Avlokan Discourses of Shri Devchand bhai Shah The book Search Photographs About

Shrimad Rajchandra Vachanamrut

8 November 2000 · sitting 1 of 2 · Patrank 321, 608, 526 · 58 minutes

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Recitations restored to their canonical wording: Mangalacharan — Mangalam Bhagavan Viro, Mangalacharan — Sarva Mangala Mangalyam, Namokar mantra, Omkar bindu sainyuktam, Samaysar mangalacharan.

0:00श्रीमद् राजचंद्र

0:02पत्रांक 321 और 608 तारीख

0:088-11-2000 श्री देवचंद्र भाई।

0:13णमो अरिहंताणं णमो सिद्धाणं णमो आयरियाणं णमो उवज्झायाणं

0:20णमो लोए सव्व साहूणं नमः समयसाराय

0:25स्वानुभूत्या चकासते । चित्स्वभावाय भावाय

0:31सर्वभावान्तरच्छिदे मंगलं भगवान वीरो,

0:36मंगलं गौतमो गणी। मंगलं कुन्दकुन्दार्यो,

0:41जैनधर्मोऽस्तु मंगलम्॥ सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं

0:47सर्वकल्याणकारकम। प्रधानं सर्वधर्माणां

0:52जैनं जयति शासनम॥ ॐकारबिन्दुसंयुक्तं

0:57नित्यं ध्यायन्ति योगिनः। कामदं मोक्षदं चैव ॐकाराय नमो नमः राजचंद्र वचनामृत

1:00पत्रांक 335. भमेशथी खंभात तमारा

1:02Lalchand bank-मां पत्र

1:05लखाया. अत्यंत उदास

1:10परिणामे वेदो एवुं जे

1:15चैतन्य छे चैतन्य

1:20मने आपणा स्वभाव. चैतन्य

1:24माने अपना स्वभाव मूल तत्व

1:28है अपरिणामी तत्व है शाश्वत तत्व है। इसका स्वभाव ऐसा है

1:33कि वो अत्यंत उदास परिणाम में रहता है हमेशा। अनुकूलता के वक्त

1:40जो हर्षित होता है वो चैतन्य नहीं है। तो प्रतिकूलता के वक्त

1:47जो अपने आप को शोक मग्न हो जाता है

1:49वो चैतन्य नहीं है वो चैतन्य का स्वभाव नहीं है। जैसे जीव है। जैसे

1:53जीभ है। तो जीभ हमेशा लुखी रहती है।

1:57लुखी रहती है माने क्या उसका स्वभाव ही ऐसा है।

2:00कोई भी स्वाद वहां टिकता नहीं है। एक गले के नीचे उतरा के स्वाद गया। मुंह में रहे

2:07तब तक ही स्वाद जैसा गले के तरफ गया के खत्म।

2:12वापिस कोरी की कोरी ऐसा ही चैतन्य का स्वभाव ही कोना का खोला है।

2:17मतलब राग द्वेष चैतन्य नहीं करता है। हर... हर परिस्थिति के अंदर राग द्वेष

2:23दूसरा कोई करता है चैतन्य नहीं करता है। अत्यंत उदास परिणाम में रहलू एहु जे चैतन्य है

2:30जो अपना मूल स्वभाव। पवितराग है। राग द्वेष करने का उसका स्वभाव नहीं है।

2:37वो हमेशा उदास परिणाम में रहता है उदास परिणाम में माने क्या?

2:42उदास सुख की सहेली है अकेली उदासीनता उदासीनता का मतलब क्या?

2:47करना है ऐसा वो भी नहीं। ऐसा नहीं करना है वो भी नहीं।

2:52राग भी नहीं द्वेष भी नहीं। नहीं करना है वो द्वेष हो गया, करना है वो राग हो गया।

2:57कोई भी कार्य। दोनों से पार, totally balance के अंदर।

3:02जैसी घटना घटे, जैसे संयोग आए, वियोग हो गया, सब में एक शरीर का रहता है।

3:08राग द्वेष रहित। उदासी उदासी उदासी

3:11उदासी उदासी उदासी। विपायमान नहीं होता है,

3:16mix नहीं होता है।

3:19अत्यंत उदास परिणाम में ऐनू ऐवु जे चैतन्य मूल स्वभाव है तो स्वभाव का

3:23एक जैसा एक शाश्वत उसका स्वभाव है वैसा परिणमन भी उसका स्वभाव है।

3:30हमेशा रहने का जो स्वभाव है वैसा उसका परिणमन भी स्वभाव दोनों भौतिक दोनों परिणाम

3:37एक साथ में उसमें है। चैतन्य शाश्वत भी रहता है।

3:42कभी भी उसका नाश नहीं होता है।

3:45लेकिन... होता है। लेकिन हमेशा work करते रहता है कुछ ना कुछ।

3:49उसके परिणाम आते रहते हैं।

3:51समुंदर शाश्वत भी है और उसकी तरंगे भी आती रहती हैं, उछलता भी है।

3:55स्थिर भी है, उछलता भी है। ऐसे मूल स्वभाव उदास है।

4:01उस लेपायमान निर्लेप। उसको संयोगों की, क्षेत्रों की,

4:08समय की कोई असर नहीं होती है।

4:11असल बिना का है, उदास उदास उदास। असल बिना का है उदास हर हालत में उदास उदास है।

4:17ऐसा जो चैतन्य है, ऐसे चैतन्य को ज्ञानी प्रवृत्ति में भी ऐसा ही रखते हैं।

4:24प्रवृत्ति में तो राग द्वेष हो ही जाते हैं। उपयोग बाहर गया,

4:28फिर राग द्वेष चालू हो जाते

4:33हैं। थोड़ा भी उपयोग यहाँ से चैतन्य से हटा सुदा से तो राग द्वेष चालू,

4:36अच्छा बुरा चालू। ऐसा होने

4:38पर भी ज्ञानी क्या करते हैं? चाहे जैसी

4:40प्रवृत्ति... चाहे जैसी प्रवृत्ति हो बाहर में। तो अंदर का चैतन्य को

4:47उदास ही रखते हैं। अंदर से अभिप्राय से लेपायमान नहीं होते हैं।

4:52ज्ञानी ज्ञानी का स्वभाव चाहे अज्ञानी का स्वभाव वो तो

4:56ऐसा लुक्का का लुक्का ही है खोरा का खोरा ही

4:59है। यानी अज्ञानी का स्वभाव खराब है ज्ञानी का अच्छा है ऐसा नहीं है कुछ।

5:04जीव मात्रा का स्वभाव लुक्का उदास वितराग है। अज्ञानी।

5:09अज्ञानी का जीव भी राग द्वेष नहीं करता है स्वभाव में।

5:15ज्ञानी का जीव भी स्वभाव से राग द्वेष नहीं करता है। अब फर्क कहाँ आता है?

5:21अब फर्क जो है प्रवृत्ति में

5:23है। अज्ञानी का स्वभाव राग द्वेष रहित होने पर भी उदास होने पर भी जब प्रवृत्ति

5:27में आता है तो अभिप्राय पूर्वक राग द्वेष करता है।

5:32और ज्ञानी पुरुषात पूर्वक चैतन्य की दृष्टि पूर्वक। चैतन्य

5:37की दृष्टिपूर्वक। चाय जैसी प्रवृत्ति हो।

5:41प्रवृत्ति में mix नहीं होते हैं। शोक का प्रसंग हो, तो शोक नहीं करते हैं।

5:48हंसी खुशी का प्रसंग हो, हंसी खुशी नहीं, अभिप्राय पूर्वक। अभिप्राय,

5:53फिर वापिस अभिप्राय में नहीं होने पर भी, मतलब भाव में नहीं होने पर भी,

5:58action में हो सकते हैं वापिस।

6:00खाने पीते हैं,

6:02दवा लेते हुए, मजाक करते हुए, वो सब हो सकता है वापिस। वो सब हो

6:06सकता है वापस। लेकिन ये जो

6:07कुछ भी होता है वो तो action है, वो तो शरीर की क्रिया है।

6:10जैसे भगवान के मंदिर में गए तो हाथ जोड़े,

6:13प्रदक्षिणा दी। तो शरीर भी ज्ञानी का काम करता है, तो ये सब किसकी क्रिया है?

6:20ज्ञानी के शरीर की क्रिया है, आत्मा जो है वो ज्ञानी की नहीं है।

6:24पूजा करने का जो भाव है वो भी ज्ञानी नहीं करता है।

6:27पूजा करते वक्त भी उसको पूजा करने का भाव नहीं है, अभिप्राय पूर्वक,

6:32आचरण पूर्वक है वापस। आचरण पूर्वक है office। तो अभिप्राय को

6:35और आचरण को दोनों को अलग-अलग कर देना है।

6:38तो आपको मालूम पड़ जाएगा कि जाने की प्रवृत्ति कैसी होती है।

6:42अत्यंत उदास परिणाम में रहेलू एहु जे चैतन्य तेने

6:46ज्ञानी प्रवृत्ति में रचपच हुआ छता एहु ने एहु ज राखे था। निर्लेप ज राखे था।

6:54अपनी निर्लेपता को बना के रखते हैं, अपनी उदासीनता को intact रखते हैं।

6:59विचलित नहीं होते हैं। तो पण कई ऐसी हैं,

7:03फिर भी हम कहते हैं। यानी ऐसा सजग है, पुरुषार्थवंत है।

7:09प्रवृत्ति में भी वो निर्लेपी रहते हैं, फिर भी हम ऐसा कहते हैं।

7:14कि माया बहुत खतरनाक है, दुस्तर है। दुरंत है।

7:19दुस्तर और दुरंत दो शब्द डाल लिया। ये जीव के

7:25जैसा स्वभाव है, वैसा अवस्था नहीं है जीव की,

7:28संसार अवस्था के अंदर। Even ज्ञानी की भी। जैसा अंदर में स्वभाव है

7:34वैसा बाहर में परिणमन तो नहीं है। स्वभाव तो पूर्ण वितराग है।

7:38लेकिन ज्ञानी की अवस्था देखें तो

7:40आंशिक वितराग है, पूर्ण वितराग नहीं है, राग द्वेष उनको भी होते हैं।

7:44ये जो स्वभाव का और परिणमन का जो मेलजोल नहीं है।

7:49अंदर एक बाहर एक। अंदर एक बाहर एक उसको कहते हैं माया।

7:55क्रोध, मान, माया, लोभ। माया लोभ। मुख में राम बगल में छुरी नहीं कहते हैं।

8:00उसका नाम माया। जैसा दिखता है वैसा है नहीं और है

8:04ऐसा दिखता नहीं है। ये माया के परिणाम हैं।

8:10गुप्त रहता है। हकीकत गुप्त रहती है। और बाहर जो दिखाई देता है वो...

8:17तो जैसा स्वभाव है वैसा ही उनका अभिप्राय बन चुका है ज्ञानी पुरुष।

8:23प्रवृत्ति में रहने से... देने से। वो हर्षित हो जाते हैं।

8:28शोक मग्न हो जाते हैं ऐसा नहीं है।

8:31चिंतित हो जाते हैं, भयवान हो जाते हैं, तकलीफ में आ जाते हैं ऐसा नहीं है।

8:36क्योंकि फुर्सत से ज्ञानी अपने को संभालते रहते हैं। और अवस्था में

8:42भी निर्लेप रहने की कोशिश रहती है।

8:45होवे नहीं होवे दूसरी बात है, अभिप्राय में निर्लेपता है।

8:49भिन्नता है, भिन्नता माने touch भी नहीं करते हैं किसी भाव को।

8:53अलग-अलग... करते हैं कुछ

8:56भाव अलग-अलग रहते हैं बिल्कुल। झमेले में

9:00भी अपने को अलग रखते

9:02हैं। फिर भी कृपाल देव का कहना है सावधान करने के लिए कि भैया माया का

9:06भरोसा नहीं करना। माया दुस्तर है।

9:08माया रूपी समुंदर ऐसा है कि उसे चीर नहीं सकते।

9:13चीर नहीं सकते ऐसा नहीं दुस्तर है माने क्या कठिनता से चीरा जा सकता है।

9:18चीरना असंभव है ऐसा नहीं दुस्तर। ऐसा नहीं,

9:22दुस्तर। बहुत बहुत मुश्किल से पार सकोगे

9:24माया के समुंदर से। कोई easy बात नहीं है कि जैसा अंदर में स्वभाव हो,

9:29वैसा का वैसा बाहर में भी

9:31वितरागता पूर्ण हो, ये कोई easy बात नहीं है। ज्ञान दशा होने के

9:35बाद अभिप्राय में भले ही नहीं हो,

9:38लेकिन परिणाम भी... जैसा अंदर में स्वभाव है वैसा ही होना, ये कोई easy बात नहीं है।

9:46माया दुस्तर है। माया का समुंदर ऐसा है... माया का समुंदर ऐसा है

9:50कि बहुत परिश्रम करने के बाद ही तीर्थ सकोगे।

9:53ऐसा easily वो तैरना संभव नहीं है ज्ञानी को भी।

9:57दूसरी एक बात किलियां दुरंत हैं। माया का

10:03जो विस्तार इतना बड़ा है, इतना बड़ा विस्तार है।

10:07कि जैसा कि उसका अंत नहीं आएगा ऐसा लगे अपने को लेकिन अंत आता है।

10:14लेकिन बहुत

10:15बहुत चलने के बाद

10:16बहुत परिश्रम बहुत। चलने के बाद बहुत परिश्रम बहुत गति पुरुषार्थ करने के

10:19बाद ही उसका अंत आता है।

10:21स्वभाव का और परिणमन का जो भेद है। जो difference है।

10:27ये दुरंत है दुरंत माने क्या बहुत देर के

10:29बाद बहुत परिश्रम उठाने के बाद उसका अंत आता है।

10:34तब जाकर के वो दोनों का मेल होता है जैसा स्वभाव वैसा परिणमन।

10:39सिद्ध भगवान को जैसा स्वभाव वैसा परिणमन है।

10:42हरिहर भगवान को जैसा स्वभाव वैसा परिणमन है। ऐसा परिणमन है इसके नीचे के जो

10:46ज्ञानी पुरुष हैं साधना करने वाले आचार्य देव मुनिराज उपाध्याय साधु

10:53या श्रावक या चौथे गुणस्थान भरती सम्यक दृष्टि

11:06उसको बहुत मुश्किल से

11:09माया का समुंदर तैरना पड़ता है तैर तो लेंगे वो। फिर तो लेंगे वो।

11:14लेकिन बहुत दूर बहुत दूर। बहुत चलने के बाद आवे ऐसी मंजिल है वो।

11:20ज्ञान दशा से परमात्मा बनने में कोई निश्चित निश्चित time limit नहीं है।

11:26अज्ञान दशा से ज्ञान दशा में आने के लिए time limit है।

11:33अगर जीव सही प्रयत्न करे, ज्ञानी की आज्ञा अनुसार चले,

11:38थोड़ी भी गलती ना करे तो 6 महीने में हो जाए। में हो जाए तो आसान है

11:46लेकिन ज्ञान दशा आने के बाद जैसा स्वभाव हमने अपने

11:51ज्ञान में अनुभव किया है जैसा स्वभाव परमात्मा का हमने अनुभव किया है

11:58वैसा ही

12:00पूर्ण उदास पूर्ण वितराग हमारी अवस्था भी

12:03हो जाए अवस्था में भी अंत मात्र भी राग द्वेष ना होवे मन में अंत मात्र भी

12:06राग द्वेष के विकल्प। मन में

12:08अंत मात्रा में राग द्वेष के विकल्प नहीं आवे।

12:12उसके लिए तो कोई time limit नहीं है, किसी को तो उसी भाव में हो जाए।

12:16और किसी को बहुत लंबे 8 10 भाव 15 भाव में बाद में होवे।

12:21कोई कोई उपसम ज्ञानी होता है तो अगर प्रमाद करे, जागृति में ना रहे तो गिर भी जावे।

12:26तो फिर बहुत सारे भाव भी करना पड़े। मुक्ति निश्चित है। लेकिन time limit निश्चित

12:33है। कब मुक्ति होगी अब, कब परमात्मा बनेगा,

12:35क्योंकि माया दुस्तर है। कारण के माया दुस्तर छे, माया दुरंत छे.

12:41क्षणवार पण, समय एक पण,

12:44एने आत्माने विशे स्थापन करवा योग्य

12:49नथी. मतलब क्या? एक समय मात्र भी let go

12:54करने योग्य नहीं है. ज्ञानी को ज्यादातर खेद होता है. तो खेद किस

12:59प्रकार का होता है? ज्यादा

13:01पुरुषार्थ करते है तो खेद बढता

13:03है. फुर्सत करते हैं तो खेत बढ़ता है।

13:07फुर्सत ज्यादा करते हैं तो खेत भी बढ़ता है।

13:10फुर्सत ज्यादा करते हैं मतलब क्या जागृति बढ़ती है। जागृति जितना बढ़ती है,

13:17उतना खेत भी बढ़ता है क्यों? क्योंकि परिणाम

13:19तो जैसा स्वभाव है वैसा तो नहीं है। तो खेत बढ़ते जाता है।

13:24बस तो ज्ञानी safe हो जाता है। देखो ये safety का कारण क्या है?

13:30Safety का कारण क्या है? जागृति। जागृति का... जागृति। जागृति के कारण अपने

13:34जैसा स्वभाव है ऐसा परिणमन नहीं है।

13:36परिणमन उल्टे हैं बिल्कुल।

13:39अंदर में उदासीनता है लेकिन बाहर में वैसी उदासीनता नहीं है।

13:42बाहर में involve हो जाते हैं हर बात बात में। fix हो जाते हैं।

13:48ये जो difference है। ये जो मायापना है माया। कपटीपना अंदर एक बाहर एक ऐसा जो है।

13:57इसका ज्ञानी को बहुत दुख लगता है। वो दुख कब लगता है? जब जागृति... तो दुख कब लगता है

14:01जब जागृति बढ़ती है मतलब फुर्सत बढ़ता है। तो ऐसे परिणाम को देख कर के

14:07झिझलाहट आ जाती है। परिणाम control के बाहर हो जाता है।

14:13क्षणवारपण समय एकपण एने आत्माने विषे स्थापन करवा योग्य नथी।

14:19कि नहीं अभी हम तो 4थे गुणस्थान में हैं

14:21तो हमारे तो ऐसे परिणाम होंगे ही। नहीं ऐसा करने योग्य नहीं है।

14:28हमारी मजबूरी है। अभी हमारी कमजोरी है।

14:32हमारे में अभी इतना चरित्र गुण develop नहीं हुआ है, स्थिरता की कमी है।

14:37इसीलिए हमारा से उपयोग जैसा स्वभाव है वैसा उपयोग नहीं रहता है।

14:41ऐसे परिणाम नहीं रहता है। हमको माफ़ करो। हमको excuse करो। नहीं

14:48है। क्षणवार भी, एक समय मात्र भी,

14:52इसे आत्मा ने विषय स्थापन करना योग्य नहीं है। ऐसी अपनी कमजोरी... ऐसी अपनी कमजोरी को

14:59स्थान देने योग्य नहीं है आत्मा में। Let go

15:03करने योग्य नहीं है, दुर्लक्ष करने योग्य नहीं है।

15:07दुर्लक्ष नहीं करेगा उसको गलती को गलती मानेगा, उसका खेद होगा। तो safety हो जाएगी।

15:15अगर ये नहीं हुआ खेद। तो इसका मतलब साफ है। कि जीव के

15:21स्वभाव के अनुकूल परिणाम नहीं होने पर भी। ज्ञानी पुरुष। ज्ञानी पुरुष को अगर

15:26खेद नहीं होता है तो

15:28जागृति में कमी है। जागृति नहीं है, अवलोकन नहीं है।

15:33मतलब पुरुषार्थ नहीं है। पुरुषार्थ वाले ज्ञानी पुरुष को

15:37तो निरंतर खेद रहता है और वो खेद उदासीनता में वृद्धि करता है।

15:41ये खेद उसको संसार के प्रसंगों से जुड़ने से बचाता है।

15:47ज्ञानी पुरुष का जो ज्ञान होता है आचार्य,

15:51जो होता है, वो तो यही होता है कि बेटा मैं भी

15:54आत्मा हूँ। मैं ही आत्मा हूँ। गाड़ी से अलग हो जाता है

15:57क्या वो? गाड़ी petrol दीजिए मैं तो नहीं देता हूँ गाड़ी। उस तरह से अलग ही

16:02रहता है उनका तो कार्य। नहीं वो स्थिरता का पुरुषार्थ,

16:06द्रव्य दृष्टि का पुरुषार्थ। ये भी पुरुषार्थ है।

16:09सबसे पहले वो वही try करेगा। द्रव्य दृष्टि वाला पुरुषार्थ।

16:14जो परिणाम में जैसा होना है वो मैं तो ध्रुव परमात्मा हूँ।

16:18उसकी दृष्टि छोड़ता नहीं हूँ। तो ही वो सुखी रहता है।

16:23क्योंकि खेत इतना बढ़ गया है कि अब वो खेत को

16:25neutral करने के लिए वैसा दृष्टि में आना ही पड़ता है उसको। तो

16:31द्रव्य दृष्टि का पुरुषार्थ बोलते हैं इसको। लेकिन अगर उसमें नहीं रह सकता है तो फिर

16:36क्या? तो फिर जागृति वाला पुरुषार्थ रहता

16:38है। और जागृति वाला तो पुरुषार्थ है।

16:41ये बहुत तकलीफदाई है तकलीफदाई क्यों है?

16:44कि जैसा हमारा स्वभाव हमने अनुभव किया है

16:46पूर्ण निर्दोष, पूर्ण वितराग, संपूर्ण... पूर्ण वितराग

16:49संपूर्ण तत्व

16:51अंश मात्र भी मलिनता नहीं। ऐसा स्वभाव होने पर भी परिणाम ऐसे नहीं है।

16:58और उस परिणाम का ज्ञानी को बहुत खेद होता है।

17:02जैसे-जैसे ज्ञान की दशा बढ़ते जाएगी। चौथे गुणस्थान में आया। तो

17:08वो प्रमादी बहुत होता है लेकिन पुरुषार्थ करने लगेगा तो

17:11अशुभ भावों के ऊपर उसको बहुत खेद हो जाएगा क्योंकि जागृति बढ़ गई अब।

17:15फिर आगे क्या होगा?

17:18जागृति बढ़ने से, अशुभाव में खेत बढ़ने से, वो खेत limit के बाहर जाता है।

17:23तो क्या होता है? तो अंदर में स्थिरता बढ़ती है क्योंकि ये जो

17:28राजीपा नहीं है, अपने परिणाम के साथ वो राजी नहीं है। तो उसको वो परिणाम के

17:35गलती को मिटाने के लिए उसके पास एक ही इलाज है, कौन सा है?

17:38द्रव्य दृष्टि वाला, स्वभाव को

17:40देखना। दूसरा तो हाथ पैर मारेगा नहीं।

17:42ज्ञानी दूसरा उपाय तो करेगा नहीं, यही उपाय करेगा। नहीं

17:43दूसरा उपाय तो करेगा नहीं यही उपाय करेगा।

17:46कि अपने स्वभाव को देखेगा, परिणाम को दुर्लक्ष कर देगा।

17:49तो स्थिरता बढ़ेगी। बाहर हटते ही दुख होता है और अंदर जाते ही सुख हो जाता है।

17:56ऐसी चाल चलता है। ऐसा अंदर में स्थिरता बढ़ती है। तो पहले तो अशुभ भाव बुरे लगते थे।

18:03लेकिन अंदर में स्थिरता बढ़ती है।

18:05तो फिर अब शुभ भाव भी बुरे लगने लगेंगे। वो उतना भी बाहर नहीं जाना है। देखो।

18:12क्योंकि वो भी तो विभाव भाव है। जैसे अशुभ भाव पाप के भाव बंध का कारण है।

18:18ऐसे शुभ भाव आत्मचिंतन हो, स्वाध्याय हो,

18:22पूजा भक्ति हो, ये सब भी। द्रव्य दृष्टि की स्थिरता बढ़ती है जिसको

18:27उसको वो भी दुखदाई लगता है।

18:29क्योंकि उसमें time waste होता है उसका। Time waste तो होवे ही होवे ऊपर से

18:33बंधन होता है।

18:36उस बंधन के कारण स्वर्गादि में बहुत लंबा लंबा आयुष्य मिलता है

18:39वहां वहां भटकना पड़ता है। वहाँ पटकना पड़ता है

18:42जो ज्ञानी को मंजूर नहीं है तो

18:46उसमें भी उसको बहुत दर्द होने लगता है तो ऐसे साधना का स्तर और बढ़ जाता है

18:52और आगे बढ़ता है तब जाकर के क्या होता है मुनि अवस्था आ जाती है जिसमें

18:59साधना बहुत अच्छी चलती

19:02है शुभ भाव तो उस time में रहते ही नहीं हैं शुभ भाव रहते

19:04हैं कभी-कभी लेकिन वो भी सुहाते

19:07नहीं हैं वापस चले आते हैं अंदर झुला झुलते हैं। वापस चले आते हैं अंदर, झुला

19:09झूलते हैं। श्रावक में अभी उतनी स्थिरता नहीं है।

19:13क्योंकि इतना शुभ भाव के प्रति इतना तीव्र अनादर होना चाहिए,

19:17तीव्र दुख लगना चाहिए, ऐसा श्रावक को नहीं लगता है।

19:21ज्ञानी को तो शुभ भाव में मजा आता है, शुभ भाव में मजा आने का मतलब क्या?

19:25तो उसको अशुभ भाव और शुभ भाव है तो पहले किसको तकलीफदायक समझेगा?

19:31अशुभ भाव को तकलीफदायक समझेगा। सत्संग में मजा आएगी, भक्ति में मजा आएगी। आदरियों के

19:34साथ रहने में मजा आती है।

19:35क्योंकि... साथ रहने में मज़ा आती है

19:37क्योंकि इतनी साधना में कमज़ोरी है। साधना बढ़ेगी तो फिर वो भी सब ख़त्म गायब।

19:41अशुभ भाव में तीव्र खेद, शुभ भाव में भी दुर्लभ।

19:45लेकिन फिर भी जितनी साधना अभी अभी आगे नहीं बढ़ी है

19:50तब तक शुभ भाव में खेद नहीं होता है।

19:52फिर बाद में शुभ भाव में भी खेद होना चालू हो जाता है। स्थिरता अंदर में बढ़ेगी।

19:56ये सब क्रमशः पहले अशुभ भाव चलते हैं फिर शुभ भाव और आखा तक ज्ञान दशा

20:02और फिर शुभ भाव भी चलते हैं

20:05और मात्र। स्वभाव भी तलते हैं और मात्र अंदर के अंदर की स्थिरता बढ़ती रहती है।

20:09कि मुनिराज को स्थिरता बढ़ती है तो फिर आगे श्रेणी लगा करके पूर्ण वितराग बनते हैं।

20:14लक्ष्य हमारा पूर्ण वितरागता है। मतलब पूर्ण वितरागता माने क्या?

20:20स्वभाव तो वितराग ही है, पूर्ण वितराग ही है। अवस्था वितराग नहीं है। तो

20:26ज्ञानी है उसको शांति नहीं चाहिए अब, सुख नहीं चाहिए अब। इधर कहीं लिखा है, इधर

20:33लिखा है। 324 में एक line है, सम्यक दर्शन का मुख्य लक्षण वितरागता

20:39जानते हैं, वैसा अनुभव है।

20:42सम्यक दर्शन का मुख्य लक्षण वितरागता है, वितरागता माने क्या करना

20:46नहीं करना ऐसे अभिप्राय से हट जाना।

20:49मात्र ज्ञाता दृष्टा धम्म, तो सम्यक दर्शन हो जाएगा।

20:52ऐसा Prabhupada का अनुभव भी है और वितरागता इसका सम्यक दर्शन का मुख्य मुख्य लक्षण है।

20:58सम्यक दर्शन हुआ कैसे मालूम पड़ेगा?

21:00कि अभिप्राय पूर्वक के... कि अभिप्राय पूर्वक के उसके कोई भी राग द्वेष नहीं

21:04होंगे तो सम्यक दृष्टि हो

21:05गया। आचरण में फिर भी है।

21:08अभिप्राय पूर्वक के नहीं है राग द्वेष तो समझना कि वो उस सम्यक दर्शन उसको हो गया है।

21:13जैसे मीठापन है वो शक्कर का लक्षण है, खारापन है वो नमक का लक्षण है।

21:18ऐसे वितरागता उत्पन्न हो गई, परिणाम में वितरागता आई, अभिप्राय में।

21:23समझ लेना हम ज्ञान दशा में आ गए।

21:26तो बहुत अपूर्व दशा होती है। तो ज्ञानी को... तो ज्ञानी को अब सुख नहीं चाहिए।

21:31सुख तो मिल ही गया है। तिजोरी भरी है उसका बांध तो है। वितरागता चाहिए।

21:36क्योंकि ऐसी वितरागता जैसे स्वभाव में पड़ी है ऐसी अवस्था में नहीं है।

21:41वो वितरागता का पुरजोर करता है। कि हर प्रसंग में मैं neutral क्यों नहीं रह सकता हूँ?

21:47राग द्वेष रहित क्यों नहीं रहता हूँ?

21:50क्यों involve हो जाता हूँ? नहीं चाहते हो भी क्यों involve होता हूँ?

21:53ऐसे अपने परिणाम को देखता है तो बहुत तकलीफ हो जाती है। दुखी हो जाता है।

21:58दुख महसूस करता है। फिर दुख किस बात का है कि हमारी साधना उतनी उत्कृष्ट नहीं है।

22:03हम बार-बार फंस जाते हैं, इसलिए दुख होता है। तो क्या कहते हैं, अत्यंत उदास

22:10परिणाम में रहा हुआ चैतन्य।

22:13उसे ज्ञानी प्रवृत्ति होने पर भी वैसा का वैसा

22:15intact उदासीन उदासीन उदासीन ही रखता है।

22:19फिर भी कहते हैं। कि माया दुस्तर छे दुरंत छे। ये द्रव्य। ए द्रव्य

22:25स्वभाव और द्रव्य परिणामन उसका जो भेद है

22:29बहुत मुश्किल से बहुत लंबे समय के बाद मिटता है

22:32एकदम easily नहीं मिटता है कितना ही पुरसाध करो।

22:36क्षण भर पर समय एक पर एने आत्माने विषय स्थापन करवा योग्य नथी

22:41के हमारी भूमिका में ऐसा ही होता है करके उसको easily लेने की जरूरत नहीं है।

22:46निरंतर जागृत रहो। एवी तीव्र दशा आवे थी इतनी तीव्र दशा हो जाएगी।

22:54और जागृति निरंतर रहती है और जो difference है परिणाम का और द्रव्य का वो खटकता है।

23:00जितना ज्यादा खटकता है, उतनी दशा तीव्र होती है। ऊंची ऊंची level की होती है।

23:09हेवी तीव्र दशा आवै अत्यंत उदास परिणाम उत्पन्न थाए छै। देख।

23:17सत्संग में आने के बाद। नहीं अपना जागृति में अपना अवलोकन से ही मालूम पड़ता है।

23:22जागृति में अपने अवलोकन से ही मालूम पड़ता है। ज्ञानी हो गया तो

23:25महिमा तो है ही। ज्ञानी की बात है।

23:28ज्ञानी को तो आत्मा का अनुभव है ही है। और पुरुषार्थ नहीं करता है,

23:32अवलोकन ज्यादा नहीं करता है, प्रमाद करता है तो आगे नहीं बढ़ता है।

23:36तो difference जो है द्रव्य स्वभाव का और परिणाम का उसको खटकता नहीं है।

23:41जागृति का पुरुषार्थ करेगा इसलिए तो कहा। कि

23:45ज्ञानी ऐसी ही प्रवृत्ति करते हैं फिर भी माया दुरंत है

23:48दुस्तर है। तुरंत है दुस्तर है। इसीलिए ज्ञानी को कहते हैं कि क्षण भर भी समय

23:53एक भी ऐसे difference को ऐसी माया को

23:57आत्मा में स्थान देने योग्य नहीं है उसको दूर से ही नमस्कार करना है get

24:00out करना है। तो कहने का मतलब समझ में इस तरह से आ रहा है कि

24:05जो अपनी अवस्था है शरीर आदि

24:07की उस अवस्था को हम अपने को

24:09किसी भी क्षण भी उसको accept नहीं करना है।

24:13वही है ना? हाँ इसके अलावा जो अभी भी आचरण में जो राग द्वेष होते हैं involvement

24:17होता है बाद में। राग

24:17दोष होते हैं involvement होता है बाद में। ऐसी जो हमारी कमजोरी है।

24:20उसको भी accept नहीं करना है। Accept नहीं करोगे इसलिए वो नहीं होंगे ऐसी बात नहीं है।

24:26लेकिन इसका रस टूट जाएगा। और आगे बढ़ने के अंदर रस

24:31बाधा रूप है वो हट जाता है तो

24:32आगे बढ़ जाते हैं। जैसे दर्शन में का भ्रांति

24:36का रस था ऐसे चारित्र में का भी रस है एक।

24:40अगर हम उसको accept करते जाते हैं let go करते जाते हैं तो वो रस टूटता

24:43नहीं है। और जागृत... नहीं है।

24:45और जागृति में रह करके अपने आप को खेद अपने आप खेद आता है

24:48अपनी कमजोरी के ऊपर अफसोस होता है।

24:51सहज खेद आता है जागृति के कारण। तो ये चारित्र मोह का जो उदय है

24:56जो कषाय परिणाम होते हैं उसका रस टूटता है। रस टूटे बिना कमजोर होता नहीं है परिणाम।

25:03और परिणाम का नाश नहीं होता है।

25:06पूर्ण वितराग दशा होने के लिए

25:07चारित्र में भी जो क्रोध मान माया लोभ आदि जो भाव होते हैं

25:10वो भी खत्म होना है। अभिप्राय में नहीं है हमारा दोष करना। ऐसा सिर्फ इतना नहीं चलेगा।

25:18परिणाम में भी राग द्वेष नहीं होने चाहिए। तो परमात्मा बनोगे। अवलोकन में। हाँ

25:24अवलोकन में। तो अवलोकन इसलिए है। automatic जो दुख। हम्म। और

25:31दुख लगना अच्छा है। जितनी साधना में जागृति बढ़ेगी उतना दुख बढ़ते जाएगा। नहीं

25:36दुख भी अपन लगा... नहीं लगना नहीं automatic आता

25:39है। natural... Automatic आता है। Natural आते हैं तो ही सही है,

25:43अगर लगा करके दुख करते हैं तो वो तो झूठा हो गया।

25:46वो तो और कपट भाव हो गया। ऐसा नहीं natural आना चाहिए वो।

25:49जितना natural आएगा, जितनी जागृति बढ़ेगी, जितना खेद होता है

25:53उतना आगे बढ़ता है जी। तो क्या होता है, खेद होता है तो क्या होता है?

25:59इतनी जागृति होती है तो क्या होता है? तीव्र दशा हो जाती है।

26:03एवी तीव्र दशा होने से

26:04अत्यंत उदास परिणाम उत्पन्न थाए

26:06चाहे। मतलब neutral अवस्था। मतलब neutral अवस्था, neutral अवस्था। जैसा

26:10स्वभाव neutral है ना,

26:12बस बाद में परिणाम भी कोई पूछेगा तो कैसा है, अच्छा है, बुरा है?

26:18ना अच्छा है ना बुरा है। जहाँ तक हो सके

26:21अपुन involve नहीं होना चाहते हैं कोई

26:23प्रसंग में। अगर कोई दूसरा करता है तो भैया तुम कर लो

26:25ना, जो भी बराबरी है जो भी है।

26:26तू करेगा अच्छा ही करेगा।

26:28भले उससे गलती होती है लेकिन जो करेगा अच्छा ही करेगा। क्यों? इसमें स्वयं बच जाता है।

26:34और स्वयं को बचाने की चेष्टा है। वो कोशिश करता है। नहीं set होता है, हट जाता है।

26:41भई आप कर लो, जैसा आप ठीक समझे, मैं राजी हूँ हर एक में।

26:44आप सही करोगे तो राजी हूँ, गलत करोगे भी तो राजी हूँ। क्यों?

26:49ये जागरूकता है कि अपने परिणाम तो नहीं बिगाड़ना है, चाहे कुछ भी हो जाए। सही हो

26:53चाहे गलत हो, हमारे परिणाम तो हमको नहीं बिगाड़ना है।

26:57आग्रह में तो हमको नहीं रहना है।

26:59ये आग्रह रहते हैं, ऐसा नहीं, ऐसा करो,

27:02वैसा नहीं, यही तकलीफ है बहुत बड़ी। उसमें अपने परिणाम बहुत मलिन होते हैं।

27:06उसमें अपने परिणाम बहुत मलिन

27:07होते हैं उसका बहुत दुख लगता है

27:09तो फिर वो अपने को प्रसंग में से हटा लेता

27:11है। Involve नहीं होगा अगर involve होगा तो बहुत तकलीफ हो जाएगी उसको।

27:14Involve होना नहीं चाहता है। देखना नहीं दाजना नहीं ऐसा हो जाता है।

27:18इसको क्या बोलते हैं? इसको सामने वाला द्वेष गिनेगा।

27:24लेकिन हकीकत में क्या है हकीकत में उदासीनता है।

27:29ये गृहस्थ दशा में भी ऐसा हमारी हालत हो सकती है

27:32ये बात कहते हैं यहाँ पर आगे।

27:33ए वात कहे छे अहींया आगळ. एवी तीव्र दशा आवे अत्यंत उदास परिणाम उत्पन्न

27:39थाय छे. अने एवा उदास

27:41परिणामनी जे प्रवर्तनाम. प्रवृत्ति. ग्रहस्थपणा सहितनी. अभी

27:44कुटुंब परिवार के बीच में रहेता है तो भी एसी

27:49action reaction हो जाता है. परिणाम एसे चलते है जो भी पूछो. कोई जवाब नहीं हा नहीं

27:54हुं नहीं. फिर भी जबबथी पूछो

27:56एसा आपको ठीक लगे बस सब okay

27:58है मेरी तरफ से कोई बाधा नहीं है. मेरी

28:02तरफ से, मेरी तरफ से कोई बाधा नहीं है. ए क्या हो

28:07गया? सरफोडी करना नहीं चाहता है जी, हसना नहीं चाहता है. तीव्र दशा आवे, अत्यंत

28:13उदास परिणाम उत्पन्न थाय छे अंदर से. अने एवा उदास परिणामनी जे प्रवृत्ति,

28:18प्रवर्तना, ग्रस्तपणा सहितनी, ते अबंध

28:20परिणामी कहेवा योग्य छे, आ बंधन में नहीं आता है जी,

28:24safe हो गया. ए जो

28:27involve नहीं होना ए जो कार्य है...

28:30नहीं होना ये जो

28:31कार्य है दूसरों को ऐसा लगता है support नहीं करते हैं। क्या फायदा? पूछे तो

28:35भी जवाब नहीं ऐसा लगता है दूसरों को।

28:38लेकिन वास्तव में इसके तरफ से देखें तो क्या है?

28:40ऐसी जो उदासीनता प्रवृत्ति में भी जो आ गई स्वभाव में तो पहले से है।

28:45वो तो अज्ञानी के स्वभाव में भी है उदासीनता। वितराग स्वरूप है। जिन सोई ये आत्मा।

28:51अन्य होई सो कर्म। कर्म कटे सो जिन वचन। यही धर्म का प्रवचन का मर्म।

28:58जिन है वो आत्मा है।

29:00आत्मा हो नरक में हो

29:02निगोद में हो किधर एकेंद्रिय में हो किधर भी हो वो जिन है मतलब वितराग है।

29:06उसका मूल स्वभाव तो ऐसा है। लेकिन ये वितरागता की झलक अब परिणाम में आने लगी।

29:13इसमें एक अगर वो अंदर चले जाता है। तो उसको तो tension हो जाता है।

29:19प्रेम करने वाले को बहुत tension हो जाता है। ऐसा

29:22कैसा ऐसा कैसा। तो प्रेम के साथ अधिक। तो प्रेम के साथ अधिकारीपना आ जाता है वहाँ

29:27उसको तकलीफ हो जाती है बहुत।

29:28जबकि यहाँ साधना चल रही है।

29:33गृहस्थपने में भी ऐसा होता है जब ऐसा होता है।

29:37स्वभाव की झलक परिणाम में आती है उदासीनता की। तो वो जीव अबंध परिणामी कहने

29:43योग्य है ऐसे ज्ञानी पुरुष प्रवृत्ति में रहते हुए

29:47भी अबंध परिणामी हैं उनको कोई बंधन नहीं है।

29:52ऐसी स्थिति किसकी होती है? ये बात कहते हैं। जे बोध स्वरूपे स्थित छे।

29:59बोध स्वरूपे स्थित छे माने क्या? जिनेश्वर की आज्ञा के अंदर प्रवर्तमान है।

30:04जिनेश्वर की, गणधरों की,

30:06अपने से आगे ज्ञानियों की, सद्गुरुओं की आज्ञा के अनुसार चलते हैं।

30:10उनके बोध के अनुसार प्रवृत्ति करते हैं। इसका मतलब बोध स्वरूप में स्थित हैं।

30:16वही जीव इस प्रकार से कठिनता से वर्तना कर सकता है।

30:20वो भी कठिनता से कर सकता है। ये बहुत बहुत बहुत परिश्रम चाहिए इसके अंदर।

30:26गलतियां ज्यादा और सफलता बहुत कम है इसके अंदर।

30:30सद्गुरु की आज्ञा पे चलने वाला जीव भी

30:33इस प्रकार की प्रवृत्ति बहुत कठिनता से कर सकता है।

30:38मामूली बात नहीं है कि जैसा स्वभाव है वैसा हम परिणाम से भी निर्लेप रह सकें।

30:43अगर रहे तो बहुत बड़ी जबरदस्त साधना है।

30:48इतनी जबरदस्त साधना है गुरुदेव

30:52जो कृपावल्लभ देव को

30:52मिले थे। कोई जीव गुरुदेव को भी मिला था। कंजसामी भी।

31:00और इतनी तारीफ कर रहा था। वो वेदांती था। जैन धर्म ही नहीं था।

31:07लेकिन कोई भी जैन कृपावल्लभ देव के बारे में जैसा है वैसा बोलता था।

31:13तो बोलता था कि हमने कृपावल्लभ देव को

31:14देखा है। भले हम जैन नहीं हैं लेकिन... भले

31:16हम जैन नहीं हैं लेकिन उनको हमने देखा है उनकी उदासीनता।

31:21क्या कहना साधुओं में भी नहीं है। क्या बोले? ऐसी परम उदासीनता

31:27चेहरे पे झलकती थी। बड़े-बड़े त्यागी तपस्वियों

31:31में योगियों में भी ऐसी उदासीनता नहीं होती है। खबरदार जो कोई कुछ बोला है तो

31:35उनके बारे में। वो

31:39जो व्यक्ति था वो गुरुदेव को मिला और ये सब बातें कर रहा था वो।

31:43श्रीमद् राजचंद्र में वैराग्य यानी

31:45उदासीनता। श्रीमद आचंद्रनो वैराग्य एनी उदासीनता एनी तोले कोई ना आवे

31:50एम. ओ ग्रहस्थ फिर भी

31:52साधु से भी बडके थे. एसा एसा

31:55केहते थे के ओ अबंध परिणामी है. जे बोध

31:58स्वरूपे स्थित छे ते एम कठिनताथी वर्ती शके छे कारण... क्युं?

32:03बोध मिलने पर भी आज्ञा पे चलने पर भी बहोत मुश्केल से एसा कार्य

32:09होता है. एसा क्युं? क्योकी तेनी विकटता परम छे. विकटता परम

32:14से ऐसे जीवों की ऐसी साधना

32:16बहुत मुश्किल से होती है।

32:18ऐसे जीवों की उपस्थिति भी बहुत परम विकट है। भाग्य से ही दर्शन होते हैं ऐसे जीवों का।

32:24करोड़ों लाखों अब्जों में एकाध मान मन ज्ञानियों में भी विरल।

32:29ऐसे ज्ञानी भी ज्ञानी तो होते हैं लेकिन इस प्रकार के उदासीन

32:35परम विकट है। क्यों परम विकट है? क्योंकि ऐसी साधना बहुत मुश्किल से होती है।

32:42किसको बहुत मुश्किल से होती है?

32:45जो ज्ञानी की आज्ञा पे चलते हैं उनको भी बहुत मुश्किल से ये हासिल होता है।

32:50ये साधना कर सकते हैं, सबकी बस की बात नहीं है। अब आगे कहते हैं।

32:58दृष्टांत के रूप में।

33:00विदेहीपणे जनक राजानी प्रवृत्ति। ते अत्यंत उदास परिणामी लीधे रहती। जनक

33:03राजा के बारे में

33:04बहुत कहते हैं कि वो

33:07ज्ञानी... वज्र के बारे में बहुत कहते हैं कि वो ज्ञानी थे। महोलों में रहते थे।

33:13लेकिन जबरदस्त उदासीनता से। Terrific जिसको बोलते हैं।

33:20मन में भी कि कहीं किसी पदार्थ के प्रति अंश मात्र भी मोह नहीं होता था उनको।

33:26इतनी जागृति थी उनको दिन रात। इतना परिश्रम था उनका। साधना इतनी जबरदस्त थी।

33:32इसलिए जनक राजा का नाम विदेही राजा

33:34विदेही राजा हो गया था। विदेही जनक राजा ऐसा कहते हैं।

33:39जैसे doctor बनता है तो आगे doctor लिखते हैं ना? Doctor फलाना अभी उसको

33:43श्री भी नहीं doctor। ऐसे ऐसे साधना महलों में रहकर करते थे।

33:49कि इनके लिए आगे नाम के आगे विदेही रख दिया गया।

33:52कि देह में भले रहते हैं लेकिन देह

33:54देह में रहते ही नहीं देह का लक्ष्य ही नहीं है उनका। एकदम

34:00जो जंगल में योगी पुरुष नहीं कर सके ऐसी साधना वो महल में रहकर

34:04के। बिल्कुल। देखरके बिलकुल देहमां मूर्छा विना रहेते थे. इसको नाम विदेही

34:09जनक राजा एसा कहेते है.

34:11विदेहीपणे जनक राजानी प्रवृत्ति ते अत्यंत

34:14उदास परिणामने लीधे रहेती. घणुं करीने तेमने

34:17ते सहज स्वरूपमां आवी. पर उसके लिये कोई उनको

34:22प्रयत्न नहीं करना उदा एकदम समजो artificially करना एसा नहीं है.

34:26automatic उनकी एसी अवस्था हो गई थी. केमकी practice बहोत जबरदस्त

34:30थी. साधना साधना बहोत top

34:33level की थी. साधना साधना बहुत

34:34top level की थी। तो उनके लिए

34:36ऐसी उदासीनता में रहना, ऐसी विदेही दशा में रहना

34:39साधारण सी बात थी, automatic था उनके लिए। तथापि,

34:45तथापि जनक राजा क्या करते थे? तथापि कोई माया ना दुरंत प्रसंग मा,

34:53समुद्र नेविसे जेम नाव यतकिंचित डोलायमान थाय।

34:58समुद्र में नैया है चलती है देखिए।

35:00नहीं आवे चलती हे लेकिन फिर भी कभी कभी डुलायमान

35:05हो सकती हे. अगर

35:07पाणी ज्यादा उछाळा मारे तो.

35:10तथापी कोई मायाना दुरंत प्रसंगमां समुद्रने

35:13विशे जेम नाव यतकिंचित डोलायमान थाय. तेम आवा उदासीन परिणामनुं

35:18पण डोलायमानपणुं थवानुं संभव होवाथी. उदासीनता तो आवी हे जबरदस्त. लेकिन आवी

35:24परमात्म दशा नहीं आवी हे. लेकीन अभी परमात्म दशा नहीं आई

35:29है. हा इतनी level

35:31नहीं आई है. तो कभी भी हो सकता है के परिणाम

35:37में वापिस गडबडी हो

35:39जाय. इसका संभव है. मायाना

35:42दुरंत प्रसंगमां. नावनी जेम ते परिणामनुं डोलायमान

35:46थवापणुं संभवित होवाथी. अभी है नहीं उदासीनता intact

35:51है. लेकिन. कभी भी ओ उदासीनता बिगड सकती है. सती छे. जो के संसारनी प्रवृत्तिमां

35:57रहे छे. अने जीव के

35:59परिणाम के विचित्रता छे. आज उदास छे,

36:02कल वापिस लागी जेवी बन जावे. एसा भी बन

36:06सकता है. परमात्मा बनने के बाद तो safe लेकिन इसके पहेले

36:10safe नहीं है, परिणाम के कोई बोल नहीं सकते कब

36:15कैसे परिणाम होगे. ते

36:17परिणामनुं डुलायमानपणुं थवानुं संभवित होवाथी,

36:20प्रत्येक मायाना प्रसंगमां, केवळ जेनी उदास

36:23अवस्था छे. अवस्था से। एवा निज गुरु अष्टावक्र।

36:29देखो जनक राजा उदासीन रहते थे।

36:32महल में भी परम उदासीन थे

36:33इसके बावजूद भी। कि मेरे परिणाम कभी भी खराब हो सकते हैं ऐसा समझ करके।

36:39है नहीं खराब, कभी भी हो सकते हैं भाई। क्योंकि अभी परमात्मा दशा नहीं आई।

36:44तो मुझे गाफील नहीं रहना है। उसके लिए उन्होंने क्या किया?

36:50जनक राजा ने। अपने परिणाम खराब... अपने परिणाम खराब

36:54होवे ही नहीं। इसलिए आगे से

36:57कौन सी preparation की, तैयारी कौन सी थी, planning कौन सा किया?

37:02उसकी बात करते हैं। उन्होंने प्रत्येक मायाना प्रसंग में,

37:08केवल जेनी उदास अवस्था छे। उनके जो गुरु का नाम था अष्टावक्र।

37:14उनकी स्थिरता तो बहुत जबरदस्त थी। वो तो योगी थे।

37:18जब वो मेल में नहीं रहते थे और हर एक प्रसंग में, थोड़े

37:20भी उनके परिणाम... में थोड़े भी उनके परिणाम धुलायमान नहीं होते थे

37:23मतलब top level साधना में ऊँचे थे मतलब।

37:25जैसे अपने यहाँ कहते हैं कि कुनकुन आचार्य देव

37:27top level की साधना में थे। क्या? अगर कृपावृत देव को और इनको compare करें तो...

37:34तो आचार्य देव की बात नहीं आवे। ऐसा। तो जनक राजा...

37:42हमारे परिणाम भविष्य में कभी भी खराब ना होवे इसके लिए क्या किया जनक राजा ने?

37:46अभी परिणाम खराब नहीं है।

37:48फिर भी हो जाए हो... फिर भी हो जाए हो होवे उसके पहले ही हमको कुछ तैयारी कर लेना है।

37:52कौन सी तैयारी की?

37:54केवड़ जेनी उदास अवस्था छे

37:56एवा निज गुरु अष्टावक्रनी शरणता स्वीकारी। देखो।

38:05सद्गुरु का अपने गुरु का निज गुरु personal गुरु। निज अपना गुरु personal गुरु।

38:13जैसे personal bodyguard होता है ऐसे ऐसे तो ज्ञानी पुरुष बहुत हो

38:15गए लेकिन अपने को। तो ज्ञानी पुरुष

38:16बहुत हो गए लेकिन अपने को बचाने वाले

38:18bodyguard गलतियों से बचाने वाले ऐसे उसको बोलते हैं निज गुरु

38:25जिनका personal contact था अष्टावक्र का और जनक राजा का personal contact था

38:30कुछ भी problem आए तो फौरन अष्टावक्र को सब बातें मालूम रहती थी जिन्हें जनक राजा की

38:34पूरी file खोल लेते थे गुरु के सामने

38:37सो सौभाग्य भाई के personal गुरु

38:40कौन कृपा उदय क्योंकि सौभाग्य भाई के हर एक परिणाम की उनको खबर पड़ती थी।

38:46अगर मुमुक्षु जीव की हर एक परिणाम की खबर अगर सद्गुरु को होवे,

38:52तो सद्गुरु को इसको कौन सा बोध देना, कैसे turn करना, कैसे गलती से बचाना, उसकी

38:59सहज में फिकर भी होती है।

39:01और इस फिकर के कारण सहज में उनके वचन ऐसे निकलते हैं, कि सामने वाले

39:06को, right समय पे right

39:07guidance मिलता रहता है। नहीं तो guidance नहीं मिलता है, साथ मिलता है।

39:12नहीं तो guidance नहीं मिलता है साथ मिलता है लेकिन guidance नहीं मिलता है।

39:16वो भी चुप हम भी चुप ऐसा हो जाता है। दोनों side से चुप। ये गुरु इसलिए चुप है।

39:22क्योंकि वो बोले तो कुछ बोले तो बतावे अब बोले नहीं तो क्या बतावे।

39:26का रुका है उनको कैसे मालूम। अब बोले तो guidance देवे

39:30नहीं बोले तो वहां चुप है तो यहां भी चुप है।

39:32Doctor के पास दर्द ही चुप है तो doctor भी चुप है।

39:40वो आए मिलने के लिए। द निवृत्ती सत्र में थे वहाँ।

39:45तो कुछ बोल रहे नहीं चुपचाप बैठे

39:48हैं। शाम को साथ में gym

39:49लिए। 6 बजने के पहले। अभी भी देखा कि अभी शाम में शायद

39:54bed पर गए अभी बोलेंगे अभी कुछ पूछेंगे।

39:56पूछा नहीं। खुश हो देखो चटपटी होती थी कि भई बोलते नहीं हैं आए क्यों मिलने के लिए?

40:03मैं तो साधना करने के लिए निवृत्ती सत्र में आया फिर यहाँ तक मिलने को क्यों आया?

40:06कुछ पूछना होगा इसलिए आए हैं। नहीं तो

40:09मेरा सानिध्य क्यों... ले आए हैं। नहीं तो मेरा

40:10सानिध्य कौन करता? फिर भी पूछ रहे नहीं तो अभी सामने से उन्होंने,

40:15रहा नहीं गया तो सामने से बोला, तरस लगी है? क्या पूछा?

40:19प्यास लगी है क्या? तरस लगी है? वो बुद्धू का बिल्कुल समझा नहीं।

40:25क्या? नहीं नहीं वो तो मेरा चो यार है हम साथ में तो जीमें हम

40:29बाद में मैं कहाँ लेता हूँ? क्या? खत्म हो गई बात। वो meaning नहीं समझ पा

40:32रही कृपावली का ये नहीं कि...

40:35Meaning नहीं समझ पा रही कृपा वाले का ये नहीं

40:37कहना था कि 6 बजे के बाद आप पानी पियो जब आपका नियम है तो आप नियम को रखो

40:41कोई बात नहीं है। तरस लगने

40:43का meaning दूसरा है कि भई कुछ पूछना है, कोई तकलीफ है,

40:47साधना में कहीं रुकावट है, क्या है, problem क्या है

40:50बोलो तो मालूम पड़े ना तो तब चावे। और

40:54उसने वो समझा नहीं बात को। नहीं नहीं मैं तो चोबे से।

40:58साथ में gym लिए पानी पी लिए खत्म रात को पानी पीता नहीं हूँ। वो अपना बड़प्पन करने

41:01गया व्रत उपवास का अभिमान करने गया।

41:03बहुत कुछ गवा दिया उसने। सब कुछ गवा दिया उसने। अच्छा अच्छा सो जाओ सो जाओ क्या बोले?

41:09सोए हुए तो हो ही। अब और सो जाओ। लंबे होकर।

41:14आपका काम नहीं है मतलब कहने का मतलब क्या है आपका कोई काम नहीं है। बात क्या करें?

41:19बात कुछ करना नहीं है। जनक राजा ने

41:23ऐसी स्वभाव जैसा है वैसा ही

41:26उदासीन रहने के लिए जबरदस्त परिश्रम पुरुषार्थ किया।

41:29और वो हासिल हो गया। सरलता में क्योंकि अभी आटक बन गई तो सरलता में। सरलता

41:32में क्योंकि अभी अटक बन गई तो

41:33सरलता से अभी उसको कोई तकलीफ नहीं होती थी।

41:35परिणाम बिगड़ते ही नहीं थे।

41:37फिर भी भविष्य में बिगड़ सकते हैं क्योंकि अभी परमात्म दशा नहीं आई है ना।

41:41तो भविष्य में भी वो बिगड़े नहीं कभी भी कैसे ही प्रसंग में।

41:45इसके लिए उन्होंने advance में क्या कर लिया अपने

41:48personal गुरु जो अष्टावक्र थे निज गुरु।

41:52एवा निज गुरु अष्टावक्र की शरणता स्वीकारी होने थी।

41:57माया ने सुखे तरी सकाए एम थतु हतु।

42:00फायदा क्या हुआ? सरलता स्वीकार किया तो फायदा क्या हुआ?

42:07कि जो माया दुस्तर है, दुरंत है, ज्ञानियों को भी पसीना छूट जाता है।

42:13ऐसे माया रूपी समुंदर को जनक राजा आसानी से तीर सकते थे।

42:18एवी माया ने सुखे तरी सका एम तत्तवतु। कारण?

42:23क्यों अभी easy लग रहा है? अभी माया दुस्तर क्यों नहीं लग रही है?

42:27माया दुरंत क्यों नहीं लग रही है? इतनी आसानी... क्यों नहीं लग रही है

42:30इतनी आसानी कैसे हो गई मोक्ष मार्ग इतना सरल कैसे हो गया

42:36कारण दिया आखिर में last में last line कारण कारण के

42:41महात्मा ना आलंबनी ऐसी बड़वत्ताता छै क्या लिया

42:48सद्गुरु की कृपा को क्या कहना अगर उनका शरणा लियो तो आपका काम आधे से आधा easy हो जाए।

42:58मान पुरुषो का एही तो है इसले

43:04तो कुंगलीकागम. आवो सत्पुरुषना

43:07वचनामृत मुद्रा अने सत्समागम

43:10सुसुप्त चेतनने जागृत करनार पडती वृत्तिने

43:15स्थिर राखनार दर्शन मात्रथी पण निर्दोष अपूर्व

43:21स्वभावना प्रेरक. छेल्ले अयोगी. चेने अयोगी स्वभाव प्रकट करी।

43:27अनंत अव्याभा सुकमा स्थिति करावना। त्रिकाळ जिवंत वर्तो

43:32जिवंत वर्तो जिवंत। हे महात्माना अनम। बहुत मतलब अपने परिणाम बताना या खुद बात करना।

43:37लेकिन मु सामने नहीं आता

43:38भले मन में भले कहीं भी बैठा

43:40रहो मन में दुनिया की बातें कर लेते

43:42जैसा ऐसा ऐसा हुआ ऐसा। मन में आप ऐसा मतलब ऐसा

43:44लगते है की गुरु की बात कर रहे है। लेकिन सामने आने के

43:49बाद मुई नहीं आता। सामने आने के बाद वही लिखनी।

43:54बस ये बात ये कमी है आपको। अपने साधना में। लिखने के बजाय तो वो

43:59इतना इतना अंदर मन में ये चलता रहता है कि वो

44:02व्यक्त नहीं होता है ना अंदर के अंदर घुट घुट के है। व्यक्त होना चाहिए।

44:07व्यक्त क्यों नहीं होता है? क्या कारण है?

44:11देखो ये... ये प्रश्न है कोई। अब ये अवस्था यहाँ निकल गई। सोगाली जी की

44:17अवस्था ऐसी same थी? वो तो बात चली थी अबकी भरा भक्ति

44:20वाली बात। सोगाली... वाली बात। सौगानी में कितनी पराभक्ति थी।

44:23सद्गुरु से इतना दूर रहने पर भी वो कहते थे कि मेरे गुरु मेरे से दूर नहीं हैं।

44:29जहाँ मैं हूँ वहीं मेरे गुरु हैं। ये महाराज साहब का देह है वो

44:34वो सद्गुरु नहीं है उसको कानसमी मैं नहीं मानता हूँ। उनका चैतन्य देव है

44:40वो तो मेरे में विराजमान है। जहाँ मैं हूँ वहीं वो है।

44:44ऐसी दिव्य चैतन्य मूर्ति को मैं निरंतर देखता हूँ। क्या बोले? क्या हो गया अब?

44:51इसका नाम है पराभक्ति।

44:53तो दूर रहने पर भी सत्संग बराबर नहीं मिलने पर भी वो तीर्थंकरे

44:57आखा नुसे। इतनी द्रव्य दृष्टि जबरदस्त हुई कैसे?

45:01इतनी जबरदस्त साधना हुई कैसे? 18 साल के अंदर अनंत जन्म मरण का छेद करके

45:07एक ही बार बाकी रखे हैं।

45:09ऐसी जबरदस्त साधना इस काल में कैसे कर पाए उन्होंने?

45:13स्वता जो है ना, जो स्व के

45:16नजदीक रहने का जो उन्होंने

45:17पुरुषार्थ किया। के नजदीक रहने का जो उन्होंने पुरुषार्थ किया है। इसमें

45:21गुरुदेव की शरण उन्होंने स्वीकार की,

45:23उनको हृदय में बिठाया और निरंतर उनको देखते रहे। ये इसका कारण हुआ।

45:29सद्गुरु से थोड़ा भी अगर अलग हुए, दूरी रखी थोड़ी भी अंदर में भाव में,

45:36हमारा खात्मा हो जाता है। कैसी भी उनकी अवस्था हो।

45:42थोड़ा भी उनके बारे में थोड़ा भी अंदर में

45:44दूसरा परिणाम आ गया। विनय भाव में कमी आ गई। उसी प्रकार से।

45:47अपना गिरना नकी है समझो। तुम्हें अगर देखा कुछ problem आ

45:51गया है तो बात बताना जरा लेकिन जैसे हम मतलब जो

45:59जो हम चल रहे हैं कैसा कैसा हमको

46:02वो जो चर्चा करने का दिल में बहुत रहता है लेकिन वो

46:05सामने आने में उतनी चर्चा नहीं होती। तो क्या है कि कभी चर्चा करके

46:08देखे तो कितना फायदा होता है वो तो अनुभव भी है।

46:11हाँ। कई ऐसे प्रसंग बन गए हैं कि हम हम

46:12tenth... संग बन गए हैं कि हम हम tension में आ गए फिर

46:14कह दिया तो tension फौरन उतर गया ऐसा भी तो हुआ है ना? फिर भी जीव

46:19अपने अनुभव से नहीं सीखता है।

46:21तो एक तो माया तो है कौन सी माया है?

46:24कि जैसा स्वभाव है वैसा हमारा परिणाम

46:26नहीं एक तो है ही है। ये दूसरी माया है अपने

46:32परिणाम छुपाने की। सद्गुरु

46:33के सामने क्या छुपाना है?

46:36वो हमको तारने वाले हैं डुबाने वाले तो नहीं हैं। टाटेंगे तो भी... टाटेंगे तो भी

46:41हमारे को आगे लेके जाने वाले हैं। टाटेंगे तो भी हमारा हित ही करते हैं।

46:45तो क्या छुपाना है? नहीं होने पर भी इतना हम आगे हमारा परिणाम खुलते क्यों नहीं है?

46:52जनक राजा की बात यहाँ देखो कि उनके परिणाम अच्छे थे।

46:56अगर शरण स्वीकार नहीं करते थे तो भी बराबर चल रहे थे।

47:00फिर भी भई अभी परमात्म दशा नहीं हुई है।

47:03हो सकता है कोई ऐसा प्रसंग आ जाए तो मैं डोलैमान हो जाऊँ तो?

47:07अभी से ही तैयारी कर लूँ मैं। सही तैयारी कर लूँ मैं। देखो ये बात समझ लो आप। इसीलिए

47:14perfections

47:15total safety के लिए उन्होंने क्या कर लिया? परिणाम अच्छे होने पर भी क्या किया?

47:20निज गुरु अष्टावक्र की शरणता स्वीकार कर ली। फायदा क्या हुआ?

47:25इसके कारण से माया ने सुखे तरी सका एम थतुअतु। ये खुद को ही फायदा हुआ। क्यों इतना

47:33easy हो गया? रास्ता कठिन होने पर भी माया दुस्तर होने... रास्ता कठिन होने पर

47:36भी माया दुस्तर होने पर भी

47:38धुरंत होने पर भी क्युं अभी easy

47:39हो गया? क्युंकी महात्मा के आलंबन की एसी ही बडवतरता

47:45है. ओ इनको लिखा

47:48है देखो सौभागभाई को. बहोत

47:51जबरदस्त बात लिखी है शायद number

47:54मिल जाय तो में बताता हुं. सात बरताल वाली बात बतावी है. आपने वो

48:00पढाया नई पढाया? शुं रोटला

48:02रो एडो छो? क्या बोले? आड़ो छो

48:05क्या बोले

48:11रांडी रड़े मांडी रड़े क्या लिखा है ऐसा लिखा रांडी रड़े मांडी रड़े जिसका

48:18husband गुजर गया है वो दुख में आ जाए रोवे

48:21हैं उनमें आई

48:27रांडी रड़े मांडी रड़े क्या जिसका husband गुजर गया है उसको रंडा। कर गया है।

48:33उसको रंडा पाया है, वो दुखी है तो रोती है। मांडी लड़े।

48:39कि husband है लेकिन वो ऐसा है कि कमा के लाता नहीं है। क्या?

48:45तो उल्टा इसको ही मेहनत करके उसको खिलाना पड़ता है। उसके दुखों का कोई अंत नहीं है।

48:50रांडी लड़े, मांडी लड़े, पर साथ बरतारवाड़ी तो मोटूच ना उघाड़े। क्या बोले?

48:59जिसके सात सात पति हैं। पति है। उसको क्या दुख हो सकता है?

49:05ऐसे आप क्या रोना रोते हो कि मेरे से नहीं होता आत्मज्ञान, बहुत तकलीफ है वो है,

49:09मैं हूँ ना? ऐसा लिया, उसका meaning ऐसा लिया। मैं हूँ ना, काहे को घबराते हो?

49:16आपको क्या चाहिए बोलो, मुँह तो खोलो क्या चाहिए? ऐसा बोले। ऐसा लिखा है एक जगह।

49:21रांडी रड़े मांडी रड़े, पर शायद भतारवाड़ी तो मुँह ही नहीं खोले।

49:30बहुत ज़बरदस्त लिखा है इन्होंने। सोभाग भाई को लिखा है ये बात। क्यों फिकर करते

49:35हो? मैं हूँ ना, बैठा हूँ

49:36ना, काहे को मगज़मारी करते हो? तब

49:38ऐसी अवस्था में जब ऐसे सद्गुरु हमको मिलते हैं,

49:42उनका शरण लेने से हमारा काम इतना आसान होता है,

49:46तो फिर क्यों नहीं लेते हम? क्यों अपनी मनमानी करते हैं? क्यों शोषण में चलते हैं?

49:52और 526 में तो उनको वंचना बुद्धि कहा।

49:55जो परिणाम छुपाने वाली जो

49:56बात है। छुपाने वाली जो बात है 525 है

50:00125 नहीं 425 है

50:07क्योंकि guidance कैसे मिलेगा अगर आप परिणाम को छुपाओगे

50:09तो 500। 288. 288.

50:13288. पण होय भक्ति,

50:17भक्तिवाळो. आडी पुरुष रमत

50:21मांडी बेठो छे. नवा जूनुं

50:26तो एक आत्मवृत्ति सिवाय अमारे क्यां

50:33छे अने ते लखवा

50:37जेटलो मनने अवकाश

50:40पण क्यां छे. नहीं तो

50:45बधुंय नवुं छे

50:48अने बधुंय जीर्ण छे.

50:54नहीं वो बात नहीं मो पंचना बुद्धि वाला एक

50:57chapter था 525 हाँ

51:05ये रहा 526

51:12526 में लिखा है।

51:22जो जीव लघुता धारण न करे सदगुरु आगळ पण. तो प्रत्यक्षपणे जीव

51:27भव परिभ्रमणथी भय नथी पामतो

51:28एम ज विचारवा योग्य छे. एवुं

51:31लख्युं छे एनुं नाम मंचना बुद्धि लख्युं

51:33छे. के अभी इसको डर नहीं है. भविष्य में

51:37कब फिसल जाउंगा कब कैसा होगा उसका डर नहीं है. अपने

51:41को परमात्मा दशा अपने दशा में इतनी development नहीं होने पर भी अपने को

51:46safe मान के चल रहा है. ए बात लिये. ये बात

51:50लिया 526 में लिया ये बात। लोलू जी महाराज। हाँ ललू जी

51:55महाराज को लिखा। वो मेरे को अभी वो

51:57दिमाग में आया बहुत दिनों के बाद सात भरतार वाली जो है ना।

52:01बाद में ही निकलेगा वो अभी एकदम नहीं निकलेगा। छोटा सा letter है।

52:06शोभा भाई को लिखा है वो बात। मांडी रांडी रड़े मांडी रड़े

52:12पण सात भरतार वाले तो

52:13मोडू ना उघड़। ये बात को। और गुरुदेव भी कहते थे गुरुदेव। गुरुदेव भी कहते थे

52:17गुरुदेव भी एक दफे मैं सभा में चर्चा में था।

52:20तो कोई बोल रहा था कि बहुत तकलीफ होती है। कोई easy नहीं लग रहा है।

52:27तो क्या उन्होंने। तो घबराना नहीं धीरे-धीरे कार्य करना। मैं हूँ

52:33ना फिर क्यों फिक्र करते हो ऐसा गुरुदेव भी बोले।

52:36किसी और को कह रहे थे। कि घबराना नहीं मैं हूँ ना ऐसा बोले।

52:46ये अपने last line के ऊपर से लगा। महात्माना

52:49शरणनी ऐसी बलवत्तरता

52:52छै। महात्माना आलमबन्नी। आलमबन्नी। अगर जीव स्वच्छंद को

52:57छोड़ करके सद्गुरु का साथ लेवे,

53:00चला करके, उनका शरण में रहे, तो जीव तीर जाता है।

53:06Problem जो थोड़े बहुत है वो भी निकल जाते हैं। कोई problem नहीं रहते हैं फिर।

53:15Problem तो आते हैं रास्ता कठिन है लेकिन पार हो जाता है।

53:27हाँ हेरा देखो। 469। 469 में है।

53:35मिल गया आज। बहुत मुश्किल से

53:38कई दिनों के बाद। 5-7 साल हो गए होंगे पढ़े। इन्हें पाँच सात साल हो गए

53:42होंगे पढ़े। number याद नहीं रहे

53:43भूल गए। 469। number गलत ही

53:46दिया है

53:46इधर नहीं

54:01है ना। 469।

54:03रांडी रुए मांडी

54:06रुए पर साथ भरता।

54:08रुए मांडी रुड़े पण साथ भरतार वाले तो मुंडो

54:10ना उघड़े। 469 में 3 number

54:12है। Page number होगा 469। 469

54:18page number।

54:23ये

54:25रहा। हाँ ये रहा। 469 में मतलब 608 number में है। हिंदी में।

54:28नहीं page number हिंदी में

54:29तो नहीं मिलेगा। 608। नहीं 609 सत्संग

54:33का। कतारू। तथारूप गंभीर वाक्य नथी. में जो नीचे लीख

54:39रहा हुं वो इतना

54:42serious letter वचन नहीं है. फिर भी उसका आशय बहुत गंभीर है. तो पण आशय

54:48गंभीर होवाथी एक लौकिक वचननुं

54:50आत्मामां हाल घणी वार स्मरण थई आवे

54:53छे. उनको बार बार याद आता था इस बात.

54:56सात पति मतलब? पति. पति न हो तो रडे. पति निकम्मा

55:00होवे तो रोवे. लेकिन सात पति होवे तो? लेकिन सात पति होवे तो?

55:07उसको तो हर प्रकार की सुविधा है। कोई problem ही नहीं आवे।

55:12वो तो मुँह ही नहीं खोले कि मेरे को ये तकलीफ है वो तकलीफ।

55:15क्योंकि जिसको सात पति हैं, एक नहीं सात होवे, उसका उसका तो कैसे होवे?

55:20ऐसे बनता नहीं है। एक स्त्री को सात नहीं होते हैं, ये तो एक कहावत है।

55:25तो जिसको इतनी सुविधा है वो पिच-पिच क्या करे फिर बाद में? ये कहावत है।

55:30ये बात कहते हैं। तथा रूप गंभीर वाक्य न थी। तथारूप गंभीर वाक्य नथी तो पण

55:34आशय गंभीर होवाथी एक लौकिक वचनो आत्मामां हाल घणी वार

55:39स्मरण थई आवे छे.

55:41ते वाक्य आ प्रमाणे छे.

55:43रांडी रूए मांडी रूए पण साथ

55:46बरतार वाळी तो मोढुं ज न उगाडे. वाक्य

55:50अगंभीर छे क्योकी इसमे गंभीरता नहीं है वचन के अंदर.

55:54तेथी लखवामां प्रवृत्ति न थात. एसे वचन ज्ञानी पुरुष लिखते नहीं generally

56:00स्त्री पुरुष के संबंध वाले. Generally

56:02स्त्री पुरुष के संबंध वाले. पण आशय गंभीर होवाथी लेकिन इसका भाव बहुत गंभीर है.

56:08अने पोताने विशे विचारवानुं विशेष देखावाथी.

56:10तमने पतुं लखवानुं स्मरण थवाथी आ वाक्य लख्युं

56:13छे. देखो. इतना ही नहीं लिख नहीं सकते एसे वचन के

56:17उपर क्या लिखे है उनहो. एना उपर यथाशक्ति विचार करशो ए ज विनंती.

56:22ए सौभागभाई को लिखा है. काईको परेशान होते हो. इतना दुःखी क्युं

56:27होते हो. परेशान होते हो,

56:28इतना दुखी क्यों होते हो? क्यों अपनी मनमानी करते हो? टेढ़े क्यों चलते हो?

56:36संपूर्ण शरणागति में क्यों नहीं आते हो? ऐसा स्थान

56:41surrender करो, line clear है बिल्कुल। ऐसी बात लिखी है, बहुत

56:46अच्छा लिखा है।

56:47सुख धाम

56:55अनंत सुस...

56:58संत सुसंत चाही। दिन रात्रि रहे

57:05तद ध्यान मही।

57:10पर शांति अनंत सुधा

57:16मय जे। प्रणमु

57:22पद तेवर तेज।

57:32वरते जयते प्रणमु

57:38पदते। वरते जयते।