक्षु है

15:44पंकज भाई वो सत्संग का इतना

15:46रस लग गया के वो 21 दिन तक

15:48factory पे नहीं गये. सिर्फ 5-7 दिन के लिये आये

15:52थे सत्संग के लिये ज्यादा interest... 7 दिन के लिए आए थे

15:55सत्संग के लिए ज़्यादा interest होगा तो और रुक गए ऐसा करते करते एक ही

15:59दिन। जब वापस factory में कदम डाला तो एक ही दिन। बाकी एक दो बार message दे दिया था

16:03कि भई अब आप संभाल लेना कल। Result देखा तो बोले

16:05आज तक कभी भी इतना production नहीं हुआ इतना production हुआ है।

16:09मैं सामने खड़े रहता हूँ तो इतना काम नहीं होता है।

16:13अभी आने के बाद अब तक की जितनी history है उसमें सबसे ज़्यादा production हुआ है।

16:18इन लोगों ने कमाल करके दिखाया है।

16:21कम से कम one। खाया है। कम से कम 1.5% ज्यादा हुआ है।

16:23जब ₹1,00,000 का होता है तो ₹1,50,000 का हुआ है। इनका तो

16:26करोड़ों का धंधा है तो ज्यादा हुआ है।

16:28मेरी गैरहाजिरी में इतना अच्छा काम हुआ

16:30है आज सबको party दे रहा हूं मैं। और के बोले। इतना अच्छा संभाला है

16:34उनका पूरा एक नंबर धंधा है totally। ऐसा हुआ

16:37है इनका। जरूरी नहीं है कि हम नहीं जावे तो धंधा कम हो जावे।

16:41ये हमारा मगज में है कि हमारा ध्यान हमारी हाजिरी होगी तो ज्यादा अच्छा होगा।

16:45और नहीं होगी तो जैसा कि

16:46पूरा सबके कर्ता धर्ता हम ही हैं ना जैसा कि। के कर्ता धर्ता हम ही हैं ना जैसा कि।

16:49लेकिन नहीं पूर्व पुण्य और पाप के ऊपर आधारित है। Business बढ़ना नहीं बढ़ना वो।

16:55गुरुदेव का Bengaluru में जब प्रतिष्ठा थी जब। गुरुदेव आने वाले थे Bengaluru मंदिर के

17:02opening होने वाली थी।

17:04Bengaluru में बबूत मत भंडारी ने ₹8,00,000 दे करके मंदिर बनवाया।

17:07दूसरे एक मुमुक्षु ने ₹4,00,000 दिया।

17:10और गाँव गाँव में पूरे में पत्रिका छापना वो करना सबको बुलाना करना

17:14आयोजन करना इतने लोगों का।

17:17तो 5000 आदमी आने वाले हैं बाहर गाँव से तो उनका रहने की व्यवस्था और प्रसंग का पूरा

17:21गुरुदेव आने वाले हैं तो उनके अलग ध्यान रखना।

17:24कि मंदिर का अलग इतना बोझा उठा लिया लेकिन महीना भर तक गए नहीं।

17:29Factory में नहीं office में नहीं किधर भी नहीं। क्या हो रहा है पता नहीं था।

17:33पूरा इधर involve हो गए।

17:36इसमें कोई खरीदी नहीं हुई नहीं जो हुआ वो बेचो बाकी नहीं है तो मना कर दो।

17:40बहुत बड़ा लाखों करोड़ों का export import का कामकाज। Steels का। तो पूरा

17:47choke up हो गया business, जो stock था उतना बेचा।

17:51Stock इतना ज़बरदस्त stock था। कि वो

17:53बेचने में भी ध्यान नहीं रहा, order आया तो fail हो गए,

17:56stock वैसे ही पड़े रहा, बेचा नहीं माल को।

17:58खरीदी पहले ही हो गई थी तो गोदाम में माल पड़ा था पूरा। सब प्रसंग हो

18:02गया, एक डेढ़ महीने के बाद जाके office में बैठे।

18:06तो जो खरीदा था वो

18:07दाम था ₹5, तो बेचने का अभी जो market का भाव हुआ ₹8। देखो आप। बेचे तो ₹5। देखो आप।

18:13बेचे तो 5 का माल सवा 5 में बेचते थे। क्या rolling में।

18:17क्योंकि ज्यादा margin नहीं मिलता। लेकिन पड़े रहा।

18:21तो जितना बेच करके जितना profit कमाते उससे कई गुना ज्यादा profit इसमें आया है।

18:26वो 8,00,000 नहीं हूँ मैं 80,00,000 निकल गए।

18:29वो 8,00,000 खर्च करे ना 80,00,000 निकल गए बोल रहे थे। इतना फायदा हुआ है गुरुदेव के

18:33पगले पड़े ना तो ऐसा हुआ।

18:35वो तो ऐसी मान्यता वाले हैं।

18:37भगवतमल जी क्या है वो

18:38मूल दिगंबर नहीं है उनके सिद्धांतों का कोई अभी अभी तो अभ्यास है लेकिन पहले नहीं था।

18:42तो हम बोले देखो गुरुदेव का चमत्कार हुआ है, 8 class ही हुआ। अब काम पे नहीं गए

18:48बिल्कुल 1-1.5 month तक तो भी ऐसा हुआ। यहाँ ये कहते हैं यहाँ पर।

18:54कि संसार में धन आदि संपत्ति घटे कि न घटे, ये अनियत है, कभी कम हो जाए कभी नहीं होवे।

19:01हमारा ध्यान की कोई जरूरत नहीं है, वो अपने आप film बनी हुई है वैसा बनता है।

19:05कम होता है ज्यादा होता है वो तो अपनी film के अनुसार बनता है। पर... पण

19:10संसार प्रति ते जीवनी जे जीवनी भावना ते मोड़ी पड़या करें।

19:14जैसे समझ समझ आएगी अपना नुकसान फायदा का मालूम होगा,

19:18जागृति बढ़ेगी। तो संसार के प्रति जो हमारा attraction है,

19:22जो हमारा बल आधार लिया हुआ है,

19:25ऐसा होवे तो अच्छा, ऐसा होवे तो अच्छा और। तो

19:27ऐसा नहीं होता है कभी, होता है तो राजी होता है,

19:30नहीं होता है तो तकलीफ में आ जाता है।

19:32तकलीफ में क्यों आया कि हमने पहले से ही ऐसी demand रखी थी, ऐसा नहीं हुआ तो

19:35तकलीफ में आ गए। Demand... में आ गए। Demand ही नहीं रखे तो

19:39फिर जो होवे सो होवे, तकलीफ नहीं होवे, राजीपा नहीं होवे।

19:42लेकिन demand हमारी रहती है, इच्छा होती है। इच्छा के कारण ये problem आता है।

19:47आत्मारथी जीव की सिर्फ आत्मकल्याण की इच्छा होने से संसार की कोई इच्छा नहीं होती है।

19:51इसलिए जैसे-जैसे वो साधना करते जाता है, जागृति में आता है, ऐसे-ऐसे

19:55उसकी demand कम होते जाती है। ये होवे तो अच्छा, ये होवे नहीं, जैसा होवे चला लूंगा।

20:01तो संसार की जो भावना होती है, बल होता है, वो कम होता है

20:04और आत्मबल बढ़ता है। संसार प्रति जे

20:09जीवनी भावना ते मोड़ी पड़या करे।

20:12अने अनुक्रमे नाश पामायो जे थाय धीरे धीरे धीरे धीरे करके

20:15सारी संसार की इच्छाएं खत्म हो जाती हैं।

20:17हे अवलोकन की मतलब जागृति का इतना कमाल है। कि आप अपने परिणामों को देखते चले जाओ।

20:23सही है कि गलत है आपको अपने आप मालूम पड़ जाएगा।

20:26अगर आपको मोक्ष में जाना है तो धीरे धीरे सही गलत परिणाम निकल जाएंगे

20:30अच्छे परिणाम बढ़ते जाएंगे। ऐसा करते करते संसार की पूरी। ऐसा करते करते

20:33संसार की पूरी भावना zero हो जाएगी।

20:35जब zero हो जाएगी तब आप ध्यान में बैठे हैं। तो निरिकलपावस्था आती है।

20:40थोड़ी देर के लिए भी। तो समझना कि हम इस मुकाम तक पहुंचे हैं।

20:44हमको सही मुमुक्षुता है

20:45तब मालूम पड़ता है, इसके पहले मुमुक्षुता है मालूम नहीं पड़ता है।

20:49सही है कि नहीं है नहीं मालूम पड़ता है। जागृति में रहते रहते

20:52रहते रहते बिल्कुल विचार शून्यता आवे तो समझना कि हमने

20:55संसार से नाता अब तोड़ा है।

20:58और आत्मा से नाता जोड़ा है, हमको वास्तव में आत्मकल्याण करने

21:00की भावना है। भावना में अब कोई खोट नहीं है ऐसा। नहीं तो क्या है भावना मिश्र होती है।

21:06थोड़ी संसार की भावना थोड़ी आत्मा की भावना ऐसा होता है।

21:09फिर उसको बढ़ाना पड़ता है।

21:11तो साधना करते करते जागते में रहते रहते

21:13बड़ा है तो जब ध्यान में बैठे तो कोई विचार ही नहीं आवे।

21:16शून्यता आ जावे। अच्छे बुरे कोई नहीं।

21:19पर 1 minute के लिए 2 minute के लिए भी सही लेकिन ऐसा होता है।

21:23तो अनुक्रमे नाश पाने योग्यता है। आ card में ये

21:25बात घणो करीने जवा में आवत नथी लेकिन ये जो

21:27card है उसमें ऐसे। लेकिन ये जो card है उसमें ऐसे जीव तो

21:30मिलना बहुत मुश्किल है। जिनको संसार की कोई रुचि ना हो।

21:34आत्मकल्याण की 100% की भावना हो, ज्ञानी तो नहीं मिले।

21:38लेकिन pure मुमुक्षु जिसको बोले।

21:40जिसको सिर्फ आत्मकल्याण ही करना है ऐसी भावना है,

21:43ऐसे मुमुक्षु भी pure मिलते नहीं हैं।

21:45कोई ना कोई कहीं ना कहीं क्रियाकांड में उधर उधर आग्रह में फंसे हुए हैं।

21:49आत्मकल्याण करना है तो उसके लिए क्या करना उसने खुद ने

21:53किसी के सुन से सुनने के बाद या अपने आप decision ले लिया है।

21:58रोज सुबह उठकर के ऐसा पूजा पाठ करूंगा तो मेरा आत्मकल्याण हो जाएगा।

22:01इतने उपवास करूंगा तो हो जाएगा।

22:03Decision खुद ने लिया है, कोई किसी ज्ञानी को पूछकर के नक्की नहीं किया है।

22:07कि सही है कि गलत है। आंख बंद करके चले जाना है।

22:11इसमें कोई दूसरी बात आती है तो पहले तो चौंकना होता है कि ये

22:14क्या है यार। जब हम इतना करते हैं वो भी चूक जाएंगे।

22:17लेकिन ये आग्रह है वो छुड़ा रहे हैं।

22:20क्रिया होवे नहीं होवे मतलब नहीं, आग्रह जो है वो बाधारूप है।

22:23आत्मकल्याण करने वाले जीव को किसी क्रिया...

22:25आत्मक्यालन करने वाले जीव को किसी क्रियाकांड का मंत्र तंत्र का आग्रह नहीं होता

22:29है. आग्रह छूट जाता है.

22:31क्रिया भले हो आग्रह नहीं देना चाहीए

22:33आग्रह रहा तो आत्मक्यालन का निधार नहीं है अभी भी.

22:36हम सरळ नहीं है उसके लिये. काल मां ए वात घण करने

22:39जवामां आवती नथी. कोई जुदा स्वरूपमां मुमुक्षु अने कोई जुदा स्वरूपमां

22:42मुनि वगेरा जोईने विचार थाय

22:44छे. उस समय में भी साधना करने वाले तो बहोत थे. क्युंकी सबको सुख चाहीए.

22:48अने संसार में हरेक प्रकार

22:50की ईच्छा हरेक की पूरी नहीं. संसार में हर एक प्रकार की इच्छा हर एक की पूरी

22:53नहीं होती है तो सोचना होता है।

22:55ऐसा क्यों हो रहा है? सही कदम किया है, दुकान गया फिर loss क्यों हुआ?

23:00नौकर को तो पगार भी मिला।

23:02Sales tax वाले को sales tax मिला, income tax वाले को income tax मिला।

23:05दुकानदार को किराया मिला जिसकी भी दुकान थी उसको। क्या?

23:11और ये इतना साल भर मेहनत करे, हिसाब रखे,

23:13उतापटा करे, रात-दिन करे, हिसाब लगाया साल भर के बाद।

23:17इतना घाटा। देखो। घाटा मतलब अपना जो था... घाटा मतलब अपना जो था वो भी चले गया।

23:23घर की रोटी खाई और ऊपर से और कर्जा बढ़ गया।

23:26ऐसा भी होता है कि नहीं होता? फिर ध्यान रखा था ना?

23:29ऐसा तो नहीं हुआ कि 4 का माल 3.75 में बेचा है। 4 का माल तो 5 में ही बेचा

23:34है, 4.25 में बेचा है। फिर ये क्यों, क्यों बेच नहीं आई?

23:37कि पूरी साल भर की मेहनत बेकार चली गई। जो खड्डा खोदा है वो दूसरे

23:41दूसरे साल में भी उसका adjustment करना पड़ेगा।

23:45Competition में दाम ज्यादा ले सकते नहीं।

23:48ज्यादा माल मंगाकर... ज़्यादा माल मंगाकर overstock नहीं कर सकते। Time पे

23:51माल नहीं रहे, ग्राहक आए

23:52तो भी तकलीफ़। चारों ओर से तकलीफ़ है व्यापारियों को।

23:56क्या करें?

23:57Taxes देखो तो बढ़ते जाते हैं। इतनी tension रहता है,

24:02payment time पे नहीं आता है, payment time पे जाता नहीं है, माल time पे

24:05नहीं आता है। ऐसा problem

24:06होता है। ये Diwali के ऊपर जो

24:08Mumbai से जो माल मंगाने वाले हैं, जो खाने-पीने की मिठाई वगैरह। धनतेरस के दिन

24:13पूरी गाड़ियाँ रुक गई थी वहाँ,

24:15checkpost के ऊपर। अचानक, shelters वालों ने क्या किया? अचानक shelters वालों

24:17ने क्या किया भगवान जाने।

24:19धनतेरस को माल आना था सबको बांटना था order ले लिया था सबके राडा राडी और माल नहीं

24:23है आ गया है वहां से निकल गया।

24:25Payment चुकाना पड़ेगा।

24:26एक हफ्ता भर भी रह गया तो पूरे सड़ जाने वाले हैं

24:28और time पे काम नहीं आवे तो overstock हो जाएगा। देखो ये।

24:32ऐसा होता है कि नहीं पूरे लोग रो रहे थे व्यापारी लोग कि क्या करें अब हम।

24:37पूरा माल जाम कर दिया उधर road पे ही। दिवाली का time है।

24:41तो ये ये जो खाने पीने की चीजें हैं तो फटाफट order heavy stock में आया था। Order

24:45heavy stock में आया तो पूरा कमाने के लिए जो किया वो सब loss में चले गया।

24:49साल भर का loss हो जाता है इसके अंदर कभी-कभी। Season जो overstock करके लिया है

24:54साल भर की खत्म हो जाती है कमाई।

24:57तो ये अपने हाथ में बात नहीं है लेकिन यहां पर देखें तो कोई जुदा स्वरूप है मुमुक्षु।

25:01मुमुक्षु देखो तो बस सुबह प्रतिक्रमण कर लिया शाम में प्रतिक्रमण कर लिया थोड़ी भक्ति

25:05कर ली थोड़ी उपासन जाके आए मंदिर तक।

25:08आरती त्योहार में मिछा मिंदो क्रम कर लिए वो कर लिए। मतलब ये ऐसे मुमुक्षु

25:13बाकी सारा दिन धन... ऐसे मुमुक्षु बाकी सारा दिन धंधा-वंधा उठा-पटक राग-द्वेष

25:16पल-पल में करते हैं। ऐसे मुमुक्षु और ऐसे ही चाहे मुनिराज हैं।

25:21तो originality गई मुनिराज में भी कितने प्रकार के दोष।

25:25वो लकड़ी से लेकर के फिर वस्त्र, वस्त्र लकड़ी से लेकर के चश्मा, mobile phone

25:30सब आ गया है अब तो मुनिराजों के पास भी। हर चीज घर में नहीं होवे इतनी सुविधा

25:36उनको उपाश्रम में और वहां मिल जाती है।

25:38लोगों का परिचय उसको छुट्टी नहीं है आचार्य को तो खलास।

25:42हम side के जो शिष्य होते हैं वो तो ठीक है समझो

25:45उनको थोड़ा time मिलता होगा आचार्य को time नहीं मिलता। एक के बाद एक आते हैं

25:48सब मांगलिक सुनाओ तो मांगलिक सुनाने में ही जिंदगी पूरी हो जाती है।

25:52एक के बाद एक आते रहते हैं पैर पड़ते हैं मांगलिक सुनाओ।

25:55दिन में 1000 बार तो मांगलिक सुनाते हैं।

25:58उसमें ही जिंदगी पूरी हो जाती है आत्मचिंतन कब करेंगे?

26:01समय नहीं मिलता है तो यही बोलते हैं यहां पर।

26:04कोई जुदा स्वरूप में मुमुक्षु होने जुदा स्वरूप में मुनि वगैरह जो

26:08इन्हें विचार था। जोईने विचार थाय छे. क्या विचार होता है? के

26:11आवा संगे करी जीवनी उर्ध्व

26:12दशा थवी घटे नहीं. इनका संग

26:14करेंगे तो जीव आगे तो नहीं बढेगा. उर्ध्व

26:17दशा मने क्या? मोक्ष मार्ग में आगे बढे. ए तो

26:20possible नहीं. कोई बात नहीं आगे नहीं बढेंगे. लेकिन नीचे नहीं गिरे तो भी

26:25ठीक है लेकिन नहीं. अधो

26:27दशा थवी घटे. आगे बढने के

26:29बदले जीव नीचे गिरे. उस काळ में आज

26:31से कम से कम 100-150 साल पहेले की बात है

26:34तब मुनि आज का एसा स्वरूप था. बात छे. तब मुनि आदका

26:38एसा स्वरूप था. मुमुक्षु का एसा स्वरूप था. अभी आज देखे तो आज तो ओर विकृत

26:43हो गया है. इनका संग करने से अधोदशा होगी उर्ध्वरेशा तो होने का chances

26:47नहीं है. लेकिन minus point

26:48में जाओगे. जो आत्मभावना है ने वो भी खतम हो जायेगी. वडी सत्संगनो कई प्रसंग

26:53थयो छे. जेवा जीवनी व्यवस्था

26:54पण. कारदोस्ती पलटता वार नथी लागती. थोडा

26:56बहुत सत्संग किया हो थोडी बहुत आत्मभावना जागी गई.

26:59लेकिन संसार का एसा विचित्र स्वरूप है के कोई एसा प्रश्न...

27:03संसार का ऐसा विचित्र स्वरूप है कि कोई ऐसा प्रसंग आ गया।

27:09कि सत्संग छूट जाता है,

27:10आत्मभावना कमजोर हो जाती है। खत्म, वो जीव पलट जाता है 1 second के अंदर।

27:15आते-आते रुक जाता है, ऐसे भी cases नहीं बने अपने?

27:18तारंग में एक भाई आया, बहुत उत्साह बताया, तारंग के बाद मुँह नहीं बताया।

27:22Phone किया तो phone पे जवाब नहीं दे रहे।

27:25क्या बात है, कुछ problem, वो भी नहीं बताते हैं। आना ही बंद हो गया, बोलो।

27:30Regular आने वाले जीव, अचानक क्या पलटा आया, क्या

27:33दिमाग में आया भगवान। क्या पलटा आया

27:34क्या दिमाग में आया भगवान को मालूम पूरा खत्म। एवा जीवनी व्यवस्था पण कार दोस्ती पलटता

27:39वार नथी लागती मतलब क्या है अभी इसका?

27:42के सत्संग में आने के बाद आपको बहुत जल्दी से एक काम पहले कर लेना है। कौनसा?

27:48saint person की आत्मभावना। एक सबसे पहले कर लेना है उसमें ज्यादा time नहीं गवाना है।

27:55तो समझना के आपको सत्संग जो मिला है।

27:58वो पूर्व पुण्य के उड़े से

27:59जो सत्संग थोड़ा बहुत भी मिला है। बुद्धि मिला। उसका आपने सही फायदा उठाया।

28:03कि आत्मभावना 100% की हो गई। अब जो सत्संग छूट भी जाएगा तो भी आप intact रहेंगे।

28:08Externally छूटता नहीं है लेकिन छूट भी जावे तो भी। आपके

28:11आत्मभावना में बदलाव नहीं आएगा saint percent हो जाने के बाद।

28:15होता क्या है अधूरी भावना रहती है

28:17सत्संग होने के बाद। और इसमें प्रमाद करते हैं हाँ धीरे-धीरे

28:20करेंगे धीरे-धीरे करेंगे ऐसा नहीं।

28:22सबसे पहले दो चार दिन में

28:24आठ दस दिन में ही फैसला कर लेना चाहिए कि मेरे को अभी ये करना है कि वो करना है।

28:28Total क्रिया कैसी भी है क्रिया। Total क्रिया कैसी भी है

28:32क्रिया का बाद नहीं है भावना का बाद है। सत्संग में आने के बाद भी

28:36जो भावना अभी भी संसार

28:37की अंश मात्र भी रही तो उसको

28:38तो चौंकनी लगा देना। नहीं तो क्या है

28:40कि ये सत्संग पूर्व के पुण्य के उदय से मिलता

28:43है और पाप के उदय से नहीं भी मिलता है। Chances क्या है

28:46जब पूर्व का पुण्य का उदय हो और सत्संग मिले

28:47तब आपको chances है आत्मभावना 100% करने का।

28:50अकेले नहीं कर सकते हैं।

28:52पाप का उदय है और सत्संग छूट जाएगा तो

28:54फिर आप टिकना मुश्किल है। फिर आप घर बैठे तो आत्मभावना इतनी... कि आप घर बैठे तो

28:57आत्मभावना इतनी जबरदस्त नहीं होती है तो

28:59शुरुआत में एक काम कर लिए तो safe side हो जाती है।

29:02और ऐसी भावना वाले को, सयान पसंद की भावना वाले को सत्संग मिलता भी है।

29:07नहीं मिलता... सत्संगों

29:13का ही प्रसंग था वैसे।

29:14किसी पूर्व के पुण्य के कारण या किसी के मित्रों के समझाने के कारण

29:18किसी जीव का सत्संग में आना हुआ है। तो ऐसे जीव की व्यवस्था भी,

29:22ऐसे जो planning होगा रोज आना हुआ है। अभी

29:24ऐसी जो planning हो गया रोज आना हो रहा है लेकिन कभी वो gap पड़ जाएगा।

29:28कभी ऐसा time खराब आता है तो सत्संग छूटता है तो उसकी आत्मभावना zero हो जाती है।

29:32दो चार दिन में, महीने भर में सत्संग किया। और जो आत्मभावना आई।

29:38हो सकता है चार पांच दिन में ही खत्म हो जाए पूरा zero हो जाए। ऐसा होता है।

29:43ये वो प्रगट जो इन्हें चितमा खेदता है ऐसे जीवों को देख कर के

29:46कृपालु देव को खेद होता है।

29:48कि अरे ये जीव को इतना नसीब अच्छे का सत्संग में आया। थोड़ा सुना नहीं सुना।

29:51कुछ। थोडा सुना नहीं सुना, कुछ पले नहीं पडा नहीं पडा ओर एसा उडे आया के

29:56उपर छूट गया उसका साथ. एसे

29:58जीवो को देख करके उनको चित्त में

30:00खेद होता है. ओर साथ में अब अपने चित्त

30:03की बात करते है. के अपना क्यां अंदर में क्यां चल

30:07रहा है. के मारा चित्तनी व्यवस्था जोता मने एम लागे छे के, मने पण

30:11एम लागे छे के, कोई पण प्रकारे आ व्यवसाय घटतो नथी, अवश्य घटतो नथी. खुद

30:16को आत्मज्ञान दशा है. कोई भी

30:18क्रिया मन वचन काया की हो रही... कोई भी क्रिया मन वचन काया की हो

30:21रही है व्यापार धंधा आदि की तो उसमें interest बिल्कुल नहीं है।

30:25पूर्व कर्म की सजा काटने योग्य ऐसा व्यवहार करते हैं।

30:30लेकिन उतना भी उनके आत्म साधना में बाधा लगता है उनको,

30:33प्रमाद लग रहा है उनको, दोष लग रहा है। इच्छा से नहीं करते हैं,

30:38अभिप्राय का दोष नहीं है लेकिन आचरण का भी जो दोष है वो भी उनको दिल को इतना खटकता है।

30:44क्योंकि इससे मेरी रुकावट है ऐसा

30:45लगता था उनको। तो महाराज जितनी व्यवस्था जो था मने पण एवं लागे। मारा चित्तनी

30:48व्यवस्था जोता मने पण एम लागे

30:51छे के. दुसरोन के दोष देखे मुनिराज के

30:54मुमुक्षुओ के. ते देखो इनोने अपना भी दोष देखा. अकेले उनका

30:58नहीं अपना भी एसा दोष है. मारा चित्तनी व्यवस्था जोता मने एम लागे

31:03छे के मने कोई पण प्रकारे आ व्यवसाय घटतो नथी अवश्य घटतो नथी. किसी जीव को

31:10personal ध्यान देना है तो नहीं हो सकता है केसे नहीं हो सकता है के खुद

31:13व्यवसाये पडे है. तो करुणा तो

31:14आई तो उसको दो शब्द बोलके समजावे

31:16लेकिन. तो उसको दो शब्द बोल के समझावे लेकिन

31:18उतना समय नहीं मिलता है।

31:21खुद बंधन में है। और खुद को भी आत्मकल्याण बढ़ाना है,

31:24साधना करनी है तो कैसे करें व्यवसाय में करते-करते।

31:29जरूर अत्यंत जरूर आजीवन कोई प्रमाद है।

31:32ज्ञान दशा आने के बाद भी अभी भी निरर्थक प्रवृत्ति है, अभी उनको तो

31:36मालूम होगा ना कि व्यापार

31:37में से कोई फायदा होने वाला नहीं

31:39है। अज्ञान दशा में ऐसा लगता है कि दुकान नहीं जाऊं तो loss हो

31:42जाएगा, नहीं पैसा क्या

31:43मिलेगा, नहीं फिर मैं कैसे खाऊंगा,

31:44नहीं क्या पियूंगा, नहीं। कैसे खाऊंगा ना क्या पियूंगा

31:46ना। ज्ञान दशा के बाद तो

31:47उनको वो problem नहीं रहता है क्योंकि mind बिल्कुल clear है।

31:50कि जो भी कमाई आती है वो पाप पुण्य के उदय से आती है। जाओ ना जाओ।

31:54और कमाई जाती है कम होती है नुकसान होता है वो

31:58पाप के उदय के कारण होता है मेरा कुछ भी नहीं है।

32:00जीव वहां बैठे-बैठे भी दुकान में पहुंच गया तो भी जीव

32:04रुपया भी नहीं गिनता है और माल भी नहीं देखता है touch भी नहीं करता है।

32:08जीव तो सिर्फ जानना देखना करता है। लेकिन अज्ञानता के कारण ऐसा लगता है

32:12कि मैंने पैसा लिया। ऐसा लगता है कि मैंने पैसा लिया गिना मैंने हिसाब बराबर किया

32:16मैंने उसको अच्छा माल दिया या नहीं दिया ठग लिया कुछ भी किया उल्टा सीधा किया

32:21उसको लगता है कि मेरी होशियारी से मैं पैसा कमाता हूँ असल में जीव को

32:24touch भी नहीं करता है

32:26जो भी हो रहा है पूर्व के पाप पुण्य के अनुसार हो रहा है

32:30तो ज्ञान दशा के बाद तो

32:31स्थिति बिल्कुल समझ में आ गई फिर ये बेकार का दना क्यों हो रहा है

32:36वो बेकार का दना होता तो है होने में कारण क्या है पूर्व कर्म है लेकिन पूर्व

32:40कर्म। लेकिन पूर्व कर्मो के सामने हम इतने कमजोर हो जाते है, फायदो नहीं दे सकते है.

32:45अंदर स्थिरता नहीं बढाते है. अगर

32:47लीनता होवे तो नहीं जावे अंदर, लेकिन नहीं

32:50लीनता भी नहीं है अंदर की स्थिरता. ओर जाना हो

32:53जा रहा है, पूर्व कर्म आवे एसा उसमे उदय में सामेल हो

32:56जाना होता है. ए बहु तकलीफ होती है, जरूर अत्यंत जरूर. आ जीवनो कोई

33:01प्रमाद छे, मेरा बहु प्रमाद

33:02है, एसा नहीं. नहीं तो प्रगट जाण्युं छे एवुं जे झेर, ते पीवाने

33:06विशे जीवनी प्रवृत्ति केम... के

33:08पीवाने विषय जीवनी प्रवृत्ति केम होय?

33:11ये तो बिल्कुल नुकसान का धंधा है। आत्मा को तो

33:14बड़े रुपया करोड़ों जमा हो गए आत्मा को तो ₹1 का फायदा नहीं है। एक percentage

33:18भी फायदा नहीं है नुकसान है।

33:20क्योंकि करोड़ रुपया कमाने के अंदर जितने भी भाव किए हैं

33:25पाप के वो सब के सब भोगना पड़ेगा उसको। एक तो वर्तमान में

33:29आत्मजागृति नहीं रही वो एक loss।

33:32और फिर जो कर्म बांधे हैं वो भविष्य में भोगना पड़ेगा वो loss।

33:37और समय waste। Loss. और समय waste गया, वो एक loss.

33:40पूरी साधना में रुकावट बहुत बड़ी है।

33:43आरंभ परिग्रह की जो प्रवृत्ति है, साधना में बहुत से बड़ी रुकावट।

33:47जीव को आत्मकल्याण करना है, लेकिन आत्मकल्याण करने के लिए जो

33:49thinking होनी चाहिए, planning होना चाहिए,

33:52वो planning कब करेगा? free होगा तो करेगा ना?

33:54free नहीं है, सुबह से लेकर के रात भर तक कुछ ना कुछ करना धर्ना रहता है।

33:59इतनी heavy प्रवृत्ति है।

34:02तो जरूर आ जीवना बहुत प्रमाद छे, नहीं तो प्रगट जाण्यु छे, उंजे

34:05जे... नहीं तो प्रगट जाण्युं छे एवुं जे झेर ते पीवाने विशे जीवनी प्रवृत्ति केम

34:11थाय? केम होय? अथवा एम

34:13नहीं तो उदासीन प्रवृत्ति होय. चलो ठीक

34:16छे जाना पडता है. कर्म राजा लेके जाते है

34:19दुकान में. आत्मा की बिलकुल ईच्छा नहीं है. तो फिर वहा

34:25involve कैसे होता है? बिलकुल involve नहीं होना. बस चूपचाप लेके गये ने बेठ जाना

34:29वहा. तो ए उदासीन प्रवृत्ति.

34:33तो उदासिन प्रवृत्ति भी नहीं है।

34:35तो पण ते प्रवृत्ति हवे तो कोई प्रकारे पण परिसमाप्तपणु भजे।

34:40एम थवा योग्य छे। ए प्रवृत्ति

34:43अब खतम होवे तो अच्छा, नहीं होवे तो समझना कि मेरा ही कोई interest है चालू रखने में।

34:48मेरे को जितनी चाहिए उतनी उदासिनता नहीं है, मेरे को

34:51अभी आत्मकल्याण करने की सच्ची भावना नहीं है। मोक्ष मार्ग में आगे बढ़ने

34:54की भावना में खोट है।

34:56ऐसा ज्ञान दशा के बाद भी वो अपने आप को कोसते हैं इस प्रकार से।

35:00अगर ये... अगर ए प्रवृत्ति खतम नहीं होगी जल्दी से तो समजना

35:07के जरूर जीवनो कोई पण

35:09प्रकारे दोष छे. कोई पण प्रकारे

35:13का मतलब क्या होगे? सुख धाम अनंत

35:16सुसंत चाही दिन रात्री रहे तद ध्यान. ध्यान महि।

35:23पर शांति अनंत

35:36सुधा मय

35:39जे। प्रणमु पद ते

35:45बरते जयते।

35:56जयते प्रणमु

36:00पदते वर्ते जयते।