Avlokan Discourses of Shri Devchand bhai Shah The book Search Photographs About

Darshan Parishah

7 November 2000 · *Imp · 60 minutes

Transcript

Transcribed automatically and lightly corrected. The recording is the authority where they differ.

Recitations restored to their canonical wording: Mangalacharan — Mangalam Bhagavan Viro, Mangalacharan — Sarva Mangala Mangalyam, Namokar mantra, Omkar bindu sainyuktam, Samaysar mangalacharan.

0:00Serial number 650, 650 दर्शन परीषह,

0:05तारीख 7-11-2000, श्री देवचंद्र।

0:12णमो अरिहंताणं णमो सिद्धाणं णमो आयरियाणं णमो उवज्झायाणं

0:19णमो लोए सव्व साहूणं नमः समयसाराय

0:24स्वानुभूत्या चकासते । चित्स्वभावाय भावाय

0:30सर्वभावान्तरच्छिदे मंगलं भगवान वीरो,

0:35मंगलं गौतमो गणी। मंगलं कुन्दकुन्दार्यो,

0:40जैनधर्मोऽस्तु मंगलम्॥ सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं

0:45सर्वकल्याणकारकम। प्रधानं सर्वधर्माणां

0:51जैनं जयति शासनम॥ बिंदु संयुक्तम ॐकारबिन्दुसंयुक्तं

0:56नित्यं ध्यायन्ति योगिनः। कामदं मोक्षदं चैव ॐकाराय

1:03नमो नमः प्रश्न है,

1:08कुछ भाव नहीं चाहते हुए भी आते हैं। उसका कैसे करना?

1:13बंद कैसे करना उसको? आते

1:16हैं तो हमारे अवलोकन में मालूम भी पड़ते हैं और पड़ते हैं तो दुख भी होता है।

1:21और रोकने का तो है नहीं। तो फिर कैसे मिटेंगे ये भाव? गलत गलत भाव कैसे मिटेंगे?

1:29तो हमारे को उन भावों को

1:31मिटाना भी नहीं है। क्योंकि हमको सुखी होना है। तो सुखी होने के लिए जो

1:36काम हम नहीं कर सकते वो करना नहीं है, जो कर सकते हैं वो करना है।

1:42सुखी होने के लिए जरूरी है कि हम अपने स्वरूप को पहले पहचाने। भाव हटे या ना हटे।

1:49उपयोग भी किधर भी हो जाए,

1:51लेकिन हमको पहले सुखी होने के लिए अपने स्वरूप को पहचाने। को पहले सुखी

1:55होने के लिए अपने स्वरूप को पहचानना है। भाव है इसलिए दुखी है नहीं,

1:58ऐसा नहीं है कि भाव बहुत अच्छे बुरे भाव आते हैं इसलिए जीव दुखी है।

2:02कर्म बंधन होता है लेकिन दुख उसका नहीं है, दुख भ्रांति का दुख है।

2:08भ्रांति ऐसा है शरीर में रोग आवे उसका दुख नहीं है लेकिन शरीर को अपना माना है इसलिए

2:12रोग अपना है, अपने को आया ऐसा लगता है।

2:16क्यों शरीर को अपना माना है? क्योंकि अपने

2:18अपना जो original स्वरूप पहचाना नहीं। पहचाना

2:21नहीं इसलिए शरीर में जो रोग आया है

2:24तो शरीर में ऐसा नहीं लग कर के मेरे को

2:26आया ऐसा लगता है बुखार मेरे को आया है ऐसा लगता है

2:29problem वो नहीं है कि रोग आता है तकलीफ होती है

2:32अच्छे बुरे भाव आते हैं उसका problem नहीं है और उससे कोई जीव दुखी नहीं होता है

2:39जीव दुखी होता है उसका मूल कारण है अपने स्वरूप को नहीं जानता है वो हमने गलत

2:46समझ लिया है गलत सीख लिया है कि हम गलती गलत काम करेंगे

2:49तो। गलत गलत काम करेंगे तो हम गलत भाव आएंगे

2:51गलत क्रिया होंगी तो हम दुखी हो जाएंगे

2:55वो अच्छा नहीं है लेकिन डुबाने वाला भी नहीं है

2:59बाहर का मन वचन काया की कैसी भी प्रवृत्ति हो

3:03अगर जीव को अपने आत्मा का ज्ञान भान है तो वो safe है बिल्कुल

3:09ज्ञानी को भी राग द्वेष होते हैं

3:10अज्ञानी को होते हैं ऐसा नहीं है अज्ञानी को भी होते हैं

3:14क्योंकि पूर्व कर्मों के कारण झमेले में फंसा हुआ है।

3:18वो भी पूर्व कर्म कहाँ खत्म हो गए हैं?

3:20ज्ञान दशा भी आई है लेकिन पूर्व कर्म कहाँ खत्म हो गए?

3:24उसके कारण से जो जो भी screen के ऊपर अवस्था में प्रतिकूलता, अनुकूलता,

3:30दुख, चिंता, सुख ये सब होने वाला है, नाटक है ये। बस ज्ञानी अज्ञानी में क्या फर्क

3:37है? अज्ञानी को कुछ भी परेशानी आती है तो सर में आ जाता है, पूरा बोझा उठा लेता है।

3:43ज्ञानी को वही position होती है। जैसे बुखार आया या किसी ने गाली दी या कुछ भी हुआ,

3:49अपनी इच्छा से वो नहीं हुआ। तो उसको कोई अफसोस नहीं होता है।

3:52जगत का स्वरूप जानता है वो।

3:55ऐसा होने से कोई मेरा बिगड़ नहीं गया है किसी ने गाली दी तो।

3:59वो neutral भाव में रहता है। फर्क इतना है, वो नाटक समझता है, वो असल समझता है।

4:05अज्ञानी को भ्रांति होने के कारण, अपना स्वरूप नहीं पहचानने के कारण, उसको

4:09वो सही लगता है। और जिसकी भ्रांति... और

4:13जिसकी भ्रांति नहीं है अपने स्वरूप का भान हुआ है उसको ये सब होता तो है।

4:18पूर्व कर्मा अनुसार अच्छे बुरे भाव भी आते हैं। अनुकूल प्रतिकूल संयोग भी बनते हैं।

4:25लेकिन भ्रांति नहीं है।

4:29क्रोध होने से मैं क्रोधी हो
00:04:31.1000 --> 00:04:36.302
गया ऐसा नहीं मानता मैं तो जानने वाला ही हूँ। क्योंकि स्वरूप को देखा

4:36है। अभिमान होने से मैं

4:37अभिमानी हूँ ऐसा नहीं हूँ। मैं तो ज्ञेय

4:39हूँ। मैं तो ज्ञानी हूँ।

4:41एक भी गलत भाव आते हैं लेकिन मैं

4:43गलत भाव का कर्ता नहीं हूँ, गलत भावों का जानने वाला हूँ। इसी प्रकार से

4:48पुण्य के भाव हों चाहे धर्म के

4:50भाव हों उन सबका भी मैं जानने

4:52वाला हूँ, करने धरने वाला मैं नहीं हूँ, मेरे हाथ की बाजी नहीं है।

4:55जो उसके time पे जो होता है वो होता है।

4:59मैं मेरे को कोई असर नहीं करता है, मैं बिल्कुल भिन्न हूँ।

5:03बदलाव है अवस्था में है, मेरे में नहीं है, ऐसा करके वो अलग हो गया है,

5:07उसको कोई पंचायत नहीं है। ज्ञानी।

5:08पंचात नहीं. ज्ञानी को कोई पंचात नहीं. जैसे अज्ञानी को होता है वैसा ही ज्ञानी को

5:13होता है तो भी ज्ञानी safe

5:15है अज्ञानी डूब जायेगा. कृपाळुदेव लखते है

5:18एक भोग भोगवे छे. छता कर्मथी बंधा तो नथी.

5:23एक भोग भोगवतो नथी छतां बंधाय छे. अज्ञानी आत्मकल्याण के लिये

5:28नग्न दिगंबर हो जाये पंचमाला धारण करे त्याग वैराग्य करे

5:34तो भी डूबे. ज्ञानी

5:36छे खंड के... ज्ञानी 6 खंड के राज में

5:39रहे, 98,000 रानियों के बीच में रहे। अधिकार चलावे,

5:44नहीं माने तो लड़ाई भी करे। देखो ये सब करे, उसी वक्त मरि जावे।

5:52अग्नि परीक्षा सीता जी की लिया लंका से आने के बाद।

5:58सारी दुनिया को मालूम पड़ गया कि सीता जी सुरक्षित हैं, सती हैं।

6:02ठीक है, अब तो कोई problem नहीं था ना। फिर भी धोबी... फिर भी धोबी के

6:06कहने से सीता जी को जंगल में भेज दिया।

6:09यह अन्याय किया कि नहीं किया? क्या बेचारी का वांग था?

6:13राजमहल में रहने वाली रानी। उसको

6:19अंधेरे वन में जंगल में

6:22बिना सुरक्षित कोई सुरक्षा का साधन नहीं है ऐसे जंगल में अकेली रख दिया।

6:26धोबी कैसी अवस्था में? गर्भावस्था में।

6:31किसके कहने से? मामूली एक धोबी के कहने से? कहने से मामूली

6:34एक धोबी के कहने से देखो अन्याय तो देखो कैसा है

6:38दूसरों के साथ भी कोई ऐसा व्यवहार नहीं करता है

6:42तो कुछ साल पहले तो इसको वापस लाने के लिए युद्ध किया इतना बड़ा देखो कितना राग था

6:47इसको कोई लेके गया है तो मैं उसको एक एक को खत्म कर डालूंगा उसके लिए लड़ाई भी किया

6:52अब उसी को एक धोबी के कहने से घर से बाहर निकाल दिया

6:59घर से बाहर निकलना वो भी ठीक है लेकिन जंगल में रखने

7:01का कौन। करना वो भी ठीक है लेकिन जंगल में रखने को कौन बोला था जंगल में डाल

7:06दिए स्थिति को नहीं देखा अन्याय किया कि नहीं किया क्या लगता है हमारे

7:12देखो और फिर भी उसी भाव में मर जाते हैं क्या समझे अब हम

7:20ज्ञानी अज्ञानी के भाव इसका मतलब ये है कि कोई भाव हमारे control में नहीं

7:25कोई परिस्थिति हमारे control में नहीं आज जिससे रहा करते हो कल उससे द्वेष भी।

7:30आज जिससे राग करते हो कल उससे द्वेष भी हो सकता है। असल में तो जहाँ राग है वहाँ द्वेष

7:36साथ में ही है। राग है तो

7:37हम उसके ऊपर अधिकार जमाते हैं, वो हमारी

7:39इच्छा अनुसार चले ऐसी अपेक्षा रखते हैं। कि थोड़ा वो

7:4110 बातें महा माने और एक बात ना मानते ही फौरन द्वेष आता है।

7:47पड़ोसी को प्रति राग नहीं है

7:49क्योंकि वो हमारा नहीं है, वो separate है,

7:51हम separate हैं, बाजू-बाजू में रहते हैं लेकिन separate separate

7:53हैं। उसका business, उसके सगे संबंधी, उसके

7:56परिवार सब अलग-अलग हैं। संबंधी उसके परिवार सब अलग-अलग हैं। ममता है

7:58जरा भी, राग है जरा भी, तो

8:01अपनी बात नहीं माने तो दुख नहीं होता है।

8:05क्योंकि राग नहीं है तो दुख भी कैसे होगा?

8:07राग नहीं है तो अपेक्षा नहीं है, अपेक्षा नहीं है तो वो

8:10नहीं माने तो दुख नहीं होता है। तो दुख-सुख का आधार है भिन्नत्व के ऊपर है।

8:18हम अपने स्वरूप को जानेंगे तो

8:19कहीं भटकेंगे नहीं, दूसरे को अपना मानेंगे नहीं, तो हम safe हो

8:23गए हमेशा के लिए। इसलिए राग-दोष होते हैं। इसलिए राग दोष होते हैं

8:26बुरे भाव आते हैं अच्छे भाव नहीं आते हैं अच्छे भाव आते हैं

8:30उसकी कोई value नहीं है चाहे सारा दिन आत्मा के विचार आते हैं उसकी कोई value नहीं है

8:36आत्मा का विचार नहीं आत्मा का दर्शन चाहिए आत्मा का अनुभव चाहिए वो होता है क्या

8:40अगर वो हुआ है तो क्या हुआ

8:44वो बताओ main हमारा point वो है आत्मदर्शन चाहिए

8:50आपकी कैसी भी अवस्था हो आपको आत्मदर्शन कर सकते हो। को आत्मदर्शन कर सकते हो। पापी भी

8:54आज अभी चाहे तो आत्मा का दर्शन कर सकता है।

8:58तो नहीं बहुत पाप किया अब get out।

9:00तो सुधर के आओ बाद में करेंगे। बाद में तुम्हारे को

9:02देखेंगे बताएंगे ऐसा नहीं। भगवान की सभा

9:05में पापी से पापी आदमी भी रहता है।

9:08पुण्यशाली भी रहता है और धर्मात्मा भी रहते हैं सभी रहते हैं। तिर्यंक भी रहते हैं।

9:14जंगल के शेर आदि भी बाघ शेर हिंसक प्राणी भी आते हैं सुनने के लिए।

9:19तो नहीं नहीं बहुत मांस खाया है बहुत से

9:20जीवों को मारा है। कया है बहुत से जीवों को

9:22मारा है। बहुत पाप किया है सातों व्यसन वेश्यागमन परस्त्रीगमन।

9:26इतना सारा झमेला किया अभी आपको धर्म करने का अधिकार नहीं है जाओ भटको

9:29नरक में। नहीं। सब अंदर में परमात्मा है।

9:36भगवान सबको परमात्मा देखते हैं उनकी अवस्था को नहीं देखते हैं उनके

9:39भावों को नहीं देखते हैं।

9:41अगर वो जीव भी चाहे तो पलटी मार सकता है वाल्मीकि ऋषि।

9:45वालिया लुटारा बोलते थे ना। पलट गया ना। पलट पलट गया ना second के अंदर

9:51वाल्मीकि ऋषि हो गया रामायण लिखने वाला। जो लुटारा था।

9:58change हो गया ऐसे

9:59कई जीवों का जीवन बदल गया है अंगुलीमाल। गौतम बुद्ध की कथा में आता है।

10:05रोज एक मनुष्य की मारता था और उसकी अंगुली जो काट करके अपने गले में लगाता था अंगुली।

10:10वो जिस area में जंगल में रहता था समझो उसके आजू बाजू के कई गांव खाली हो गए थे।

10:14सब डरते थे वो। कोई वो रास्ते

10:16से गुजर। कोई वो रास्ते से गुजरता नहीं था क्योंकि

10:18पकड़ लेता मार डालता मार के फिर इसकी उंगली काट करके उसका हार बना करके गले में डालता।

10:25बुद्ध के कहने से वो भी बदल गया 1 second के अंदर। देखो

10:30कैसा होता है। ये ये बोध जो है

10:34धर्म का शांति का शांति सभी को चाहिए पापी को भी चाहिए पुण्यात्मा को भी चाहिए।

10:38पवित्राता के बिना शांति नहीं मिलती है

10:40अपने स्वरूप को जाने बिना शांति

10:42नहीं मिलती है। तो अधिकारी कौन पापी अधिकारी है कि। तो अधिकारी कौन

10:44पापी अधिकारी है कि नहीं स्वरूप जानने के लिए

10:48कि नहीं जो बहुत दान देवे त्याग करे उपवास करे माला फेरे भगवान की प्रार्थना करे

10:52आत्मा आत्मा करे उसको ही अधिकार है दूसरों को अधिकार नहीं

10:58पापी हो कि पुण्यात्मा हो ये सब अवस्था है

11:02अंदर में जो परमेश्वर है स्वयं वो तो बिल्कुल निर्दोष है

11:05उसने पाप भी नहीं किया है पुण्य भी नहीं किया है

11:09अगर उसकी दृष्टि करोगे तो अभी का अभी धर्म की शुरुआत हो जाएगी शुरुआत होगी।

11:14हाँ ऐसा practice करते करते फिर बाद में मोक्ष मुक्ति हो जाएगी।

11:19इसलिए चिंता की कोई बात नहीं है कि हमको ऐसे भाव आते हैं वैसे भाव आते हैं क्या करना

11:23हमको भावों को बंद नहीं करना है।

11:25हमको अपने स्वरूप को देखना है दोनों बातें हैं। उलट सुलट है।

11:31भावों को बंद करने जाओगे हैरान परेशान होगे फिर भी भाव बंद होंगे भी नहीं भी होंगे।

11:36लेकिन आपका time waste हो जाएगा आपका स्वरूप का दर्शन नहीं होगा। स्वरूप का दर्शन

11:40कर लिए भाव... स्वरूप का दर्शन कर लिए भाव चाहे कैसे भी आवे हमको

11:43स्वरूप का दर्शन करना है दूसरे हमको मारो गोली।

11:46सद्गुरु की आज्ञा है सबसे पहले तुम आत्मा को देख बाकी सब भूल जाओ।

11:51अगर वो एक के पीछे पड़ गया अपने स्वरूप स्वभाव को देख लिया। खत्म।

11:56उसकी मुक्ति निश्चित है।

11:59ये जो गलत भाव हैं धीरे-धीरे सब खत्म हो जाएंगे। अभी जो आ रहे हैं।

12:04वो बताते हैं कि भूतकाल में हमने जैसे

12:06संस्कार डाले हैं वैसी आदत है हमारे। इसलिए। इसलिए आदतवश आ रहे हैं।

12:11नहीं चाहते हुए आते हैं इसका मतलब क्या हुआ? आदतवश है।

12:16बीड़ी पीने से cancer बढ़ेगा।

12:19शक्कर खाने से मिठाई खाने से diabetes बढ़ेगा मालूम है फिर भी लालच के कारण

12:24स्वाद के कारण। आदत के कारण। देखो फंसता है ना मालूम तो है खाते हुए तो।

12:32फिर फंसता है जीव क्योंकि आदत बुरी लग गई है अब

12:34क्या करें? दारू पीने से नुकसान ही होता है। दारू पीने

12:37से नुकसानी होती है, पैसे की बर्बादी है,

12:39घरवाले परेशान रहते हैं।

12:41शरीर की हानि होती है, मालूम है लेकिन फिर भी

12:44नहीं मालूम ऐसा तो नहीं है। फिर भी पीता है कि नहीं पीता है?

12:47ये क्या है संस्कार? ऐसे

12:50कई जन्मों के संस्कार के कारण जीव की जैसे

12:52संस्कार होते हैं वैसी बोली, ऐसा संग, ऐसा वातावरण,

12:55ये सब असर करता है।

12:59लेकिन वो आत्मदर्शन का अधिकारी नहीं है, वो बात तो नहीं है। अधिकारी है। अगर

13:03वो... अधिकारी है। अगर वो जीव भी पलटना चाहे, तो सद्गुरु के शरण में आवे,

13:10सद्गुरु से वो रास्ता पूछे कि आत्मा का दर्शन कैसे

13:12करूँ, भावों को कैसे मिटाऊँ वो नहीं।

13:15प्रश्न-प्रश्ना में फर्क है। राग-द्वेष, राग-द्वेष को बंद कैसे करूँ,

13:20ये गलत भावों को बंद कैसे करूँ वो सवाल नहीं है, मेरे को

13:23अपना स्वरूप क्या है बताइए, स्वभाव क्या है बताइए।

13:27पानी गरम है लेकिन स्वभाव कैसा है?

13:31तो वो प्रश्न करो कि मेरा स्वभाव क्या है। न करो कि मेरा स्वभाव क्या है। कब तक ये रात

13:36दिन सोते रहेंगे? उसके लिए स्वभाव को

13:38देखना है तो स्वभाव को कैसे देखूं वो सवाल करो भावों को कैसे बंद करूं वो मत।

13:42वो problem ही है ही नहीं असल में problem नहीं है।

13:44क्योंकि आत्मदर्शन के बाद भी भाव आते हैं पुण्य पाप

13:47क्या करोगे अब? मंदिर में जाने का भक्ति करने का।

13:51अध्याय करने का दूसरों को समझाने का समझने का भाव आता है।

13:56ज्ञानी हो गए तो बंद हो गए पाप पुण्य के भाव

13:58गुस्सा कभी नहीं आता है? नहीं। तो जब पूर्ण वितराग हो जाएंगे,

14:04परमेश्वर हो जाएंगे, तब... अंदर से तो

14:07आत्मा का अनुभव होते ही राग द्वेष खत्म हो गए अंदर से।

14:11बाहर में है।

14:12तो बाहर में जो है वो धीरे-धीरे

14:13धीरे-धीरे साधना का अंदर की करते-करते धीरे-धीरे कम हो करके...

14:17जब साधना हमारी पूर्ण होगी तब केवल ज्ञान होगा, तब हम परमात्मा बनेंगे।

14:21तब बाहर में भी कोई दोष नहीं रहेगा। परमात्मा अंदर से बाहर से संपूर्ण निर्दोष है।

14:27और हम... अज्ञान अवस्था में भी संपूर्ण निर्दोष है कैसे स्वभाव से।

14:35अज्ञानी होते हुए भी और दूसरे ज्ञानी का वर्ग है।

14:38कि उनको आत्मा का अनुभव हो गया है तो अंदर में अंदर से राग द्वेष नहीं हो रहे हैं

14:43तो अंदर से अभिप्राय में निर्दोष है। लेकिन फिर भी वचन से काया से। मन से।

14:51गलतियां होती है। जो गलतियां धीरे-धीरे कम होते होते।

14:56साधना अंदर की बढ़ाते-बढ़ाते

14:57संपूर्ण। साधना अंदर की बढ़ाते बढ़ाते संपूर्ण वितरागता होगी तो वो

15:02निकल जाएगी। निकालने से नहीं निकलेगी साधना अंदर की करोगे तो

15:05निकल जाएगी। अंदर की साधना

15:06से आत्मा के गुण प्रकट होंगे।

15:09और जितने गुण प्रकट होंगे उतने दोष हट जाएंगे अपने आप।

15:12क्षमा होता है तो क्रोध हट जाएगा। निर्माणता आएगी मार्दव धर्म होगा तो मान हट जाएगा।

15:18मान भी हट जाएगा दीनता भी हट जाएगी।

15:21स्वरूप का आनंद सुख मिलेगा तो बाहर का लोभ खत्म हो जाएगा कि ये

15:23चाहिए वो चाहिए नहीं चाहिए कुछ भी

15:25मेरा। ये चाहिए वो चाहिए नहीं चाहिए कुछ भी मेरे

15:27को पूरा भरा हुआ हूँ मैं अंदर से ही प्रकट होगा

15:30आत्मा की आराधना करते करते आत्मा में से जो अनंत गुण

15:33अंदर भरे पड़े हैं वो सब बाहर आ जाएंगे

15:37बाहर आते ही जिस दोषों की चिंता हम अभी करते हैं

15:41बेकार की फिर भी निकाल नहीं सकते हैं सिर्फ चिंता ही करते हैं

15:44वो सारे के सारे दोष अपने आप निकल जाएंगे

15:46निकालने की भी जरूरत नहीं होंगे ही नहीं होवे

15:48और निकाले ऐसा नहीं होंगे ही नहीं तो निकालने की

15:49मेहनत करने की भी जरूरत नहीं।

15:52तो निकालने की मेहनत करने की भी ज़रूरत नहीं पड़ेगी। इसलिए सबका इलाज क्या है?

15:57Total इलाज क्या है? काम एक ही करना है।

16:01काम एक आत्मार्षनु बीजो नहीं मन रोग। मुझे सिर्फ आत्मकल्याण करना है।

16:07मुझे सिर्फ आत्मा चाहिए, आत्मशांति चाहिए और कुछ नहीं चाहिए।

16:12भावों को मिटाना मैं नहीं चाहता हूँ।

16:14मिटना है तो मिटे, नहीं मिटना है तो नहीं मिटे। उपयोग को पलटाना मैं नहीं चाहता हूँ।

16:19पलटना है तो पलट ले, नहीं पलटा है तो नहीं पलटे, भले ही बार घूम ले। तो पलटे नहीं

16:22पलटा नहीं पलटे भले ही बाल घूम।

16:25क्या? मुझे तो मेरा आत्मा मेरा स्वभाव क्या है

16:28मेरा मूल स्वरूप क्या है वो

16:29समझना है उसको देखना है उसका अनुभव करना है। और कोई target नहीं

16:35और कोई प्रश्न नहीं तो एकदम line correct आ जाएगी।

16:38कि क्या धर्म की line में आते आते दूसरे

16:42फालतू के question इतने हो जाते हैं कि मूल line छूट जाती है और

16:45दूसरी बातें आ जाती हैं।

16:49थोड़ा आगे बढ़ते ही दूसरे-दूसरे प्रकार के question आ जाते हैं।

16:53और मूल question छूट जाता है कि स्वरूप का दर्शन कैसे होवे?

16:58वो छूट जाता है। इसीलिए फायदा नहीं होता है।

17:04आत्मभावना नहीं होने से ऐसा होता है। आत्मलक्ष्य, आत्मभावना, निर्धार।

17:10तो निर्धारों को करने वाला और समय पे पहुंचना है तो क्या होगा?

17:15टेढ़ा-मेढ़ा नहीं चलेगा। टेढ़ा मेढ़ा

17:20नहीं चलेगा। समय के अंदर पहुंचना है इतना फासला है।

17:23अब वो side में बगीचा है तो देखना है। और train छूट जाती है तो फिर

17:29घर से कुछ tiffin नहीं लिया तो रास्ते में fruit की बंडी दिखी तो ले लेंगे।

17:33फिर समय train छूट जाएगी। अभी कुछ नहीं लेना है अभी तो train पे पहुंचो पहले।

17:38भले एक दिन भूखे रह जाएंगे लेकिन train छूटेगा तो नहीं चलेगा भूखे

17:41रहेंगे चलेगा देखो कैसा होगा। कोई रिश्तेदार मिला तो। कोई रिश्तेदार मिला

17:45तो हाथ ऊँचा करके उसको

17:46वहाँ से ही दूर से ही bye bye कर देते हैं,

17:48बातचीत भी नहीं करते। क्योंकि time छूट जाती है, समय पहले पहुँचना है।

17:54अगर समय होता तो बात करते थे, सब लेते थे,

17:56खाना भी खा लेते थे,

17:57लेकिन समय ही नहीं है तो क्या करोगे? ऐसे हमारे पास कोई समय नहीं है,

18:02ये समझ के चलना है क्योंकि यमराज कभी भी आ सकता है। या सत्संग कभी भी छूट सकता है।

18:08और फिर कब मिलेगी क्या मालूम,

18:10ये तो पुण्य के कारण मिलता है। नज़दीक आने... नज़दीक आने पर भी

18:14contact नहीं होते हैं ऐसा ही बनता है।

18:17क्यों नहीं होता है?

18:19हमारे पाप का कर्मा अभी हमको छोड़ता नहीं है तो क्या करोगे? नहीं होता

18:25है। कभी-कभी हमारी मन की बात

18:27मन में रह जाती है वो प्रश्न तो करते नहीं हैं और दूसरे प्रश्न कर लेते हैं।

18:30तो हमारा जो रह गया यहाँ आकर के भी कोई फायदा नहीं हुआ। हमारी समस्या कहाँ सुलझी?

18:36हमको इस मार्ग में आगे बढ़ने में क्या तकलीफ हो रही है? तो हम कहें इसके

18:39पहले ही वो... वो हम कहे इसके पहले ही वो

18:42दूसरा सवाल आ गया उसमें time चले गया तो हमारा

18:45देखो ये भी सब पूर्व के पुण्य पाप का खेल है वहाँ पर भी अंतराय आता है बीच में।

18:52हमारी मन में मन में रह जाती है हमारा समाधान होता नहीं है। Doctor के पास गए थे तो

18:59मूल बात कहते ही दूसरी बात लगा लिया doubt रह गया कि नहीं रह गया

19:02फायदा क्या हुआ गए तो।

19:04असल बात तो clear हुई नहीं। तो कितना mind में घूमता है। तो कितना mind में घूमता है

19:09ये clear कर लेना। जब तक clear नहीं करो तब तक संतोष नहीं।

19:15ऐसे हम रुके हुए हैं हमको आत्मा का दर्शन नहीं हो रहा है हम कहाँ रुके हैं?

19:19कैसे रुके हैं क्या करना उसकी उथल-पुथल मचे अंदर में, खोज चले अंदर में।

19:25तो समझना कि हमको आत्मभावना है।

19:27और फिर हमारा problem रखे कि हमको ये problem है

19:30तो सुलझे बाकी क्या सुलझे

19:31बाकी नजदीक आकर के भी क्या फायदा doctor के पास आए बोले कुछ नहीं

19:35तो क्या फायदा। doubt लेकर के जावे।

19:40ऐसा नहीं होता है पक्का करना पड़ता है दिल को

19:42संतोष होवे इस प्रकार से समाधान होना पड़ता है।

19:45समाधान मिलेगा तो आगे बढ़ने का दिल होगा नहीं तो doubt के कारण हम ही

19:48हमारे पैर रोक देंगे यहीं।

19:50भई आगे क्या है मालूम नहीं आस्था सही है कि नहीं। Stop।

19:57धमा दृष्टिक नहीं मगर मिला है तो पक्का भरोसा होना चाहिए। नहीं मिला है तो कैसे मिले?

20:03या क्यों नहीं मिलता है उसको

20:04ढूंढो। नहीं मिलता है उसको ढूंढो मिला है तो क्या हुआ वो बताओ

20:11एकदम clear इसमें थोड़ा भी देरी नहीं करना चाहिए fast fast काम करना है

20:16क्योंकि पुण्य के कारण सत्संग मिलता है छूटे कब मिले कब क्या मालूम

20:22मिलने के बाद भी कई problem आ सकते हैं क्या मालूम सफलता होवे नहीं होवे

20:29appointment लिया लेकिन doctor को दूसरा काम आ गया तो

20:31वो पूरा appointment। पूरा appointment

20:33cancel कर देता है कि नहीं करता है emergency होता है तो।

20:37कि अभी emergency काम आया कल आ जाना परसों आ जाना। ऐसा भी होता

20:42है। Operation का date देता है वो then नहीं अभी आज नहीं कल करेंगे।

20:46कल नहीं परसों करेंगे ऐसा नहीं होता है कभी-कभी। इतना busy रहता है तो क्या करे वो।

20:54आप बोल नहीं सकते वहां तो कुछ बोल नहीं सकते कि भैया क्या हो

20:57गया अभी तो appointment लिया था अभी क्या हुआ। अंतराय

21:00चल रहा है। त्राय चल रहा है। जो काम जब होने वाला है तभी होता है, इसके

21:05पहले नहीं होता है। इसीलिए समय

21:07मात्रा का प्रमाद नहीं करना है, सबसे पहले

21:09मूल मूल problem वो है। कि हम अपने स्वरूप को जानते नहीं हैं।

21:14राग द्वेष होते हैं वो problem ही नहीं है। इसलिए उनका मिटाने का चक्कर ही नहीं है।

21:20अगर होता तो पहले बोलते कि भई मेरा belief छोड़ देना। झूठा बोलना छोड़ देना,

21:24अभिमान करना छोड़ देना।

21:26तो ही तुझे परमात्मा के दर्शन होंगे नहीं तो

21:28नहीं होंगे, जाओ get out। सन होंगे नहीं तो नहीं होंगे जाओ get out। ठीक ठाक हो

21:30के आओ। इसके अंदर problem तो अपना एक ही है

21:33कि अपने को अपना खुद का जो आत्मा है

21:36उसकी तरफ खिंचाव नहीं है इसकी वजह से हमारा

21:40जो है उपयोग वहां घूमता नहीं है। घूमता नहीं है

21:42जो मूल question के इर्द गिर्द हमारी game होनी चाहिए वो

21:44नहीं हो रही। भाई। जहां पर अपना जो लोभ

21:47होना चाहिए जो खिंचाव होना चाहिए वो नहीं है उसकी वजह से अपन अपना जो है

21:51उपयोग वहां खींचता नहीं है। बस

21:52यही हमारा ही हमारा ही दोष है। और

21:54वही चीज की वजह से जो है नींद के अंदर भी जो अपना उपयोग... चीज

21:56की वजह से जो है नींद के अंदर जो अपना उपयोग बाहर

21:58रहता है वही दोष है। सब में वही। वही है। वही है। नहीं वो भूतकाल के पूर्व कर्म

22:04का उड़े है संस्कार। संस्कार वश ऐसा होता है।

22:08उसमें वो adjust कर लेता है अपने आप। अंदर यहां का प्रेम कम होने के कारण वो

22:12हार जाता है वहां। बेवश पड़े रहता है।

22:15fight नहीं कर पाता है। ऐसा होता है। नींद आना हो तो उड़े है।

22:21नींद में भाव आना हो उड़े है लेकिन जागृति वहां नहीं रहती है तो

22:24इसमें हमारा दोष है। देती है

22:29तो इसमें हमारा दोष है। अगर हम fight

22:31करें, तो कौन करेगा? जिसको

22:33जल्दी से आत्मकल्याण करना है वो fight करे। जिसको धीरे-धीरे हो जाएगा

22:36तो बस बैठो। तो fight

22:36का मतलब कि हम अपने तरफ से

22:38इतनी भावना बढ़े कि वो नींद आए तो भी अच्छा नहीं लगे।

22:42आवे लेकिन हमको अच्छा नहीं लगे। हाँ, उसका मतलब

22:48क्या होगा? 24 hours

22:49का साधना नहीं हो रही है।

22:51साधना करने वाले तो 24 hours करते हैं। अगर सोते हैं ना,

22:58सोते हैं तो भी क्यों सोते हैं? थकान लग कर के मामला बहुत ना बिगड़ जावे,

23:05इसीलिए सोते हैं।

23:07उसके पीछे भी आत्मकल्याण की भावना रहती है, बाकी सोना तो है ही नहीं, अभी क्या

23:10इतना time कमाया अब क्या कमाना है।

23:13इसको बोलते हैं fight। देखो हम

23:17जो रण मैदान में जाते हैं, युद्ध चालू हो गया है। तो... तो

23:22machine gun होती है सब तोपखाना होता है सब होता है हमारा एक camp होता है।

23:26नींद आती है क्या? नींद नहीं आती। जागती रहती है।

23:33रात में भी चलना पड़ता है रात में

23:35भी गोलाबारी करना पड़ता है रात में भी छुपना पड़ता है

23:37भागना पड़ता है। उन लोगों को नींद कैसे

23:39आती है? नींद नहीं आती है क्योंकि कभी भी कुछ भी हो सकता है।

23:45हम

23:46अगर फिर भी बहुत थक गए हैं तो under underground चले जाकर के। Underground चले जाकर के

23:49एक को तो निरंतर जागृति में रहना है।

23:53एक को। और नींद भी कैसे कि आवाज आते ही उठ जाना फिर। देखो

23:58ऐसी नींद रहती है कच्ची नींद रहती है जिसको। ऐसा रहता

24:02है। नहीं होता है city के अंदर। गोमी हुल्लड़ होते हैं।

24:08हिंदू मुसलमान को मारे मुसलमान हिंदू को मारे ऐसी position में आ जाते हैं।

24:11आजू बाजू में मोहल्ले में घर होते हैं कहां majority

24:14मुसलमान की ज्यादा होती है कहीं हिंदुओं की ज्यादा होती

24:16है। नींद आती है किसी को

24:17रात। नींद आती है किसी को रात भर? डर के मारे

24:24नींद नहीं आती है। नींद आने का बहुत से

24:26कारण हैं इसमें। एक बहुत बहुत खुशी होती है तो नींद नहीं आती है।

24:31बहुत बड़ा सर पे जिम्मेदारी हो तो नींद नहीं आती है। शादी का है और रात दिन चलो भागो

24:36ये करना है वो करना है नहीं तो खराब लगेगा। मेहमान लोग आ जाएंगे तो

24:39बाद में क्या बोलेंगे कैसा बोलेंगे? देखो कैसा होता है। Caterers को

24:41दे दिया फिर भी caterers... Caters

24:45को दे दिया फिर भी caterers बराबर काम करेगा कि नहीं करेगा उसका हमारे को डर रहता है।

24:50सब काम में। Late हो गया तो क्या करेंगे फिर? किसको contact करेंगे? कितना

24:54महीना महीना भर पहले से booking होता है। End moment में कोई मिलता नहीं है।

24:59ना bandwaaja मिलता है, ना photographer मिलता है, ना हमारा book हो

25:01गया दूसरे के साथ। क्या करोगे?

25:04Caters नहीं मिलता है। क्या?

25:08महीना पहले से ही पूरी planning होती है। कैसे आवे? End moment में

25:10क्या क्या करोगे? आग लगे तो कुआ खोदोगे

25:11क्या करोगे? आग क्या करोगे आग लगे तो कुआ खोदोगे क्या करोगे?

25:15उसमें कितनी सावधानी रहती है। इतनी जागृति इतनी सावधानी यहाँ है क्या आत्मकल्याण करने

25:21के लिए? एक चीज

25:22समझ लो। नहीं।

25:28वो तो

25:30अपने आप से भी नहीं मानती है। इतनी तरह की अपनी जो लगा हुआ है। इतनी तरह की

25:35अपना मोह है। वो चीज जो है वो तो तरह तरह

25:38की। नुकसान समझना वो

25:39सत्संग के माध्यम से आपको समझाते हैं। उपदेश के माध्यम से आपको समझाते

25:43हैं। कि आपके सारे दुखों का इलाज हो जाएगा अगर आप आत्मा को देखोगे।

25:46नहीं तो जब तक आत्मा को नहीं देखोगे

25:48तब तक यम नियम संयम कुछ भी करो नग्न विगंबर हो जाओ,

25:52पंचमहाभूत पढ़ो, पूरे शास्त्रों का अध्ययन कर लो,

25:55तो भी आपका बेड़ा पार नहीं होगा तो फिर value कितनी आत्मदर्शन की? बार-बार

26:00हर lecture में ये बात आती है।

26:03नहीं नहीं अगर अनुभव हुआ गुरु का,

26:06चौरासी के चक्कर में भटक जाओगे,

26:08पता भी नहीं मिलेगा। आज अच्छे दिन है तो भोगने में लग जाओगे।

26:14यहाँ पाप करोगे नरक निकट चले जाओगे।

26:16बुरा दिन है उसको ठीक-ठाक करने जाओगे अपना समय खो दोगे।

26:20जो करना है वो बाकी रह जाएगा। इसलिए पूरा ध्यान देओ।

26:25आत्मा को कैसे बोचना है कैसा अनुभव करो। आत्मशांति कैसे मिले इससे लगाना है।

26:31ये तो बार-बार कहने में आता है हर lecture में।

26:34प्रत्याहार के माध्यम से ही

26:36होता है। जागृति रखने को बोलते हैं। होता है। जागृति रखने को बोलते हैं तो स्वयं को

26:38बहुत सारे दोषों का मालूम पड़ता है।

26:40जागृति में रहने से बहुत सारे दोष अपने आप निकल जाते हैं।

26:44क्योंकि कुछ दोष ऐसे होते हैं जो निकलते नहीं हैं। उसकी चर्चा हम करें।

26:49कि हमारे को अभी भी ऐसा ऐसा है। हमारी भावना में अभी भी कमी है तो क्या करें?

26:56मालूम नहीं भी पड़े अगर समझो परकी रीति ना हो। साधना करते हैं

27:02ना तो ये रीति परकी। अभी साधना करते करते जागृति में रहते रहते सारी

27:05रीति खत्म हो गई। अब

27:06थोड़ा भी कहीं भी राग द्वेष

27:07नहीं दिखता है। ध्यान में बैठते हैं तो

27:09भी कुछ नहीं मालूम पड़ता है, कोई विकल्प ही नहीं आते हैं, ऐसे ठीक हुई है। ठीक है।

27:14ये तो अच्छा है ना अब तो। अब तो कोई problem नहीं है ना, अब बड़ा problem है।

27:20तो दोष दिखते नहीं हैं एक बात का। बड़ा problem कैसे है कि समझो अगर हमने

27:24X-ray निकाला और कुछ निकला तो तो

27:27operation कर सकते हैं। क्या?

27:30दर्द हो रहा है, sonography

27:31कराया, X-ray कराया, blood report कराया, सब normal है। Test कराया,

27:32blood report कराया, सब

27:33normal आ रहा है, दर्द हो रहा

27:35है। अब क्या होगा बताइए?

27:37अब कोई इलाज कर सकोगे

27:39दर्द का? ऐसा ही हुआ है ना, पानी पैसे का पानी हुआ है।

27:45Doctor को मालूम ही नहीं चलता कि कहाँ से सुन बैठा है। ये करेंगे तो

27:49हो जाएगा, nothing works. Diagnosis नहीं कर पा रहे। जितने भी injection दिए

27:51पानी नहीं, जितना भी दवाइयां दी

27:59पानी नहीं। पानी नहीं है जितना भी डुलाया पानी नहीं है।

28:02कुछ भी करना तो कुछ नहीं मतलब क्या?

28:06दर्द चालू है मतलब आत्मदर्शन हुआ नहीं है। मंजिल मिली नहीं है और दोस्त दिखते

28:11नहीं हैं। बहुत गंभीर समस्या है। देश दिखे तो इलाज करो।

28:18देश नहीं

28:20दिखते हैं। इससे तो tension इतना रहता है

28:22कि पैसे नहीं बनने बनता है। हाँ हर एक जानवी को होता है।

28:25ये tension हर एक जानवी को होता है क्योंकि दोस्त रहते रहते

28:28कोई जानवी नहीं बनता है। तो रहते कोई ज्ञानी

28:31नहीं बनता है। जो भी ज्ञानी बने हैं उससे इससे पहले की अवस्था में दोषों से हो

28:35जाते हैं। राजसिक के भाव आचरण

28:37में, शिष्य के प्रति। असंयम, संवेग, आसक्ति,

28:42निर्वेद, अनुकंपा ये सारे गुण चले प्रकट होते हैं तभी तो आत्मा के दर्शन होते हैं।

28:47आप पाप करते जाओ पुण्य करते जाओ और आत्मा के दर्शन होंगे कैसे होंगे?

28:50दृष्टि में भले ही ना कैसे मिलेगा परमात्मा?

28:52जागृति के कारण ये सब गुण आ जाएंगे। आगुती के कारण ये सब

28:57गुण आ जाएंगे एक भी दोष नहीं रहेगा।

29:00ये तो... ये कोई... मंजिल नहीं मिले तब तक तो...

29:05ये भी घबराहट होनी चाहिए तब तो एक भी दोष नहीं है किसको निकालूंगा? फिर भी आत्मा के

29:10नहीं मिल रहा। गरीब के अंदर में समस्या है। Payment भाई बहुत बहुत दिया है माल

29:12नहीं आया time पे तो? क्या

29:16होता है? बताइए। बताइए क्या होता है कि नहीं होता? देश में ये सब चल रहा है। उब्जाते

29:18हैं। आत्मा का आनंद चाहिए, अनुभूति

29:21चाहिए, अपना अस्तित्व चाहिए, वो कहाँ मिला? आत्मा

29:26के दर्शन कहाँ हुए? तो दोष तो

29:27अभी भी चालू हैं। जो मोटे-मोटे करते थे

29:33वो नहीं दिखते हैं।

29:45छोटे-मोटे करते थे

29:48वो भी नहीं दिखते

29:49हैं। अब जो पर्दे के पीछे हैं वो होंगे।

29:52अब जो पर्दे के पीछे हैं वो होंगे

29:54तभी तो आत्मदर्शन नहीं होता है। तो बड़ा दोष तो अभी भी चालू है।

29:58हमारा आत्मा नहीं दिखना, उसका अनुभव नहीं होना, वही सबसे बड़ा दोष है। राग द्वेष

30:04मिटना कोई बड़ी बात नहीं है।

30:07क्रोध नहीं करना, झूठ नहीं बोलना,

30:09परिग्रह नहीं रखना, अभिमान नहीं करना, वो कोई बड़ी... वो तो

30:12दूसरे धर्म वाले भी ऐसा रहते हैं, रह सकते हैं। कई धर्मों में ऐसा होता है,

30:16क्यागी तपस्वी ऐसे होते हैं।

30:20बिना अहंकार के साधना करने वाले,

30:21बहुत... बिना अहंकार के साधना करने वाले बहोत अन्य धर्म में भी है. जगत का कोई

30:27attraction नहीं एसे मीरांबाई है नरसिंह महेता है एसे कई भक्त हो

30:31गये है एसे. भक्ति में

30:33एसे डूबे के फिर उनको कोई

30:35दुनिया की कोई लालच अहंकार वो सब वैष्णव

30:38जन तो तेने कई ए नथी आवतुं. जे पीड

30:41पराई जाणे रे. पर निंदा न करे पर स्त्रीने मात गणे नथी

30:45आवतुं. ए तो अन्य धर्म में भी है. वो तो अन्य धर्म में भी है।

30:53फिर भी वो दोषी है, महा दोषी है क्योंकि अपने स्वरूप को नहीं जानते हैं।

30:57क्यों नहीं जानते हैं कि बताने वाले सद्गुरु नहीं मिले उनको प्रत्यक्ष में। इसलिए

31:03योग्यता थी लेकिन पा नहीं सके।

31:07योग्यता बराबर थी अगर सत्पुरुष कोई मिलते तो पा लेते थे।

31:09तो अपने से आगे निकल जाते थे।

31:11इतनी ताकत थी लेकिन क्या करें? उनको कोई मार्ग बताने वाला नहीं मिला ये भी

31:15एक दुख अंतराय होता है। बताने वाला नहीं मिला। ये भी एक रुखांतर होता है।

31:18जब जीव तैयार होता है तो कोई बताने वाला नहीं मिलता।

31:21बताने वाला तो मिलता है तब हम तैयार नहीं होते हैं। दोनों बाजू से problem है।

31:26इसीलिए कोई ऐसा मेल बैठता है। एक धन्य घड़ी आती है उसमें मेल बैठता है।

31:31कि हमारे आत्मकल्याण के भाव भी भावना भी बराबर होती है 100% की। सामने

31:36रास्ता बताने वाले भी बराबर उस time पे बराबर मिल जाते हैं। ऐसा हर वक्त नहीं बनता है।

31:43ये कोई बहुत हमारा सुंदर time आया है।

31:47सोने की घड़ी आई है समझ लो। उस time में अगर प्रमाद किया तो क्या होगा?

31:53जब समय आया तब प्रमाद किया सो गए।

31:56समय निकल गया। इन्हेंको समय पे ही वो घास को काटना पड़ता है गेहूं फसल जो होती है ना।

32:02अगर हफ्ता भर भी late किए तो वो सूख जाता है।

32:07समय पे ही उसका time हो गया पक गया तो

32:09निकाल लेना पड़ता है। अगर उसमें देरी हो

32:14गई ज्यादा तो खत्म जल जाता है पूरा अग्नि के कारण।

32:18धूप में ही पूरा जल जाता है खाने को काम भी नहीं आता है।

32:24उतनी धूप जरूरी है जब तक वो पक ना जाए फसल नहीं होवे। फसल के बाद अगर रहा तो

32:31जल जाता है धूप में। क्या फायदा फिर? सबका balance रहता है ना हर एक चीज का।

32:38कितना नमक कितना डालना। नहीं

32:40डालोगे चलेगा। नहीं डालोगे

32:41चलेगा डालना तो है लेकिन कितना डालना भाई उसकी limit है कि नहीं है।

32:46उतना ही डालना

32:47जो हमको taste को

32:48बराबर adjust करे ज्यादा डालोगे तो खा नहीं सकोगे वापस। सब waste हो जाएगा।

32:55नहीं डालोगे तो भी खाने का मज़ा नहीं आएगा ज्यादा डालोगे तो भी

32:58सब में balance है कि नहीं है। ऐसे धर्म करना है तो भी balance है।

33:03balance लेना पड़ता है। सबसे

33:05एक काम करते हैं। सबसे काम करते

33:08आज कल से आज तक मैंने वो try की।

33:10उसमें मेरे को कुछ भी इतना बोझ नीचे पड़ गया ना

33:15इधर था। एक के ऊपर निर्भर

33:20होते बस। हम्म। तो बस वैसे जैसे बैठी रहती है।

33:22उसमें

33:23ना भाव आया

33:29ना वत्सल हुआ ना दृष्टि इधर

33:32उधर गई। स्वरूप का दर्शन हुआ नहीं हुआ? देख लो। तो इतने इतने गुण प्रकट हो गए। दो।

33:37गुण प्रकट हो गए, दोष नहीं दिख रहे हैं, फिर भी गुण

33:39आत्मा का दर्शन क्यों नहीं होता है?

33:41आत्मा का दर्शन होता है तब जीव को स्वयं को मालूम पड़ता है कि मुझे

33:44अभी आत्मा के दर्शन हुए।

33:46कोई नई घटना घटी जो कभी जिंदगी में नहीं घटी।

33:50मालूम नहीं पड़े ऐसा नहीं अंधे को भी अगर हो जाए तो ही मालूम पड़े,

33:53ऐसी चीज है ये। परमात्मा से साक्षात्कार हो जावे। तो

33:58हमको पता नहीं हुआ कि नहीं हुआ ऐसा ऐसा जवाब नहीं होता है। यही बताता है कि अभी हम

34:01वहां तक नहीं पहुंचे हैं। ये बताता

34:04है कि अभी हम वहाँ तक नहीं पहुँचे हैं।

34:06नहीं पहुँचे हैं तो कारण क्या है?

34:08दोस्तों को दिखते नहीं हैं। नहीं दिखते हैं

34:12लेकिन हैं ज़रूर। सद्गुरु की कृपा और श्रोति की महिमा के अनुसार जनता वासी जो है ना

34:16तो सब का एक

34:20ही पिता है और सब कल से मिल रहे हैं। हम्म। कि बस अभी एक ही पिता

34:24है, एक ही का साथ मेरे को मिल

34:30रहा है। उस बहाना से हम मिल रहे हैं। तो कल से

34:33एक ही पिता है। तो बस एक ही आवाज़ है। हम्म ठीक है लेकिन वहाँ...

34:35ठीक है लेकिन वहां गहराई

34:36तक नहीं पहुंच पाए ना। तो उसका

34:38दर्द भी रहना चाहिए। दर्द आना चाहिए। होने दो,

34:40बस थोड़ा प्रयास करते जाओ। तो ऐसा होने दो। कभी-कभी पूछ

34:42रही थी कि यहां देखो अभी नहीं हुआ ऐसे होता, फिर बाद में पूछ रही थी

34:45ये दो तीन बार पूछ रही थी। ऐसे आ गए मतलब मेरे पूछने की वजह से मेरे को मतलब ऐसा

34:49महसूस हुआ। जब भी जाऊंगी दुकान जाते पूछूंगी दुकान में नहीं है। दुकान जाते

34:52दुकान में रहेंगे रहेंगे। पीछे

34:53से ऐसा मतलब हो रहा। जब इसके

34:56आगे मेरा क्या है

34:58कल था वो हो जाता ना खत्म होने

35:05के

35:07बाद।

35:08जब एक एक

35:15का निर्धारण करके। बताता है कि शाश्वत का ये मेरे पहले से था अब वो नहीं है

35:20तैयार था। विचार होंगे। सही नहीं है मतलब क्यों सही नहीं है उसका कारण बताता हूँ। नहीं

35:24है मतलब ऐसा हो गया कि वो सही नहीं है मेरा। तो सही नहीं है करके उसको छोड़

35:30दिया। हम्म। एक के बाद एक के ऊपर रहके। हम्म हम्म। सही इसलिए नहीं है कि आप ज्ञान से

35:37direct आत्मा को नहीं जानकर ज्ञान से

35:40मन के आधार लेकर के मैं गायक हूँ, मैं जानने वाला हूँ, ऐसा विचार करते हो।

35:46सही कब होगा? हाँ। ठीक है, कल तो बात चली थी बोलके। हम्म हम्म

35:52हम्म। हाँ ठीक है। तो

35:55अभिप्राय निकल गया कि विचार करने

35:57से आत्मा मिलेगी। पूरा निकल गया कि विचार करने से आत्मा मिलेगी।

36:00आत्मा का विचार करने से हमें आत्मा नहीं मिलेगी। हाँ तो विचार करना मिट गया।

36:05हमें जानने वाला हूँ ऐसा बोलने

36:07की भी जरूरत नहीं पड़ी। बस ठीक।

36:10अभी यहाँ तक आने के बाद अभी भी नहीं मिला ना?

36:12result तो अभी भी नहीं निकला ना?

36:16ठीक है। लेकिन अभी result तो नहीं निकला ना? अभी क्या फर्क क्या पड़ा अभी? कि

36:22ठीक है। तो पहले क्या होता था कि... क्या होता था कि आत्मा के विचार आते थे।

36:27आत्मा के विचार आते थे कई प्रकार से मैं गायक हूँ, मैं शरीर से भिन्न हूँ,

36:31विकल्प से भिन्न हूँ ऐसे विचार आते थे।

36:34लेकिन दुनियादारी के विचार नहीं आता था। अब क्या हो गया

36:38आत्मा के भी विचार करना बंद हो गया।

36:40क्योंकि फायदा नहीं। फायदा नहीं। तो

36:43अब तो relief relief मिली ना एक। क्योंकि अभी वो भी कसाई नहीं रहा। कुछ नहीं। जो मन का

36:49मन का आधार लेकर के जो आत्मा का विचार करते

36:51उतना जो कसाई था आधार बुद्धि थी वो भी खत्म हो गया। ठीक

36:54है। अब तो और फायदा होना चाहिए फिर भी अभी नहीं हुआ है। इससे आगे। bedment तैयार है।

37:00ना पर का विचार आता है ना अपने स्वभाव का विचार आता है तैयारी तो है। फायदा नहीं हुआ

37:05है। ठीक है। अगर वो अगर वो ध्येय नहीं होता तो इतनी साधना भी कैसे होती?

37:13problem वो नहीं है कि अभी ध्येय बांधा कि नहीं बांधा। problem वो

37:17पर का विचार तो आता नहीं है तो वो भी problem नहीं है।

37:20अब तो स्वयं का विचार भी नहीं करते। अब तो स्वयं का विचार

37:24भी नहीं करते हो तो वो भी problem नहीं है। फिर भी हासिल बोझा

37:27भी कम हुआ ना अभी कल से तो और बोझा

37:30कम हुआ ना। देखो आत्मा का विचार करते थे तो बोझा था इसका मतलब ये हो गया है ना।

37:34वो तो फिर मेरे अंदर चलता था।

37:35चलता था अपनी भावना के कारण चलता था

37:37भले हम करते नहीं थे लेकिन होता था तो बोझा भी था। कल उसको नुकसान समझ लिए।

37:44तो वो भी खत्म हो गया ना मामला। फिर भी एक दो बार आया ऐसा। आता। आएगा। आया।

37:49आया। लेकिन इसकी value नहीं रही। वो अच्छा नहीं लगा। आया और फिर आया और वैसे ही गया।

37:54खत्म। मालूम नहीं ना तो बुलाया ना

37:57फिर गया। बस। आया और गया। ठीक है।

37:59तो वो भी एक बोझा चले गया ना कि भई हमको ये

38:01विचार करना है कि वो विचार नहीं करना है ना। खत्म हो गई बात। अब इतने

38:06बोझा रहित हैं इतनी शांति भी है।

38:09लेकिन फिर भी एक दुख है।

38:11अभी हमको स्वरूप का दर्शन तो नहीं हुआ। क्योंकि मालूम

38:14नहीं पड़ता है हुआ कि नहीं हुआ इसका मतलब...

38:16तो मालूम नहीं पड़ता है हुआ कि नहीं हुआ इसका मतलब नहीं हुआ है।

38:19अगर होता तो मालूम पड़ता।

38:22तो अब क्या बाकी रह गया? अभी है कि नहीं दोस्त? हाँ जरूर दोस्त है। अभी भी दोस्त है।

38:28क्या दोस्त है?

38:30अगर दोस्त नहीं होता... कुछ नहीं

38:35मेरे मन में

38:38आता मेरे को। नहीं। नहीं मालूम पड़े

38:40तो भी स्वरूप का दर्शन नहीं है

38:42तो अभी वो बड़ा दोस्त तो अभी भी चालू है। कौन सा?

38:46अपने स्वरूप को नहीं पहचानने का दोष अभी भी चालू है। उसका क्या करोगे?

38:51इतना करने के बाद भी main

38:52दोष तो अभी गया ही नहीं है। जो मूल दोष जिसको निकालना चाहिए असल में,

38:58सबसे पहले वो निकालना चाहिए।

39:00इसके बदले दूसरा दूसरा काम कर लिया, लेकिन वो चीज नहीं हुई अभी तक।

39:03जो निकालना था वो नहीं निकला।

39:06दो कुत्ते जो है लड़ते लड़ते कुएं में गिरे। और एक दूसरे को मार डाले। अब वो गांव का

39:12पानी को पी... अब वो गाँव का पानी

39:13कोई पीता नहीं था क्योंकि उसमें ज़हर जैसा हो गया था मतलब, बू आती थी, वास आती थी।

39:20अब क्या करें?

39:22पानी के बिना चले भी नहीं। तो

39:24decision ले लिया सब लोगों ने कि सब पूरा पानी निकालना पड़ेगा,

39:28फिर कल सुबह नया पानी आएगा, वो pure रहेगा, बिना वास का।

39:33तो निकालने के लिए सब निकालो बाहर, सब लोगों ने

39:36मेहनत किया, पूरा पानी निकालो। दूसरे दिन भी वही की वही हाल।

39:41कि आपने कहाँ बोला था? आपने तो पानी निकालने को बोला था ना? अरे

39:44पानी किसके लिए निकालना था? कुत्ते को

39:46निकालने के लिए पानी निकालना था। पानी खराब हो गया था तो वो

39:49एक तो। दूसरा कुत्ते निकालना है। हमने निकाला तो क्या हो गया?

39:56यही बात है इसके अंदर। पानी पूरा

39:58निकाल दिया मतलब राग द्वेष एक भी नहीं आ रहे ना दूसरे के

40:00आ रहे ना अपने आ रहे। लेकिन मूल बात...

40:05स्वरूप का दर्शन की गलती... वो तो अभी चालू है।

40:09बस... बस इसका दर्द होना चाहिए।

40:12अभी इतना हो गया अब क्या बाकी रह गया? अभी पूरा बाकी है।

40:18कितना बाकी है? 6 फेरा पढ़ लिए सातवां फेरा नहीं फेरे अभी भी शादी हुई कि

40:22नहीं हुई? नहीं बोलते हैं। 6 फेरा फेर लिए अभी एक ही कदम। सातवां फेरे

40:27में भी अभी पूरा

40:30घूम लिए round एक कदम बाकी रखा है। पूरा हुआ। अभी

40:34भी शादी रुक सकती है।

40:38शादी कब होते हैं जब सातवाँ round पूरा लग गया complete तब शादी होती

40:42है जब तक तो कभी भी रोक लो।

40:46यहाँ तक आ गए एक कदम का फासला है वहाँ तक आ गए

40:49अभी भी नहीं मिल रहा है। tension बढ़ता है।

40:54doctor को नस नहीं मिलती है निदान नहीं होता है और दर्दी चिल्लाता है तो क्या होता है?

41:00क्या होता है परेशान होता है doctor। खुशी नहीं मनाता है कि

41:03चलो। खुशी नहीं मनाता है कि चलो सब report normal आ गए। खुशी मनाता है?

41:09वो अपने को छाती ठोक के कह सकता है कि आप कुछ भी नहीं हो आप बेका के चिल्लाते हो।

41:14Report तो पूरे normal है। घर जाओ घर जाओ बोल सकता है?

41:20नहीं बोल सकता। Report भले ही normal है

41:22लेकिन दर्दी इतना चिल्ला रहा है। ये रेस्टोरेंट

41:27क्यों बोलो? हमारा रेस्टोरेंट किस time? हाँ मालूम होता है।

41:30मालूम बताऊँ मैं आपको। Direct बताता हूँ। बताऊँ

41:33मैं आपको। मैं बताता हूँ। आपको दोस्त नहीं दिखता है।

41:37दोस्त नहीं दिखता है तो अब इलाज किसका करेंगे?

41:39स्वरूप का दर्शन भी नहीं, वहाँ दोस्त भी नहीं दिख रहा

41:41है। आप किसका इलाज करोगे?

41:44अब क्या करें, क्या बताएँ? क्या बताएँ कि क्या करोगे अब?

41:48हमको तो मंज़िल तक पहुँचना है, वहाँ तो पहुँचे नहीं हैं।

41:51स्वरूप का दर्शन तो हुआ नहीं है और दोस्त भी दिखता नहीं है, अब इलाज कैसे करोगे?

41:57कुछ दिखे, कोई दोस्त दिखे तो तो बोले कि भई

42:00ये गलती है, निकलो। कोई भ्रांति है तो निकालो

42:06भ्रांति भी नहीं है

42:07देखो ये बहुत tension वाली

42:08बात है इतना जबरदस्त tension होता है

42:13पूछो नहीं ये घड़ी हर एक को आती है जिन जिन को हुआ उनको ये घड़ी आती है

42:18अपुन कृपा ओडे कर लेंगे देखो क्या होता है

42:21कृपा ओडे तो

42:22इतने महाज्ञानी थे।

42:23और के वजह से वो समस्या हल हुई।

42:33हाँ आया लेकिन उन्होंने भूतकाल में सद्गुरु की आराधना की थी। फिर वो भूल गए थे।

42:40हाँ भूल गए थे। तो उनको तो होना आसान है, हमारे को तो संस्कार ऐसे है नहीं।

42:46तो जैसे भूतकाल में सद्गुरु का जो contact था, वो उनको अभी काम आया।

42:50इसी प्रकार वर्तमान में सद्गुरु का जो contact है, वो हमारे को helpful हो सकता है।

42:55ठीक है। वो समस्या तो हमारी नहीं है। वो समस्या तो हम हमारी नहीं है ना। हाँ। हाँ जो

43:01जो समस्या कृपावदेव को थी वो समस्या तो हमारी तो नहीं है।

43:05तो हमारे को तो ज्यादा chance है अच्छा chance।

43:08ठीक है लेकिन ऐसी अवस्था सब में आती है। सभी जीवों को कृपावदेव को भी आई।

43:14अनुभव के 3-4 दिन पहले की बात है। तो क्या लिखा है? हे सहजात्म स्वरूपी।

43:22तमे क्या क्या अने केवी केवी हिते मुंजाया चो ये तो कहो।

43:26ए तो कहो. 161 number. आवी विभ्रम अने दिग्मुख दशानी. सी, विभ्रम एटले क्यां ईलाज

43:31करवी मालुम ज नथी पडतुं. दिग्मुख

43:33एटले दिशा सूझती नथी, कोई रस्तो नथी

43:35सूझतो, कोई उपाय नथी सूझतो. आवी अवस्थामां कंई सूझतुं

43:38नथी. पछी जवाब अंदरथी आत्मा आपे छे के हुं शुं कहुं?

43:41शुं जवाब दउं? कारण के एनो जवाब तो छे ज नहीं, केवी रीते जवाब,

43:46शुं जवाब दईशुं? एटलुं ज बोली शको के हजी मंजिल नथी पहोंची तो क्यांक ने क्यांक भले

43:51नहीं. अभी मंजिल नहीं पहुंचे तो कहीं ना कहीं

43:53भले ही नहीं दिखता है लेकिन दोस्त जरूर है ऐसा कह सकते हो।

43:57क्या? अगर दर्द नहीं होता तो... अगर रोग नहीं होता,

44:02report normal आए ऐसा ही अंदर में normal होता,

44:06तो दर्द नहीं होना चाहिए था। दर्द हो रहा मतलब क्या?

44:09कहीं गड़बड़ जरूर है लेकिन पता लगता नहीं है। अब पता नहीं लगे तब तक जवाब क्या देवे?

44:15हूँ सु कहूँ तुमने सु उत्तर आपूँ।

44:18मति मुंजाई गई से अब मन का शक्ति

44:20बुद्धि होशियारी... शक्ति, बुद्धि, होशियारी सब चले गई।

44:23उसका काम नहीं है अब।

44:23सीधे उठके दरवाजा

44:38खोलने का नहीं, मैं

44:40बाहर से ही दरवाजा लेके

44:40चले जाऊं। तो दरवाजा लेके आपके

44:41पास 2-3 minute तो बैठे होंगे। तो 2-3 minute में उठके 3:20 में आ

44:45जाएंगे तो दरवाजा नहीं खोलना

44:46पड़ेगा तुम्हें। 3 minute से 2-3

44:48minute। तो मति मुंजाई गई इससे। दिमाग काम

44:50नहीं कर रहा है अब। गति चलती नहीं है। दिमाग

44:52भी काम नहीं कर रहा है और progress भी नहीं हो रहा

44:54है। गति चलती नहीं है मतलब क्या? step में progress होना चाहिए वो तो हो

44:57रहा नहीं जाके। Step में progress होना चाहिए वो तो हो रहा नहीं जा के वहीं है।

44:59जो स्थिति है वही स्थिति कायम

45:00है आगे नहीं बढ़ रहे। अब ये जब हालत हुई है तो

45:03साथ में कृपा लोग को क्या होता था? इसका result क्या आया? ऐसा जब हुआ

45:06तब उनका result क्या आया? खेद-खेद

45:07अने कष्ट-कष्ट आत्मा में थई रहल छे।

45:09इतनी तकलीफ हो रही है इतनी तकलीफ हो रही है।

45:11जिसका बयान नहीं कर सकते वो।

45:15तकलीफ हो गई। अब तो। अब तो मिल जाना चाहिए था दर्शन। अब तो कोई गलती ही नहीं है।

45:21ना परिणाम को आगे पीछे करना है।

45:23नाग्रज सहने तो निकालना भी नहीं है, दूसरों का विचार ही नहीं आता है।

45:27अब तो आत्मा का विचार में से भी मुक्त हो गए कि वो भी बेकार है।

45:31अब तो क्या है, अब क्या रहा? अब कौन सी रुकावट है?

45:35अब वो जब तक वो निदान नहीं मिलेगा,

45:39और हमको तो मंजिल मिली नहीं है तो हमको मंजिल नहीं मिली उसका दुख तो होता ही है।

45:44क्या है दृष्टि धरती न थी। क्यां दृष्टि धरती नथी। निराधार निराश्रय थई गया छीए।

45:49अब किसी का आधार भी नहीं है। गुरु को पूछे तो गुरु जवाब नहीं देवे।

45:53अंदर में अपने को नहीं सूझे। लटक गए बीच में ही। ना इधर के रहे ना उधर के रहे।

45:58देखो कैसी हालत हो गई। ऊंचा नीचा परिणाम प्रहव्या करे छे।

46:03doubt शंका कुशंका। विश्वास डगमगा रहा है।

46:09कभी परिणाम अच्छे कभी डगमग डगमग हो गए क्या होगा अब। अथवा।

46:12क्या होगा? अथवा अवळा विचार लोकादिक स्वरूपना आव्या करे छे. बिना

46:16जरूरी बिना प्रयोजन के

46:18विचार आने लागे वापिस. केवा

46:20भ्रांति अने मूरता रह्या करे छे, स्वरूप

46:22की भ्रांति तो अभी भी है. मूरता मने पागलपन

46:26है. न खाने में चित्त लगे, न पीने में लगे, न

46:30बोलने में लगे. आंख से आंसु जावे, कुछ समज में नहीं आवे, वैसा ठीकाना है. कई

46:36दृष्टि पहोंचती नथी, भ्रांति पडी गई छे. के हवे मारामां कई... के हमें

46:41मारा मा कहीं विशेष गुण दिखाता न थे।

46:47क्या? जितना गुण प्रकट हुए

46:50सामने दोष भी निकल गए, राग द्वेष निकल गए, पंचायतें निकल गई, सब

46:54संसार में कहीं रस नहीं रहा, तो इतने गुण तो प्रकट हो गए। तो सामने result भी आया,

46:59उसकी शांति भी है। ऐसा नहीं है कि अशांत हो गए, disturbance हो गया।

47:03लेकिन आत्मा का दर्शन होवे,

47:06उसके लिए जो गुण चाहिए, special गुण चाहिए, वो तो नहीं है।

47:09गुण जोईए वो तो नहीं है. हवे अमारो शक्ति खतम हो गई अब. लडते लडते लडते लडते

47:14शक्ति खतम हो गई. अने फिर

47:17भी मंजिल तो पहोंची नहीं है. तो हमको

47:19डर बेठ गया भ्रांति हो गई के मेरे में अब

47:23ज्यादा गुण नहीं बचे अब कता हुं. अब में क्या करुं कैसे करुं? हुं हवे

47:28बीजा मुमुक्षुओने पण साचा स्नेह प्रिय नथी. सबकी नजर में गिर जाना हो अब.

47:33पेहले तो आपनी नजर में

47:34गिर गया. इतना किया तो भी मिला तो कुछ नहीं. अब क्या करे? खराब भावथी मने ईच्छा नथी

47:40अथवा कई खेंचाता भावथी अने मध्यम
00:47:42.1000 --> 00:47:48.371
स्नेह प्रिय गणाय छे. वधारे परिचय न करवो जोईए ते में कर्यो एनो पण खेद थाय

47:48छे. सबकी नजर में आ गया

47:50के इन्के परिणाम एसे है बहोत आगे

47:52के stage में लेकिन अभी भी मिला नहीं है क्या गलती होगी क्या गलती होगी.

47:57सबकी आंखो में आ गया. काट

47:58के काट के काट के नस खुद

48:00को मालुम पडता है. दूसरो को मालुम पडता है.

48:06तो doubt आता है कुछ छुपाते होंगे।

48:08क्या doubt आता है गलती तो होगी लेकिन छुपा रहे हैं कह नहीं पा रहे हैं।

48:12नहीं तो मिल ही जाता ना गलती नहीं है तो मिल ही जाता ना फिर काहे। ऐसा लग जाता

48:17है हीन भावना आती है निर्बलता आती है पामरता आती है।

48:21ये सब development होता है इसमें।

48:24बदा दर्शन में शंका था इसमें। जब जैन दर्शन का अभ्यास किया तो बाकी सब

48:29दर्शन तो फीके पड़ गए उसमें श्रद्धा खत्म हो गई।

48:32एक जैन धर्म सर्वोपरि था। एक जैन धर्म सर्वोपरि था वितराक धर्म।

48:35उसकी आराधना करे तो भी फायदा नहीं हुआ तो अब तो

48:37सब सब doubtful हो गया। अब तो उल्टा problem बढ़ गया।

48:40ये सारे doctors का इलाज नहीं हुआ तो एक doctor ने थोड़ा-थोड़ा

48:44बताया कि हाँ यहाँ कोई fault है यहाँ ये है

48:47इसका ये इलाज है तो थोड़ा विश्वास आया कि ये कर देगा ठीक। लेकिन वो

48:51इलाज करने के बाद भी fail गया तो क्या हुआ?

48:53अब doubt आना शुरू हो गया वापस। कि नहीं नहीं ये

48:56doctor ठीक नहीं है। इससे अच्छा doctor नहीं है तो

49:00अभी हम हमारा कोई अभी भरोसा नहीं है।

49:02तो अभी हम हमारा कोई अभी भरोसा नहीं है ऐसा हो जाता है कि नहीं हो जाता doubt

49:04आता है कि नहीं आता है same ये हालत है आस्था होती न थी मतलब श्रद्धा नहीं आती है

49:10देखो क्या परिस्थिति बनी है कृपा हो दे। नहीं। कल से

49:15एक

49:19बार ये भी कल पूरा गुरु के पीछे भी नहीं करना बोल रहे तो वहां

49:26श्रद्धा तो कम नहीं हुई मेरी पता नहीं

49:29कहीं मेरे अंश में कहीं श्रद्धा की

49:30अश्रद्धा तो नहीं हुई है खड़े नहीं कर पाए। हम्म। वो भी हो

49:32सकता है। वो भी हो सकता है क्योंकि अभी तक फायदा नहीं मिला तो reverse भी

49:35जा सकता है जीव। जब तक

49:36line नहीं मिले तब तक कभी भी

49:37जीव पलट सकता है। doubt भी आ सकता है।

49:40नहीं मिलेगा ऐसा भी हो जाता है। विश्वास टूट सकता है, सब हो सकता है।

49:46result तो आया ना जो result चाहते थे। जो मूल गलती थी वो अभी की अभी वैसी की वैसी रही।

49:52छोटे-छोटे दोस्त निकल गए, राज dress वाले,

49:55परपंचायती वाले, दीनादरी में। ले। दीनादारी में interest, पंच इंद्रियों का विषयों

49:59में रस, ये सब निकल गए।

50:00लेकिन बड़ा जो problem है वो तो अभी भी है, जैसा का वैसा।

50:05कि स्वयं भगवान है फिर भी अपने को

50:06अपना दर्शन तो नहीं हो रहा है। असल में तो वही पहले करना था।

50:11अगर वो पहले होता तो सारे दोष निकल जाते थे। लेकिन वही नहीं हो रहा है।

50:18देखो। अब समस्या और गहरी हो गई है।

50:21जितनी समस्या गहरी है उतना गंभीरता ज्यादा आती है। गंभीरता ज्यादा आती है

50:26seriousness ज्यादा आती है अब मेरा क्या होगा जितने हाथ पैर मारने थे मार लिए

50:32जितनी ताकत थी पूरी लगा दी फिर भी नहीं हो रहा है अब क्या करूँ मैं नहीं आता है

50:39बहुत बड़ा problem आता है ये tension जो है ना वो बहुत बढ़ जाता है

50:46दर्द बहुत बढ़ जाता है ऐसी स्थिति आती है कि नहीं आती है

50:51वो देख लेना। एवी स्थिति आती है की नहि आती है वो देख लेना अपने परिणाम को check

50:54कर लेना. सदगुरुनो योग तो बाजतो नथी. अने अमने सदगुरु तरीके गणवानुं थाय छे

50:59खुद की बात करते है

51:01ते केम करवुं? अमे जे विषयमां

51:03शंकामा छीए ते विषयमां बीजाने शुं समजावुं खुद

51:06कोई अनुभव नहि होय तो क्यां बताये? ओर लोग उनको

51:10सदगुरु समज करके आत्मा का दर्शन कैसे करना पूछते थे लेकिन खुद

51:14ही दाहो दाहो गरबड में छे. कई समजाव्युं जतुं नथी अने वखत वीततो जाय छे. ए

51:20कारणथी तथा कईक विशेष उदयथी. कारणथी दत्ता कईक विशेष उदयथी देखो. एक तो

51:25खुद दामोदले बीजो बहारमां उदय

51:27एसा है. तो त्याग भी हो

51:29सकता नहीं है. त्याग जेसी अवस्था निर्वृत्ति. ए नहीं खाना वो नहीं

51:33खाना सव्रत तप नियम ओ

51:35भी नहीं होता है. जेथी बधी

51:37स्थिति शंकारूप थई पडी छे. तो उसका

51:40इतना दर्द है. के कहेते है के आ करता तो हमारे झेर पीने मरवुं ते

51:45उत्तम छे. उत्तम नहीं सर्वोत्तम छे

51:47एसा लिखा है. उत्तम छे सर्वोत्तम. उत्तम

51:50छे सर्वोत्तम छे। अब जिंदगी जीने की इच्छा नहीं हो

51:53रही। जिसके लिए इतनी मेहनत किया वही नहीं मिल रहा है। अब जिंदगी जीने

51:57की इच्छा नहीं हो। क्या करूँ जिंदगी जीकर?

52:01फायदा तो कुछ हुआ नहीं सब।

52:03इतना प्रयत्न करने पर भी। अंदर से आत्मा का आवाज आता है दर्शन परीषह एमज वेदा।

52:09इसका नाम है दर्शन परीषह।

52:11आत्मा का दर्शन नहीं होता है तो उसका जो दुख होता है उसका नाम परीषह।

52:14आत्मा के दर्शन नहीं होने का तकलीफ।

52:15आत्मा के दर्शन नहीं होने का तकलीफ. प्रतिकुलता का तकलीफ नहीं. कोई दोष है उसकी

52:21तकलीफ नहीं. आत्मा का दर्शन

52:23नहीं होता है उसकी तकलीफ. अंदर में बहु

52:25वेदना होती है. तो बोला वो तो एसा ही होता है.

52:31Answer.

52:32ते योग्य छे पण हमने लोकोनो परिचय ज्ञानी छीए एवी तेमनी मान्यता साथे

52:36न पड्यो होत तो खोटुं

52:37शुं हतुं? लोगो को भी ए

52:39मालुम पडना चाहीए था के हमको आत्मज्ञान नहीं

52:42हुआ तो लोगो को पूछना नहीं चाहीए हमको बहार disturb

52:45नहीं करना चाहीए. इतना नहीं चाहिए हमको बाहर disturb नहीं करना चाहिए। अब ऐसा

52:47हो गया है लोगों की नज़र में तो बड़े बन गए हैं। और अंदर से देखें तो खाली फूल,

52:50दमदोल। उसका problem भी बहुत हो गया है, mind पे tension आ गया

52:55है। ऐसा ही बनने वाला था देखो, आ गई बात।

52:59कि लोगों की नज़र में ऐसा ही होने वाला था,

53:01हमारी नज़र में ऐसा ही होने वाला था, क्या करें, क्या कर सकते हैं?

53:04ते बंदर।

53:06जैसा होने का था वही हुआ, जैसी film थी वैसी बनी है, वैसी सामने आई है। हम कहते

53:13हैं। हम कहते हैं अपने आत्मा को। अरे हे दुष्ट आत्मा, अब गुणगान नहीं गाए।

53:19मैं परमात्मा हूँ, मैं गायक हूँ, अनंत गुणों का भंडार हूँ, ये बात कहाँ छूट गई?

53:27क्या उल्टी अपने को गाली दी? हे, अरे हे दुष्ट आत्मा,

53:34पूर्वे त्यँ बराबर संमती न राखिन।

53:37कर्म बांधते बखत तो हस्ते हस्ते कर्म बांधे,

53:39अंतराय दिया। दिया सदगुरुमां भक्ति नहीं राखी, ऊलटी विराधना करी. त्यां

53:44एसा जब बांधे तब

53:45तो कोई विचार नहीं किया.

53:48पूर्वे त्यां बराबर संमति न राखी अने

53:51कर्म बंधन कर्या. तो हवे तुं ज एना फळ भोगवे छे.

53:56जब तुमको जरूर पडती हे ने तो तुमको अंतराय हे देखो. लावता पूरी

54:02हे पाने की, लेकिन अंतराय भी उतनी जबरदस्त हे. ए अंतराय

54:07कहां से आई? अभी तो...

54:09अभी तो आप ऐसा तो नहीं कर सकते कि मेरे को इधर रस है उधर रस है इधर रस है।

54:13वो तो वो तो दोष है ही नहीं। वो तो दोष दिखते

54:16नहीं हैं और फिर भी कार्य नहीं होता है तो ये

54:18कार्य नहीं होने में जो अंतराय है,

54:20जो समय जाता है, बाधा पड़ती है,

54:24हमारी भावना सफल नहीं होती है प्रयत्न करने पर भी, ये कहाँ से आई ये अंतराय?

54:29वर्तमान में तो कोई रोकने वाला नहीं है। भूतकाल का है।

54:35पूर्वे त्यँ बराबर सम्मति न राखिया। वहाँ बराबर सम्मति न रखी और कर्म बंधन किए, तो

54:40अब तू ही जिसके फल भोगवे है।

54:43जब तक पूर्व कर्म

54:44अभी हैं, तब तक आत्मदर्शन होने वाले नहीं

54:50हैं। बिल्कुल सही बात है, ऐसा ही होता है।

54:53तो reason तो समझ में आया ना reason क्या है, कौन रोकने वाला है?

54:58भूतकाल में जो गलती की थी वो

55:00रोकते हैं। और गुरुजी अपन

55:01ऐसा मान बैठेगा हमारी मनोबल नहीं होगी। मनोबल कमज़ोर नहीं होगी,

55:03इसलिए तो कहते हैं। मन कमजोर नहीं होगी। इसलिए तो कहते हैं देखो कृपा देखो क्या हुआ।

55:08Vision मालूम पड़ गया, वर्तमान में कोई गलती नहीं है। कहीं भी फंसे हुए नहीं हैं,

55:12फिर भी कार्य नहीं हो रहा है, दोष दिखते नहीं हैं, फिर भी कार्य

55:15नहीं हो रहा है। मालूम पड़ गया।

55:18ठीक है,

55:19तो अब result ढूंढा तो कौन सा, कुछ ना कुछ reason तो होना ही चाहिए। तो कहाँ गई बात?

55:24भूतकाल में कहीं किसी को रोका है, अंतराय डाली है, विराधना की है।

55:29आत्मा की तो विराधना की है लेकिन देवगुरु शास्त्र की

55:31भी कभी विराधना की है। गुरु जी आज का तो... साधना की है। गुरु जी आज का तो same चल

55:36रहा है अभी जो घंटे भर से

55:37चल रहा है उसका एक कण या एक

55:39शब्द भी मेरे पल्ले नहीं पड़ा। हम्म। और जब से ये जो चल

55:42रही थी अपनी अवेलना या विरक्ति जो चल रही थी ये direct कचोट रही है मेरे

55:47को कि मैंने किया होगा ऐसा इसके लिए। इसलिए समझ में नहीं आता है

55:49इसलिए भावना नहीं आ रही है

55:50आत्मभावना नहीं बढ़ रही है। एक घंटे में पूछूंगा। नहीं समझ में आएगा ये तो

55:54बहुत high level की बात। साधना में बहुत आगे बढ़ गए

55:57तब ये समस्या आई है उनकी बात। जिसको संसार

56:00में अंश... जिसको संसार में अंश मात्र भी रस नहीं है।

56:03पर पंचायती बिल्कुल नहीं है, जो हुआ सो आग लगे पूरी दुनिया को। क्या? ऐसा कर दिया है।

56:11कल तक सिर्फ आत्मा के विचार आते थे,

56:13वो भी गलती है बताया तो वो भी छोड़ गए अब। अब आत्मा के विचार भी नहीं आ रहे,

56:17दुनिया के तो नहीं आ रहे लेकिन आत्मा के भी नहीं आ रहे। तो साधना कितनी ऊंची है?

56:23ऐसी ऊंची साधना में जो problem आए

56:25उसकी चर्चा चल रही है, तो जो starting करने वाले को कहां से पल्ले आएगा? Starting करने

56:28वाले को कहाँ से पल्ले आएगा?

56:30ये तो पल्ले होने वाली बात नहीं

56:34है। ये तो जो border line पे आ गए हैं कि अभी एक कदम रखे तो मामला

56:37सुलझ जाएगा, एक कदम रखे तो।

56:39जो border line पे हैं। उसकी बात चल रही है। तो हम तो border line पे भी नहीं हैं।

56:44तो वो बात कहाँ से समझेंगे हम?

56:47ABCD भी start नहीं किया है, अवलोकन भी बराबर नहीं चलता है, जागृति

56:50भी बराबर नहीं है, अभी परपंचायती हैं।

56:52क्या करूँ, क्या नहीं करूँ, ऐसा करूँ, वैसा करूँ, ऐसे

56:55ढेर सारे विचार चलते हैं दुनियादारी के। विचार चलते हैं दुनियादारी के

57:01तो मतलब beginning भी नहीं हुई है साधना की तो साधना के end moment पर

57:05क्या problem आते हैं वो बात

57:07कहाँ समझ में आएगी समझ में नहीं

57:09आएगी इसलिए step by step ही आगे बढ़ना पड़ता है

57:12अवलोकन से ही शुरुआत करना पड़ता है

57:15तो आपके लिए तो 371 चला था अभी पत्र

57:18तीन दिन तक और 371 में सत्संग करना

57:22compulsory by chance नहीं मिलता तो क्या। By

57:24chance नहीं मिलता तो क्या करना है वो बात बताया।

57:28अच्छा वो कार्य करना है जागृति का उसमें भी बाधा डाले तो क्या करना है वो बात बताया।

57:33क्या? वो बहुत अच्छा letter आपने सुना शायद 371 वो आपके काम का है।

57:39मेरी beginning का है वो।

57:41Beginning से आगे बढ़ते बढ़ते जब end पे आए तब क्या समस्या आई उसकी बात अभी चल रही है।

57:47वही समस्या इनकी चल रही थी।

57:49अनुभव के 2 दिन पहले की बात है ये। ऐसी position कृपा करके। एसी

57:52position कृपा करीने करी हो गई. क्या कहेते है अरे हे दुष्ट आत्मा. पुरवे

57:57त्यां बराबर संमति न राखी

57:59अने कर्म बंधन कर्या अंतराय कर्म

58:00बांध्या. तो हवे तुं ज एना फळ भोगवे

58:03छे के आटली महेनत करे छे. इतनी महेनत कर रहा

58:06है फिर भी फल नहीं मिल रहा है. संसार सपने में भी

58:10नहीं चाहीए सपना भी नहीं आता है. ए वो चाहीए ए चाहीए खाउं ए पीउं वो

58:15करुं वो करुं. ए काम करुं उधर करुं ए करुं कुछ भी नहीं. ये काम करूँ

58:20उधर करूँ ये करूँ कुछ भी नहीं आता है।

58:23फिर भी काम नहीं होता है। भूतकाल में किए हुए कर्मों का फल भुगत रहा है।

58:30ठीक है अब vision मालूम पड़ गया ना?

58:33भावना कमजोर नहीं हुई भावना उल्टी बढ़ी। इसका क्या इलाज करें? इलाज नहीं करोगे तो वापस

58:40जाके वहाँ इलाज तो करना है। क्या बोले यहाँ? तू का तो जहर पी

58:46का तो उपाय तत्काल कर। सुख धाम

58:51अनंत सुसंत चहि

58:56दिन रात रहे तद ध्यान महि।

59:03प्रशांति अनंत सुधामय जे

59:10प्रणमो पद ते वरते जयते।

59:16प्रणमो। प्रणमु पदते

59:27वरते जयते।

Corrected by hand (2026-09-26): The sitting is Darshan Parishah — दर्शन परीषह, the affliction concerning faith, one of the twenty-two — confirmed by Tejas, and the video is titled that way. The catalogue files it under "Other discourses" with the reference run together and misspelt as "Darshanparishad", a parishad being an assembly, which is a different word. Naming it also lets the transcript reach it: a day with two sittings is told apart by the text name, and "Other discourses" shares no word with the recording, so the transcript had nowhere to go.