Avlokan Discourses of Shri Devchand bhai Shah The book Search Photographs About

Shri Dravya Drushti Prakash

6 November 2000 · Patra 144, 146, 147, 6 · 30 minutes

Transcript

Transcribed automatically and lightly corrected. The recording is the authority where they differ.

Recitations restored to their canonical wording: Mangalacharan — Mangalam Bhagavan Viro, Mangalacharan — Sarva Mangala Mangalyam, Namokar mantra, Omkar bindu sainyuktam, Samaysar mangalacharan.

0:05डबल दृष्टि प्रकाश 144 146 147। तारीख 6 11 2000 श्री

0:11देवचंद णमो अरिहंताणं णमो सिद्धाणं

0:15णमो आयरियाणं णमो उवज्झायाणं णमो लोए सव्व साहूणं

0:21नमः समयसाराय

0:24स्वानुभूत्या चकासते । चित्स्वभावाय भावाय

0:30सर्वभावान्तरच्छिदे मंगलं भगवान वीरो,

0:35मंगलं गौतमो गणी। मंगलं कुन्दकुन्दार्यो,

0:40जैनधर्मोऽस्तु मंगलम्॥ सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं

0:45सर्वकल्याणकारकम। प्रधानं सर्वधर्माणां

0:51जैनं जयति शासनम॥ बिंदु

0:53संयुक्तम ॐकारबिन्दुसंयुक्तं नित्यं ध्यायन्ति योगिनः। कामदं मोक्षदं चैव

0:57ॐकाराय नमो नमः श्री जगत् दृष्टि

0:58प्रकाश। तजस वाणिजीति तत्व तत्त्व। ब्रह्म 144। प्रज्ञानेन का ध्यान के

1:03बारे में क्या कहना है?

1:05निर्विकार ध्यान के पहले अनेक प्रकार

1:09का चिंतन मनन अंतुर तक चलता है।

1:12चिंतन मनन घंटों तक चलता है। फिर भी वो

1:20निर्विकल्पता का

1:23कारण नहीं

1:32है। वो तो अटकाव है।

1:34कारण तो नहीं है।

1:36कि हम बहुत अथापटक करेंगे,

1:38अवलोकन करने का प्रयत्न करेंगे, भेद ज्ञान करने का प्रयत्न करेंगे।

1:42कुछ करेंगे तो होगा, ऐसे खाली बैठना क्या? उठापटक कितनी भी करें,

1:48इससे फायदा तो कुछ भी नहीं

1:50है, आत्मज्ञान तो होने वाला नहीं है। लेकिन यही

1:52आत्म... लेकिन यही आत्म ध्यान में बाधा है।

1:57क्या? घंटों तक चिंतन चलता है,

2:01निर्विकल्प होने के पहले। क्योंकि, प्रमुखा सुधी तो

2:07कुछ ना कुछ मेहनत करना चाहता है इस बारे में, चिंतन चलता है। और तो क्या?

2:12मैं आत्मा हूँ, मैं शुद्ध हूँ, मैं बुद्ध हूँ, मैं परब्रह्म हूँ, ऐसा हूँ, वैसा हूँ।

2:16ज्ञान मात्र में हूँ। मेरा काम

2:18केवल धारणा देखना है, ऐसे सब बहुत सारे विचार आते हैं। देखना है

2:20ऐसे बहुत सारे विचार आते हैं।

2:22बीच-बीच में संसार के विचार आते हैं तो क्यों आ रहे हैं मेरे को विचार?

2:26मैं तो आत्मा हूँ मैं जानने वाला हूँ ऐसा चलता है बहुत बार। आता है

2:32नहीं आने का नहीं है। तो आता ही नहीं है वो बात नहीं आएगा।

2:38तो प्रयत्न वाली भावना होने से प्रयत्न होने से ऐसे विचार आते हैं। घंटों तक चलते हैं।

2:45फिर भी वो निर्विकलता का कारण नहीं है। विचार किया।

2:50इसीलिए बाद में अनुभव हुआ, इतनी मेहनत किया इसलिए बाद में वेदन आया, ऐसा नहीं है।

2:55उल्टा वो, उसने रोका है वेदन को।

3:01विचार जो किया, उसने वेदन रुक गया। विचार करना नहीं, ज्ञान करना नहीं।

3:07करने गया तो फंस गए। निर्विकल्लता तो अंदर में उग्र अवलंबन से ही होती है।

3:14अंदर में मतलब शाश्वत जो परमात्मा है। उसका उग्र अवलंबन लेना है।

3:22कैसे लेना है? दिखता तो है नहीं। उसका अवलंबन कैसे लेवे?

3:27स्वयं परमात्मा है उसका अंदर में, अंदर में उग्र अवलंबन लेना है।

3:31तो अपने आप निरपेक्षता आ जाएगी। लेकिन कैसे लेवे? उग्र अवलंबन माने क्या?

3:36दिखे तो पकड़ लेवे लेकिन दिखता तो है नहीं। जैसा

3:41लंगड़ा आदमी चलता है तो

3:43लकड़ी का टेका लेके चलता है। का लेके चलता है। केता माने आधार अवलंबन।

3:48ओके बिना वो गिर जाता है। लकड़ी रहेगा तो बराबर। थोड़ा थोड़ा चल सकता है।

3:56ऐसे। अपने अंदर में अवलंबन लिए तो निरपेक्ष दशा है।

4:01अंदर में अवलंबन लेना है और अवलंबन भी मामूली नहीं उग्र अवलंबन लेना है।

4:08उग्र अवलंबन माने क्या कोई सहारा नहीं यही सहारा है।

4:12कौन सा तुम्हें परमात्मा। कौन सा कि मैं

4:14परमात्मा हूँ ऐसा सारा। अवलंबन कैसे लिया जाता है?

4:17सिर्फ बोलने से तो अवलंबन होता नहीं है।

4:21अवलंबन ऐसे लिया जाता है कि जब मैं परमात्मा हूँ तो मुझे करने को क्या बाकी रहेगा?

4:26जो उथा पटक, जो हेरातेरी।

4:29तो उसका उग्र अवलंबन लेना माने क्या ध्यान करने का

4:32भी विकल्प नहीं करना। होवे तो होवे नहीं होवे तो नहीं। जब उसमें चिंतन रुकावट

4:35है उनका बनाना इसका मतलब

4:37पूरा बेफिक्र करने का। हाँ बेफिक्र ही

4:38है। पूरा एकदम। अगर नहीं हो। हाँ बेफिक्र

4:40ही हूँ। अगर नहीं होगे तो करने से

4:42तो मिलने वाली नहीं है। बेफिक्र मतलब क्या करोगे तो मरो, होने वाला नहीं

4:48है। वो तो असल में इच्छा है तो ध्यान नहीं होता, ध्यान है तो इच्छा नहीं रहती।

4:53आपको ध्यान करना है तो वो ध्यान होता ही नहीं कभी। दोनों opposite हैं।

4:59ज्ञाता भाव है वो ध्यान।

5:01करना नहीं करना वो ध्यान नहीं है। हाँ तो करता तो छूटेगा तो

5:06ही ध्यान होगा नहीं तो होता ही नहीं।

5:10पुरुषाद करो पुरुषाद करो वो तो कहने की भाषा है

5:12जो प्रमाद है। जो अपने

5:15स्वभाव का अवलंबन नहीं लेते हैं। ध्यान तो एकाग्रता के लिए करते हैं।

5:17एकाग्रता। ध्यान के लिए बैठना ऐसे नहीं बैठते।

5:21एकाग्रता की एकाग्रता की कौन करेगा?

5:25परमेश्वर थोड़ा करेगा एकाग्रता वो थोड़ा ध्यान करेगा।

5:28हम कौन हैं परमेश्वर की अवस्था है। अवस्था गड़बड़ वाली है।

5:34तो उसको ठीक होने के लिए

5:35ध्यान करना जरूरी है किसको

5:37अवस्था। ध्यान करना ज़रूरी है किसको अवस्था। लेकिन हम कौन हैं?

5:41हम अवस्था नहीं हैं। हम तो परमात्मा हैं। तो परमात्मा हो तो उसका

5:46अवलंबन लो और कुछ करने धरने से बाद पीछा छुड़ाओ।

5:50ध्यान पर्याय को करना है तो करेगा मेरे को नहीं करना। पर्याय भीन मैं भीन।

5:56पर्याय 1 second रहती है दूसरी second नाश हो जाता है। मैं हमेशा रहने वाला हूँ।

6:02पर्याय को ज़रूरत पड़ती है ध्यान करने की मेरे को कोई ज़रूरत नहीं पड़ती है ध्यान

6:06करने की। और नहीं करे तो

6:07भी मैं जैसा का वैसा हूँ, तो काहे को पीछे पड़ूँ मैं?

6:13मेरे को क्या ज़रूरत है?

6:15मेरे को सम्यक दर्शन की भी ज़रूरत नहीं है, मेरे को ध्यान की भी ज़रूरत नहीं है।

6:20मेरे को मौन की भी ज़रूरत नहीं है।

6:22मेरे को बाहर भटकता उपयोग को अंदर लाने की भी ज़रूरत नहीं है।

6:26तमाम इच्छा का नाश हो गया है। इसने

6:30मैं परमात्मा हूँ ऐसा स्वीकार किया, तभी तो... ऐसा स्वीकार किया तभी तो वो कुछ

6:33करता नहीं। वो तो जब पदार्थ का निर्णय होता तभी होता था ना कि मैं तो आत्मा

6:36ही हूँ। आत्मा ही हूँ वो पदार्थ का निर्णय करते तभी

6:40वो नहीं

6:41होता। ठीक। उसके बाद जो

6:45ध्यान है। उसके बाद निर्णय हो गया तो अपने आप चलता है ध्यान करने की क्या जरूरत।

6:49जिसको निर्णय हो गया है उसका

6:51ध्यान अपने आप चलता है। नहीं कभी-कभी ध्यान करके बैठ जाते

6:53शुरू में। ठीक है बैठे तो बैठे हो

6:55लेकिन। ध्यान करने के बाद अपने आप से वो

6:57stop हो जाता है। बैठे हैं इसीलिए वो ऐसा नहीं है। इसीलिए हुआ ऐसा नहीं है।

7:02जब बैठे हैं इसलिए ध्यान हुआ ऐसा नहीं है ये कहते हैं। ध्यान होगा

7:07जब ध्यान लगता है आत्मा में इसके पहले बहुत सारा घंटों भर तो विचार कर रहे हैं,

7:11ध्यान में बैठे हैं सब कुछ कर रहे हैं लेकिन किए बोल के ध्यान हुआ ऐसा नहीं है।

7:17ये करेंगे तो ही ध्यान होगा ऐसा नहीं है कभी-कभी ध्यान अपना अपने

7:20आप होता है कभी-कभी बहुत मेहनत करने

7:22पर भी नहीं होता है। 2-4 घंटे बैठो वेदन नहीं आ

7:27रहा है कभी एकदम automatically

7:29जाते ही बैठते ही... भी

7:30एकदम automatically जाते ही बैठते ही बैठना आप।

7:36का मतलब क्या? सुते

7:39तो कोई आत्मज्ञान होने वाला।

7:44वो कब सुटेगी कि मैं परमात्मा हूँ ऐसा अवलंबन लेगा तो सुटेगी।

7:47पकड़ना धरना फिर रहता नहीं। इसको ऐसा

7:49जरूरी नहीं कि दृढ़ दृष्टि

7:50का वो प्रयास करता रहेगा फिर उसको आत्मज्ञान होगा। वही प्रयास है ना

7:54मैं परमात्मा हूँ ऐसा अवलंबन लिया वही प्रयास। और क्या। और क्या प्रयास करना है? कि

7:59भगवान हो ऐसा मानना है, स्वीकार करना

8:02है। इसका नाम द्रव्य दृष्टि।

8:04कुछ करने धरने जावे तो फिर वो द्रव्य दृष्टि कहाँ हो? तो अवस्था की दृष्टि हो।

8:09कि ये अवस्था पसंद नहीं है तो फिर इसको change करना है।

8:11जो पसंद वाली अवस्था है वो लाना है। वो द्रव्य दृष्टि नहीं

8:16है। भले ही उपयोग बाहर फिरें हमको अंदर लाना नहीं है।

8:19क्योंकि हम द्रव्य हैं। हम परमात्मा हैं। तो द्रव्य दृष्टि हो गई।

8:25चिंतन है जब तक

8:27अनुभव नहीं है। अनुभव होगा तो चिंतन नहीं रहेगा। ये

8:31कहना चाहते हैं। चिंतन होता है, आता है लेकिन जब

8:34अनुभव होता है तो चिंतन भी छूट जाता है ना?

8:36अनुभव कब होता है? वेदन कब आता है?

8:40वेदन के वक्त मैं परमात्मा हूँ,

8:42मैं ज्ञान मात्र हूँ, मैं जानने वाला हूँ, ऐसा कहाँ रहता है?

8:46वहाँ तो ये भी विचार नहीं रहता है। तो वो दशा नहीं आई

8:50है अभी तक। नहीं आई है तो फिर वो हम वहाँ तक नहीं पहुँचे अभी तक। भावना।

8:58भावना बढ़ाना।

8:59हम आगे बढ़ गए हैं, हम ठीक चल रहे हैं, वो शांति मिल रही है

9:02तो हम बराबर हैं, ऐसा नहीं मानना।

9:03अभी हमको करने का बहुत बाकी है, अभी जहाँ पहुँचना चाहिए वहाँ नहीं पहुँचे, ऐसा

9:07मानना। वो तो सही है

9:08ना। अभी भी आए थे यही सोच

9:09के आए थे अभी। हाँ तो अभी तो

9:10नहीं आ रहे। वो भी मालूम जहाँ जहाँ नहीं मालूम पड़ा

9:13वो अभी आप लोग छोड़ दिए कि आप जैसे बोले वैसे करेंगे। हमको

9:15नहीं मालूम पड़ रहा अभी आप लोग कैसे मालूम पड़ेगा। भरा दिया था कैसे भरा दिया था?

9:22नहीं तो नहीं तो जो पहुंचेगा वहां तक उसको समझ में आएगी।

9:25जो नहीं पहुंचा उसको समझ में नहीं आएगी ये बात।

9:29वो तो बोलेगा मैं इतना भी नहीं बोलना कि

9:31मैं जानने देखने वाला हूं। तो प्रयास नहीं करना क्या ऐसा हो जाएगा।

9:37और जिसको मालूम पड़ गया वो तो ऐसा प्रयास करने की जरूरत ही नहीं है अपने आप चलता है।

9:42उसका progress हो रहा है तो progress क्या करेगा? यहां पे सौगानी बोल रहे हैं।

9:45चिंता दुख है तो बिना चिंतन के भी आत्मा का अनुभव नहीं है भाई। तो बाबा चिंतन के

9:48भी आत्मा का अनुभव नहीं होगा ये भी जरूरी है। अनुभव के पहले

9:52चिंतन होता है लेकिन अनुभव जो हुआ है, तो क्या? वो चिंतन के

9:56कारण नहीं हुआ है। जब तक चिंतन था तब तक वो रुका हुआ था।

10:00चिंतन बंद होते ही अनुभव चालू हुआ। तो चिंतन भी compulsory रहेगा।

10:04वो तो हमारी अवस्था है। अगर चिंतन ही नहीं रहेगा, तो फिर परमात्मा होगा।

10:10चिंतन नहीं और ध्यान लग गया तो हम परमात्मा हो गए। ऐसा तो

10:13हुआ नहीं है कभी। विशुद्ध से सुपना। चिंतन नहीं और

10:16ध्यान... से सुपना आके चिंतन नहीं है और ध्यान भी नहीं है तो तुम बाहर में फस गए कहीं।

10:21तो चिंतन देव बीच की कड़ी है। बाहर से हटे तो अपने आत्मा का विचार आया।

10:26लेकिन विचार आया इसीलिए अनुभव हुआ

10:28ऐसा नहीं है विचार बंद हुआ तो अनुभव हुआ। बाहर गाँव गए थे तो

10:33घर पे आना था तो हम आँगन में आ गए।

10:37अब एक कदम अंदर रखने की बात। तो घर में आ जाएगा।

10:43क्या एक ही कदम का फासला है। दरवाजे के। फांसला है दरवाजे के बाहर खड़ा है

10:48एक कदम अंदर रखे तो घर में आ जाए लेकिन रखेगा तब ना नहीं रखा तब तक कहाँ है

10:55घर में है कि घर के बाहर है

10:58आंगन में तो आया ना लेकिन आंगन में आया तो घर में थोड़ा आया है

11:03सारी दुनिया का विचार छोड़ा और मैं आत्मा हूँ

11:05मैं परमात्मा हूँ मैं जानने

11:06देखने वाला हूँ ऐसा विचार आता क्या तो आत्मा को अनुभव थोड़ा कर रहा है वो तो

11:10विचार कर रहा है। आत्मा को अनुभव थोड़ा कर रहा है वो तो विचार कर रहा

11:15है और जब अंदर आ जाएगा घर में तो आंगन छूट जाएगा

11:19जब अनुभव होगा तब वो विचार भी छूट जाएगा कि मैं आत्मा हूँ ध्यान में देखने वाला हूँ

11:26तो फिर एक दूसरे का काम कहाँ से हुआ

11:30विचार किया था इसलिए घर में आया आंगन तक आया इसलिए घर में आया किसने कहा

11:34वो तो कदम उठाना पड़ता है और कदम उठाने के लिए आंगन को छोड़ना पड़ता है

11:39घर में जाने के लिए आंगन को छोड़ना पड़ता है।

11:43ऐसे आत्मा का अनुभव करने के लिए

11:45मैं आत्मा हूँ, मैं परमात्मा हूँ, मैं जानने देखने वाला हूँ।

11:49मुझे ध्यान करना है,

11:50मुझे आत्मा का अनुभव करना है, मुझे वेदन चाहिए, ये सब बोलना पड़ेगा।

11:54चौकड़ी नहीं लगाओगे तो अंदर आओगे ही नहीं।

12:00वो thing you can be वो picture मैं आत्मा

12:03हूँ। जरूरत नहीं। होवे तो होवे बाकी हमको जरूरत नहीं। नहीं इसके

12:06बिना कैसे होगा नहीं करेंगे तो?

12:08तो ये नई भ्रांति है। क्योंकि इससे तो होता नहीं है। और रहेगा जब तक रुकावट ही है।

12:14इसलिए कोई ऐसा सोचेगा तो कुछ नहीं करना तो फिर क्या करना?

12:19करना तो पड़ेगा ना कुछ भी चिंतन मन में। मैं आत्मा हूँ ऐसा सोचना तो पड़ेगा ना।

12:23नहीं तो बाहर के विकल्प हटेंगे कैसे?

12:26बाहर के विकल्प हटेंगे नहीं तो फिर हम अंदर जाएंगे कैसे अंदर आत्मा में?

12:30इसलिए बीच में अंदर जाने के लिए

12:31मैं आत्मा हूँ ऐसा विचार तो

12:32करना जरूरी है

12:33है है। तो यही तो विचार आता

12:38है। तो भड़ते आते

12:40हैं। आता है। बाहर का तो हमको आता ही नहीं है।

12:42फूल भर से कभी by chance हम लोगों ने कोई सुसाइड कर लिया। तो अभी कौन रोकता है?

12:47तो तो आपका problem solve हो गया।

12:49जब बाहर के विचार आते नहीं। खत्म हो जाती। बाहर के by

12:53chance बोल के भी हम कर दिए थे। बाहर के विचार आते नहीं।

12:57सिर्फ आत्मा के विचार आते

12:58हैं। सिर्फ आत्मा के विचार। और फिर भी अनुभव नहीं हुआ तो अब रोकने

13:01वाला कौन है? बाहर के

13:02विचार तो रोकने वाले नहीं अभी कौन रोक रहा है? का

13:04भाई हमको यही मालूम नहीं। वही हमको ये मालूम नहीं पड़ रहा अभी।

13:08वही है अभी तो मैं... जब बाहर के विचार आते हो

13:10तो तो हम कह सकते हैं कि अभी आत्मा की लगन नहीं लगी है तभी

13:12बाहर के विचार आते हैं इसलिए आत्मदर्शन नहीं हो।

13:15लेकिन बाहर के विचार तो आते नहीं। आत्मदर्शन भी नहीं हो रहा है।

13:19स्वयं का चिंतन हम भूलते हैं। आत्मदर्शन भी नहीं हो रहा

13:22है, आत्मा का अनुभव भी नहीं हो रहा है, बाहर का विचार भी नहीं आ रहा है तो अभी क्या हो

13:25रहा है अभी? वर्तमान परिदृश्य में क्या हो रहा है?

13:28चिंतन

13:31ही हो रहा है। तो वही रुका हुआ है। सिद्ध हो गया। क्या?

13:34थोड़ा बाहर का विचार थोड़ा आत्मा का विचार आता तो तो हम ऐसा कह सकेंगे।

13:38और हमको अभी आत्मा का अनुभव इसलिए नहीं होता है कि

13:40थोड़ा थोड़ा बाहर में भी ऊँची है थोड़ा थोड़ा बाहर का भी विचार आता है।

13:43लेकिन जब आप स्वयं कहते हो

13:45कि बाहर का तो एक भी विचार नहीं है। सिर्फ आत्मा का विचार है।

13:49अगर भूल के भी कभी बाई चांस दिमाग में आ भी गया तो अरे अपन तो ज्ञाता दृष्टा वाले

13:53रह गए ये कौन से आ गए ऐसे जानते तो हमको याद आ जाता। ठीक है। तो

13:56बाई चांस उसी समय उसी क्षण हम बोल जाते। ओ विचार वाला ध्यान है ओ नीचे

13:59तक ध्यान नहीं। ध्यान है और निर्विकल ध्यान नहीं। नहीं तो ये

14:03हमको ये हम कल... और विचार वाला ध्यान है वो

14:05निर्विकल ध्यान को

14:06रोकता है। नहीं पर इतना तो हमको

14:08मालूम पड़ता है ना

14:15कि हम अभी कौन से ध्यान में आए, कौन सी चर्चा में आ गए, कहाँ गए ये तो ध्यान देता

14:19है। हम जागृत अवस्था में आकर के हमको कोई... जागृति, जागृति

14:22है, किसकी जागृति है, अवस्था

14:23की। द्रव्य की। स्व की। स्व की नहीं, स्व की अवस्था की।

14:26हाँ। वर्तमान में जो जो,

14:28वर्तमान, वर्तमान में जो जो... जो

14:29जो वर्तमान वर्तमान में जो जो हो रहा है उसकी जानकारी है

14:32आत्मा की जानकारी नहीं है। आत्मा में क्या हो रहा है आपको नहीं मालूम आपको

14:37आत्मा की अवस्था में क्या हो रहा है वो मालूम है।

14:40आत्मा की अवस्था में ये हो रहा है कि आत्मा का दर्शन नहीं हुआ है एक बात।

14:45और दुनियादारी के फालतू के विचार नहीं आ रहे हैं। ये नहीं आने वाले हैं।

14:50और अब जो क्या हो रहा है फिर

14:53कि हमको आत्मा के विचार आ रहे हैं ये वर्तमान अवस्था है उसका आप

14:55बोल रहे हैं कि हमको ऐसी अवस्था है।

14:57वो बोल रहे हैं कि हमको ऐसी अवस्था है। तो

15:02आप किसका ध्यान किया? किसकी जानकारी आपको हुई? आत्मा की हुई कि आत्मा की

15:05अवस्था की हुई? आत्मा की

15:06अवस्था की जानकारी हुई, आत्मा की नहीं। आत्मा

15:09की होती तो ये पंचायत ही नहीं होती। आदि हो गए,

15:14correct तो भी नहीं होता, नहीं करते। आदि हो गए तो इसमें नुकसान हो रहा है ऐसा समझना।

15:19यहाँ तो ये कहते हैं

15:21कि निर्विकल्प ध्यान आत्मदर्शन के पहले अनेक प्रकार के चिंतन

15:25दंतों तक चलते हैं। अनेक प्रकार के चिंतन घंटों तक चलते हैं। हाँ। आप दिन

15:28चलते हैं। आप दिन जब जागो तब। ठीक है।

15:30फिर भी वह निरीश्वरता का कारण नहीं है। इससे आपको आत्मा का अनुभव होगा नहीं।

15:36नहीं होवे तो नहीं होवे लेकिन नीचे तो नहीं गिरे ना? तो नहीं नीचे गिरेंगे।

15:41यह तो रुकावट है। यही रुकावट है।

15:45यह चिंतन चलता है कि मैं जानने देखने वाला हूँ वही रुकावट है

15:49जिसके कारण हम आत्मा को नहीं देख पाते हैं। यह बात सही है। ये बात सही है।

15:53तो कैसे होता है निर्विकल्प अनुभव?

15:55निर्विकल्पता तो अंदर में उग्र अवलंबन से ही होती है।

16:00ध्यान को ऐसा करें तो होगा, ऐसा अवलंबन की जरूरत नहीं है।

16:06उसको अवस्था का कोई अवलंबन लेने की जरूरत नहीं है

16:09कि ये अवस्था मिट जाए और ऐसी अवस्था आवे तो ध्यान होगा। तो

16:13वो भी विकल्प, वो विकल्प। उसको तो परमात्मा का अवलंबन लेना है, परमात्मा स्वयं है।

16:20अंदर का उग्र अवलंबन। उग्र अवलंबन माने क्या?

16:23कभी विचार का ध्यान करने की भी जरूरत ना पड़े।

16:26उसकी भी इच्छा

16:30ना हो। बिल्कुल। उग्र अवलंबन। बिल्कुल। उग्र

16:33अवलंबन में मददार में छोड़ देना। कुछ जो होगा देखा जाएगा। ऐसा करना। तो आधार लिया ना?

16:38नहीं तो सौदाबाजी करता है। अनुभव के लिए मैं ध्यान करता हूँ।

16:44आत्मा का ध्यान क्यों करना है? आत्मा का अनुभव करने के लिए।

16:47कुछ प्रयत्न करता है उसने मांग लिया। क्या मांगा?

16:50प्रयत्न करता है उसने मांग लिया क्या मांगा? आत्मदर्शन मांगा। होवे तो

16:54भले नहीं होवे तो भले

16:55मुझे तेरा ही ध्यान करना है इसका नाम अवलंबन है। क्या

16:58सोके सोके नींद लगने की position में सोके तो सब कुछ अंदर पहुंचना हो

17:02जाता है। हाँ देखो इसका मतलब क्या हुआ? सोने के लिए

17:04कोशिश थी वो तो। इसका मतलब क्या होगा?

17:06आत्मा का तो बिल्कुल समय ध्यान ही रहता है।

17:08फिर हो जाता है इसका मतलब क्या होगा? इसका मतलब ये हुआ कि नहीं होने से ही होना है।

17:14करने जाएंगे तो नहीं होगा। निरीक्षण। निर्विकल्लता तो

17:18अंदर में उग्र अवलंबन से ही रहती है।

17:20विचार रूप ध्यान तो रुकावट है।

17:24विचार रूप जो ध्यान है, जो विचार करते हैं, जानने देखने वाला हूँ, मैं परमात्मा हूँ,

17:28शरीर से भिन्न हूँ, दूसरों का विचार आया तो मेरे को क्या करना है?

17:33मैं तो आत्मा हूँ, मुझे क्या लेना देना? ऐसा जो विचार आता है।

17:37ऐसे विचार वाला ध्यान जो है, वो रुकावट है। होता है। ऐसा नहीं है कि वो नहीं होता है,

17:43क्योंकि आत्मा में उपयोग... वो नहीं होता है

17:44क्योंकि आत्मा में उपयोग अंदर में लगा नहीं है अनुभव हुआ नहीं है।

17:48और बाहर का विचार नहीं आता है तो फिर क्या होगा आत्मा का ही विचार आएगा वही होता है।

17:53लेकिन हो रहा है इसलिए आत्मा का अनुभव होगा ऐसा नहीं है। होता है आ जाता है

17:58लेकिन वो अवलंबन नहीं है। वो आधार नहीं है। उसका आधार लेने से कार्य नहीं होगा।

18:06उसका तो आधार छोड़ना है कि अच्छा हो रहा है।

18:09अच्छा है कि मेरे को दूसरे के विचार नहीं आ रहे मुझे आत्मा के ही विचार आ रहे हैं। ये

18:12अच्छा है। अच्छा माना तो मर गए,

18:14अच्छा नहीं नुकसान बासी होना चाहिए।

18:17कभी भी मेरी मंजिल नहीं मिली मेरे, नहीं तो मैं क्यों विचार करूँ इतना?

18:22आत्मा हूँ, आत्मा हूँ, ये बोलने की चीज़ है कि अनुभव करने की चीज़ है? महाराष्ट्र

18:29हिंदुस्तान का है, बोलने की ज़रूरत है, वो तो है ही है।

18:33क्या चिल्लाते हो महाराष्ट्र आत्मा का, हिंदुस्तान का है?

18:37कश्मीर हमारा है ऐसा बोल,

18:39क्योंकि वो पाकिस्तान भी बोल रहा है कि हमारा है, हम यहाँ... कि

18:41पाकिस्तान नहीं बोल रहा है कि हमारा है हम यहाँ झगड़ा है। वो

18:44बोलोगे क्या? कश्मीर हमारा है हम नहीं छोड़ेंगे।

18:47कश्मीर भारत का है क्योंकि वहाँ झगड़ा है।

18:52जहाँ झगड़ा नहीं है वहाँ तो फिर

18:53जहाँ शांति नहीं है जहाँ

18:54tension नहीं है फिर वहाँ बोलने की जरूरत ही क्या है कि मैं परमात्मा हूँ।

18:58हो। आप बोलो तो भी हो नहीं बोलो तो भी हो आप हो।

19:03वहाँ कोई जरूरत नहीं है कि नहीं नहीं नहीं बोलेंगे तो फिर हम परमात्मा नहीं रह जाएंगे

19:07ऐसा थोड़ा है। आप बोलो या नहीं बोलो। थोड़ा है आप बोलो या नहीं बोलो ध्यान करो

19:10या नहीं करो आप परमात्मा हो।

19:12कला। ये बात। तो जो विचार रूप जो ध्यान होता है आता है

19:19हो जाता है फिर भी वो अवलंबन नहीं है। ऐसा अगर होवे

19:24बाहर का विचार नहीं आवे एक भी और सिर्फ आत्मा के विचार आवे।

19:29तो ऐसा नहीं समझना कि हमको आत्मा का अनुभव हो जाएगा। नहीं होगा। सिर्फ अकेले आत्मा

19:36का। सिर्फ अकेले आत्मा का विचार आएगा तो भी आत्मा का अनुभव नहीं होगा। दूसरे

19:41के विचार की तो बात ही क्या वो तो उसका तो काम होने

19:43वाला ही नहीं है। दूसरे की परपंचायती

19:46करता है उसका तो काम ही नहीं।

19:48लेकिन जो मैं आत्मा हूँ जानने देखने वाला हूँ सबसे भिन्न हूँ।

19:52मुझे पर से क्या लेना देना मैं काहे को पंचायत करूँ ये सब जो विचार आते हैं।

19:57उससे भी आत्मा का दर्शन नहीं होगा क्योंकि वो अवलंबन नहीं

20:01है। अवलंबन तो अंदर में लिया हुआ है ज्ञानी ने

20:04अवलंबन किसका लिया है

20:05अंदर। ने अवलंबन किसका लिया है अंदर में भगवान अपना उसमें ही उग्रता होने

20:09पर जब ज्यादा अवलंबन ले लेते हैं

20:11थोड़ा थोड़ा अवलंबन लेते हैं तो वेदन नहीं आता है ज्यादा अवलंबन देते हैं

20:15उग्रता आ जाती है जोश आ जाता है तो निर्विकलता होती

20:22है अब एकदम जोश वाला अवलंबन लेता है जब जोश में आकर के काम करता है तब वेदन आता है

20:28इसके पहले अवलंबन लेता है लेकिन जोश वाला नहीं बस इतना फर्क है।

20:33ज्ञानी को निरंतर अपने स्वभाव का अवलंबन है। लेकिन उसके दो प्रकार। एक तो

20:40slowly slowly अवलंबन है और एक जोर से लेवे। एक ऐसा ही पकड़ लेवे।

20:46और एक जोर से पकड़।

20:50ज्ञानी को अनुभव होने के बाद उसने हमेशा परमात्मा का

20:53स्वभाव का अवलंबन लिया है। तो वेदन नहीं आता है।

20:58जोर से पकड़ेगा तो वेदन आएगा।

21:02ये बात। कितना फर्क है। ज्ञानी निरंतर अपने स्वभाव का ही

21:05अनवलंबन लेकर बैठे हैं, उनको पराय का अवलंबन है ही नहीं।

21:08वो चाहते ही नहीं कि मेरा मोक्ष हो जाए।

21:11होने वाला होगा तो होगा, नहीं होने वाला तो नहीं होगा, होगा ही। कि मुझे

21:14पड़ी नहीं है कुछ मोक्ष।

21:17अरे मेरा ध्यान क्यों नहीं लग रहा, उधर-उधर क्यों भाग रहा ध्यान,

21:19उसको चिंता नहीं है कुछ।

21:21क्योंकि उसकी पराय का अवलंबन छूट गया है। और अपने परमात्मा का स्वभाव का अवलंबन है।

21:27लेकिन उसमें दो प्रकार हैं, एक मंद

21:29और एक तीव्र। दो प्रकार है एक मंद और एक तीव्र। जब तक मंद अवलंबन है ज्ञानी का

21:33तब तक उसको आत्मा का निर्विकल्प अनुभव नहीं होता है।

21:37और जब उग्र अवलंबन लेता है अपने स्वभाव का तब उसको वेदन आता है।

21:43अवलंबन तो ज्ञानी पुरुष ने अंदर में लिया हुआ है।

21:48उसको पराय दृष्टि नहीं है उसको द्रव्य दृष्टि ही है। उसको किसी की परवाह नहीं है।

21:54फिर भी अनुभव कब होगा? उग्रता आने पर। उभरता आने पर ही अनुभव।

21:59यदि अटकाव रूप विचार आदि को कारण माना जाए,

22:03मतलब मेरे को दुनियादारी के विचार नहीं आते, मेरे को सिर्फ आत्मा के विचार आते हैं।

22:08अब तो मेरा काम हो जाएगा, ऐसा माना जाए, तो विचार से छूट करके अंदर नहीं आ जाओगे।

22:15आ नहीं सकोगे, क्यों? कि जो गलती है उसको सही माननी है।

22:19तो गलती मिटेगी नहीं और आप अंदर में आत्मा का अनुभव होगा नहीं।

22:23सारी जिंदगी आप आत्मा का विचार करो, मैं जानने वाला हूँ। आप आत्मा का विचार

22:27करो मैं जानने वाला हूँ देखने वाला हूँ। करने डरने

22:33वाला नहीं हूँ तो भी आत्मा को अनुभव करिए। ये बात कहते हैं। ऐसे विचारों को

22:36अटकाव मानने पर अंदर आ सकते हो।

22:39ये भी धोखाधड़ी हो रही है मेरे से।

22:41इससे मेरा आत्म कल्याण होने वाला नहीं है। सम्यक दर्शन होने वाला नहीं है। ऐसा मानोगे

22:47तो विचार की महत्ता जाएगी तो आत्मा की महत्ता आ जाएगी। अभी वो विचार

22:50जो आते हैं दूसरे। अभी वो

22:52विचार जो आते हैं दूसरे के नहीं आते हैं और अपने आत्मा के आते हैं उसको भला मानता है।

22:58अच्छा मानता है हमारा progress हुआ ऐसा मानता है। खत्म। रुक गया है।

23:03अब उसको आत्मा का अनुभव नहीं है।

23:06मंद शक्ति वश पर्याय में अनेक तरह का विचार चलता है शक्ति जोर ज्यादा नहीं है।

23:12आवलंबन द्रव्य का है लेकिन जोर से नहीं आता। Slowly slowly मंद मंद मंद।

23:18वो शक्ति नहीं है। मंद शक्ति से पर्याय में अनेक... मंद शक्ति से पर्याय में

23:21अनेक तरह का विचार चलता है क्योंकि निरविकल्प तो होता नहीं।

23:25जब तक मनता है, तब तक निरविकल्पता नहीं। जहाँ से तो निरविकल्पता है।

23:33तो मंद शक्ति वश पर्याय में अनेक तरह का विचार चलता है,

23:37और ऐसा भी लगता है कि सही कदम है।

23:41किंतु ऐसा चिंतन आदि कारण नहीं है, किंतु अटकाव ही अटकाव है।

23:46ये जो हमको उल्लास आता है वो हमारी गलती

23:49है, हम आगे बढ़ रहे हैं। वो हमारी गलती है। हम आगे

23:52बढ़ रहे हैं ऐसा मानते हैं वो गलती है।

23:53असल में ऐसा नहीं हुआ था।

23:56झुकाव था। अब 146 number। स्वयं की बात करते हैं

24:01कि स्वयं कैसे आगे बढ़ते थे। अपने

24:04को तो सुख पीने की अधिकार रहती है।

24:06ध्यान लगे चाहे नहीं लगे। प्रयत्न होवे चाहे नहीं होवे शांति मिल रही है ना।

24:10Oh that's all.

24:13अपने को तो सुख पीने की अधिकार रहती है। हम हमेशा उस चीज को

24:16देखते हैं। हमेशा वो चीज़ को देखते हैं। शांति मिली कि नहीं मिली। ध्यान हुआ नहीं हुआ,

24:21पुरुषार्थ चला नहीं चला हमको नहीं मालूम। हम तो वो चीज़ को देखते हैं।

24:26जानने की हमको अधिकता नहीं है

24:28कि ये जानूँ, वो जानूँ, ऐसा करूँ, वैसा करूँ, वो

24:30करूँ, हमको ज़रूरत नहीं है। शांति मिल गई बस हो गया, that's finish matter.

24:36और खरेखर तो विकल्प से जो जानते हैं, जानकारी हासिल करते हैं, सुनते हैं, पढ़ते हैं,

24:42चिंतन करते हैं, मनन करते हैं, ये सब में क्या है?

24:46मन का आधार लेकर के विकल्प जानना होता है। वो तो सच्चा जानना ही नहीं है।

24:51क्योंकि बीच में रुकावट है मन, मन बीच में है, direct जानना नहीं हुआ है।

24:57ज्ञान मन के माध्यम से जानता है, जैसे ज्ञान आँख के माध्यम से देखता है।

25:02कान के माध्यम से सुनता है। Direct नहीं सुनता है। तो फिर वो आत्मा का ज्ञान नहीं है।

25:11मैं आत्मा हूँ ऐसा उसको सोचना पड़ता है। मन का आधार लेता है।

25:16इसीलिए वो आत्मज्ञान नहीं है। आत्मज्ञान किसको बोलते हैं?

25:22कि मन बोले ही नहीं कि मैं आत्मा हूँ फिर भी आत्मा का ध्यान हो

25:25जाए उसका नाम आत्मज्ञान है। बीच में कोई रुकावट नहीं direct

25:30ज्ञान ज्ञान को देखे। ज्ञान मन को बीच में

25:32ला करके फिर सोचे कि मैं आत्मा हूँ ज्ञान देखने वाला हूँ ज्ञान...

25:39बिना मन के आधार से direct ज्ञान। से direct

25:41ज्ञान ज्ञान को catch करें और मैं ज्ञेय अपना समान।

25:45खरेखर तो विकल्प से जानते हैं वो तो सच्चा ज्ञान जानना भी नहीं। अंदर में अभेदता से

25:52जो सहज जानना होता है automatically वही सच्चा ज्ञान है।

25:58अंदर में अभेद होकर। मतलब इसके माध्यम से

26:04जानूं ऐसा करके जानूं ये

26:05करके जानूं ऐसा बैठूं जानूं

26:07ऐसा नहीं direct अभेद रूप से। Direct अवैध रूप से।

26:10जो सहज जानना होता है उसका नाम सच्चा ज्ञान होता

26:14है। पर सत्ता अवलम्बी ज्ञान को हे कहा है।

26:17पर सत्ता अवलम्बी माने क्या? अपना ज्ञान करना है लेकिन बीच में किसी का टेका लेना है।

26:24पर सत्ता माने मन। सद्गुरु, देव, शास्त्र, ये पर सत्ता है।

26:32उसका अवलंबन लेकर के, उनका आधार लेकर के जो

26:34ज्ञान किया जाता है, वो ज्ञान सही नहीं है

26:36उसको छोड़ना। वो ज्ञान सही नहीं है उसको छोड़ने योग्य है।

26:40अपना ज्ञान करने के लिए बीच में कोई नहीं चाहिए,

26:43ना सद्गुरु चाहिए, ना देव चाहिए, ना शास्त्र चाहिए, ना मन चाहिए।

26:48अगर जब तक उनका आधार लेते हो तब तक वो सच्चा ज्ञान नहीं।

26:52सद्गुरु की बात सुन कर के कहते हो कि मैं आत्मा हूँ।

26:56तो सद्गुरु की बात सुन के कहा है, आपने कहाँ अनुभव किया है?

27:01तो वो सच्चा नहीं है, है सच्ची बात लेकिन सच्चा नहीं। आप स्वयं देख कर के बोलो।

27:06आप स्वयं देख कर के बोलो

27:08कि मैं आत्मा हूँ। वो तो copy है।

27:10सद्गुरु ने कहा कि मैं आत्मा हूँ जानने देखने वाला हूँ तो आपने भी बिना देखे बोल दिया।

27:15मैं जानने देखने वाला आत्मा हूँ ये

27:16तो copy हुआ अकल कहाँ है। नहीं पर जीव धातु के हिसाब

27:21से तो मालूम पड़ता है ना

27:23कि ये पाशवा जीव और ये जीव। जीव धातु के हिसाब से तो आत्मा को करके ये तो

27:28गुरु के कहने के बाद मालूम पड़ेगा।

27:30तो आत्मा का जो द्रव्य है शाश्वत पदार्थ है उसके ऊपर। है शाश्वत

27:36पदार्थ जान, उसके ऊपर तो श्रद्धा ही

27:39है। केवल पर्याय कुछ भी हो।

27:40शाश्वत जो पदार्थ है, जीव तत्व के ऊपर तो... वही बोले नहीं बोले, गुरु बोलने से तो

27:43आत्मा में इनकी शक्ति है, आत्मा का दुख मालूम पड़ा। श्रद्धा अगर हुई हो

27:48तो... शाश्वत जो पदार्थ है उसकी तो श्रद्धा ही है तीनों का... श्रद्धा अगर है,

27:51तो फिर वो... वो प्रश्न नहीं रहता है कि ध्यान साधना अकेले करना है।

27:56विचार करना कि नहीं करना। विचार करते-करते हो जाएगा। विचार करते करते हो जाएगा।

28:03श्रद्धा अगर हो गई है तो फिर उसको ऐसा नहीं होता है।

28:06वो तो बोलता है ये विचार से होता है। वो तो विकल्प रहता है। फिर बाद में ये तो

28:09विकल्प है मैं तो शाश्वत हूँ।

28:11हम्म। ये ये भाषित होता है। भाषित होता है।

28:15तब। होता नहीं है तो फिर। ये

28:20ये भाषित जरूर होता है अरे ये भाषित नहीं हो रहा है।

28:23ये तो पर मैं तो शाश्वत लोक में भी जाऊँगी तो

28:26आखिर

28:30तो शाश्वत पदार्थ जो है वही

28:31जाना। हाँ। हाँ। ये तो पर्याय है।

28:33हाँ। अवस्था है। ये ये जो है... ऐसा आप जानते भले हो कि...

28:36लेकिन जानते हो तो साथ में आपको कुछ दूसरा कुछ होता नहीं।

28:40वो भी विचारों से जानते हो। हाँ। वो विचार रूप जानना हो। direct जानना होता तो

28:46स्थिति बदल जाती। तो तो हालत और...

28:51प्रबल... प्रबलता होती। बहुत कुछ हो जाता उसका। बहुत बड़ा change आता है।

28:57अभी जानते हो तो आपने सुना है बोलके जानते हो। अज तक अनुभव नहीं था। अगर अंदर से

29:03स्वयं ने देख कर के अनुभव किया ऐसा

29:05कि मैं शाश्वत हूँ, तो दुनिया बदल जाती है।

29:09कि चिंता किस बात की? कि चिंता किस बात की है? वो

29:13नहीं है अभी। विचार से है लेकिन वो उससे नहीं है।

29:16Direct स्वयं का अनुभव नहीं है। परसत्ता अवलंब्य ज्ञान को तो हे कहा है ना।

29:22शिवभूति मुनि विशेष जानते नहीं थे। सुख धाम

29:28अनंत सुसंत चहि

29:32दिन रात रहे तद ध्यान महि।

29:39प्रशांति अनंत सुधामय जे

29:46प्रणमो पद ते वरते जयते।

29:53प्रणमु पदते वरते जयते।