Shrimad Rajchandra Vachanamrut
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0:00श्रीमद् राजचंद्र
0:02पत्रांक 321 और 608 तारीख
0:088-11-2000 श्री देवचंद्र भाई।
0:13णमो अरिहंताणं णमो सिद्धाणं णमो आयरियाणं णमो उवज्झायाणं
0:20णमो लोए सव्व साहूणं नमः समयसाराय
0:25स्वानुभूत्या चकासते । चित्स्वभावाय भावाय
0:31सर्वभावान्तरच्छिदे मंगलं भगवान वीरो,
0:36मंगलं गौतमो गणी। मंगलं कुन्दकुन्दार्यो,
0:41जैनधर्मोऽस्तु मंगलम्॥ सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं
0:47सर्वकल्याणकारकम। प्रधानं सर्वधर्माणां
0:52जैनं जयति शासनम॥ ॐकारबिन्दुसंयुक्तं
0:57नित्यं ध्यायन्ति योगिनः। कामदं मोक्षदं चैव ॐकाराय नमो नमः राजचंद्र वचनामृत
1:00पत्रांक 335. भमेशथी खंभात तमारा
1:02Lalchand bank-मां पत्र
1:05लखाया. अत्यंत उदास
1:10परिणामे वेदो एवुं जे
1:15चैतन्य छे चैतन्य
1:20मने आपणा स्वभाव. चैतन्य
1:24माने अपना स्वभाव मूल तत्व
1:28है अपरिणामी तत्व है शाश्वत तत्व है। इसका स्वभाव ऐसा है
1:33कि वो अत्यंत उदास परिणाम में रहता है हमेशा। अनुकूलता के वक्त
1:40जो हर्षित होता है वो चैतन्य नहीं है। तो प्रतिकूलता के वक्त
1:47जो अपने आप को शोक मग्न हो जाता है
1:49वो चैतन्य नहीं है वो चैतन्य का स्वभाव नहीं है। जैसे जीव है। जैसे
1:53जीभ है। तो जीभ हमेशा लुखी रहती है।
1:57लुखी रहती है माने क्या उसका स्वभाव ही ऐसा है।
2:00कोई भी स्वाद वहां टिकता नहीं है। एक गले के नीचे उतरा के स्वाद गया। मुंह में रहे
2:07तब तक ही स्वाद जैसा गले के तरफ गया के खत्म।
2:12वापिस कोरी की कोरी ऐसा ही चैतन्य का स्वभाव ही कोना का खोला है।
2:17मतलब राग द्वेष चैतन्य नहीं करता है। हर... हर परिस्थिति के अंदर राग द्वेष
2:23दूसरा कोई करता है चैतन्य नहीं करता है। अत्यंत उदास परिणाम में रहलू एहु जे चैतन्य है
2:30जो अपना मूल स्वभाव। पवितराग है। राग द्वेष करने का उसका स्वभाव नहीं है।
2:37वो हमेशा उदास परिणाम में रहता है उदास परिणाम में माने क्या?
2:42उदास सुख की सहेली है अकेली उदासीनता उदासीनता का मतलब क्या?
2:47करना है ऐसा वो भी नहीं। ऐसा नहीं करना है वो भी नहीं।
2:52राग भी नहीं द्वेष भी नहीं। नहीं करना है वो द्वेष हो गया, करना है वो राग हो गया।
2:57कोई भी कार्य। दोनों से पार, totally balance के अंदर।
3:02जैसी घटना घटे, जैसे संयोग आए, वियोग हो गया, सब में एक शरीर का रहता है।
3:08राग द्वेष रहित। उदासी उदासी उदासी
3:11उदासी उदासी उदासी। विपायमान नहीं होता है,
3:16mix नहीं होता है।
3:19अत्यंत उदास परिणाम में ऐनू ऐवु जे चैतन्य मूल स्वभाव है तो स्वभाव का
3:23एक जैसा एक शाश्वत उसका स्वभाव है वैसा परिणमन भी उसका स्वभाव है।
3:30हमेशा रहने का जो स्वभाव है वैसा उसका परिणमन भी स्वभाव दोनों भौतिक दोनों परिणाम
3:37एक साथ में उसमें है। चैतन्य शाश्वत भी रहता है।
3:42कभी भी उसका नाश नहीं होता है।
3:45लेकिन... होता है। लेकिन हमेशा work करते रहता है कुछ ना कुछ।
3:49उसके परिणाम आते रहते हैं।
3:51समुंदर शाश्वत भी है और उसकी तरंगे भी आती रहती हैं, उछलता भी है।
3:55स्थिर भी है, उछलता भी है। ऐसे मूल स्वभाव उदास है।
4:01उस लेपायमान निर्लेप। उसको संयोगों की, क्षेत्रों की,
4:08समय की कोई असर नहीं होती है।
4:11असल बिना का है, उदास उदास उदास। असल बिना का है उदास हर हालत में उदास उदास है।
4:17ऐसा जो चैतन्य है, ऐसे चैतन्य को ज्ञानी प्रवृत्ति में भी ऐसा ही रखते हैं।
4:24प्रवृत्ति में तो राग द्वेष हो ही जाते हैं। उपयोग बाहर गया,
4:28फिर राग द्वेष चालू हो जाते
4:33हैं। थोड़ा भी उपयोग यहाँ से चैतन्य से हटा सुदा से तो राग द्वेष चालू,
4:36अच्छा बुरा चालू। ऐसा होने
4:38पर भी ज्ञानी क्या करते हैं? चाहे जैसी
4:40प्रवृत्ति... चाहे जैसी प्रवृत्ति हो बाहर में। तो अंदर का चैतन्य को
4:47उदास ही रखते हैं। अंदर से अभिप्राय से लेपायमान नहीं होते हैं।
4:52ज्ञानी ज्ञानी का स्वभाव चाहे अज्ञानी का स्वभाव वो तो
4:56ऐसा लुक्का का लुक्का ही है खोरा का खोरा ही
4:59है। यानी अज्ञानी का स्वभाव खराब है ज्ञानी का अच्छा है ऐसा नहीं है कुछ।
5:04जीव मात्रा का स्वभाव लुक्का उदास वितराग है। अज्ञानी।
5:09अज्ञानी का जीव भी राग द्वेष नहीं करता है स्वभाव में।
5:15ज्ञानी का जीव भी स्वभाव से राग द्वेष नहीं करता है। अब फर्क कहाँ आता है?
5:21अब फर्क जो है प्रवृत्ति में
5:23है। अज्ञानी का स्वभाव राग द्वेष रहित होने पर भी उदास होने पर भी जब प्रवृत्ति
5:27में आता है तो अभिप्राय पूर्वक राग द्वेष करता है।
5:32और ज्ञानी पुरुषात पूर्वक चैतन्य की दृष्टि पूर्वक। चैतन्य
5:37की दृष्टिपूर्वक। चाय जैसी प्रवृत्ति हो।
5:41प्रवृत्ति में mix नहीं होते हैं। शोक का प्रसंग हो, तो शोक नहीं करते हैं।
5:48हंसी खुशी का प्रसंग हो, हंसी खुशी नहीं, अभिप्राय पूर्वक। अभिप्राय,
5:53फिर वापिस अभिप्राय में नहीं होने पर भी, मतलब भाव में नहीं होने पर भी,
5:58action में हो सकते हैं वापिस।
6:00खाने पीते हैं,
6:02दवा लेते हुए, मजाक करते हुए, वो सब हो सकता है वापिस। वो सब हो
6:06सकता है वापस। लेकिन ये जो
6:07कुछ भी होता है वो तो action है, वो तो शरीर की क्रिया है।
6:10जैसे भगवान के मंदिर में गए तो हाथ जोड़े,
6:13प्रदक्षिणा दी। तो शरीर भी ज्ञानी का काम करता है, तो ये सब किसकी क्रिया है?
6:20ज्ञानी के शरीर की क्रिया है, आत्मा जो है वो ज्ञानी की नहीं है।
6:24पूजा करने का जो भाव है वो भी ज्ञानी नहीं करता है।
6:27पूजा करते वक्त भी उसको पूजा करने का भाव नहीं है, अभिप्राय पूर्वक,
6:32आचरण पूर्वक है वापस। आचरण पूर्वक है office। तो अभिप्राय को
6:35और आचरण को दोनों को अलग-अलग कर देना है।
6:38तो आपको मालूम पड़ जाएगा कि जाने की प्रवृत्ति कैसी होती है।
6:42अत्यंत उदास परिणाम में रहेलू एहु जे चैतन्य तेने
6:46ज्ञानी प्रवृत्ति में रचपच हुआ छता एहु ने एहु ज राखे था। निर्लेप ज राखे था।
6:54अपनी निर्लेपता को बना के रखते हैं, अपनी उदासीनता को intact रखते हैं।
6:59विचलित नहीं होते हैं। तो पण कई ऐसी हैं,
7:03फिर भी हम कहते हैं। यानी ऐसा सजग है, पुरुषार्थवंत है।
7:09प्रवृत्ति में भी वो निर्लेपी रहते हैं, फिर भी हम ऐसा कहते हैं।
7:14कि माया बहुत खतरनाक है, दुस्तर है। दुरंत है।
7:19दुस्तर और दुरंत दो शब्द डाल लिया। ये जीव के
7:25जैसा स्वभाव है, वैसा अवस्था नहीं है जीव की,
7:28संसार अवस्था के अंदर। Even ज्ञानी की भी। जैसा अंदर में स्वभाव है
7:34वैसा बाहर में परिणमन तो नहीं है। स्वभाव तो पूर्ण वितराग है।
7:38लेकिन ज्ञानी की अवस्था देखें तो
7:40आंशिक वितराग है, पूर्ण वितराग नहीं है, राग द्वेष उनको भी होते हैं।
7:44ये जो स्वभाव का और परिणमन का जो मेलजोल नहीं है।
7:49अंदर एक बाहर एक। अंदर एक बाहर एक उसको कहते हैं माया।
7:55क्रोध, मान, माया, लोभ। माया लोभ। मुख में राम बगल में छुरी नहीं कहते हैं।
8:00उसका नाम माया। जैसा दिखता है वैसा है नहीं और है
8:04ऐसा दिखता नहीं है। ये माया के परिणाम हैं।
8:10गुप्त रहता है। हकीकत गुप्त रहती है। और बाहर जो दिखाई देता है वो...
8:17तो जैसा स्वभाव है वैसा ही उनका अभिप्राय बन चुका है ज्ञानी पुरुष।
8:23प्रवृत्ति में रहने से... देने से। वो हर्षित हो जाते हैं।
8:28शोक मग्न हो जाते हैं ऐसा नहीं है।
8:31चिंतित हो जाते हैं, भयवान हो जाते हैं, तकलीफ में आ जाते हैं ऐसा नहीं है।
8:36क्योंकि फुर्सत से ज्ञानी अपने को संभालते रहते हैं। और अवस्था में
8:42भी निर्लेप रहने की कोशिश रहती है।
8:45होवे नहीं होवे दूसरी बात है, अभिप्राय में निर्लेपता है।
8:49भिन्नता है, भिन्नता माने touch भी नहीं करते हैं किसी भाव को।
8:53अलग-अलग... करते हैं कुछ
8:56भाव अलग-अलग रहते हैं बिल्कुल। झमेले में
9:00भी अपने को अलग रखते
9:02हैं। फिर भी कृपाल देव का कहना है सावधान करने के लिए कि भैया माया का
9:06भरोसा नहीं करना। माया दुस्तर है।
9:08माया रूपी समुंदर ऐसा है कि उसे चीर नहीं सकते।
9:13चीर नहीं सकते ऐसा नहीं दुस्तर है माने क्या कठिनता से चीरा जा सकता है।
9:18चीरना असंभव है ऐसा नहीं दुस्तर। ऐसा नहीं,
9:22दुस्तर। बहुत बहुत मुश्किल से पार सकोगे
9:24माया के समुंदर से। कोई easy बात नहीं है कि जैसा अंदर में स्वभाव हो,
9:29वैसा का वैसा बाहर में भी
9:31वितरागता पूर्ण हो, ये कोई easy बात नहीं है। ज्ञान दशा होने के
9:35बाद अभिप्राय में भले ही नहीं हो,
9:38लेकिन परिणाम भी... जैसा अंदर में स्वभाव है वैसा ही होना, ये कोई easy बात नहीं है।
9:46माया दुस्तर है। माया का समुंदर ऐसा है... माया का समुंदर ऐसा है
9:50कि बहुत परिश्रम करने के बाद ही तीर्थ सकोगे।
9:53ऐसा easily वो तैरना संभव नहीं है ज्ञानी को भी।
9:57दूसरी एक बात किलियां दुरंत हैं। माया का
10:03जो विस्तार इतना बड़ा है, इतना बड़ा विस्तार है।
10:07कि जैसा कि उसका अंत नहीं आएगा ऐसा लगे अपने को लेकिन अंत आता है।
10:14लेकिन बहुत
10:15बहुत चलने के बाद
10:16बहुत परिश्रम बहुत। चलने के बाद बहुत परिश्रम बहुत गति पुरुषार्थ करने के
10:19बाद ही उसका अंत आता है।
10:21स्वभाव का और परिणमन का जो भेद है। जो difference है।
10:27ये दुरंत है दुरंत माने क्या बहुत देर के
10:29बाद बहुत परिश्रम उठाने के बाद उसका अंत आता है।
10:34तब जाकर के वो दोनों का मेल होता है जैसा स्वभाव वैसा परिणमन।
10:39सिद्ध भगवान को जैसा स्वभाव वैसा परिणमन है।
10:42हरिहर भगवान को जैसा स्वभाव वैसा परिणमन है। ऐसा परिणमन है इसके नीचे के जो
10:46ज्ञानी पुरुष हैं साधना करने वाले आचार्य देव मुनिराज उपाध्याय साधु
10:53या श्रावक या चौथे गुणस्थान भरती सम्यक दृष्टि
11:06उसको बहुत मुश्किल से
11:09माया का समुंदर तैरना पड़ता है तैर तो लेंगे वो। फिर तो लेंगे वो।
11:14लेकिन बहुत दूर बहुत दूर। बहुत चलने के बाद आवे ऐसी मंजिल है वो।
11:20ज्ञान दशा से परमात्मा बनने में कोई निश्चित निश्चित time limit नहीं है।
11:26अज्ञान दशा से ज्ञान दशा में आने के लिए time limit है।
11:33अगर जीव सही प्रयत्न करे, ज्ञानी की आज्ञा अनुसार चले,
11:38थोड़ी भी गलती ना करे तो 6 महीने में हो जाए। में हो जाए तो आसान है
11:46लेकिन ज्ञान दशा आने के बाद जैसा स्वभाव हमने अपने
11:51ज्ञान में अनुभव किया है जैसा स्वभाव परमात्मा का हमने अनुभव किया है
11:58वैसा ही
12:00पूर्ण उदास पूर्ण वितराग हमारी अवस्था भी
12:03हो जाए अवस्था में भी अंत मात्र भी राग द्वेष ना होवे मन में अंत मात्र भी
12:06राग द्वेष के विकल्प। मन में
12:08अंत मात्रा में राग द्वेष के विकल्प नहीं आवे।
12:12उसके लिए तो कोई time limit नहीं है, किसी को तो उसी भाव में हो जाए।
12:16और किसी को बहुत लंबे 8 10 भाव 15 भाव में बाद में होवे।
12:21कोई कोई उपसम ज्ञानी होता है तो अगर प्रमाद करे, जागृति में ना रहे तो गिर भी जावे।
12:26तो फिर बहुत सारे भाव भी करना पड़े। मुक्ति निश्चित है। लेकिन time limit निश्चित
12:33है। कब मुक्ति होगी अब, कब परमात्मा बनेगा,
12:35क्योंकि माया दुस्तर है। कारण के माया दुस्तर छे, माया दुरंत छे.
12:41क्षणवार पण, समय एक पण,
12:44एने आत्माने विशे स्थापन करवा योग्य
12:49नथी. मतलब क्या? एक समय मात्र भी let go
12:54करने योग्य नहीं है. ज्ञानी को ज्यादातर खेद होता है. तो खेद किस
12:59प्रकार का होता है? ज्यादा
13:01पुरुषार्थ करते है तो खेद बढता
13:03है. फुर्सत करते हैं तो खेत बढ़ता है।
13:07फुर्सत ज्यादा करते हैं तो खेत भी बढ़ता है।
13:10फुर्सत ज्यादा करते हैं मतलब क्या जागृति बढ़ती है। जागृति जितना बढ़ती है,
13:17उतना खेत भी बढ़ता है क्यों? क्योंकि परिणाम
13:19तो जैसा स्वभाव है वैसा तो नहीं है। तो खेत बढ़ते जाता है।
13:24बस तो ज्ञानी safe हो जाता है। देखो ये safety का कारण क्या है?
13:30Safety का कारण क्या है? जागृति। जागृति का... जागृति। जागृति के कारण अपने
13:34जैसा स्वभाव है ऐसा परिणमन नहीं है।
13:36परिणमन उल्टे हैं बिल्कुल।
13:39अंदर में उदासीनता है लेकिन बाहर में वैसी उदासीनता नहीं है।
13:42बाहर में involve हो जाते हैं हर बात बात में। fix हो जाते हैं।
13:48ये जो difference है। ये जो मायापना है माया। कपटीपना अंदर एक बाहर एक ऐसा जो है।
13:57इसका ज्ञानी को बहुत दुख लगता है। वो दुख कब लगता है? जब जागृति... तो दुख कब लगता है
14:01जब जागृति बढ़ती है मतलब फुर्सत बढ़ता है। तो ऐसे परिणाम को देख कर के
14:07झिझलाहट आ जाती है। परिणाम control के बाहर हो जाता है।
14:13क्षणवारपण समय एकपण एने आत्माने विषे स्थापन करवा योग्य नथी।
14:19कि नहीं अभी हम तो 4थे गुणस्थान में हैं
14:21तो हमारे तो ऐसे परिणाम होंगे ही। नहीं ऐसा करने योग्य नहीं है।
14:28हमारी मजबूरी है। अभी हमारी कमजोरी है।
14:32हमारे में अभी इतना चरित्र गुण develop नहीं हुआ है, स्थिरता की कमी है।
14:37इसीलिए हमारा से उपयोग जैसा स्वभाव है वैसा उपयोग नहीं रहता है।
14:41ऐसे परिणाम नहीं रहता है। हमको माफ़ करो। हमको excuse करो। नहीं
14:48है। क्षणवार भी, एक समय मात्र भी,
14:52इसे आत्मा ने विषय स्थापन करना योग्य नहीं है। ऐसी अपनी कमजोरी... ऐसी अपनी कमजोरी को
14:59स्थान देने योग्य नहीं है आत्मा में। Let go
15:03करने योग्य नहीं है, दुर्लक्ष करने योग्य नहीं है।
15:07दुर्लक्ष नहीं करेगा उसको गलती को गलती मानेगा, उसका खेद होगा। तो safety हो जाएगी।
15:15अगर ये नहीं हुआ खेद। तो इसका मतलब साफ है। कि जीव के
15:21स्वभाव के अनुकूल परिणाम नहीं होने पर भी। ज्ञानी पुरुष। ज्ञानी पुरुष को अगर
15:26खेद नहीं होता है तो
15:28जागृति में कमी है। जागृति नहीं है, अवलोकन नहीं है।
15:33मतलब पुरुषार्थ नहीं है। पुरुषार्थ वाले ज्ञानी पुरुष को
15:37तो निरंतर खेद रहता है और वो खेद उदासीनता में वृद्धि करता है।
15:41ये खेद उसको संसार के प्रसंगों से जुड़ने से बचाता है।
15:47ज्ञानी पुरुष का जो ज्ञान होता है आचार्य,
15:51जो होता है, वो तो यही होता है कि बेटा मैं भी
15:54आत्मा हूँ। मैं ही आत्मा हूँ। गाड़ी से अलग हो जाता है
15:57क्या वो? गाड़ी petrol दीजिए मैं तो नहीं देता हूँ गाड़ी। उस तरह से अलग ही
16:02रहता है उनका तो कार्य। नहीं वो स्थिरता का पुरुषार्थ,
16:06द्रव्य दृष्टि का पुरुषार्थ। ये भी पुरुषार्थ है।
16:09सबसे पहले वो वही try करेगा। द्रव्य दृष्टि वाला पुरुषार्थ।
16:14जो परिणाम में जैसा होना है वो मैं तो ध्रुव परमात्मा हूँ।
16:18उसकी दृष्टि छोड़ता नहीं हूँ। तो ही वो सुखी रहता है।
16:23क्योंकि खेत इतना बढ़ गया है कि अब वो खेत को
16:25neutral करने के लिए वैसा दृष्टि में आना ही पड़ता है उसको। तो
16:31द्रव्य दृष्टि का पुरुषार्थ बोलते हैं इसको। लेकिन अगर उसमें नहीं रह सकता है तो फिर
16:36क्या? तो फिर जागृति वाला पुरुषार्थ रहता
16:38है। और जागृति वाला तो पुरुषार्थ है।
16:41ये बहुत तकलीफदाई है तकलीफदाई क्यों है?
16:44कि जैसा हमारा स्वभाव हमने अनुभव किया है
16:46पूर्ण निर्दोष, पूर्ण वितराग, संपूर्ण... पूर्ण वितराग
16:49संपूर्ण तत्व
16:51अंश मात्र भी मलिनता नहीं। ऐसा स्वभाव होने पर भी परिणाम ऐसे नहीं है।
16:58और उस परिणाम का ज्ञानी को बहुत खेद होता है।
17:02जैसे-जैसे ज्ञान की दशा बढ़ते जाएगी। चौथे गुणस्थान में आया। तो
17:08वो प्रमादी बहुत होता है लेकिन पुरुषार्थ करने लगेगा तो
17:11अशुभ भावों के ऊपर उसको बहुत खेद हो जाएगा क्योंकि जागृति बढ़ गई अब।
17:15फिर आगे क्या होगा?
17:18जागृति बढ़ने से, अशुभाव में खेत बढ़ने से, वो खेत limit के बाहर जाता है।
17:23तो क्या होता है? तो अंदर में स्थिरता बढ़ती है क्योंकि ये जो
17:28राजीपा नहीं है, अपने परिणाम के साथ वो राजी नहीं है। तो उसको वो परिणाम के
17:35गलती को मिटाने के लिए उसके पास एक ही इलाज है, कौन सा है?
17:38द्रव्य दृष्टि वाला, स्वभाव को
17:40देखना। दूसरा तो हाथ पैर मारेगा नहीं।
17:42ज्ञानी दूसरा उपाय तो करेगा नहीं, यही उपाय करेगा। नहीं
17:43दूसरा उपाय तो करेगा नहीं यही उपाय करेगा।
17:46कि अपने स्वभाव को देखेगा, परिणाम को दुर्लक्ष कर देगा।
17:49तो स्थिरता बढ़ेगी। बाहर हटते ही दुख होता है और अंदर जाते ही सुख हो जाता है।
17:56ऐसी चाल चलता है। ऐसा अंदर में स्थिरता बढ़ती है। तो पहले तो अशुभ भाव बुरे लगते थे।
18:03लेकिन अंदर में स्थिरता बढ़ती है।
18:05तो फिर अब शुभ भाव भी बुरे लगने लगेंगे। वो उतना भी बाहर नहीं जाना है। देखो।
18:12क्योंकि वो भी तो विभाव भाव है। जैसे अशुभ भाव पाप के भाव बंध का कारण है।
18:18ऐसे शुभ भाव आत्मचिंतन हो, स्वाध्याय हो,
18:22पूजा भक्ति हो, ये सब भी। द्रव्य दृष्टि की स्थिरता बढ़ती है जिसको
18:27उसको वो भी दुखदाई लगता है।
18:29क्योंकि उसमें time waste होता है उसका। Time waste तो होवे ही होवे ऊपर से
18:33बंधन होता है।
18:36उस बंधन के कारण स्वर्गादि में बहुत लंबा लंबा आयुष्य मिलता है
18:39वहां वहां भटकना पड़ता है। वहाँ पटकना पड़ता है
18:42जो ज्ञानी को मंजूर नहीं है तो
18:46उसमें भी उसको बहुत दर्द होने लगता है तो ऐसे साधना का स्तर और बढ़ जाता है
18:52और आगे बढ़ता है तब जाकर के क्या होता है मुनि अवस्था आ जाती है जिसमें
18:59साधना बहुत अच्छी चलती
19:02है शुभ भाव तो उस time में रहते ही नहीं हैं शुभ भाव रहते
19:04हैं कभी-कभी लेकिन वो भी सुहाते
19:07नहीं हैं वापस चले आते हैं अंदर झुला झुलते हैं। वापस चले आते हैं अंदर, झुला
19:09झूलते हैं। श्रावक में अभी उतनी स्थिरता नहीं है।
19:13क्योंकि इतना शुभ भाव के प्रति इतना तीव्र अनादर होना चाहिए,
19:17तीव्र दुख लगना चाहिए, ऐसा श्रावक को नहीं लगता है।
19:21ज्ञानी को तो शुभ भाव में मजा आता है, शुभ भाव में मजा आने का मतलब क्या?
19:25तो उसको अशुभ भाव और शुभ भाव है तो पहले किसको तकलीफदायक समझेगा?
19:31अशुभ भाव को तकलीफदायक समझेगा। सत्संग में मजा आएगी, भक्ति में मजा आएगी। आदरियों के
19:34साथ रहने में मजा आती है।
19:35क्योंकि... साथ रहने में मज़ा आती है
19:37क्योंकि इतनी साधना में कमज़ोरी है। साधना बढ़ेगी तो फिर वो भी सब ख़त्म गायब।
19:41अशुभ भाव में तीव्र खेद, शुभ भाव में भी दुर्लभ।
19:45लेकिन फिर भी जितनी साधना अभी अभी आगे नहीं बढ़ी है
19:50तब तक शुभ भाव में खेद नहीं होता है।
19:52फिर बाद में शुभ भाव में भी खेद होना चालू हो जाता है। स्थिरता अंदर में बढ़ेगी।
19:56ये सब क्रमशः पहले अशुभ भाव चलते हैं फिर शुभ भाव और आखा तक ज्ञान दशा
20:02और फिर शुभ भाव भी चलते हैं
20:05और मात्र। स्वभाव भी तलते हैं और मात्र अंदर के अंदर की स्थिरता बढ़ती रहती है।
20:09कि मुनिराज को स्थिरता बढ़ती है तो फिर आगे श्रेणी लगा करके पूर्ण वितराग बनते हैं।
20:14लक्ष्य हमारा पूर्ण वितरागता है। मतलब पूर्ण वितरागता माने क्या?
20:20स्वभाव तो वितराग ही है, पूर्ण वितराग ही है। अवस्था वितराग नहीं है। तो
20:26ज्ञानी है उसको शांति नहीं चाहिए अब, सुख नहीं चाहिए अब। इधर कहीं लिखा है, इधर
20:33लिखा है। 324 में एक line है, सम्यक दर्शन का मुख्य लक्षण वितरागता
20:39जानते हैं, वैसा अनुभव है।
20:42सम्यक दर्शन का मुख्य लक्षण वितरागता है, वितरागता माने क्या करना
20:46नहीं करना ऐसे अभिप्राय से हट जाना।
20:49मात्र ज्ञाता दृष्टा धम्म, तो सम्यक दर्शन हो जाएगा।
20:52ऐसा Prabhupada का अनुभव भी है और वितरागता इसका सम्यक दर्शन का मुख्य मुख्य लक्षण है।
20:58सम्यक दर्शन हुआ कैसे मालूम पड़ेगा?
21:00कि अभिप्राय पूर्वक के... कि अभिप्राय पूर्वक के उसके कोई भी राग द्वेष नहीं
21:04होंगे तो सम्यक दृष्टि हो
21:05गया। आचरण में फिर भी है।
21:08अभिप्राय पूर्वक के नहीं है राग द्वेष तो समझना कि वो उस सम्यक दर्शन उसको हो गया है।
21:13जैसे मीठापन है वो शक्कर का लक्षण है, खारापन है वो नमक का लक्षण है।
21:18ऐसे वितरागता उत्पन्न हो गई, परिणाम में वितरागता आई, अभिप्राय में।
21:23समझ लेना हम ज्ञान दशा में आ गए।
21:26तो बहुत अपूर्व दशा होती है। तो ज्ञानी को... तो ज्ञानी को अब सुख नहीं चाहिए।
21:31सुख तो मिल ही गया है। तिजोरी भरी है उसका बांध तो है। वितरागता चाहिए।
21:36क्योंकि ऐसी वितरागता जैसे स्वभाव में पड़ी है ऐसी अवस्था में नहीं है।
21:41वो वितरागता का पुरजोर करता है। कि हर प्रसंग में मैं neutral क्यों नहीं रह सकता हूँ?
21:47राग द्वेष रहित क्यों नहीं रहता हूँ?
21:50क्यों involve हो जाता हूँ? नहीं चाहते हो भी क्यों involve होता हूँ?
21:53ऐसे अपने परिणाम को देखता है तो बहुत तकलीफ हो जाती है। दुखी हो जाता है।
21:58दुख महसूस करता है। फिर दुख किस बात का है कि हमारी साधना उतनी उत्कृष्ट नहीं है।
22:03हम बार-बार फंस जाते हैं, इसलिए दुख होता है। तो क्या कहते हैं, अत्यंत उदास
22:10परिणाम में रहा हुआ चैतन्य।
22:13उसे ज्ञानी प्रवृत्ति होने पर भी वैसा का वैसा
22:15intact उदासीन उदासीन उदासीन ही रखता है।
22:19फिर भी कहते हैं। कि माया दुस्तर छे दुरंत छे। ये द्रव्य। ए द्रव्य
22:25स्वभाव और द्रव्य परिणामन उसका जो भेद है
22:29बहुत मुश्किल से बहुत लंबे समय के बाद मिटता है
22:32एकदम easily नहीं मिटता है कितना ही पुरसाध करो।
22:36क्षण भर पर समय एक पर एने आत्माने विषय स्थापन करवा योग्य नथी
22:41के हमारी भूमिका में ऐसा ही होता है करके उसको easily लेने की जरूरत नहीं है।
22:46निरंतर जागृत रहो। एवी तीव्र दशा आवे थी इतनी तीव्र दशा हो जाएगी।
22:54और जागृति निरंतर रहती है और जो difference है परिणाम का और द्रव्य का वो खटकता है।
23:00जितना ज्यादा खटकता है, उतनी दशा तीव्र होती है। ऊंची ऊंची level की होती है।
23:09हेवी तीव्र दशा आवै अत्यंत उदास परिणाम उत्पन्न थाए छै। देख।
23:17सत्संग में आने के बाद। नहीं अपना जागृति में अपना अवलोकन से ही मालूम पड़ता है।
23:22जागृति में अपने अवलोकन से ही मालूम पड़ता है। ज्ञानी हो गया तो
23:25महिमा तो है ही। ज्ञानी की बात है।
23:28ज्ञानी को तो आत्मा का अनुभव है ही है। और पुरुषार्थ नहीं करता है,
23:32अवलोकन ज्यादा नहीं करता है, प्रमाद करता है तो आगे नहीं बढ़ता है।
23:36तो difference जो है द्रव्य स्वभाव का और परिणाम का उसको खटकता नहीं है।
23:41जागृति का पुरुषार्थ करेगा इसलिए तो कहा। कि
23:45ज्ञानी ऐसी ही प्रवृत्ति करते हैं फिर भी माया दुरंत है
23:48दुस्तर है। तुरंत है दुस्तर है। इसीलिए ज्ञानी को कहते हैं कि क्षण भर भी समय
23:53एक भी ऐसे difference को ऐसी माया को
23:57आत्मा में स्थान देने योग्य नहीं है उसको दूर से ही नमस्कार करना है get
24:00out करना है। तो कहने का मतलब समझ में इस तरह से आ रहा है कि
24:05जो अपनी अवस्था है शरीर आदि
24:07की उस अवस्था को हम अपने को
24:09किसी भी क्षण भी उसको accept नहीं करना है।
24:13वही है ना? हाँ इसके अलावा जो अभी भी आचरण में जो राग द्वेष होते हैं involvement
24:17होता है बाद में। राग
24:17दोष होते हैं involvement होता है बाद में। ऐसी जो हमारी कमजोरी है।
24:20उसको भी accept नहीं करना है। Accept नहीं करोगे इसलिए वो नहीं होंगे ऐसी बात नहीं है।
24:26लेकिन इसका रस टूट जाएगा। और आगे बढ़ने के अंदर रस
24:31बाधा रूप है वो हट जाता है तो
24:32आगे बढ़ जाते हैं। जैसे दर्शन में का भ्रांति
24:36का रस था ऐसे चारित्र में का भी रस है एक।
24:40अगर हम उसको accept करते जाते हैं let go करते जाते हैं तो वो रस टूटता
24:43नहीं है। और जागृत... नहीं है।
24:45और जागृति में रह करके अपने आप को खेद अपने आप खेद आता है
24:48अपनी कमजोरी के ऊपर अफसोस होता है।
24:51सहज खेद आता है जागृति के कारण। तो ये चारित्र मोह का जो उदय है
24:56जो कषाय परिणाम होते हैं उसका रस टूटता है। रस टूटे बिना कमजोर होता नहीं है परिणाम।
25:03और परिणाम का नाश नहीं होता है।
25:06पूर्ण वितराग दशा होने के लिए
25:07चारित्र में भी जो क्रोध मान माया लोभ आदि जो भाव होते हैं
25:10वो भी खत्म होना है। अभिप्राय में नहीं है हमारा दोष करना। ऐसा सिर्फ इतना नहीं चलेगा।
25:18परिणाम में भी राग द्वेष नहीं होने चाहिए। तो परमात्मा बनोगे। अवलोकन में। हाँ
25:24अवलोकन में। तो अवलोकन इसलिए है। automatic जो दुख। हम्म। और
25:31दुख लगना अच्छा है। जितनी साधना में जागृति बढ़ेगी उतना दुख बढ़ते जाएगा। नहीं
25:36दुख भी अपन लगा... नहीं लगना नहीं automatic आता
25:39है। natural... Automatic आता है। Natural आते हैं तो ही सही है,
25:43अगर लगा करके दुख करते हैं तो वो तो झूठा हो गया।
25:46वो तो और कपट भाव हो गया। ऐसा नहीं natural आना चाहिए वो।
25:49जितना natural आएगा, जितनी जागृति बढ़ेगी, जितना खेद होता है
25:53उतना आगे बढ़ता है जी। तो क्या होता है, खेद होता है तो क्या होता है?
25:59इतनी जागृति होती है तो क्या होता है? तीव्र दशा हो जाती है।
26:03एवी तीव्र दशा होने से
26:04अत्यंत उदास परिणाम उत्पन्न थाए
26:06चाहे। मतलब neutral अवस्था। मतलब neutral अवस्था, neutral अवस्था। जैसा
26:10स्वभाव neutral है ना,
26:12बस बाद में परिणाम भी कोई पूछेगा तो कैसा है, अच्छा है, बुरा है?
26:18ना अच्छा है ना बुरा है। जहाँ तक हो सके
26:21अपुन involve नहीं होना चाहते हैं कोई
26:23प्रसंग में। अगर कोई दूसरा करता है तो भैया तुम कर लो
26:25ना, जो भी बराबरी है जो भी है।
26:26तू करेगा अच्छा ही करेगा।
26:28भले उससे गलती होती है लेकिन जो करेगा अच्छा ही करेगा। क्यों? इसमें स्वयं बच जाता है।
26:34और स्वयं को बचाने की चेष्टा है। वो कोशिश करता है। नहीं set होता है, हट जाता है।
26:41भई आप कर लो, जैसा आप ठीक समझे, मैं राजी हूँ हर एक में।
26:44आप सही करोगे तो राजी हूँ, गलत करोगे भी तो राजी हूँ। क्यों?
26:49ये जागरूकता है कि अपने परिणाम तो नहीं बिगाड़ना है, चाहे कुछ भी हो जाए। सही हो
26:53चाहे गलत हो, हमारे परिणाम तो हमको नहीं बिगाड़ना है।
26:57आग्रह में तो हमको नहीं रहना है।
26:59ये आग्रह रहते हैं, ऐसा नहीं, ऐसा करो,
27:02वैसा नहीं, यही तकलीफ है बहुत बड़ी। उसमें अपने परिणाम बहुत मलिन होते हैं।
27:06उसमें अपने परिणाम बहुत मलिन
27:07होते हैं उसका बहुत दुख लगता है
27:09तो फिर वो अपने को प्रसंग में से हटा लेता
27:11है। Involve नहीं होगा अगर involve होगा तो बहुत तकलीफ हो जाएगी उसको।
27:14Involve होना नहीं चाहता है। देखना नहीं दाजना नहीं ऐसा हो जाता है।
27:18इसको क्या बोलते हैं? इसको सामने वाला द्वेष गिनेगा।
27:24लेकिन हकीकत में क्या है हकीकत में उदासीनता है।
27:29ये गृहस्थ दशा में भी ऐसा हमारी हालत हो सकती है
27:32ये बात कहते हैं यहाँ पर आगे।
27:33ए वात कहे छे अहींया आगळ. एवी तीव्र दशा आवे अत्यंत उदास परिणाम उत्पन्न
27:39थाय छे. अने एवा उदास
27:41परिणामनी जे प्रवर्तनाम. प्रवृत्ति. ग्रहस्थपणा सहितनी. अभी
27:44कुटुंब परिवार के बीच में रहेता है तो भी एसी
27:49action reaction हो जाता है. परिणाम एसे चलते है जो भी पूछो. कोई जवाब नहीं हा नहीं
27:54हुं नहीं. फिर भी जबबथी पूछो
27:56एसा आपको ठीक लगे बस सब okay
27:58है मेरी तरफ से कोई बाधा नहीं है. मेरी
28:02तरफ से, मेरी तरफ से कोई बाधा नहीं है. ए क्या हो
28:07गया? सरफोडी करना नहीं चाहता है जी, हसना नहीं चाहता है. तीव्र दशा आवे, अत्यंत
28:13उदास परिणाम उत्पन्न थाय छे अंदर से. अने एवा उदास परिणामनी जे प्रवृत्ति,
28:18प्रवर्तना, ग्रस्तपणा सहितनी, ते अबंध
28:20परिणामी कहेवा योग्य छे, आ बंधन में नहीं आता है जी,
28:24safe हो गया. ए जो
28:27involve नहीं होना ए जो कार्य है...
28:30नहीं होना ये जो
28:31कार्य है दूसरों को ऐसा लगता है support नहीं करते हैं। क्या फायदा? पूछे तो
28:35भी जवाब नहीं ऐसा लगता है दूसरों को।
28:38लेकिन वास्तव में इसके तरफ से देखें तो क्या है?
28:40ऐसी जो उदासीनता प्रवृत्ति में भी जो आ गई स्वभाव में तो पहले से है।
28:45वो तो अज्ञानी के स्वभाव में भी है उदासीनता। वितराग स्वरूप है। जिन सोई ये आत्मा।
28:51अन्य होई सो कर्म। कर्म कटे सो जिन वचन। यही धर्म का प्रवचन का मर्म।
28:58जिन है वो आत्मा है।
29:00आत्मा हो नरक में हो
29:02निगोद में हो किधर एकेंद्रिय में हो किधर भी हो वो जिन है मतलब वितराग है।
29:06उसका मूल स्वभाव तो ऐसा है। लेकिन ये वितरागता की झलक अब परिणाम में आने लगी।
29:13इसमें एक अगर वो अंदर चले जाता है। तो उसको तो tension हो जाता है।
29:19प्रेम करने वाले को बहुत tension हो जाता है। ऐसा
29:22कैसा ऐसा कैसा। तो प्रेम के साथ अधिक। तो प्रेम के साथ अधिकारीपना आ जाता है वहाँ
29:27उसको तकलीफ हो जाती है बहुत।
29:28जबकि यहाँ साधना चल रही है।
29:33गृहस्थपने में भी ऐसा होता है जब ऐसा होता है।
29:37स्वभाव की झलक परिणाम में आती है उदासीनता की। तो वो जीव अबंध परिणामी कहने
29:43योग्य है ऐसे ज्ञानी पुरुष प्रवृत्ति में रहते हुए
29:47भी अबंध परिणामी हैं उनको कोई बंधन नहीं है।
29:52ऐसी स्थिति किसकी होती है? ये बात कहते हैं। जे बोध स्वरूपे स्थित छे।
29:59बोध स्वरूपे स्थित छे माने क्या? जिनेश्वर की आज्ञा के अंदर प्रवर्तमान है।
30:04जिनेश्वर की, गणधरों की,
30:06अपने से आगे ज्ञानियों की, सद्गुरुओं की आज्ञा के अनुसार चलते हैं।
30:10उनके बोध के अनुसार प्रवृत्ति करते हैं। इसका मतलब बोध स्वरूप में स्थित हैं।
30:16वही जीव इस प्रकार से कठिनता से वर्तना कर सकता है।
30:20वो भी कठिनता से कर सकता है। ये बहुत बहुत बहुत परिश्रम चाहिए इसके अंदर।
30:26गलतियां ज्यादा और सफलता बहुत कम है इसके अंदर।
30:30सद्गुरु की आज्ञा पे चलने वाला जीव भी
30:33इस प्रकार की प्रवृत्ति बहुत कठिनता से कर सकता है।
30:38मामूली बात नहीं है कि जैसा स्वभाव है वैसा हम परिणाम से भी निर्लेप रह सकें।
30:43अगर रहे तो बहुत बड़ी जबरदस्त साधना है।
30:48इतनी जबरदस्त साधना है गुरुदेव
30:52जो कृपावल्लभ देव को
30:52मिले थे। कोई जीव गुरुदेव को भी मिला था। कंजसामी भी।
31:00और इतनी तारीफ कर रहा था। वो वेदांती था। जैन धर्म ही नहीं था।
31:07लेकिन कोई भी जैन कृपावल्लभ देव के बारे में जैसा है वैसा बोलता था।
31:13तो बोलता था कि हमने कृपावल्लभ देव को
31:14देखा है। भले हम जैन नहीं हैं लेकिन... भले
31:16हम जैन नहीं हैं लेकिन उनको हमने देखा है उनकी उदासीनता।
31:21क्या कहना साधुओं में भी नहीं है। क्या बोले? ऐसी परम उदासीनता
31:27चेहरे पे झलकती थी। बड़े-बड़े त्यागी तपस्वियों
31:31में योगियों में भी ऐसी उदासीनता नहीं होती है। खबरदार जो कोई कुछ बोला है तो
31:35उनके बारे में। वो
31:39जो व्यक्ति था वो गुरुदेव को मिला और ये सब बातें कर रहा था वो।
31:43श्रीमद् राजचंद्र में वैराग्य यानी
31:45उदासीनता। श्रीमद आचंद्रनो वैराग्य एनी उदासीनता एनी तोले कोई ना आवे
31:50एम. ओ ग्रहस्थ फिर भी
31:52साधु से भी बडके थे. एसा एसा
31:55केहते थे के ओ अबंध परिणामी है. जे बोध
31:58स्वरूपे स्थित छे ते एम कठिनताथी वर्ती शके छे कारण... क्युं?
32:03बोध मिलने पर भी आज्ञा पे चलने पर भी बहोत मुश्केल से एसा कार्य
32:09होता है. एसा क्युं? क्योकी तेनी विकटता परम छे. विकटता परम
32:14से ऐसे जीवों की ऐसी साधना
32:16बहुत मुश्किल से होती है।
32:18ऐसे जीवों की उपस्थिति भी बहुत परम विकट है। भाग्य से ही दर्शन होते हैं ऐसे जीवों का।
32:24करोड़ों लाखों अब्जों में एकाध मान मन ज्ञानियों में भी विरल।
32:29ऐसे ज्ञानी भी ज्ञानी तो होते हैं लेकिन इस प्रकार के उदासीन
32:35परम विकट है। क्यों परम विकट है? क्योंकि ऐसी साधना बहुत मुश्किल से होती है।
32:42किसको बहुत मुश्किल से होती है?
32:45जो ज्ञानी की आज्ञा पे चलते हैं उनको भी बहुत मुश्किल से ये हासिल होता है।
32:50ये साधना कर सकते हैं, सबकी बस की बात नहीं है। अब आगे कहते हैं।
32:58दृष्टांत के रूप में।
33:00विदेहीपणे जनक राजानी प्रवृत्ति। ते अत्यंत उदास परिणामी लीधे रहती। जनक
33:03राजा के बारे में
33:04बहुत कहते हैं कि वो
33:07ज्ञानी... वज्र के बारे में बहुत कहते हैं कि वो ज्ञानी थे। महोलों में रहते थे।
33:13लेकिन जबरदस्त उदासीनता से। Terrific जिसको बोलते हैं।
33:20मन में भी कि कहीं किसी पदार्थ के प्रति अंश मात्र भी मोह नहीं होता था उनको।
33:26इतनी जागृति थी उनको दिन रात। इतना परिश्रम था उनका। साधना इतनी जबरदस्त थी।
33:32इसलिए जनक राजा का नाम विदेही राजा
33:34विदेही राजा हो गया था। विदेही जनक राजा ऐसा कहते हैं।
33:39जैसे doctor बनता है तो आगे doctor लिखते हैं ना? Doctor फलाना अभी उसको
33:43श्री भी नहीं doctor। ऐसे ऐसे साधना महलों में रहकर करते थे।
33:49कि इनके लिए आगे नाम के आगे विदेही रख दिया गया।
33:52कि देह में भले रहते हैं लेकिन देह
33:54देह में रहते ही नहीं देह का लक्ष्य ही नहीं है उनका। एकदम
34:00जो जंगल में योगी पुरुष नहीं कर सके ऐसी साधना वो महल में रहकर
34:04के। बिल्कुल। देखरके बिलकुल देहमां मूर्छा विना रहेते थे. इसको नाम विदेही
34:09जनक राजा एसा कहेते है.
34:11विदेहीपणे जनक राजानी प्रवृत्ति ते अत्यंत
34:14उदास परिणामने लीधे रहेती. घणुं करीने तेमने
34:17ते सहज स्वरूपमां आवी. पर उसके लिये कोई उनको
34:22प्रयत्न नहीं करना उदा एकदम समजो artificially करना एसा नहीं है.
34:26automatic उनकी एसी अवस्था हो गई थी. केमकी practice बहोत जबरदस्त
34:30थी. साधना साधना बहोत top
34:33level की थी. साधना साधना बहुत
34:34top level की थी। तो उनके लिए
34:36ऐसी उदासीनता में रहना, ऐसी विदेही दशा में रहना
34:39साधारण सी बात थी, automatic था उनके लिए। तथापि,
34:45तथापि जनक राजा क्या करते थे? तथापि कोई माया ना दुरंत प्रसंग मा,
34:53समुद्र नेविसे जेम नाव यतकिंचित डोलायमान थाय।
34:58समुद्र में नैया है चलती है देखिए।
35:00नहीं आवे चलती हे लेकिन फिर भी कभी कभी डुलायमान
35:05हो सकती हे. अगर
35:07पाणी ज्यादा उछाळा मारे तो.
35:10तथापी कोई मायाना दुरंत प्रसंगमां समुद्रने
35:13विशे जेम नाव यतकिंचित डोलायमान थाय. तेम आवा उदासीन परिणामनुं
35:18पण डोलायमानपणुं थवानुं संभव होवाथी. उदासीनता तो आवी हे जबरदस्त. लेकिन आवी
35:24परमात्म दशा नहीं आवी हे. लेकीन अभी परमात्म दशा नहीं आई
35:29है. हा इतनी level
35:31नहीं आई है. तो कभी भी हो सकता है के परिणाम
35:37में वापिस गडबडी हो
35:39जाय. इसका संभव है. मायाना
35:42दुरंत प्रसंगमां. नावनी जेम ते परिणामनुं डोलायमान
35:46थवापणुं संभवित होवाथी. अभी है नहीं उदासीनता intact
35:51है. लेकिन. कभी भी ओ उदासीनता बिगड सकती है. सती छे. जो के संसारनी प्रवृत्तिमां
35:57रहे छे. अने जीव के
35:59परिणाम के विचित्रता छे. आज उदास छे,
36:02कल वापिस लागी जेवी बन जावे. एसा भी बन
36:06सकता है. परमात्मा बनने के बाद तो safe लेकिन इसके पहेले
36:10safe नहीं है, परिणाम के कोई बोल नहीं सकते कब
36:15कैसे परिणाम होगे. ते
36:17परिणामनुं डुलायमानपणुं थवानुं संभवित होवाथी,
36:20प्रत्येक मायाना प्रसंगमां, केवळ जेनी उदास
36:23अवस्था छे. अवस्था से। एवा निज गुरु अष्टावक्र।
36:29देखो जनक राजा उदासीन रहते थे।
36:32महल में भी परम उदासीन थे
36:33इसके बावजूद भी। कि मेरे परिणाम कभी भी खराब हो सकते हैं ऐसा समझ करके।
36:39है नहीं खराब, कभी भी हो सकते हैं भाई। क्योंकि अभी परमात्मा दशा नहीं आई।
36:44तो मुझे गाफील नहीं रहना है। उसके लिए उन्होंने क्या किया?
36:50जनक राजा ने। अपने परिणाम खराब... अपने परिणाम खराब
36:54होवे ही नहीं। इसलिए आगे से
36:57कौन सी preparation की, तैयारी कौन सी थी, planning कौन सा किया?
37:02उसकी बात करते हैं। उन्होंने प्रत्येक मायाना प्रसंग में,
37:08केवल जेनी उदास अवस्था छे। उनके जो गुरु का नाम था अष्टावक्र।
37:14उनकी स्थिरता तो बहुत जबरदस्त थी। वो तो योगी थे।
37:18जब वो मेल में नहीं रहते थे और हर एक प्रसंग में, थोड़े
37:20भी उनके परिणाम... में थोड़े भी उनके परिणाम धुलायमान नहीं होते थे
37:23मतलब top level साधना में ऊँचे थे मतलब।
37:25जैसे अपने यहाँ कहते हैं कि कुनकुन आचार्य देव
37:27top level की साधना में थे। क्या? अगर कृपावृत देव को और इनको compare करें तो...
37:34तो आचार्य देव की बात नहीं आवे। ऐसा। तो जनक राजा...
37:42हमारे परिणाम भविष्य में कभी भी खराब ना होवे इसके लिए क्या किया जनक राजा ने?
37:46अभी परिणाम खराब नहीं है।
37:48फिर भी हो जाए हो... फिर भी हो जाए हो होवे उसके पहले ही हमको कुछ तैयारी कर लेना है।
37:52कौन सी तैयारी की?
37:54केवड़ जेनी उदास अवस्था छे
37:56एवा निज गुरु अष्टावक्रनी शरणता स्वीकारी। देखो।
38:05सद्गुरु का अपने गुरु का निज गुरु personal गुरु। निज अपना गुरु personal गुरु।
38:13जैसे personal bodyguard होता है ऐसे ऐसे तो ज्ञानी पुरुष बहुत हो
38:15गए लेकिन अपने को। तो ज्ञानी पुरुष
38:16बहुत हो गए लेकिन अपने को बचाने वाले
38:18bodyguard गलतियों से बचाने वाले ऐसे उसको बोलते हैं निज गुरु
38:25जिनका personal contact था अष्टावक्र का और जनक राजा का personal contact था
38:30कुछ भी problem आए तो फौरन अष्टावक्र को सब बातें मालूम रहती थी जिन्हें जनक राजा की
38:34पूरी file खोल लेते थे गुरु के सामने
38:37सो सौभाग्य भाई के personal गुरु
38:40कौन कृपा उदय क्योंकि सौभाग्य भाई के हर एक परिणाम की उनको खबर पड़ती थी।
38:46अगर मुमुक्षु जीव की हर एक परिणाम की खबर अगर सद्गुरु को होवे,
38:52तो सद्गुरु को इसको कौन सा बोध देना, कैसे turn करना, कैसे गलती से बचाना, उसकी
38:59सहज में फिकर भी होती है।
39:01और इस फिकर के कारण सहज में उनके वचन ऐसे निकलते हैं, कि सामने वाले
39:06को, right समय पे right
39:07guidance मिलता रहता है। नहीं तो guidance नहीं मिलता है, साथ मिलता है।
39:12नहीं तो guidance नहीं मिलता है साथ मिलता है लेकिन guidance नहीं मिलता है।
39:16वो भी चुप हम भी चुप ऐसा हो जाता है। दोनों side से चुप। ये गुरु इसलिए चुप है।
39:22क्योंकि वो बोले तो कुछ बोले तो बतावे अब बोले नहीं तो क्या बतावे।
39:26का रुका है उनको कैसे मालूम। अब बोले तो guidance देवे
39:30नहीं बोले तो वहां चुप है तो यहां भी चुप है।
39:32Doctor के पास दर्द ही चुप है तो doctor भी चुप है।
39:40वो आए मिलने के लिए। द निवृत्ती सत्र में थे वहाँ।
39:45तो कुछ बोल रहे नहीं चुपचाप बैठे
39:48हैं। शाम को साथ में gym
39:49लिए। 6 बजने के पहले। अभी भी देखा कि अभी शाम में शायद
39:54bed पर गए अभी बोलेंगे अभी कुछ पूछेंगे।
39:56पूछा नहीं। खुश हो देखो चटपटी होती थी कि भई बोलते नहीं हैं आए क्यों मिलने के लिए?
40:03मैं तो साधना करने के लिए निवृत्ती सत्र में आया फिर यहाँ तक मिलने को क्यों आया?
40:06कुछ पूछना होगा इसलिए आए हैं। नहीं तो
40:09मेरा सानिध्य क्यों... ले आए हैं। नहीं तो मेरा
40:10सानिध्य कौन करता? फिर भी पूछ रहे नहीं तो अभी सामने से उन्होंने,
40:15रहा नहीं गया तो सामने से बोला, तरस लगी है? क्या पूछा?
40:19प्यास लगी है क्या? तरस लगी है? वो बुद्धू का बिल्कुल समझा नहीं।
40:25क्या? नहीं नहीं वो तो मेरा चो यार है हम साथ में तो जीमें हम
40:29बाद में मैं कहाँ लेता हूँ? क्या? खत्म हो गई बात। वो meaning नहीं समझ पा
40:32रही कृपावली का ये नहीं कि...
40:35Meaning नहीं समझ पा रही कृपा वाले का ये नहीं
40:37कहना था कि 6 बजे के बाद आप पानी पियो जब आपका नियम है तो आप नियम को रखो
40:41कोई बात नहीं है। तरस लगने
40:43का meaning दूसरा है कि भई कुछ पूछना है, कोई तकलीफ है,
40:47साधना में कहीं रुकावट है, क्या है, problem क्या है
40:50बोलो तो मालूम पड़े ना तो तब चावे। और
40:54उसने वो समझा नहीं बात को। नहीं नहीं मैं तो चोबे से।
40:58साथ में gym लिए पानी पी लिए खत्म रात को पानी पीता नहीं हूँ। वो अपना बड़प्पन करने
41:01गया व्रत उपवास का अभिमान करने गया।
41:03बहुत कुछ गवा दिया उसने। सब कुछ गवा दिया उसने। अच्छा अच्छा सो जाओ सो जाओ क्या बोले?
41:09सोए हुए तो हो ही। अब और सो जाओ। लंबे होकर।
41:14आपका काम नहीं है मतलब कहने का मतलब क्या है आपका कोई काम नहीं है। बात क्या करें?
41:19बात कुछ करना नहीं है। जनक राजा ने
41:23ऐसी स्वभाव जैसा है वैसा ही
41:26उदासीन रहने के लिए जबरदस्त परिश्रम पुरुषार्थ किया।
41:29और वो हासिल हो गया। सरलता में क्योंकि अभी आटक बन गई तो सरलता में। सरलता
41:32में क्योंकि अभी अटक बन गई तो
41:33सरलता से अभी उसको कोई तकलीफ नहीं होती थी।
41:35परिणाम बिगड़ते ही नहीं थे।
41:37फिर भी भविष्य में बिगड़ सकते हैं क्योंकि अभी परमात्म दशा नहीं आई है ना।
41:41तो भविष्य में भी वो बिगड़े नहीं कभी भी कैसे ही प्रसंग में।
41:45इसके लिए उन्होंने advance में क्या कर लिया अपने
41:48personal गुरु जो अष्टावक्र थे निज गुरु।
41:52एवा निज गुरु अष्टावक्र की शरणता स्वीकारी होने थी।
41:57माया ने सुखे तरी सकाए एम थतु हतु।
42:00फायदा क्या हुआ? सरलता स्वीकार किया तो फायदा क्या हुआ?
42:07कि जो माया दुस्तर है, दुरंत है, ज्ञानियों को भी पसीना छूट जाता है।
42:13ऐसे माया रूपी समुंदर को जनक राजा आसानी से तीर सकते थे।
42:18एवी माया ने सुखे तरी सका एम तत्तवतु। कारण?
42:23क्यों अभी easy लग रहा है? अभी माया दुस्तर क्यों नहीं लग रही है?
42:27माया दुरंत क्यों नहीं लग रही है? इतनी आसानी... क्यों नहीं लग रही है
42:30इतनी आसानी कैसे हो गई मोक्ष मार्ग इतना सरल कैसे हो गया
42:36कारण दिया आखिर में last में last line कारण कारण के
42:41महात्मा ना आलंबनी ऐसी बड़वत्ताता छै क्या लिया
42:48सद्गुरु की कृपा को क्या कहना अगर उनका शरणा लियो तो आपका काम आधे से आधा easy हो जाए।
42:58मान पुरुषो का एही तो है इसले
43:04तो कुंगलीकागम. आवो सत्पुरुषना
43:07वचनामृत मुद्रा अने सत्समागम
43:10सुसुप्त चेतनने जागृत करनार पडती वृत्तिने
43:15स्थिर राखनार दर्शन मात्रथी पण निर्दोष अपूर्व
43:21स्वभावना प्रेरक. छेल्ले अयोगी. चेने अयोगी स्वभाव प्रकट करी।
43:27अनंत अव्याभा सुकमा स्थिति करावना। त्रिकाळ जिवंत वर्तो
43:32जिवंत वर्तो जिवंत। हे महात्माना अनम। बहुत मतलब अपने परिणाम बताना या खुद बात करना।
43:37लेकिन मु सामने नहीं आता
43:38भले मन में भले कहीं भी बैठा
43:40रहो मन में दुनिया की बातें कर लेते
43:42जैसा ऐसा ऐसा हुआ ऐसा। मन में आप ऐसा मतलब ऐसा
43:44लगते है की गुरु की बात कर रहे है। लेकिन सामने आने के
43:49बाद मुई नहीं आता। सामने आने के बाद वही लिखनी।
43:54बस ये बात ये कमी है आपको। अपने साधना में। लिखने के बजाय तो वो
43:59इतना इतना अंदर मन में ये चलता रहता है कि वो
44:02व्यक्त नहीं होता है ना अंदर के अंदर घुट घुट के है। व्यक्त होना चाहिए।
44:07व्यक्त क्यों नहीं होता है? क्या कारण है?
44:11देखो ये... ये प्रश्न है कोई। अब ये अवस्था यहाँ निकल गई। सोगाली जी की
44:17अवस्था ऐसी same थी? वो तो बात चली थी अबकी भरा भक्ति
44:20वाली बात। सोगाली... वाली बात। सौगानी में कितनी पराभक्ति थी।
44:23सद्गुरु से इतना दूर रहने पर भी वो कहते थे कि मेरे गुरु मेरे से दूर नहीं हैं।
44:29जहाँ मैं हूँ वहीं मेरे गुरु हैं। ये महाराज साहब का देह है वो
44:34वो सद्गुरु नहीं है उसको कानसमी मैं नहीं मानता हूँ। उनका चैतन्य देव है
44:40वो तो मेरे में विराजमान है। जहाँ मैं हूँ वहीं वो है।
44:44ऐसी दिव्य चैतन्य मूर्ति को मैं निरंतर देखता हूँ। क्या बोले? क्या हो गया अब?
44:51इसका नाम है पराभक्ति।
44:53तो दूर रहने पर भी सत्संग बराबर नहीं मिलने पर भी वो तीर्थंकरे
44:57आखा नुसे। इतनी द्रव्य दृष्टि जबरदस्त हुई कैसे?
45:01इतनी जबरदस्त साधना हुई कैसे? 18 साल के अंदर अनंत जन्म मरण का छेद करके
45:07एक ही बार बाकी रखे हैं।
45:09ऐसी जबरदस्त साधना इस काल में कैसे कर पाए उन्होंने?
45:13स्वता जो है ना, जो स्व के
45:16नजदीक रहने का जो उन्होंने
45:17पुरुषार्थ किया। के नजदीक रहने का जो उन्होंने पुरुषार्थ किया है। इसमें
45:21गुरुदेव की शरण उन्होंने स्वीकार की,
45:23उनको हृदय में बिठाया और निरंतर उनको देखते रहे। ये इसका कारण हुआ।
45:29सद्गुरु से थोड़ा भी अगर अलग हुए, दूरी रखी थोड़ी भी अंदर में भाव में,
45:36हमारा खात्मा हो जाता है। कैसी भी उनकी अवस्था हो।
45:42थोड़ा भी उनके बारे में थोड़ा भी अंदर में
45:44दूसरा परिणाम आ गया। विनय भाव में कमी आ गई। उसी प्रकार से।
45:47अपना गिरना नकी है समझो। तुम्हें अगर देखा कुछ problem आ
45:51गया है तो बात बताना जरा लेकिन जैसे हम मतलब जो
45:59जो हम चल रहे हैं कैसा कैसा हमको
46:02वो जो चर्चा करने का दिल में बहुत रहता है लेकिन वो
46:05सामने आने में उतनी चर्चा नहीं होती। तो क्या है कि कभी चर्चा करके
46:08देखे तो कितना फायदा होता है वो तो अनुभव भी है।
46:11हाँ। कई ऐसे प्रसंग बन गए हैं कि हम हम
46:12tenth... संग बन गए हैं कि हम हम tension में आ गए फिर
46:14कह दिया तो tension फौरन उतर गया ऐसा भी तो हुआ है ना? फिर भी जीव
46:19अपने अनुभव से नहीं सीखता है।
46:21तो एक तो माया तो है कौन सी माया है?
46:24कि जैसा स्वभाव है वैसा हमारा परिणाम
46:26नहीं एक तो है ही है। ये दूसरी माया है अपने
46:32परिणाम छुपाने की। सद्गुरु
46:33के सामने क्या छुपाना है?
46:36वो हमको तारने वाले हैं डुबाने वाले तो नहीं हैं। टाटेंगे तो भी... टाटेंगे तो भी
46:41हमारे को आगे लेके जाने वाले हैं। टाटेंगे तो भी हमारा हित ही करते हैं।
46:45तो क्या छुपाना है? नहीं होने पर भी इतना हम आगे हमारा परिणाम खुलते क्यों नहीं है?
46:52जनक राजा की बात यहाँ देखो कि उनके परिणाम अच्छे थे।
46:56अगर शरण स्वीकार नहीं करते थे तो भी बराबर चल रहे थे।
47:00फिर भी भई अभी परमात्म दशा नहीं हुई है।
47:03हो सकता है कोई ऐसा प्रसंग आ जाए तो मैं डोलैमान हो जाऊँ तो?
47:07अभी से ही तैयारी कर लूँ मैं। सही तैयारी कर लूँ मैं। देखो ये बात समझ लो आप। इसीलिए
47:14perfections
47:15total safety के लिए उन्होंने क्या कर लिया? परिणाम अच्छे होने पर भी क्या किया?
47:20निज गुरु अष्टावक्र की शरणता स्वीकार कर ली। फायदा क्या हुआ?
47:25इसके कारण से माया ने सुखे तरी सका एम थतुअतु। ये खुद को ही फायदा हुआ। क्यों इतना
47:33easy हो गया? रास्ता कठिन होने पर भी माया दुस्तर होने... रास्ता कठिन होने पर
47:36भी माया दुस्तर होने पर भी
47:38धुरंत होने पर भी क्युं अभी easy
47:39हो गया? क्युंकी महात्मा के आलंबन की एसी ही बडवतरता
47:45है. ओ इनको लिखा
47:48है देखो सौभागभाई को. बहोत
47:51जबरदस्त बात लिखी है शायद number
47:54मिल जाय तो में बताता हुं. सात बरताल वाली बात बतावी है. आपने वो
48:00पढाया नई पढाया? शुं रोटला
48:02रो एडो छो? क्या बोले? आड़ो छो
48:05क्या बोले
48:11रांडी रड़े मांडी रड़े क्या लिखा है ऐसा लिखा रांडी रड़े मांडी रड़े जिसका
48:18husband गुजर गया है वो दुख में आ जाए रोवे
48:21हैं उनमें आई
48:27रांडी रड़े मांडी रड़े क्या जिसका husband गुजर गया है उसको रंडा। कर गया है।
48:33उसको रंडा पाया है, वो दुखी है तो रोती है। मांडी लड़े।
48:39कि husband है लेकिन वो ऐसा है कि कमा के लाता नहीं है। क्या?
48:45तो उल्टा इसको ही मेहनत करके उसको खिलाना पड़ता है। उसके दुखों का कोई अंत नहीं है।
48:50रांडी लड़े, मांडी लड़े, पर साथ बरतारवाड़ी तो मोटूच ना उघाड़े। क्या बोले?
48:59जिसके सात सात पति हैं। पति है। उसको क्या दुख हो सकता है?
49:05ऐसे आप क्या रोना रोते हो कि मेरे से नहीं होता आत्मज्ञान, बहुत तकलीफ है वो है,
49:09मैं हूँ ना? ऐसा लिया, उसका meaning ऐसा लिया। मैं हूँ ना, काहे को घबराते हो?
49:16आपको क्या चाहिए बोलो, मुँह तो खोलो क्या चाहिए? ऐसा बोले। ऐसा लिखा है एक जगह।
49:21रांडी रड़े मांडी रड़े, पर शायद भतारवाड़ी तो मुँह ही नहीं खोले।
49:30बहुत ज़बरदस्त लिखा है इन्होंने। सोभाग भाई को लिखा है ये बात। क्यों फिकर करते
49:35हो? मैं हूँ ना, बैठा हूँ
49:36ना, काहे को मगज़मारी करते हो? तब
49:38ऐसी अवस्था में जब ऐसे सद्गुरु हमको मिलते हैं,
49:42उनका शरण लेने से हमारा काम इतना आसान होता है,
49:46तो फिर क्यों नहीं लेते हम? क्यों अपनी मनमानी करते हैं? क्यों शोषण में चलते हैं?
49:52और 526 में तो उनको वंचना बुद्धि कहा।
49:55जो परिणाम छुपाने वाली जो
49:56बात है। छुपाने वाली जो बात है 525 है
50:00125 नहीं 425 है
50:07क्योंकि guidance कैसे मिलेगा अगर आप परिणाम को छुपाओगे
50:09तो 500। 288. 288.
50:13288. पण होय भक्ति,
50:17भक्तिवाळो. आडी पुरुष रमत
50:21मांडी बेठो छे. नवा जूनुं
50:26तो एक आत्मवृत्ति सिवाय अमारे क्यां
50:33छे अने ते लखवा
50:37जेटलो मनने अवकाश
50:40पण क्यां छे. नहीं तो
50:45बधुंय नवुं छे
50:48अने बधुंय जीर्ण छे.
50:54नहीं वो बात नहीं मो पंचना बुद्धि वाला एक
50:57chapter था 525 हाँ
51:05ये रहा 526
51:12526 में लिखा है।
51:22जो जीव लघुता धारण न करे सदगुरु आगळ पण. तो प्रत्यक्षपणे जीव
51:27भव परिभ्रमणथी भय नथी पामतो
51:28एम ज विचारवा योग्य छे. एवुं
51:31लख्युं छे एनुं नाम मंचना बुद्धि लख्युं
51:33छे. के अभी इसको डर नहीं है. भविष्य में
51:37कब फिसल जाउंगा कब कैसा होगा उसका डर नहीं है. अपने
51:41को परमात्मा दशा अपने दशा में इतनी development नहीं होने पर भी अपने को
51:46safe मान के चल रहा है. ए बात लिये. ये बात
51:50लिया 526 में लिया ये बात। लोलू जी महाराज। हाँ ललू जी
51:55महाराज को लिखा। वो मेरे को अभी वो
51:57दिमाग में आया बहुत दिनों के बाद सात भरतार वाली जो है ना।
52:01बाद में ही निकलेगा वो अभी एकदम नहीं निकलेगा। छोटा सा letter है।
52:06शोभा भाई को लिखा है वो बात। मांडी रांडी रड़े मांडी रड़े
52:12पण सात भरतार वाले तो
52:13मोडू ना उघड़। ये बात को। और गुरुदेव भी कहते थे गुरुदेव। गुरुदेव भी कहते थे
52:17गुरुदेव भी एक दफे मैं सभा में चर्चा में था।
52:20तो कोई बोल रहा था कि बहुत तकलीफ होती है। कोई easy नहीं लग रहा है।
52:27तो क्या उन्होंने। तो घबराना नहीं धीरे-धीरे कार्य करना। मैं हूँ
52:33ना फिर क्यों फिक्र करते हो ऐसा गुरुदेव भी बोले।
52:36किसी और को कह रहे थे। कि घबराना नहीं मैं हूँ ना ऐसा बोले।
52:46ये अपने last line के ऊपर से लगा। महात्माना
52:49शरणनी ऐसी बलवत्तरता
52:52छै। महात्माना आलमबन्नी। आलमबन्नी। अगर जीव स्वच्छंद को
52:57छोड़ करके सद्गुरु का साथ लेवे,
53:00चला करके, उनका शरण में रहे, तो जीव तीर जाता है।
53:06Problem जो थोड़े बहुत है वो भी निकल जाते हैं। कोई problem नहीं रहते हैं फिर।
53:15Problem तो आते हैं रास्ता कठिन है लेकिन पार हो जाता है।
53:27हाँ हेरा देखो। 469। 469 में है।
53:35मिल गया आज। बहुत मुश्किल से
53:38कई दिनों के बाद। 5-7 साल हो गए होंगे पढ़े। इन्हें पाँच सात साल हो गए
53:42होंगे पढ़े। number याद नहीं रहे
53:43भूल गए। 469। number गलत ही
53:46दिया है
53:46इधर नहीं
54:01है ना। 469।
54:03रांडी रुए मांडी
54:06रुए पर साथ भरता।
54:08रुए मांडी रुड़े पण साथ भरतार वाले तो मुंडो
54:10ना उघड़े। 469 में 3 number
54:12है। Page number होगा 469। 469
54:18page number।
54:23ये
54:25रहा। हाँ ये रहा। 469 में मतलब 608 number में है। हिंदी में।
54:28नहीं page number हिंदी में
54:29तो नहीं मिलेगा। 608। नहीं 609 सत्संग
54:33का। कतारू। तथारूप गंभीर वाक्य नथी. में जो नीचे लीख
54:39रहा हुं वो इतना
54:42serious letter वचन नहीं है. फिर भी उसका आशय बहुत गंभीर है. तो पण आशय
54:48गंभीर होवाथी एक लौकिक वचननुं
54:50आत्मामां हाल घणी वार स्मरण थई आवे
54:53छे. उनको बार बार याद आता था इस बात.
54:56सात पति मतलब? पति. पति न हो तो रडे. पति निकम्मा
55:00होवे तो रोवे. लेकिन सात पति होवे तो? लेकिन सात पति होवे तो?
55:07उसको तो हर प्रकार की सुविधा है। कोई problem ही नहीं आवे।
55:12वो तो मुँह ही नहीं खोले कि मेरे को ये तकलीफ है वो तकलीफ।
55:15क्योंकि जिसको सात पति हैं, एक नहीं सात होवे, उसका उसका तो कैसे होवे?
55:20ऐसे बनता नहीं है। एक स्त्री को सात नहीं होते हैं, ये तो एक कहावत है।
55:25तो जिसको इतनी सुविधा है वो पिच-पिच क्या करे फिर बाद में? ये कहावत है।
55:30ये बात कहते हैं। तथा रूप गंभीर वाक्य न थी। तथारूप गंभीर वाक्य नथी तो पण
55:34आशय गंभीर होवाथी एक लौकिक वचनो आत्मामां हाल घणी वार
55:39स्मरण थई आवे छे.
55:41ते वाक्य आ प्रमाणे छे.
55:43रांडी रूए मांडी रूए पण साथ
55:46बरतार वाळी तो मोढुं ज न उगाडे. वाक्य
55:50अगंभीर छे क्योकी इसमे गंभीरता नहीं है वचन के अंदर.
55:54तेथी लखवामां प्रवृत्ति न थात. एसे वचन ज्ञानी पुरुष लिखते नहीं generally
56:00स्त्री पुरुष के संबंध वाले. Generally
56:02स्त्री पुरुष के संबंध वाले. पण आशय गंभीर होवाथी लेकिन इसका भाव बहुत गंभीर है.
56:08अने पोताने विशे विचारवानुं विशेष देखावाथी.
56:10तमने पतुं लखवानुं स्मरण थवाथी आ वाक्य लख्युं
56:13छे. देखो. इतना ही नहीं लिख नहीं सकते एसे वचन के
56:17उपर क्या लिखे है उनहो. एना उपर यथाशक्ति विचार करशो ए ज विनंती.
56:22ए सौभागभाई को लिखा है. काईको परेशान होते हो. इतना दुःखी क्युं
56:27होते हो. परेशान होते हो,
56:28इतना दुखी क्यों होते हो? क्यों अपनी मनमानी करते हो? टेढ़े क्यों चलते हो?
56:36संपूर्ण शरणागति में क्यों नहीं आते हो? ऐसा स्थान
56:41surrender करो, line clear है बिल्कुल। ऐसी बात लिखी है, बहुत
56:46अच्छा लिखा है।
56:47सुख धाम
56:55अनंत सुस...
56:58संत सुसंत चाही। दिन रात्रि रहे
57:05तद ध्यान मही।
57:10पर शांति अनंत सुधा
57:16मय जे। प्रणमु
57:22पद तेवर तेज।
57:32वरते जयते प्रणमु
57:38पदते। वरते जयते।