Avlokan Discourses of Shri Devchand bhai Shah The book Search Photographs About

Shrimad Rajchandra Vachanamrut

8 November 2000 · sitting 2 of 2 · Patrank 528 · 40 minutes

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Recitations restored to their canonical wording: Mangalacharan — Mangalam Bhagavan Viro, Mangalacharan — Sarva Mangala Mangalyam, Namokar mantra, Omkar bindu sainyuktam, Samaysar mangalacharan.

0:01श्रीमद् राजचंद्र पत्रांक 528 भाग पहला।

0:06तारीख 8-11-2000 श्री देवचंद्र भाई।

0:13णमो अरिहंताणं णमो सिद्धाणं णमो आयरियाणं णमो उवज्झायाणं

0:20णमो लोए सव्व साहूणं नमः समयसाराय

0:25स्वानुभूत्या चकासते । चित्स्वभावाय भावाय

0:31सर्वभावान्तरच्छिदे मंगलं भगवान वीरो,

0:36मंगलं गौतमो गणी। मंगलं कुन्दकुन्दार्यो,

0:41जैनधर्मोऽस्तु मंगलम्॥ सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं

0:47सर्वकल्याणकारकम। प्रधानं सर्वधर्माणां

0:52जैनं जयति शासनम॥ ॐकारबिन्दुसंयुक्तं

0:57नित्यं ध्यायन्ति योगिनः।

0:58कामदं मोक्षदं चैव ॐकाराय नमो नमः राजचंद्र वचनामृत पत्र number 528

1:01five twelve स्वप्ने जेने संसार

1:02सुखनी ईच्छा रही नथी अने संपूर्ण

1:04निसारभूत. और संपूर्ण

1:04निस्वार्थभूत जिसे

1:19संसार का स्वरूप

1:25भासियो

1:29है। एवा ज्ञानी पुरुष। कैसे ज्ञानी पुरुष? जिसको सपना भी नहीं

1:35आता है कि बाहर से

1:36सुख मिलेगा। संसार में से कुछ मिलेगा।

1:40सपने में भी नहीं, सपना भी नहीं आता है। और जिसे संपूर्ण निस्वार्थभूत

1:46जिसे संसार का स्वरूप भासियो है।

1:49अनुकूलता है तो भी उनको सार नहीं लगता है। नहीं तो अनुकूल... लगता है। नहीं तो

1:53अनुकूल time में तो लगता है कि नहीं संसार में कोई जेने ऐसा है। ये भी एक मजा है।

1:59प्रतिकूलता तो अच्छी नहीं लगे लेकिन अनुकूलता अच्छी लगती है।

2:04लेकिन ज्ञानी पुरुष को तो अनुकूलता में भी सार भासित नहीं होता है।

2:09ये अनुकूलता टिकने वाली नहीं है कब छू हो जाएगी मालूम नहीं। ऐसा स्वरूप है संसार का।

2:16संपूर्ण निसार भूत।

2:18जेने संसार नु

2:19स्वरूप। बासिं। स्वरूप. वास्युं छे. एवा ज्ञानी पुरुष पण. वारंवार आत्मा

2:25अवस्था संभाळी संभाळीने उदय होय

2:27ते पारब नैवेद्य छे. एसे ज्ञानी

2:30पुरुष को भी संसार में बहोत तकलीफ होती

2:34है. तीरने में. बहु समुद्र में डूबे है जीसको सहारो

2:39नहीं मिले वो तो बिचारे. तीरंगे कैसे? लेकिन इनको सहारो मिला है.

2:44लेकिन अभी तो का चोथा गुण स्थान. लेकिन अभी तो कहाँ चौथा गुणस्थान और कहाँ

2:51परमात्मा की दशा। चौदहवाँ चौदहवें गुणस्थान।

2:55वो भी पार कर देना तो तो जाकर सिद्ध भगवान बनेंगे।

2:58तो बहुत साधना विकट है। परमात्मा बनने की साधना बहुत विकट है उनको

3:03भी बहुत तकलीफ होती है तैरने में किनारे में आने में उनको भी तकलीफ होती है।

3:07ऐसे ज्ञानी पुरुष। वो भी

3:11बार-बार अपनी आत्मा की दशा को संभाल-संभाल करके।

3:15जानकारी में जागरूकता में रहते-रहते। जानकारी में जागरूकता में

3:18रहते रहते जैसा उदय आता है

3:20ऐसे अपने नसीब को भेजते हैं

3:23सुख में दुख में सब उनको भी और शोक होता है

3:26अंदर में चिंताएं होती हैं ये सब तकलीफ भोगते हैं

3:30ये सजा मिली है भूतकाल में किए हुए कर्मों की सजा है

3:35कभी रास्ता नहीं सूझता है ऐसा भी बनता है कैसे tackle करना situation tackle कैसे करना

3:44बहुत तकलीफ होती है। ऐसे ज्ञानी पुरुष भी बार-बार

3:48आत्मा की अवस्था संभाल-संभाल कर उदय होता है। ऐसे प्रारब्ध को वेधते हैं।

3:55जैसा कर्म का उदय आता है ऐसा हुआ है। स्वीकार कर लेते हैं।

3:59सुख को, दुख को, सबको स्वीकार कर लेते हैं।

4:04लेकिन आत्मा अवस्था ने विषय प्रमाद थवा देता नाथे। साधना जिसको जल्दी-जल्दी करनी है।

4:11बाहर में सुख आओ चाहे दुख आओ लेकिन। बार में सुख आओ चाहे

4:14दुख आओ लेकिन। अपनी जागृति के अंदर थोड़ा भी प्रमाद नहीं करते

4:17हैं। ये तो किसकी बात है जिसको

4:20संसार में थोड़ा भी सुख भाषित नहीं होता है।

4:24अनुकूलता भी प्रतिकूलता के समान। तकलीफदाई है

4:28मोहित नहीं होते हैं अनुकूलता में भी। इतने सावधान हैं श्रद्धा इतनी मजबूत होने वाले

4:34ज्ञानी की ये बात है।

4:36वो भी निरंतर पुरुषार्थ करते हैं प्रमाद नहीं करते हैं।

4:41अपनी आत्मा को। अपनी आत्मा की अवस्था को संभालते हैं। कैसे संभालते हैं?

4:45आत्मा की अवस्था को कैसे संभालना? उपयोग पलटाना।

4:49नहीं उपयोग पलटाने का तो हो ही नहीं सकता है। फिर कैसे संभालेंगे? द्रव्य दृष्टि से।

4:56अपना जो मूल स्वभाव है उसको देखते ही,

4:59उसका आधार लेते ही, परिणति में अपने आप change आ जाता है।

5:03परिणति अपने आप सुधर जाती है।

5:05इस प्रकार से वो बार-बार प्रमाद किए

5:07बिना अपने स्वभाव को बार-बार बार-बार ल...

5:08अपने स्वभाव को बार-बार बार-बार लक्ष्य में लेकर के

5:12सहज में ध्यान आदि क्रिया में लग जाते हैं। लग जाते हैं नहीं हो जाता है

5:17सहज सहज में क्योंकि दूसरा कोई रास्ता ही नहीं है। संसार सागर तैरने

5:22का और कोई रास्ता नहीं है पूजा भक्ति

5:24व्रत तप नियम ये कोई रास्ता नहीं है। स्वभाव का लक्ष्य रहे

5:29जानने वाला निरंतर दृष्टि में रहे वो संसार सागर तैरने का है

5:36उपाय है। तो ज्ञानी पुरुष

5:40जिसकी श्रद्धा तो पक्की हो

5:41गई है अब फंसने वाले नहीं हैं संसार के प्रसंगों में क्योंकि

5:44सारभूत नहीं लगते हैं कोई भी प्रसंग।

5:47नहीं फंसने वाले हैं तो भी वो

5:49बैठ नहीं गए हैं कि चलो अभी हाथ पे हाथ रखकर अब तो safe हो गए ना।

5:53पहले तो कोई सहारा ना था अब तो नैया मिल गई ना तैरने के लिए

5:56तो बस अगर बाहर हो जाएंगे कैसे भी करके।

5:59हो जाएंगे वो तो निश्चित है।

6:02लेकिन फिर भी वो प्रमाद नहीं करते

6:03हैं। प्रमाद ना हो। प्रमादना अवकाश योगे अगर वो प्रमाद

6:08करेंगे तो. ज्ञानीने पण

6:10अंशे व्यामोह थवानो संभव. कहेलो

6:13छे ज्ञानी भी मोहित हो सकता

6:16है संपूर्ण नहीं अंशे. अंशे उनको भी भ्रांति हो सकती

6:21है. प्रमादना अवकाश योगे अगर स्वरूप को नहीं संभलेगा स्वभाव का लक्ष

6:26नहीं करेगा बार. एसे ज्ञानी को भी अंश में व्यामोह. जो

6:32भी अंश में व्यामोह

6:34भ्रांति होने का संभव। जे संसार से कहो छे।

6:39ये संसार का स्वरूप ऐसा है कि वो भी मोहित कर लेता है ज्ञानी को

6:42पूर्ण स्वरूप से नहीं करता है क्यों?

6:44आत्मा का अनुभव एक बार हो चुका है।

6:47लेकिन जागृति में नहीं रहेंगे

6:49तो वो भी आकर्षित करते हैं और जितना आकर्षित करते हैं उतना ही

6:52कसाय तीव्र होता है।

6:56कसाय में उठापटक बहुत होती है। तीव्रता गुस्सा तीव्र हो जाता है।

7:01हो जाता है अच्छा नहीं लगता है द्वेष बुद्धि आ जाती है

7:06अनुकूल परिस्थिति में राग हो

7:07जाता है क्या होगा

7:16तो प्रमाद ना

7:17अवकाश योग है मतलब अगर स्वभाव का लक्ष्य नहीं करेंगे तो

7:20उसमें काफिल रहेंगे तो ऐसा पुरुषार्थ नहीं होगा तो

7:25ज्ञानी को भी आंशिक रूप से मोह होने का संभव है।

7:29मोह बढ़ने का भी संभव है। मोह मतलब कौन सा मोह बढ़ेगा अब?

7:33दर्शन मोह वाली भ्रांति तो खत्म हो गई। चारित्र्य मोह बढ़ता है।

7:38और स्थिति ऐसी बनती है कि अज्ञानी की स्थिति

7:40अच्छी होती है और ज्ञानी की स्थिति खराब दिखती

7:43है। इतना सत्संग करता है, इतनी आराधना करता है लेकिन फिर भी

7:47कोई परिणाम में change नहीं आता है। क्यों? प्रमाद।

7:51स्वभाव को नहीं संभालता है।

7:52बार-बार बार-बार बार-बार स्वभाव का लक्ष्य करना चाहिए वो

7:55नहीं करता है। इसमें प्रमाद करता है।

7:58हे, इसमे प्रमाद करता हे. हे तो वो से मुक्ति तो होने ही वाली हे लेकिन इतना

8:03प्रमाद भी उसको नहीं करना हे

8:05क्योकी संसार बहोत विचित्र हे. संसार के

8:07जो संग प्रसंग हे वो इतने जीव को कल्याण

8:10में इतने अंतराय डालते हे के अगर उसमे पुरुषार्थ नहीं रहा तो

8:13problem आ सकता हे. ते संसारमां आवा संसारमां जे ज्ञानीने पण मोहित करे छे.

8:20ते संसारमां साधारण जीवे रहीने.

8:22तेनो व्यवसाय लौकिक. तेनो व्यवसाय लौकिक

8:25भावे करीने आत्महित ईच्छवुं ए नहीं बनवा जेवुं

8:28ज कार्य छे. जीस संसार में कदम कदम पर ज्ञानी

8:33को भी बहोत संभाळ संभाळ करके बहोत जागृति में रहे करके बहोत पुरुषार्थ

8:38करके बचना होता है. एसे इस संसार के अंदर जीसको आत्मज्ञान

8:43नहीं हुआ है एसे साधारण

8:46जीव को. संसार भी संभाळना है कुटुंब परिवार शरीर आदि ए भी संभाळना है. शरीर

8:52आदि ये भी संभालना है।

8:55और आत्म कल्याण भी करना है। Possible नहीं है ये बात। एक साथ दो कार्य नहीं

9:02कर सकते। या संसार या आत्मा। किसी को एक को तो छोड़ना ही पड़ेगा।

9:08अभी क्या है कि संसार में तो रंगे गया है तो आत्महित को छोड़ा हुआ है इसने।

9:12पूरा change करना पड़ता है। सपने में भी संसार नहीं चाहिए।

9:16उठे जैसा है मैं सहन कर लूंगा,

9:18adjust कर लूंगा लेकिन आत्मा किसी भी हालत में चाहिए चाहिए

9:21चाहिए। आत्मा किसी भी हालत में चाहिए

9:22चाहिए चाहिए ऐसा अगर निश्चय दृढ़ नहीं हुआ

9:26तो उसको संसार में भी रस है तो फिर वो कार्य नहीं हो सकता है one one side होना चाहिए

9:32कोई भी एक side पकड़ना है किसको साधारण जीव

9:37नहीं तो उसकी बस की बात नहीं है क्योंकि ज्ञानी

9:39के भी बस की बात नहीं है बहुत मुसीबत से वो आगे बढ़ रहे हैं

9:43तो मुमुक्षु जीव को तो बस की बात है ही नहीं उसको तो बहुत संभालना है

9:48ऐसे संसार में ऐसे

9:49विचित्र। एसे संसार में एसे विचित्र. चारो ओर से बाधारूप.

9:54संसार में साधारण जीव

9:55को तो. संसार की प्रवृत्ति भी

9:58लौकिक भाव से करना. वा आत्महित की चाहना

10:02रखना. नहीं बनने जेसा कार्य हो. क्युं एसा क्युं? केमके

10:07लौकिक भाव आडे आत्मानी निवृत्ति ज्यां नथी आवती. त्यां हित विचारणा बीजी

10:12रीते थवी संभवती नथी. त्यां उलटता है जीव. उलझता है जीव। तो क्या होता है?

10:20निवृत्ति नहीं मिलती है। एक के बाद एक, एक के बाद एक कार्य आते रहते हैं और उसमें

10:25ये तो करना ही पड़ेगा, ये तो फर्ज है हमारी। इतना नहीं करेंगे तो कौन करेगा?

10:30करे बिना तो चलेगा नहीं, लोग क्या कहेंगे, आजू-बाजू वाले क्या कहेंगे? ये तो

10:34चाहिए ही चाहिए, ऐसा करके

10:35जो लौकिक भाव में प्रवृत्ति करता है,

10:38तो निवृत्ति नहीं मिलती है साधना करने के लिए।

10:42निवृत्ति मिले तो अपने हित के बारे में सोचें,

10:44निवृत्ति नहीं मिलती है तो हित के बारे में... निवृत्ति नहीं मिलती है तो

10:47हित के बारे में कैसे सोचेगा? पहले जो planning करना पड़ता है।

10:50ये संसार में हर कार्य planning करके करता है ना, कोई भी कार्य हो।

10:54ये Mumbai जाना है तो planning से।

10:56मेरे ticket available है कि नहीं, कौन सी date fix करना। कब जाना है, कब आना है।

11:02कब अनुकूलता है। ये सब decision पहले करता है ना, बाद में कदम उठाता है।

11:09इसी प्रकार से इसमें भी आत्मदर्शन उसी को

11:12होता है जिसको पहले सबसे... किसी को होता है जिसको पहले सबसे उसके पहले

11:14आत्मदर्शन होने के पहले planning होता है mind के अंदर

11:17सहज रूप से। जब आत्मकल्याण करना है तो planning करना है तो उसमें बाधा रूप जो जो है

11:23वो सब छोड़ना पड़ता है। Mumbai भी जाना है और यहाँ का काम भी संभालना है।

11:30तो फिर नहीं हो सकता है फिर आपको यहीं रहना है।

11:33यहाँ का काम किसी को हवाले कर सकते हो

11:35या 3 4 दिन 5 दिन 8 दिन के लिए pending कर सकते हो

11:38तो ही आप जा सकते हो। तो दोनों काम साथ में कैसे करें?

11:42ऐसे ही यहाँ पर भी एक ही काम करना है, लक्ष्य एक ही, मुझे

11:45अभी आत्मकल्याण के सिवा कुछ नहीं करना

11:48है। बाकी सब जो होगा उदे अनुसार।

11:51तो लौकिक भाव आडे आत्मा ने निवृत्ति ज नथी आवती, लौकिक विचारना में पड़ता है,

11:57ओ संग पोसंग बढ़ जाता है, नहीं करना चाहिए ओ संग बढ़ाता है।

12:00मुमुक्षु का संग कम और लौकिक जनों का संग ज्यादा जिसको आत्मा की बात भी पसंद नहीं है।

12:06तो क्या हो गया रुचिपूर्वक असत्संग में गया। सत्संग में गया।

12:10रुचिपूर्वक तो ये लौकिक भाव आ गया,

12:12लौकिक भाव के आड़े फिर इसको निवृत्ति नहीं मिलती और बेकार के

12:15चर्चा विचारणा में समय जाता है। सत्संग भी नहीं होता है इसके अंदर।

12:22तो

12:23जीव को आत्महित की विचारणा करने के लिए planning करने

12:26के लिए समय भी नहीं मिलता है। एक निवृत्ति तो बीजानु परिणाम थमु

12:31थमु संभव है सर, एक एक का stop होगा

12:33तब दूसरा चालू होगा। जब तक संसार की प्रवृत्ति चालू है तब तक

12:35आत्महित की प्रवृत्ति... की प्रवृत्ति

12:36चालू है तब तक आत्महित की प्रवृत्ति नहीं है, विचारणा भी नहीं है।

12:40और आत्महित की प्रवृत्ति है,

12:42तो संसार की प्रवृत्ति नहीं है। प्रवृत्ति नहीं है मतलब बंद हो जाता है ऐसा नहीं है।

12:46ये हमारे को भूसा हो गया।

12:48आत्मा के पीछे लग जाएंगे, ध्यान उधर लगा लेंगे तो संसार की जैसे

12:51सारी प्रवृत्ति बंद हो जाएगी। खाने का ही मन नहीं रहेगा, पीने

12:54का ही मन नहीं रहेगा, नींद भी नहीं आएगी ऐसा।

12:56या दुकान भी नहीं जाएंगे, घर-बार का काम भी नहीं होगा, ये हमारे को mind में भूसा है।

13:02प्रवृत्ति रहेगी, प्रवृत्ति करने का जो

13:04भाव है वो निकल जाएंगे। करने का जो भाव है वो निकल जाएंगे क्यों क्यों ऐसा होगा

13:09क्योंकि अभी हम खाना बनाने का भाव करते हैं

13:13और फिर खाना बनाते हैं प्रवृत्ति में हमको

13:16ऐसा भूसा भूसा गया है कि हम ऐसा planning किया

13:19खाना बनाने का भाव आया

13:21रोटी बनाने का विचार आया और फिर हमने ये

13:23सब planning करा तो रोटी बनी अगर हम विचार नहीं करते तो रोटी नहीं बनती थी

13:28विचार किया इसलिए रोटी बनी है

13:32बिल्कुल गलत बात है विचार अलग है। बिल्कुल गलत बात है। विचार अलग है,

13:35वो आत्मा ने किया है।

13:36और रोटी बनना नहीं बनना वो

13:37lot, चकला, बेलन आदि जड़ पदार्थों का कार्य है।

13:40असल में तो lot का कार्य है। असल में, निमित्त में दूसरी बहुत सी चीजें हैं।

13:47इसमें एकाध निमित्त ये भी ले लो कि इसका भाव। क्या? निमित्त में। कर्ता में तो रोटी

13:55भाई ने बनाई नहीं। ऐसे दुकान के भी कोई काम हमने

13:57नहीं किया है। हमने सोचा इसलिए कार्य हुआ, बिल्कुल गलत बात।

13:59तो फिर... सोचा इसलिए कार्य

14:00हुआ बिल्कुल गलत बात तो फिर हर वक्त ऐसा होना चाहिए देखो अपने भावों का अवलोकन करो

14:06भावों का अवलोकन करके देखो

14:07कि 1 घंटे में हमने 1000 बातें सोची हैं 1000 बार विचार आए अच्छे बुरे

14:12कितना कार्य हुआ अगर भाव के अनुसार हमारे भाव के अनुसार दुनिया चलती है

14:18तो जितने जितने हमारे भाव आते हैं सब के सब हमारा इस प्रकार से कार्य होना चाहिए

14:23जैसे मन में किसी को भाव आया कि इसको थप्पड़ मार देना है बहुत हैरान करता है मेरे को

14:28मार सका। मार सका? Action आया ऐसा?

14:34नहीं आया। मन में 10 बार 15 बार भाव कर लो। लेकिन action आना हुआ क्या?

14:38ये क्या बताता है? Percentage देख लो चलो।

14:43इन भावों का percentage देख लो कि

14:44कितने भाव हमने किए उसमें से कितने सफल हुए। तो भी आपको लगेगा।

14:50कि भावों से दुनिया नहीं चलती है। भाव जीव करता है अज्ञानता के कारण

14:56और कार्य... के कारण और कार्य जैसा

14:58जड़ का परिणमन होने वाला है

15:00ऐसा होता है। ये अवलोकन में सबसे पहले ये सीखा शिक्षा लेना है। सबसे पहले

15:04ये सीखना है अवलोकन के अंदर।

15:07कि हम बेकार का कर्म बांध लेते हैं कार्य तो होता नहीं कर्म फुकट के बांध लेते हैं।

15:12भई जिस कार्य के लिए गया

15:14travel की ₹500 ₹1000 खर्च कर डाला और वहां जिसको मिलने गए वही नहीं मिला। क्या हुआ?

15:20समय और शक्ति और बेकार का दंड हो गया कि नहीं हो गया?

15:23वैसा ही हमारी जिंदगी ऐसी गुजर रही है।

15:26दिन भर में हजारों प्रकार के अच्छे बुरे भाव कर लेते हैं।

15:31कर्म का पोटले तो हम बांधते हैं और वो भोगना भी हमको ही है आप इस। लेकिन कार्य

15:39कितना होता है?

15:40तो आप आप खुद महसूस करोगे कि 95% 99% भी आपकी इच्छा से नहीं होते हैं कार्य।

15:49फिर बेकार के भाव क्यों करें?

15:52फिर संसार हमारी इच्छाओं के... ये संसार हमारी इच्छाओं के अधीन नहीं

15:56है। 3 साल का बच्चा

15:57भी हमारी बात नहीं मानता। वो

15:59अपने हिसाब से रहता है अपनी मर्जी अनुसार।

16:02अगर उसको अनुकूल परिस्थिति नहीं है तो वो रोता है चिल्लाता है।

16:07उसको जब तक अपने अनुकूल परिस्थिति में रखेंगे तब तक अपना से

16:09राजी है नहीं तो राजी नहीं है वो।

16:12सब सब जीव स्वतंत्र है सबको

16:14अपना अपना अपना अपना जहाँ जहाँ सुख भाषित होता है वहाँ वहाँ रहने

16:17में आदी हो गए हैं। उसमें

16:19अगर घरवाले भी अगर तकलीफ देवे... घरवाले भी अगर तकलीफ देवे। तो भी उसको नहीं सुवात है।

16:24जिससे राग करता है वो

16:25अगर तकलीफ देवे तो वो नहीं सुवात है देखो

16:27जीव की परिस्थिति कैसी है। इतना संसार चारों ओर से

16:32तकलीफदाई है असार। तो ज्ञानी पुरुष को मालूम है इस बात का।

16:37एक की निवृत्ति तो बीजाणु परिणाम थहु संभव है। एक की निवृत्ति होगी तो दूसरा

16:42आत्मा लेंगी। संसार में से ही

16:44छुट्टी नहीं होती है तो

16:45आत्मविचारणा कैसे करेगा जीव। तो साधारण जीव को। तो साधारण जीव को

16:49तो इस संसार में तैरना बहुत मुसीबत है।

16:52इसीलिए उसको सबसे पहले एक भाव पे आ जाना चाहिए।

16:55उसको अपनी आत्मा को पूछना चाहिए कि ये थोड़ी सी जिंदगानी है। शरीर के लिए,

17:00परिग्रह के लिए, हर एक के लिए तूने कितने भाव किए? देह ने माटे

17:06हे जीव तूने अनंत भाव बिगाड़ लिए। अनंत जन्म मरण किए।

17:09क्यों देह में बुद्धि थी, मोहित बुद्धि थी।

17:13अब हे जीव संसार से छूटना तो उपाय है। कि देह ने... कि देरने खातर अनंत भव व्यतीत किया

17:19अब संतो कहते हैं कि संत पुरुष कहते हैं कि।

17:22तुम सिर्फ एक भव अपने आत्मा के लिए दे दो।

17:26सिर्फ एक भव इसमें से भी कई जिंदगी तो निकल गई है।

17:30किसी की तो आधी से ज्यादा निकल गई है।

17:34बाकी की जो बची हुई जिंदगी सिर्फ आत्मा के लिए लगाना

17:37है। मुझे सिर्फ आत्मा चाहिए और कुछ नहीं चाहिए संसार के पूरे रंग तंग निकाल दो।

17:41क्या होगा क्या नहीं होगा

17:42निकाल दो। निकाल देने से आपके भाव बंद हो जाएंगे क्रिया बंद नहीं। से आपके

17:44भाव बंद हो जाएंगे क्रिया बंद नहीं होगी

17:47क्रिया तो जैसी होने वाली है

17:48ऐसी ही होगी पहले रोटी बनाने का भाव नहीं आएगा तो फिर रोटी कैसे

17:52बनेगी देखो होता है कि नहीं होता

17:57है होगा ही होगा

18:00क्योंकि वो होने वाला है जड़ में तो होगा तो आप बिना भाव के

18:04activity में शामिल हो जाएंगे इच्छा नहीं है वो शामिल हो जाओगे बिना भाव के

18:09फायदा क्या होगा कि भावों के कारण जो कर्मों का पोटला बनता था

18:12वो नहीं बंधेगा और आप। वो नहीं बंधेगा। और आपको

18:14उस time में रोटी बनाते बनाते भी सत्संग की बात याद आएगी।

18:17सद्गुरु की बात याद आएगी। आत्म कल्याण की दृढ़ता भावना बढ़ेगी।

18:22कार्य लौकिक चल रहे हैं और अंदर में भावना

18:25विचार सब कैसे चल रहे हैं? कब मेरे आत्मा का हित होगा?

18:29कब मेरे आत्मा का दर्शन होगा? कब सत्संग मिलेगा? आज सत्संग में कैसी बात आई थी?

18:34उसका thinking चलता है। कार्य संसार की प्रवृत्ति के चलते हैं। और अंदर में भावना

18:41पूरी... अंदर में भावना पूरी बदल गई। ऐसा हो सकता है।

18:45भावना बिल्कुल धर्म कल्याण करने की, आत्म कल्याण की हो

18:48और क्रिया संसार की प्रवृत्ति की हो, देखने की, सुनने की, चखने की, ये सब हो।

18:52ऐसा बन सकता है।

18:54कि अंदर का change होता है, दूसरों को मालूम पड़े ना भी पड़े,

18:57क्योंकि अंदर की बात है, अंदर में change हुआ है।

19:00तो आत्मार्थी जीव को अंदर में सुविचारणा चलती है, planning चलता है।

19:04जिस बात की हमको important लगती है ना, वो

19:07बात की planning चलती है। किस... किस बात की importance है?

19:12कौन सा कदम कौन सा काम निपटाना है? वो

19:16वो target बनाने के बाद अपने आप विचार उसके अनुसार ही चलेंगे।

19:21जैसे घर में शादी हो तो अभी पूरा planning उसके अनुसार ही चलेगा देखो अपने आप।

19:26नहीं करना है तो भी चलेगा ही चलेगा। क्योंकि

19:28ये तारीख fix हो गई है ये सब तो अब इसके अनुसार सब

19:31आगे की पूरी बातें fixing हो जाएंगी। समय के पहले कपड़े आ जाना, समय के पहले

19:35सब band baaje हो जाना, समय

19:36के पहले सब... सब band-baaje हो जाना

19:38समय के पहले सब। सब booking हो जाना complete।

19:41ताकि end moment में दौड़ा-दौड़ी नहीं हो पंचायत ना हो देखो पूरा।

19:45ये अपने आप आते हैं विचार। क्योंकि हमने target एक fix कर दिया date fix कर दिया है।

19:50ऐसे इसके अंदर एक target fix कर दो। कि मुझे आज का आज ही आत्मकल्याण करना है।

19:56जितना जल्दी होवे आत्मकल्याण करना इसके अलावा अभी कुछ नहीं करना है।

20:00तो इतना fix करते ही पूरे विचार जो है

20:02आपके अंदर में पलट जाएंगे। विचार पलटते ही संसार। विचार पलटते

20:05ही संसार की प्रवृत्ति नहीं रुकेगी।

20:07और किसी का बाधारूप नहीं बनोगे, दुकान भी जाओगे, घर में भी काम संभालोगे। सब होता है।

20:13लेकिन अंदर की स्थिति जो है बदल गई पूरी, भावों की स्थिति। पहले भाव परिवर्तन होता है,

20:19रुचि बदलती है। सबसे पहले उपयोग नहीं आता है आत्मा के अंदर।

20:23सबसे पहले भावों की बदलना होता है कि संसार किसी भी कीमत पे नहीं चाहिए।

20:28मुझे सिर्फ आत्मा ही चाहिए, ऐसा एक अंदर में भावों का बदलाव होता है।

20:31इसके लिए अवलोकन compulsory है। अवलोकन के बिना ये संभव नहीं है।

20:37निरंतर जागृति में रहने की कोशिश करते करते करते करते अंदर के भाव पूरे बदल जाते हैं।

20:43जिसके पूरे पूरे भाव बदल गए हैं सिर्फ आत्मा चाहिए उसको आत्मा मिलता है।

20:49हर एक को आत्मा नहीं मिलता है भले ही ध्यान करें या कुछ भी करें व्रत तप उपवास करें।

20:53हर एक को आत्मा नहीं मिलता है भाव बदलते हैं तो आत्मा का दर्शन हो सकता है।

20:57भाव नहीं बदलते हैं तो आत्मा के दर्शन नहीं होता है

20:59तो ये बात यहाँ कहते हैं। एक नहीं निवृत्ति

21:02तो बीजानु परिणाम थमु संवेष संसार के भावों की निवृत्ति

21:06बिल्कुल stop तो दूसरे की स्थिति उत्पन्न होती है कौन सी आत्मकल्याण की।

21:12लेकिन दोनों साथ में नहीं रहेंगे संसार के

21:14भाव भी और आत्मकल्याण दोनों साथ में नहीं होता है।

21:17अहित हेतु एवं संसार संबंधी प्रसंग।

21:22संसार के जो भी प्रसंग है शादी ब्याह के हो कि और कोई भी हो।

21:26व्यापार धंधे के हो। या कोई बीमारी हो तो hospital में जा... या कोई

21:28बीमारी हो तो hospital में जाना पड़ता हो।

21:31ऐसे कोई भी प्रसंग हो, birthday हो, ऐसा कोई भी प्रसंग।

21:35संसार संबंधी कोई भी प्रसंग है वो कैसे है? अहित हेतु है। अहित हेतु माने क्या?

21:39इससे जीव का अंश मात्र भी भला होने वाला नहीं है। चाहे खुशी के हो,

21:46चाहे दुखी होने के हो, कोई भी प्रसंग संसार के हैं, ये जीव को अहित का कारण बनता है।

21:51अहित हेतु एवं संसार संबंधी प्रसंग, ये हमारे पूर्व कर्मों के उदय के

21:55अनुसार जो जो... ये हमारे पूर्व कर्मों के उदय के

21:57अनुसार जो जो घटनाएं घटती हैं वो। दूसरा हमारा लौकिक भाव।

22:02कि हमको लोगों को जैसा व्यवहार में होता है, लोगों को जैसा पसंद है,

22:06लोग उंगली नहीं उठावे, इस प्रकार से हमको काम करना है।

22:11लोगों में बदनामी ना हो, लोग कोई उंगली नहीं उठावे,

22:14व्यवहार बराबर निभाना है, व्यवहार में कहीं गलती ना हो जावे हमारे से।

22:20हम गलती करेंगे तो अच्छा नहीं लगेगा। ऐसा जो हमारा लौकिक भाव,

22:24संसार संबंधी प्रसंग उदय। संसार संबंधी प्रसंग उदय अनुसार अनुकूल प्रतिकूल। और

22:29इसमें joint होने वाले लोगों को

22:31अच्छा दिखाने के लिए व्यवहार निभाने का जो भाव है वो लौकिक भाव। और ये

22:35तो भाव अब वो लोक चेष्टा।

22:38सिर्फ भाव है ऐसा नहीं फिर लोगों को

22:41बाहर से भी दिखे कि हम आपके जैसे

22:42ही हैं आपके जैसा ही व्यवहार करना चाहते हैं आपसे अलग नहीं हैं ऐसा करके

22:46लोगों को सुहावे ऐसा action reaction प्रवृत्ति। उदय प्रसंग। लौकिक भाव। वे प्रसंग

22:53लौकिक भाव और लौकिक क्रिया सांसारिक क्रिया ज्ञानियों की क्रिया नहीं।

23:00लोकी लोगों को अच्छा लगे ऐसी क्रियाएं मन वचन काया के प्रवर्त्त।

23:05अहित हेतु ये सब क्या है जीव का कल्याण करने वाला नहीं है। अहित करने वाला है बहुत

23:11क्योंकि आत्मज्ञान नहीं हुआ और ऐसे लफड़े में फंसा है तो होने वाला भी नहीं है।

23:16अहित हेतु ऐसा संसार संबंधी प्रसंग लौकिक भाव और लोक चेष्टा। और

23:22लोग कैसे? ये सौनी संभाल जेम बने तेम जति करेने।

23:25क्योंकि एकदम possible नहीं है तो क्या कह दिया?

23:28जितना हो सके दूर रहना, बहुत संभालना, बहुत संभालना ऐसा।

23:33Maximum जहाँ तक अपनी ताक़त हो वहाँ तक avoid करते जाओ, avoid, दूर रखो, दूर रखो सब।

23:40जेम बने तेम ये सौनी संभाल।

23:43नहीं संभालूँगा तो नुकसान हो जाएगा, नहीं संभालूँगा तो ये

23:45लोग क्या बोलेंगे? ऐसा। अच्छा नहीं लगेगा। तो ये। अच्छा नहीं लगेगा।

23:49ये सौनी संभार जेम बने तेम जति करीनी। Avoid करना।

23:54नहीं होता है avoid तो क्या करना?

23:56भाई कोई प्रश्न ऐसे हैं कि भई हम तो अभी शामिल होना ही पड़ता है।

23:59हम उसको छोड़ के भाग नहीं सकते हैं तो क्या करना? दूसरा point अब।

24:05तेने संक्षेपिन। 8 घंटे का

24:07program हो तो उसको कैसा भी

24:08करके 4 घंटे में खत्म कर। 4 घंटे

24:09का हो तो 2 घंटे में। जितना हो सके minimize कर देना है। तेने संक्षेपिन।

24:15आत्महित ने अवकाश अपो घटे छे। इतने अवकाश अपो घटे छे।

24:18संक्षेप करके लौकिक भाव से निवृत्ति ले करके, लौकिक प्रवृत्ति से निवृत्ति ले करके,

24:25चाहे जैसे उदय प्रसंग में हमको अपना आत्मा का हित कैसे होवे, ऐसा planning करना चाहिए।

24:32अगर ऐसा समय नहीं खींच के निकालोगे तो

24:35बहुत परेशानी हो जाएगी। ये 51 number का माताजी का बोल है।

24:40इसमें भी बहुत अच्छी बात कही है। आकाश... आकाश पाताल भले एक था।

24:48तो आकाश पाताल एक होता है तो क्या होता है? करोड़पति रोडपति हो जाता है।

24:52ऐसी परिस्थिति इतना नुकसान होता है। कि जो believe ही नहीं कर सकते।

24:57एकदम अटाकटा आदमी एकदम अचानक cancer घोषित हो जाए 2-3 महीने

25:00दिन का मेहमान है। 2-3 महीने का मेहमान है ऐसा हो जाए आकाश पाताल एक हो जाए।

25:06कि हम believe ही नहीं कर सके अरे अब इतना अच्छे थे

25:09और ऐसे cancer कैसे हो सकता है कभी बीड़ी नहीं पिया सुपारी नहीं खाया वो

25:11नहीं खाया। कैसे हो सकता है?

25:14हटे कटे इंसान को अचानक kidney fail हो जाए लो। ये क्या हो गया? आकाश पाताळ एक।

25:20जो हमने सोचा नहीं है कर्मों का उड़े कब उड़े में आएगा पाप का उड़े

25:23कब दुनिया पलट जाएगी हमको कोई पता नहीं। दुकान में आग लग जाए।

25:30कोई चोरी जबरदस्त हो जाएगी पूरा छिन जावे। जावे और accident हो जाए हाथ पैर टूट जावे।

25:37जीवन भर का अपाहिज हो जावे। देखो

25:40ये क्या हो गया है अनहोनी। देखो ये क्या हो गया है अनहोनी होती है ऐसी घटना

25:43संसार में रोज़ बरोज़ घटती है।

25:46हमारे पे नहीं गुजरी है बाकी लोगों पे तो रोज़।

25:50चालू ही है रोज़ paper में news आता ही है।

25:53उसकी ज़िंदगी पूरी पलट जाती है 1 second के अंदर। दिवाली का वो फटाकड़ा देखने गया।

25:59फटाकड़ा आ गया पूरा जल गया। ऐसा होता है। संसार में ऐसे प्रसंग रोज़ बनते हैं।

26:06कि संसार का असार स्वरूप जो है स्वर्णभंग। सार स्वरूप जो है स्वर्ण भंगुर स्वरूप है।

26:11वो देख करके पढ़ करके सुन करके ज्ञानियों को तो वैराग्य आता है कि

26:15ये संसार में किसका भरोसा रखें कब न जाने कब क्या हो जावे। क्या भरोसा रखें?

26:20आकाश पाताल भले एकता है भले ऐसी स्थिति आवे कि तेरी वस्तु की चले नहीं

26:25एकदम तुम्हारी स्थिति एकदम खराब हो जावे। पर भाई थारा ध्येय ने तू चुपिस ने।

26:33तेरा ध्येय है मनुष्य जन्म सफल करने का आत्मदर्शन करने का

26:36आत्मा की संभालने का। आत्मा की संभाल रखना। उसको तुम चाहे जैसे

26:39प्रसंग में भी पीछे नहीं हटो।

26:42आ गई। सारा प्रयत्न ने छोड़िस नहीं, पहले जो कोशिश है, जागृति है,

26:49सुविचारणा है, आत्महित कैसे होवे उसकी सुविचारणा है, उसको तुम छोड़ना नहीं।

26:54आत्मार्थ ने पोषण मरेते कार्य करू, जिससे हमारी आत्मा की भावना बढ़े,

26:59ऐसे सत्संग, भक्ति आदि

27:00कार्य करते रहना, जागृति में रहते रहना। दूसरा कार्य नहीं

27:02करना। आत्मभावना कमजोर। करना।

27:04आत्मभावना कमजोर पड़े ऐसे संग में, प्रसंग में, कुसंग में,

27:09असत्संग में तुम नहीं रहना, वहाँ छोड़ देना।

27:12दूसरों को बुरा लगेगा तो ऐसा होगा तो वो नहीं देखना, वो साथ छोड़ देना।

27:17जे ध्येय चढ़े ते पूर्ण करजे। जिस ध्येय को तुमने पकड़ा है,

27:22उसको कैसा भी करके तुम पार पड़ना। जरूर तेरे को सिद्धि होगी। तू सफल हो जाएगा।

27:29ये बात यहाँ कही है।

27:30दूसरा भी एक बोल है कि, चाया जैसी कटोकटी में भी। चाहे जैसी कटोकटी में भी तू तेरे

27:35ज्ञान और ध्यान का समय निकाल लेना।

27:38ये अमूल्य मनुष्य जीवन बेकार चले जाता है प्रपंचों में।

27:42उसमें समय मिलता नहीं है आत्मकल्याण के बारे में सोचने को।

27:46लेकिन अगर तुझे मुक्ति चाहिए तो

27:48चाहे जैसी कटोकटी में भी। कि इधर सम इधर को देखे तो वो बिगड़े।

27:54उधर देखे तो ये बिगड़े ऐसी परिस्थिति। कटोकटी किसको बोलते हैं?

27:58कि दोनों को संभालना possible ही नहीं है एक को

28:00तो छोड़ना पड़ता है practically। एक को तो छोड़ना पड़ता है practically भी। क्या करना?

28:04ऐसी कटोकटी में भी तू तेरे ज्ञान ध्यान का समय खींच निकालना, उसको तो तू नहीं छोड़ना।

28:10चाहे कुछ भी हो जाए।

28:12क्योंकि वो तो कुछ भी हो जाए उसमें तो पूर्व कर्म है ना,

28:14उसमें तो तेरी कोई चलने वाली है भी नहीं ऐसे भी तो।

28:17तुम ध्यान रखेगा तो भी तेरा बुरा time आया तो अच्छा time होने

28:19वाला भी नहीं है। तुम चाहे कितना भी ध्यान रख ले।

28:22जब तेरे पाप का उड़े आया तो कुछ नहीं हो सकता है।

28:25इंद्र, नरेंद्र, धिनेंद्र कोई कुछ कर सकता नहीं है।

28:30मंत्र तंत्र औषध कुछ काम नहीं आते हैं, सब हाथ ऊँचे कर देते हैं।

28:34कोई बचाने वाला कोई नहीं है।

28:36कोई हाथ पकड़ने वाला नहीं है क्योंकि बुरा time आया तो

28:38कितना भी गिड़गिड़ा, कितना भी ध्यान कर, कितनी भी प्रार्थना कर,

28:42कितना भी मंत्र तंत्र कर ले

28:43तेरा कोई कार्य होने वाला नहीं है। Better ये है कि अभी इसके

28:48बेकार का जो नहीं हो सके उस कार्य के पीछे जाने के बदले,

28:52जो हमारा कार्य हो सकता है। और लोक चेष्टा।

28:57ते सउनी संभाल जेम बने तेम जति करीने। जो तू न करे तो तेने संक्षेपीने।

29:05आत्महितने अवकाश आपो घटे से। क्योकि संसार में पल पल खतरा है।

29:11ज्ञानी पुरुष भी बहुत ध्यान रख करके कदम कदम पे

29:14देख देख के चल रहे हैं बहुत पुरुषार्थ उनको भी करना पड़ता है।

29:18तुझे आत्मज्ञान नहीं हुआ है

29:19तेरी स्थिति तो बहुत खतरनाक है। तुझे ये सब बहुत ध्यान रख करके कदम उठाना

29:23है। बहुत ध्यान रख कर के कदम उठाना है। कैसा भी करके आत्महित को अवकाश देना है।

29:29अब चलो हम तैयार कर लिए कि हमको आत्महित करना ही है,

29:32इतना सुनने के बाद अंदर में विचार आया।

29:37बात तो बिल्कुल सही है, practically भी दिखती है, संसार में ऐसा ही है।

29:41कब स्थिति बदल जावे, कब क्या हो जाए, कोई पता नहीं, भरोसा नहीं। और अंदर के जो

29:46राग भाव हैं, राग द्वेष के, वो मिटते नहीं हैं, मिटेंगे नहीं तो

29:49मुक्ति कैसे हो अब? और फिर जो

29:51कर्म के पोटले बांध रहे हैं, उसमें दुखी तो आखिर में हम ही होने

29:53वाले हैं। बांध रहे हैं उसमें दुखी तो आखिर में हम ही होने वाले

29:57हैं। हमको ही सब भोगना है जैसे हम भाव करेंगे जैसा

30:03बीज बोएंगे वैसा ही फल आएगा। संसार का बीज बोया है तो संसार बढ़ेगा जन्म मरण

30:06होते जाएंगे। तो फिर हमको संभालना

30:07है सावधान होना है अभी हमको आत्महित

30:09करना है ऐसा अगर हमने तय किया है तो।

30:12तब उपाय की बात करते हैं।

30:14कि अगर ऐसा हमारे अंदर में भावना होती है तो सबसे पहले

30:17क्या कार्य करें। किंतु आत्महित करना है तो सबसे पहले क्या। इंतरा आत्मय करना है तो

30:21सबसे पहले क्या काम करना होगा?

30:24तो कोई भी कार्य करना है तो कार्य करने की जो विधि है वो पहले जानना पड़ता है। क्या?

30:31अगर विधि में गड़बड़ हुई तो भावना होने पर भी कार्य नहीं होगा। भावना तो अच्छी है।

30:37लेकिन कैसे करना कैसे पार पहुँचना?

30:41नैया तो मिल गई लेकिन किनारा ये बाजू है और हम मदबरिया ये बाजू है।

30:45और दरिया के पानी के ऊपर तो road का कोई sign board वगैरह लगे हैं

30:48क्या? chance और board वगैरह लगे हैं क्या

30:50कि A side जाओगे तो किनारा आएगा और A side जाओगे तो

30:53बीच में जाओगे ऐसा तो कुछ symptom नहीं है।

30:56road पे तो आपको मिल जाएंगे arrow mark मिल जाएंगे

30:59कितना कदम चले कितना kilometer चले सब मिल जाता है।

31:02लेकिन दरिया के अंदर गए तो?

31:06और किनारे पे जाना है और गलती से अगर wrong direction हो गया तो क्या होगा?

31:12देखो अब क्या होता है। इसीलिए आत्महित करना है।

31:18आत्महित कैसे करना है वो पहले जान लेना है। कोई भी कदम उठाने के पहले।

31:25Mumbai जाना है तो Mumbai जाने वाली train कौन सी है? 8 10 train platform पे खड़ी है।

31:30सब platform full है हर

31:32platform पे गाड़ी है। कौन सी गाड़ी Mumbai जाती है? कहीं ऐसा

31:37ना हो कि जल्दबाजी में

31:38Madras की train में बैठ गए Delhi की train में बैठ गए।

31:42जानकारी पूरी लेने के बाद उतना time तो आपको देना ही है। इसके बाद आपको कदम उठाना है।

31:48भावना intact है लेकिन भावना को सफल करने के लिए planning जरूरी है,

31:52सब कुछ जानना जरूरी है विधि।

31:54वो विधि कहाँ मिलती है? वो काम पहले करना है। तो देखो क्या कहते हैं।

32:00आत्महित माते सत्संग जेहुँ बड़वान बीजू निमित्त कोई जणातु नते।

32:05देखो अब आखिर बात आई घूम फिर के सत्संग।

32:09तो अगर आपको आत्मकल्याण करना है, मुक्ति

32:10पाना है तो। आपके पास कोई alternative... आपके पास कोई alternative नहीं है।

32:15ऐसे बहुत से दर्शन, पूजा, भक्ति,

32:18त्याग, वैराग्य ऐसे बहुत से हैं लेकिन सबसे बलवान कौन? सबसे बलवान निमित्त,

32:24उपादान नहीं, उपादान तो तू स्वयं। लेकिन जहाँ guidance मिलता है, perfect,

32:30भगवान के दर्शन करने में guidance नहीं मिलता है।

32:33पूजा करने में नहीं मिलता है, शास्त्र पढ़ने में भी हम

32:36हो सकता है अर्थ का अनर्थ कर देवे।

32:38समझने में गलती करें। 45 number की गाथा में आता है कि

32:43राग द्वेष के भाव जीव नहीं करता है। 46 number की गाथा में आता है कि राग द्वेष के

32:48भाव जीव ही करता है, अब क्या बोलोगे बताइए, क्या अर्थ करोगे?

32:53शास्त्र पढ़ने में भी हम ये गलती कर सकते हैं कि

32:55खाली यहाँ ऐसा कहा यहाँ ऐसा कहा, किसकी बात मानना? कौन

32:59सी बात मानना, वही author है। एक ही गाथा का फर्क है 45 46, समय सार की। इतनी opposite

33:05बात। हम समझ नहीं पाते हैं, आज।

33:08हम समझ नहीं पाते हैं, आशाएं नहीं समझ पाते हैं। क्या करें? तो कोई भी प्रवृत्ति में

33:14हमको जगाने के लिए, हमारा आत्महित में

33:17जल्दी से progress होवे, इसके लिए सबसे बलवान निमित्त कौन सा?

33:22सत्संग।

33:23आत्महित माते सत्संग जेहुं

33:24बड़वान बीजू निमित्त कोई पान जणातुं नथी। आप नग्न दिगंबर हो जाओ,

33:30मुनि बन जाओ, जंगल में रह जाओ, वो निमित्त नहीं है।

33:34ये तो आपने सीधा

33:34जानकारी लिए बिना सीधा action शुरू कर दिया है। Action शुरू कर दिया है। विधि

33:38तो मालूम नहीं है कि कैसे

33:39करना और सीधा कार्य शुरू कर दिया है।

33:41उसने उपवास किया मैं भी उपवास करूँ मेरे को भी शायद मिल जाएगा।

33:44Vishvadeva भगवान ने वर्सी तप किया था और मोक्ष में गए।

33:48हम भी शुरू करो हर साल वर्सी तप करो एक नहीं 10 करो। क्या हुआ?

33:54मोक्ष मोक्ष तो बहुत दूर की बात है।

33:56अंश मात्र भी शरीर के प्रति

33:58संयोगों के प्रति मोह कम नहीं हुआ है राग द्वेष कम नहीं हुआ है।

34:02कितने साल से वर्सी तप

34:03करते हो? पिछले 10 साल से लगातार वर्सी तप। पिछले 10 साल से लगातार

34:06वर्ष तक कर रहा हूँ। वो

34:08कितना कम हुआ राग द्वेष कितना कम हुआ?

34:12क्योंकि विधि नहीं है।

34:14विधि पहले जानना है और इसके लिए कुछ भी कार्य करने से पहले कदम उठाने से पहले

34:19सत्संग में आना है। चलो सत्संग करना चालू कर दिए। सत्संग आज से शुरू।

34:26ऐसा करके सत्संग में आना शुरू कर दिए। लेकिन वहाँ भी एक problem है।

34:31छता ते सत्संग पण वो सत्संग भी। ते सत्संग पण वो सत्संग भी फायदा

34:36नहीं होता है सत्संग में

34:37जाने के बाद भी। आत्महित के लिए

34:38सत्संग करना है और सत्संग किया तो भी

34:40फायदा नहीं हुआ ऐसा भी बनता है। क्या कारण? ते

34:44सत्संग पण जे जीव लौकिक भाव ती अवकाश देतो नथी तेने प्राय निष्फळ जाय छे।

34:51आत्मकल्याण भी करना है। संसार के

34:55जो हमारे जो उदय प्रसंग है उसको भी संभाल रखना है। घर में भी

34:58ध्यान देना है धंधे में भी ध्यान देना है। करना है धंधे में भी ध्यान देना है

35:02व्यवहार में भी बराबर चलना है और आत्मकल्याण भी करना है

35:06सब हो सकता है 24 घंटा है हमारे पास

35:09सुबह का 1 घंटा शाम का 1 घंटा सत्संग के लिए रख लो 2 घंटा 8-10 घंटे दुकान के लिए रख

35:15लो 2-4 घंटा शरीर के लिए रख लो

35:18सब होता है ना नहीं होता

35:21है क्या थोड़ा इधर ध्यान दे थोड़ा इधर

35:23bowling भी करना आता है fielding करना भी आता है catch पकड़ना भी आता है

35:27और batting करना भी आता

35:28है और wicket keeping भी आता है सब। भी आता है और

35:32wicket keeping भी आता है सब आता है क्या होगा कैसे होगा ये कार्य

35:36होने का संभव ही नहीं है ऐसा नहीं हो सकता है लौकिक भावना

35:40बिल्कुल खत्म हुई तो सत्संग एकदम फलवान हो जाएगा

35:44इतना ज्यादा सत्संग करने की जरूरत नहीं पड़ती है

35:48सत्संग करते जाएं करते जाएं करते जाएं result अभी तक नहीं निकला है जरूर

35:53हमारे में कमी रह गई क्या कमी रह गई हम सत्संग तो बहुत किया।

35:59सही समझा भी, बुद्धि में बैठ भी गया, लेकिन हमने

36:02अभी तक लौकिक भाव को नहीं छोड़ा है। यही वजह

36:05है कि हमको 6 महीना क्या, 6 साल तक भी सत्संग करते हुए भी फायदा नहीं हो रहा

36:11है। 6 जन्मों में भी नहीं होगा। क्यों नहीं होगा?

36:15लौकिक भाव को नहीं छोड़ा, अभी भी आग्रह कितने

36:17पड़े हैं। ऐसा नहीं करना है, ऐसा करना है।

36:20फिर हमारे जो action reaction, ये खाना है, ये नहीं

36:23खाना है। Reaction reaction ये खाना है ये नहीं खाना है।

36:26यहाँ जाना है यहाँ नहीं जाना है।

36:28यहाँ अच्छा लगता है यहाँ अच्छा नहीं लगता है कितने अंदर में प्रपंच पड़े हैं।

36:32हम free नहीं हैं। हमने surrender नहीं किया है वातावरण के

36:35साथ। समझौता नहीं किया उदय के साथ।

36:38उदय आता है तो घबराकर करके fight करने लग जाते हैं अनाप-शनाप कुछ भी जो

36:41भी उपाय आता है कर लेते हैं। सर दुखा तो सर फौरन anesthesia ले लेते हैं

36:46doctor के पास दौड़े जाते हैं।

36:48तब आत्मा याद नहीं आता है आता है याद? कि सर तो ये

36:51दुखा है तो आत्मा को तो ज्ञान होता है।

36:54भले हम उपाय करो लेकिन साथ में ये भाव चलता है कि मैं शरीर से भिन्न

36:59हूँ। वो तो उस time में याद ही नहीं आता इतना दर्द था। कौन भागे ये किया वो किया।

37:04उस time में आत्मा याद नहीं आता doctor आ जाता है। ये लौकिक भाव।

37:08लौकिक भाव भी कहीं गए तो अपना taste का खाना नहीं मिला। परेशान।

37:13ये तो चाहिए ही चाहिए था दाल तो ठंडी नहीं चलेगी गरम ही चाहिए।

37:17मिर्ची कम है नहीं चलेगा मिर्ची चाहिए ये सब कितना क्या क्या हो

37:20गया है ये। क्या क्या हो गया है? आत्मकल्याण के करने वाले के एसे लक्षण तो

37:24नहीं होते है. ए करना है,

37:26ए नहीं करना है, एसा होना है,

37:28एसा नहीं होते है. सारे लौकिक भाव है. तो

37:31फिर एसे लौकिक भाव भी है, हम सत्संग भी करते जावे

37:34और... वी कैसे सफळ होगा? नहीं होगा. सफळ होने का कोई chance नहीं होता है. कितना भी

37:39करे नहीं होता है. सत्संग सिवाय आत्महित माटे बीजुं कोई बढवानुं निमित्त नथी. छता ते
00:37:44.1000 --> 00:37:46.915
सत्संग पर जे जीव लौकिक भावथी

37:47अवकाश देतो नथी... होती अवकाश देतो नथी. तेने प्राय निष्फळता छे. इसको सफल नहीं होता

37:52है सत्संग बेकार हो जाता

37:53है. इसले सत्संग करने वाले को सबसे

37:56पहेले क्यां बताया गया? के भैया तुं अपने भावो का अवलोकन कर. तु कहा

38:00खडा है तुजे लोक आत्मा

38:02की कल्याण करने की भावना है के

38:04संसार को बढाने की भावना है? तुजे क्यां

38:07है अंदर में क्यां चल रहा है? उसका देखना चालु कर दे. देखेगा तो लौकिक भाव खतम होगा

38:13नहीं देखेगा. एसा ही सत्संग में

38:15आ जायेगा जाग... ऐसे ही सत्संग में आ

38:17जाएगा, जागृति में नहीं रहेगा तो लौकिक भाव बढ़ जाएंगे।

38:20कुछ सत्संग सफल होने वाला नहीं है।

38:22अवलोकन करेगा तो जागृति आएगी तो अपना अच्छा बुरा वो पहचानेगा। दोष के प्रति अब सहज में

38:29दुर्लक्ष होगा। उपेक्षा हो जाएगा, दर्द होगा। अपने आप आत्मक गुण का विकसित होता है,

38:35सत्संग सफल होता है। जितना दोष कम होता है वहां, उतना गुण प्रकट होता है और वो गुण

38:41सत्संग को सफल करने में फायदा होता है।

38:43सत्संग निमित्त है। कार्य अपने गुणों... सीमित है। कार्य अपने गुणों से होने वाला है।

38:47गुणों की वृद्धि होगी, दोषों की कमी होगी, तो हम आगे बढ़ेंगे।

38:51नहीं तो हम आगे नहीं बढ़ेंगे। आकी का

38:58जो पोषण है आधा फल ले लेंगे। सुख धाम अनंत

39:03सुसंत जाही।

39:08दिन रात्रि

39:11रहे

39:12तद ध्यान।

39:14तद ध्यान मही। पर शांति

39:20अनंत सुधा मय जी।

39:26प्रणमु पद ते वरते

39:32जयते।

39:39वरते जयते प्रणमु

39:45पदते वरते जयते।