Avlokan Discourses of Shri Devchand bhai Shah The book Search Photographs About

Shri Dravya Drushti Prakash

6 February 2002 · Patra 22 · 58 minutes

Transcript

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Recitations restored to their canonical wording: Mangalacharan — Mangalam Bhagavan Viro, Mangalacharan — Sarva Mangala Mangalyam, Namokar mantra, Omkar bindu sainyuktam, Samaysar mangalacharan.

0:12णमो अरिहंताणं णमो सिद्धाणं

0:16णमो आयरियाणं णमो उवज्झायाणं

0:21णमो लोए सव्व साहूणं नमः समयसाराय

0:28स्वानुभूत्या चकासते । चित्स्वभावाय भावाय

0:36सर्वभावान्तरच्छिदे मंगलं भगवान वीरो,

0:43मंगलं गौतमो गणी। मंगलं कुन्दकुन्दार्यो,

0:50जैनधर्मोऽस्तु मंगलम्॥ सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं

0:57सर्वकल्याणकारकम। प्रधानं सर्वधर्माणां

1:04जैनं जयति शासनम॥ ॐकारबिन्दुसंयुक्तं

1:12नित्यं ध्यायन्ति योगिनः। कामदं मोक्षदं चैव

1:20ॐकाराय

1:21नमो नमः श्री

1:29द्रव्य दृष्टि प्रकाश

1:30part 1। पूज्य निहालचंद सौगानी जी के आध्यात्मिक पत्र।

1:37ये पत्र number है 22। कलकत्ता से ये पत्र

1:41लिखा है। 1961 July में। 42 साल

1:47करीब-करीब होने आए। ओम श्री सद्गुरु देवाय नमः।

1:55आत्मार्थी। नाम काट दिया इधर।

2:01पूज्य गुरुदेव श्री सुख शांति में विराजते होंगे। ये सोनगढ़ में पत्र लिखा है

2:06कलकत्ता से। कलकत्ता से। क्योंकि गुरुदेव तो सोनगढ़ में रहते हैं।

2:13साधर्मी जन समोव शरण जैसे वातावरण में,

2:17उनकी दिव्य ध्वनि जैसी अमृत वाणी का, लाभ लेकर,

2:23अनंत सुख प्राप्त करें यही भावना है।

2:28गुरुदेव तीर्थंकर जैसे लगते हैं।

2:30जो वहां सुनने वाले

2:32हैं वो कैसे, कैसे समोव शरण में विराजमान हैं। जैसे समोसरण में विराजमान हैं।

2:36और उनकी वाणी कैसी है

2:37जैसे दिव्य ध्वनियाँ भगवान की। ये सभी शिष्यों को अपने गुरु की वाणी ऐसी ही लगती है।

2:44ऐसा लगता है कि हम समोसरण में ही बैठे हैं।

2:50सिर्फ सानिध्य से ही शांति का अनुभव होता है।

2:55दुनिया के उठापटक हेराफेरी डाल-देल।

2:59ये उनके सामने आते ही जैसे कि कहाँ चले आते हैं नहीं मालूम। कई लोग लिखते

3:03हैं diary में लिखते हैं तो

3:05फिर वो भाव बाहर नहीं आता है।

3:10शुद्ध हृदय से अगर इस प्रकार से किया जाए, शुद्ध हृदय का मतलब आत्मशांति की कामना से।

3:18शुद्ध हृदय का यही मतलब है। तो इस line में सफलता अवश्य है।

3:26साधर्मी जन समोवसरण जैसे वातावरण में

3:31उनकी... उनकी दिव्य ध्वनि जैसी अमृत वाणी का लाभ लेकर

3:35अनंत सुख प्राप्त करें यही भावना है।

3:40ऐसे तो सानिध्य में कषाय की मनता होती है और शांति मिलती है लेकिन वो शांति

3:45की बात नहीं कर रहे हैं।

3:48और उद्योग अंदर में जावे और थोड़ा सा निर्विकल्प अनुभूति होवे और थोड़ा सुख मिले

3:54उसकी भी बात नहीं कर रहे। क्योंकि लक्ष्य

3:57वो नहीं है। क्योंकि लक्ष्य वो नहीं है, लक्ष्य तो पूर्ण शांति है, अनंत सुख है।

4:03पूरा भंडार अपने को मिले

4:05ऐसी भावना बात है, भावना में कमी नहीं है। भावना तो पूरा ही चाहिए।

4:10फिर नहीं मिले तो बार-बार बार-बार प्रयास करके उसको हासिल करना होता है।

4:16तो इनकी भावना क्या है? कि sir सब गुरुदेव की वाणी सुन करके,

4:22उसका लाभ ले करके, मतलब लाभ मतलब guidance।

4:27कृपा नहीं। लाभ का मतलब क्या है?

4:32कि गुरु उनका काम कर देवे थोड़ा, easy कर देवे, ऐसा नहीं।

4:36लाभ का मतलब है कृपा, कृपा दृष्टि देना। मार्गदर्शन। हाँ, मार्गदर्शन।

4:42हमको आत्मशांति के रास्ते पे चलना है,

4:45पता नहीं है। सब गुरुदेव हमारे को रास्ता बताते हैं।

4:51उतना उनका उपकार है, कि चलना नहीं चलना वो

4:53हमारे हाथ में है। उनकी... वो हमारे हाथ में है। उनकी

4:55बात समझना नहीं समझना वो हमारे हाथ में है।

4:59तो हम समझे तो हमारे को लाभ है, नहीं समझे तो हमारे को लाभ है।

5:03सद्गुरु की कोई कृपा कोई जादू-जादू छड़ी नहीं है। कि वो कुछ कर दे।

5:10तो अमृत वाणी का लाभ लेकर अनंत सुख प्राप्त करें।

5:14अमृत वाणी क्यों कहा? वाणी तो वाणी है, जड़ है।

5:17इसको अमृत क्यों कहा?

5:20क्योंकि अगर ये वाणी हृदय में उतर जाए तो... में उतर जाए तो फिर हमको

5:25मौत का भी भय नहीं लगेगा

5:27क्योंकि शरीर मैं नहीं हूँ मैं तो परमात्मा हूँ चैतन्य तत्व हूँ

5:32शरीर छूट जाए तो डर नहीं है ये अमर हो जाता मृत्यु से पार हो जाता

5:41इसीलिए सद्गुरुदेव की वाणी को अमृत वाणी कहते हैं और दिव्य ध्वनि इसलिए कहा

5:49क्योंकि इस काल में सर्वज्ञ भगवान तो

5:50है नहीं। इस काल में सर्वज्ञ भगवान तो है नहीं रास्ता

5:52टिकाने वाले। लेकिन फिर भी गुरुदेव जैसे मिले हमारे।

5:58तो जो दिव्य ध्वनि का जो सार है वही उनकी वाणी का सार है। कि भैया

6:03तुम सारी झंझट को छोड़कर के

6:06दूसरों को अपना मान करके छोड़कर के। स्वयं मैं परमात्मा हूँ ऐसा अनुभव करो।

6:11और शांति से रहो।

6:14ये सार दिव्य ध्वनि का है यही सार गुरुदेव की वाणी का है

6:17यही सार जितने। यही सार जितने भी सद्गुरु हैं

6:20ज्ञानी पुरुष हैं सबका यही कहना है।

6:23कि हे जीव तू ब्रह्मा माँ तुझे हित कहता हूँ। सुख अंतर में है

6:29बाहर दुनिया से मिलने वाला नहीं है। इसीलिए दिव्य ध्वनि में

6:35माने भगवान की वाणी में और गुरुदेव की वाणी में या ज्ञानी पुरुष के वाणी में

6:40कोई अंतर नहीं है। सब दिव्य ध्वनि है। साधर्मी जन।

6:50साधर्मी जन समोव शरण जैसे वातावरण में उनकी दिव्य

6:53ध्वनि जैसी अमृतवाणी का

6:57लाभ लेकर अनंत सुख प्राप्त करें। ये तो

7:02हर एक ज्ञानी का सपना होता है कि जो मार्ग

7:05मैंने पाया है जो परमात्मा को मैंने हासिल किया है

7:09वो रास्ता इतना सरल है कि जैन अजैन मनुष्य तिर्यक। पजेंस मनुष्य तिरियंच

7:17even नरक में भी जीव उसको प्राप्त कर सकता है इतना आसान है।

7:23और वो मिल गया रास्ता तो फिर वो हमेशा के लिए सुखी हो जाएगा। तो हर एक ज्ञानी

7:32की ये भावना रहती है। कि जगत के जीव बेकार के दुखी ना हो जाए। तो जल्दी से जल्दी

7:37अपने आत्मा का अनुभव करके परम शांति

7:39प्राप्त करें। ये शांति के लिए जो... ये शांति के लिए जो

7:43हेराफेरी उठापटक करते हैं, इसमें शांति तो नहीं मिलती है,

7:48उल्टी अशांति बढ़ जाती है। चाहिए शांति लेकिन उपाय झूठा करोगे तो कैसे चले?

7:56जाना है east में, लेकिन गलती से पश्चिम को east मान के चलोगे तो क्या होगा?

8:06तो west में ही जाओगे फिर east में कैसे?

8:08उल्टा दूर चले जाओ। नज़दीक तो आने का... नज़दीक तो

8:11आने का सवाल ही नहीं है लेकिन और जितना जाओगे उतना

8:15दूर चले जाओ।

8:16ऐसे जगत के जीवों को शांति

8:18सबको चाहिए लेकिन पता नहीं है रास्ता। रास्ता पता नहीं होने से वो

8:24अपनी मनमानी से जो अज्ञानता तो है ही

8:27और फिर जो उपाय करते हैं उसमें छूटने के बदले और फंस जाते हैं चुंगुल के अंदर।

8:33गुरुदेव कहते थे कि दो पाँव वाला मनुष्य है शादी किया तो चार पाँव वाला जानवर बनता है।

8:41क्या तो चार पाँव वाला जानवर बनता है। क्या? क्योंकि दो बाईस के दो पाँव

8:45उस जीवन साथी अब साथ में ही चलना है ना जीवन भर।

8:49क्या? आगे पीछे नहीं जा सकते छोड़ के कहीं गए तो परेशान।

8:56शादी की तो चार पाँव वाला जानवर और बच्चे हुए

8:59तो छह पाँव वाला भमरा हुआ। उसकी शादी की तो आठ पाँव वाले करोलिया

9:03रहता है बोलते उसको अंग्रेजी

9:05में। बोलते उसको अंग्रेजी में क्या बोलते

9:07हैं?

9:09Spider spider spider.

9:192 और 2,

9:204. रिलीपर spider? Spider

9:21में नहीं अभी नहीं

9:22आया। अभी वो नहीं है

9:23उसके पीछे। अभी सिर्फ 4 5 तक ही रहा था वो। वो है एक उसको तो... जाओ भैया तुम

9:29अपने घर। बाकी रहे 2 सिर्फ।

9:30और फिर 8 हो गया 9 हो गया तो फिर परवाह नहीं फिर 8 हो या 100 हो 1000 हो

9:3496000 हो... 100, 1000 हो, 96,000 आनी

9:36हो तो भी परवाह नहीं। आत्मज्ञान होने के

9:38बाद तो कोई परवाह नहीं। आत्मज्ञान नहीं होवे तब तक परेशानी है।

9:42एकड़े एक ने बगड़े बे।

9:46बगड़े माने क्या बिगाड़ा। एक

9:51एक 1 * 1 is 1. 1 * 2 is 2. तो हमारे गुजराती में ऐसा बोलते हैं एकड़े एक अने बगड़े

9:58दो हुए तो मरे।

10:00एक रहे जब तक शांति है और दो

10:02हुए किसी को मिला लिया। है और दो हुए किसी को मिला लिया अपने

10:04में तो फिर सब मामला बिगड़ जाता है।

10:08तो दो पाँव वाले मनुष्य में से चार पाँव वाला जानवर, छह पाँव वाला भमरा,

10:14और आठ पाँव वाला spider।

10:17बस फिर अपनी ही जाल में फसते जाता है अंदर में। और बाहर निकलने का नहीं होता

10:24है। ऐसी picture भी आती है स्वर्ग नरक जैसा कोई picture आई थी पहले संजीव कुमार।

10:29और फिर वो जाल में फसता

10:30है, ऐसा फसता है कि वो मर... फंसता है ऐसा फंसता है कि वो मर जाता है इसके बाद

10:34भी आता है वो भगवान। अब चलना है

10:36तुझे स्वर्ग मोक्ष में। नहीं अभी तो यहाँ मज़ा आती

10:41है। ये छूटना नहीं चाहता है जीव। संसार की माया जाल में ऐसा फंसा है खुद ही।

10:47खंभे को बात किसने भिड़ी? खंभे ने।

10:52नहीं हमने ही भिड़ी है और फिर बोलते हैं खंभा छोड़ता नहीं है।

11:00कांटे खुद ही बो रहे हो चुभते हैं तो रो रहे हो क्या

11:07ऐसी मूर्खता क्यों करते हो और दोष औरों को दे रहे हो

11:14बोया खुद ने चुभते हैं तो रोते हो और फिर दोष किसके ऊपर

11:22कांटे खुद ही बोए हो

11:24चुभते हैं तो रोते हो और दोष औरों को। रोते हो और दो स्वरों को देते हो।

11:28पिछुटने का कोई सवाल नहीं है।

11:31ये अपनी गलती है कि हमने दुकान से मोह किया,

11:36परिवार से मोह किया, समाज से मोह किया और अपने आप को भूल गए। क्या कहते हैं

11:44कि गुरुदेव की दिव्य ध्वनि जैसी अमृतवाणी का लाभ लेकर के

11:51सभी जीव अनंत सुख प्राप्त करें। मतलब अपने... मतलब अपनी आत्मा को पहचाने,

11:58उसको जाने, कि मैं ही परमात्मा हूँ और उसकी ही भक्ति, दर्शन, पूजा सब उसकी ही करें,

12:05और शांति रूपी प्रसाद लेवे, और अनंत सुखी हो जाए।

12:11सुखी होने का तो बहुत सरल उपाय है। दुखी होने के लिए तो बहुत कठिनाई है।

12:16सुखी होने के लिए किसी की dependence की जरूरत नहीं। अंधा,

12:19बहरा, लूला, लंगड़ा भी सुखी हो सकता है।

12:22क्योंकि सुखी होने की... करता है क्योंकि सुखी होने के लिए अपने आप को देखना है

12:27उसके आँख नाक कान मन की कोई ज़रूरत नहीं है 5 इंद्रियों की ज़रूरत नहीं है

12:33क्योंकि आत्मा में color नहीं है जो हम आँख से देखेंगे

12:37आत्मा में शब्द नहीं है जो हम कान से सुनेंगे

12:41आत्मा में कोई स्वाद नहीं है खट्टा मीठा जो हम जीभ से चखेंगे

12:45कोई सुगंध दुर्गंध नहीं है वो तो पुद्गल के हैं जो हम उसको

12:51नाक के। नाक के द्वारा उसका महसूस कर सकते हैं।

12:55ना ठंडा गरम ऐसा कुछ है कि स्पर्श इंद्री का काम।

12:59आत्मा का स्वरूप ऐसा है कि बुद्धि

13:01में बैठने वाला नहीं है कभी। मन से हम उसको पार नहीं पहुंच सकते।

13:08चिंतन मनन से भी वो

13:09चीज हाथ में आने

13:10वाली नहीं है। इसीलिए कोई भी जीव हो भले

13:14अंधा बहरा लूला लंगड़ा... जीव हो

13:18भले अंधा बहरा लूला लंगड़ा हो तो भी

13:20और ज्यादा सोच विचार कर नहीं सकता हो बुद्धि नहीं हो।

13:24और संयोग बहुत खराब हो तो भी।

13:30अगर ये तरीका समझ लेवे। सद्गुरु से guidance ले लेवे हो तरीका समझ लेवे

13:35तो। तो बहुत आसानी से

13:35अपने परमात्मा के दर्शन कर सकता है।

13:39जानवर भी कर लेते हैं। ये मनुष्य की क्या बात है।

13:43Maximum 6 महीने लगे इससे ज्यादा नहीं लगे

13:46अगर सही से चला तो। अगर सही से चला तो सही में शांति की भावना हो

13:50इसीलिए क्या है कि गुरुदेव की अमृतवाणी का लाभ लेकर अनंत सुख प्राप्त करें

13:55यही मेरी भावना है ये पहला paragraph हुआ अब दूसरा

14:01आपका पत्र तारीख 15-7 का मिला है

14:08इसके पहले तो कोई नहीं मिला था

14:12इन पुण्य योग होने से कैसा पुण्य। कैसा पुण्य का योग है?

14:18सद्गुरु का सानिध्य नहीं, सत्संग नहीं। अकेले पड़ गए। इन

14:26पुण्य योग होने से सोनगढ़ प्रति के विकल्प की प्रधानता नहीं होने से।

14:33जब अपनी चलती नहीं है तो फिर विकल्प क्यों करें बेकार? जब जा नहीं सकते तो फिर वो

14:39हमारी स्थिति हमको मालूम है फिर विकल्प ही नहीं आता।

14:43तो सोनगढ़ जाना है जाना है जाना है ऐसे जो विकल्प आने चाहिए

14:48वो नहीं आते याद आती है सद्गुरु की निरंतर याद रहती है।

14:53लेकिन उनको दर्शन प्रत्यक्ष करने के लिए सोनगढ़ जाओ

14:58वो possible नहीं है

14:59पुण्य योग साथ नहीं रहता तो विकल्प नहीं आते हैं। मतलब विकल्प आते हैं तो

15:06भी उसकी प्रधानता नहीं है

15:07क्योंकि second thought भी मालूम है कि हम भले ही भावना करें लेकिन। कि हम भले ही

15:10भावना करें लेकिन ऐसा होने वाला तो

15:13नहीं है। हीन पुण्य योग होने से मतलब परिस्थिति अच्छी नहीं होने से सांसारिक परिस्थिति

15:19संयोग अच्छे नहीं होने से। पूर्व कर्मों के कारण।

15:23ज्ञानी को भी ऐसी ऐसी परिस्थिति आती है।

15:26ज्ञानी आत्मज्ञान हो गया तो फिर सुखी हो जाएगा।

15:30कोई जरूरी नहीं है। आत्मज्ञान हो गया तो फिर उसको

15:35कोई तकलीफ नहीं होगी शरीर में रोग नहीं आएगा प्रतिकूलता में

15:38भी। प्रतिकूलता मिट जाएगी ऐसी कोई guarantee नहीं

15:43है। ऐसी guarantee के लिए कोई आना भी नहीं है। सहयोग का सुख चाहिए तो नहीं आना।

15:49क्योंकि सहयोग का सुख तो permanent नहीं है।

15:52वो तो आएगा बाद में बिछड़ जाएगा, बाद में आएगा बिछड़ जाएगा। परम शांति चाहिए।

15:58कभी ना बिछड़े ऐसी शांति चाहिए।

16:02तो ही काम हो सकता है। भावों की शुद्धता ऐसी होना चाहिए। शुद्धता ऐसी होना चाहिए

16:07कि मुझे तो परम शांति चाहिए

16:12परम शांति ही चाहिए और कुछ नहीं चाहिए संयोग का सुख मुझे नहीं चाहिए।

16:18तीन पुण्य योग होने से

16:21सोनगढ़ प्रति के विकल्प की प्रधानता नहीं होने से

16:24प्रधानता नहीं है विकल्प नहीं आते ऐसा नहीं है भावना तो होती है

16:29कि कब सद्गुरु के दर्शन करूँ

16:31कब उनका सानिध्य मिले भावना होती है लेकिन वो भी। भावना होती है लेकिन वो

16:35विकल्प आते हैं लेकिन उसका जोर नहीं चलता है।

16:38विकल्प का जोर क्यों नहीं चलता है?

16:40क्योंकि ज्ञान का जोर पहले से ही जबरदस्त है, alertness बहुत।

16:45क्या?

16:46विकल्प का जोर नहीं चलने का ये कारण है। जिसकी साधना अच्छी है

16:50उसको विकल्प के जोर नहीं चलते।

16:52आते हैं विकल्प। लेकिन आ करके चले जाते हैं। लंबा लंबा लंबा लंबा फिर planning।

16:58वो सब नहीं होता है। आया गया, आया गया।

17:03विकल्प आना ज़रूरी है क्योंकि भूतकाल में किए हुए कर्म हैं तो

17:06वो film बन गई है तो आएंगे तो सही।

17:09लेकिन पहले क्या करते थे? कोई विकल्प आया तो फिर ऊपर से planning,

17:15अफसोस ऐसे सब चलता था लंबा लंबा। विकल्प के विकल्प होते थे। पहले क्या होते थे?

17:22एक विकल्प आया, हमने किसी ने गाली दी। क्यों दी? मैंने क्या किया था?

17:28अब मैं क्या करूँ? कुछ करना है। कुछ करना है ईंट का जवाब पत्थर से देना है बेटा।

17:35वो तो सब लोग खड़े थे इसलिए मैं कुछ जवाब नहीं बनाया था फिर मेरे को

17:38उस time में सूझा नहीं कुछ। लेकिन अब सोच पढ़ के planning करके

17:43बराबर ईंट का जवाब पत्थर से देना है। इतने सारे विकल्प के विकल्प चलते हैं।

17:50यहाँ आते हैं विकल्प अभी भी। लेकिन विकल्प का जोर नहीं है।

17:55सोनगढ़ जाने के विकल्प भी आते हैं। गुरुदेव के दर्शन करने

18:00के विकल्प। गुर्दे के दर्शन करने के विकल्प आते हैं, वाणी सुनने के विकल्प आते हैं। इस

18:04संसार से छूटने के विकल्प आते

18:05हैं। झंझट से छूट जाना है ऐसा।

18:07त्रास त्रास होता है।

18:09और कोई भी विकल्प का

18:12जोर नहीं चलता है।

18:17मन नचाता था हमारे। अब आत्मा में इतना power हो गया साधना के कारण,

18:25कि प्रसंग तो बनेंगे लेकिन हम नाचते नहीं हैं।

18:28हम हम हैरान नहीं हो जाते हैं, हैरान परेशान

18:32होना हमारा काम नहीं है। ज्ञानी को

18:37भी परेशानियां आती हैं। झूठे आरोप आते हैं।

18:41कोई समझ नहीं सकता है। कोई आकर के शांत वातावरण में पथरे डाल के जाता है।

18:46सब होता है, रोग भी आते हैं शरीर में। मनचाही स्थिति नहीं भी होती है। प्रतिकूलता जीवन

18:53भर रहती है ऐसे। प्रतिकूलता जीवन भर रहती है ऐसा भी होता है।

18:57क्यों ज्ञानी को तो ऐसा नहीं होना चाहिए। ज्ञानी अभी बना है

19:02पहले अज्ञान दशा में जो कर्म किए हैं।

19:05उसकी सजा तो उसको भी काटनी पड़ती है।

19:10इसलिए आते हैं लेकिन आते हैं तो ज्ञानी को कोई तकलीफ नहीं होती। क्यों नहीं होती है?

19:17क्योंकि उनको परमात्मा का आधार मिल गया है। उसके पास खुद की एक दृष्टि है।

19:25और दूसरों की दृष्टि से मापतोल नहीं करता। वो अपनी नज़र में कैसा है वो देख लेता है।

19:30सही है गलत है क्या है वो खुद देख लेता है। खुद का माप दुनिया कुछ भी कहे।

19:37तुम सही चल रहे हो या गलत चल रहे हो कुछ भी कहे लेकिन फर्क नहीं पड़ता है।

19:42विचलित नहीं होता। कोई मुझे सही नहीं समझ पाते हैं।

19:47मेरी साधना अच्छी चल रही है

19:49लेकिन कोई मुझे समझ नहीं सकता है। उल्टा... मुझे समझ

19:51नहीं सकता है उल्टे झूठे आरोप लगाते

19:52हैं नहीं कोई फर्क नहीं पड़ता है

19:57पूर्व कर्मों के उदय से

19:59प्रसंग बनते हैं लेकिन अंदर में साधना का जोर इतना है

20:04कि विकल्प आते हैं लेकिन ठहरते नहीं हैं

20:09विकल्प के विकल्प नहीं होते हैं राग आता है लेकिन राग का राग नहीं है

20:14क्योंकि उसकी प्रधानता नहीं है तो अशुभ भाव के भी ऐसे। तो अशुभ भाव की

20:19भी ऐसी हालत होती है और

20:20देखो शुभ भाव की भी ये हालत हो गई सोनगढ़ जाना

20:23गुरु के दर्शन करना ये तो अच्छे भाव हैं।

20:26लेकिन वो तो करना ही चाहिए ना ऐसा भाव नहीं आता है। विकल्प आता है

20:30विकल्प को आत्मा बल नहीं देता है। Support नहीं करता है।

20:36गुरु के दर्शन करना है सोनगढ़ जाना है यहाँ से छूटना है।

20:40सब वातावरण बहुत कुसंग वाला है असत्संग वाला है।

20:44आत्मा को कोई बल नहीं मिलता है यहाँ अकेला पड़ गया हो। बल नहीं मिलता है

20:47यहाँ अकेला पड़ गया हूँ। क्या? बाहर आऊंगा तो साधना अच्छी होगी सोनगढ़ में।

20:53गुरु के पास जाके आऊँ थोड़ा साधना अच्छी करके आ जाऊँ। आते हैं विकल्प।

21:01लेकिन, वो ज्ञान में इतना सामर्थ्य हो गया है, कि वो आए और गए।

21:09विकल्प आते हैं लेकिन उसकी प्रधानता नहीं हो रही है।

21:14सोनगढ़ जाने के विकल्प... सोनगढ़ जाने के विकल्प की प्रधानता

21:16नहीं है, शुभ भाव की भी प्रधानता नहीं है,

21:18तो फिर अशुभ भाव की कैसे होगी प्रधानता?

21:22एक तो कीचड़ में रहना पड़ता है, बाकी रहना-वेहना नहीं है कुछ। रहना

21:29पड़ता है। एक पूर्व कर्म की सजा काटना है।

21:33कल लिया था ना 415? स्त्री है तो उसका भी जो भोग कर्म है निवृत्त करना है।

21:39परिवार है तो उनको भी जो भी चुकता कर देना है, इसलिए रहना पड़ता है। चुकता

21:42कर देना है इसलिए रहना पड़ता है।

21:44रेवा शंकर है तो उसका भी कुछ लेना देना है इसलिए रहना पड़ता है।

21:49बाकी किसी भी प्रकार के आत्मिक बंधन को लेकर

21:54हम संसार में नहीं रहते हैं। पर same स्थिति है।

22:01वो बाहर से चरणान योग से बात करते हैं, ये द्रवान योग से बात करते हैं।

22:07स्थिति दोनों की एक ही है।

22:09दोनों एक भावता ही हैं। दोनों एक बहुत आ रही है। कृपाल देव

22:13की 10 साल की साधना हुई, इनकी 18 साल की साधना हुई ज्ञान दशा के बाद की।

22:19super class। अनमोल हीरे, अध्यात्म जगत के अनमोल हीरे, एक बहुत आ रही

22:27है। देखो कैसे लिखा है। स्वयंभर प्रति

22:32के विकल्प की प्रधानता नहीं होने से

22:34अभी तक मैं उधर नहीं आ सका।

22:38हीन पुण्य योग होने से। इन पुण्य योग होने से एक। दूसरा

22:41सोनगढ़ प्रति के विकल्प की प्रधानता नहीं होने से। ये दो।

22:47अभी तक मैं उधर नहीं आ सका इसका अत्यंत खेद है।

22:53खेद भी है। मनचाहा सत्संग नहीं मिलता है तो। खेद भी रहता है।

23:02क्योंकि अगर

23:03और इसका मतलब फिर क्या हो गया? सत्संग नहीं मिलता। सत्संग नहीं मिलता

23:07उसका अगर खेद नहीं है,

23:09तो फिर इसका मतलब क्या हो गया? क्या सत्संग में मज़ा आती है?

23:15कि नहीं ऐसा तो हो ही नहीं सकता है।

23:17कुसंग में और सत्संग में मज़ा तो ज्ञानी

23:21को हो ही नहीं सकती।

23:22कैसा

23:23लिखा है? सौभाग्य

23:47भाई भी कोई कमाल की चीज है।

23:51वीर की वेदना हमें वधारे रहे।

23:54कारण के वितरागता विशेष से।

23:59जितनी साधना जबरदस्त। अंतर का ज्ञान की साधना बहुत जबरदस्त, इतनी वितरागता ज्यादा।

24:07उतना ही संसार जहर जैसा लगता है। ज्ञानी को शुभराग भी

24:13अभिप्राय में। अभिप्राय में काले नाग के बराबर लगते हैं।

24:18और मुनियाज को घेर का घड़ा लगता है। जैसे-जैसे साधना बढ़ेगी ना इतना-इतना बाहर से

24:25हट जाओगे बातचीत करना ही पसंद नहीं। देखो।

24:31विरह की वेदना हमने

24:32बढ़ाई है किसका विरह है?

24:36सद्गुरुदेव का। नहीं अंदर में जा नहीं सकते बार-बार

24:40अपने परमात्मा का विरह है। एनी वेदना बहु रहेती छे तो पछी

24:45केम के वितरागता विशेष छे.

24:47पारमां तो कशुं छे ज नहीं आपणो संभाव. अन्य संगमां बहु उदासीनता छे.

24:55पण हरि ईच्छाने अनुसरी प्रसंग उपाध.

25:00विरहमां रहेवुं पडे छे.

25:04जे ईच्छा सुखदायक मानीए छीए. ठीक छे हवे शुं करी शकीए?

25:07प्रयास करीए छीए नहीं पहोंचता तो शुं करी शकीए? प्रयास करते

25:10है नहीं पहोंचते है तो क्या कर सकते

25:15फिर से अन्य संगमां बहु उदासीनता छे

25:18पण हरि ईच्छाने अनुसरी प्रसंगोपात विरहमां रहेवुं पडे छे

25:25जे ईच्छा सुखदायक मानीए छीए पण एम नथी

25:30एक एक तरफ से सुखदायक मानते है केमके

25:32आपणी चलती नहीं लेकिन अभिप्राय में तो बोलते है के. बोलते हैं ये।

25:37ये ठीक नहीं हो रहा है।

25:42सुख भी है दुख भी है।

25:45सुख इसलिए कि हमारी चलती नहीं है तो हथियार डाल देना ही अच्छा है।

25:49लेकिन अभिप्राय अभिप्राय ऐसा नहीं।

25:55अभिप्राय में तो सद्गुरु का ही निरंतर सार।

25:58अपने परमात्मा में ही निरंतर लीन ध्यान हो जाए ये अभिप्राय होता है।

26:04भक्ति अने सत्संग मा विरह राखवानी इच्छा सुख। विरह राखवानी ईच्छा सुखदायक मानवामां

26:09अमारो विचार रहेतो नथी.

26:13दूसरी कोई बात होवे विरह हो जाये तो भले हो जाये. लेकिन भक्ति और सत्संग

26:21वो अगर हमारे जीवन में से छूट जाये

26:23हमको मंजूर नहीं है. हमको पसंद नहीं है. श्री हरि करता

26:28ए बाबतमां अमे वधारे स्वतंत्र छीए.

26:32बहोत बढिया बात है.

26:38परमात्मा से भी ज्यादा इस बारे में हम ज्यादा स्वतंत्र हैं।

26:42कि हमको भक्ति छूटती नहीं है। और सत्संग की भावना छूटती नहीं है।

26:49मिले नहीं मिले अलग बात है लेकिन हमारी भावना नहीं छूटती।

26:53हम स्वतंत्र हैं इस भावना में। और हम छोड़ना भी

27:00नहीं चाहते। जब तक हम स्वयं परमात्मा नहीं बनेंगे तब तक सत्संग के बिना... सत्संग के

27:04बिना, भक्ति के बिना, अगर हम

27:06एक पल भी रहे तो हमारे प्राण छूट जाएं।

27:08हम नहीं रहना चाहते। निरुपायता जरूर है, पूर्व कर्म बलवान हो सकते हैं।

27:16और बाहर में हमारी चलती नहीं है,

27:18लेकिन भले ही बाहर में नहीं चलती, अभिप्राय में किसका है जो?

27:24अभिप्राय तो हमारा ऐसा है कि हम यहां ही रहें, इधर ही रहें। भक्ति अने...

27:30भक्ति अने सत्संगमां विरह राखवानी ईच्छा सुखदायक मानवामां अमारो

27:35विचार रहेतो नथी. श्रीहरि करता

27:40ए बाबतमां अमे वधारे स्वतंत्र छीए. ए कुदरत पे नहीं छोड सकते है के मिला तो

27:45मिला नहीं मिला तो नहीं मिला.

27:49ए कुदरत पे हम नहीं छोड सकते. भक्ति और सत्संग हम कुदरत पे नहीं छोडना चाहते.

28:00तो हीन पुण्य योग होने से

28:06सोमगढ़ प्रति के विकल्प की प्रधानता नहीं होने से अभी तक मैं उधर नहीं आ सका

28:13इसका अत्यंत खेद है। देखो हीन पुण्य योग का पता है

28:21विकल्प आते हैं उसका जोर नहीं चलता है साधना चल रही है पता है इतना।

28:28इतना होने पर

28:30भी सोनगढ़ नहीं जा सकते हैं उसका

28:35दुख लगता है। इतनी

28:37अच्छी साधना चलती है ना

28:38फिर काहे को जरूरत है गुरु के पास?

28:41क्या जरूरत है सत्संग की? क्या जरूरत है भक्ति की? तो साधना

28:48कितनी भी अच्छी चले लेकिन अभी परमात्म दशा तो नहीं आई। कैसे आएगी? कैसे आएगी?

28:56निरंतर अंदर में रह नहीं सकता है ये जीव। कभी ऐसी स्थिरता नहीं आई है।

29:04तो उस स्थिरता को बढ़ाने के लिए भी ज़रूरी है

29:08कि हम भक्ति में रहें, सद्गुरु के चरण में रहें और सत्संग में रहें।

29:13नहीं मिले वो अलग बात है लेकिन अभिप्राय तो

29:16ऐसा ही रहे कि जब तक हमको मुक्ति ना मिले तब तक

29:20श्री सद्गुरु के चरण के

29:22सानिध्य में कभी भी छोड़... गुरु के चरण के सानिध्य कभी भी छूटे नहीं। इससे तो

29:26मौत आ जाए तो अच्छा है लेकिन ये छूटना नहीं चाहिए।

29:30ये हमारी साधना को बल देता है।

29:35क्योंकि हमारा उपयोग ज्यादातर बाहर रहता है तो

29:37फिर बाहर उपयोग रहता है उसको आधार कौन है?

29:41अंदर रहता है तो तो हमारा परमात्मा हमारे

29:43साथ है लेकिन उपयोग बाहर रहता है तो कौन किसका सहारा है?

29:48उपयोग बाहर रहता है तो सद्गुरु के अलावा और किसका सहारा है?

29:54सत्संग के अलावा फिर किसका सहारा है? फिर तो वही है।

29:59बाहर में ना बाहर में

30:00compare करें तो कुटुंब परिवार आदि जो होते हैं और एक बाजू सद्गुरु रहते

30:06हैं। किसका सहारा लेना चाहिए?

30:08कहाँ शांति ज़्यादा मिलती है?

30:11कौन हमको कहेगा कि भैया तुम क्यों हमारे पीछे पड़े हो?

30:14जाओ अंदर में आत्मा में। wife तो

30:15नहीं कहेगी, माँ बाप तो नहीं कहेंगे, भाई। नहीं कहेगी माँ बाप तो

30:18नहीं कहेंगे भाई बहन तो नहीं कहेंगे

30:20customer तो नहीं कहेगा partner तो नहीं कहेगा शरीर तो नहीं कहेगा कौन कहेगा

30:29कि भैया तुम हमारे पीछे क्यों भक्ति में क्यों time waste करते हो जाओ ना अंदर

30:33तेरा परमात्मा अंदर है क्यों गुरु की भक्ति करते हो

30:38तेरे परम गुरु अंदर है उसका भक्ति करो ना

30:41ये कौन कहेगा इसीलिए सद्गुरु का साथ चाहिए। गुरु का साथ चाहिए।

30:48क्योंकि अगर हम अंदर हैं तो तो हम जागते हैं और हमारा काम बराबर चल रहा है।

30:53लेकिन बाहर निकले जैसे वहां से तो हम सो गए हैं।

30:57जब सो गए हैं तो फिर जागृत करने के लिए चाहिए ही चाहिए कोई।

31:02और गुरु से बढ़िया जागृत करने वाला दूसरा कोई नहीं इस दुनिया के अंदर।

31:08असत्यो माहे थी प्रभु परम सत्ये तु नहीं जा।

31:14उंडा अंधारे। ऊंडा अंधारेथी प्रभु

31:17परम तेजे तुं लई जाय.

31:23मृत्यो माहे तुं प्रभु परम क्यां कहे छे अमृत

31:29अमृत समीपे तुं लई जा. ए सदगुरु

31:33के बिना कोण लई जाय? कोन उतारे भव पार

31:37प्रभु बिन कोन उतारे भव पार.

31:42आपणे इसमे आये ने सजाग. अपने इसमें है

31:44ना सज्जद मुस्तफा बोलते हैं। इसीलिए। मैं सोनगढ़ नहीं आ सका हूँ,

31:51उसका मुझे अत्यंत खेद है, खेद नहीं।

31:55अत्यंत खेद। ये

31:59balance इसको बोलते हैं, निश्चय व्यवहार की संधि इसको बोलते हैं।

32:04उपादान और निमित्त का जो balancing है वो इधर है।

32:08ज्ञानियों की साधना में ये जरूरी है कि ऐसा होता ही है।

32:15गए तीन माह से कुछ ऐसे योग हुए।

32:20पिछले तीन महीने से मतलब ये April,

32:24May, June, July। 1961। गए

32:29तीन माह से कुछ ऐसे योग हुए।

32:31प्रथम मेरे पिता श्री का स्वर्गवास हुआ।

32:35शायद April में हुआ होगा। 2001 माह। दो साल एक माह पहले मेरे स्वयं के

32:40शरीर के छूटने जैसा योग हो गया था।

32:45मैं भी मौत के करीब आ गया था। शरीर छूटने वाला था।

32:50कुछ व्यक्तियों ने मेरे पास एक bag देखकर,

32:54उसमें रकम नहीं होते

32:56हुए भी रकम के भ्रम में, मेरे पेट में 9 inch गहरा खंजर मार दिया।

33:04चाकू घुसा दिया। bag लेने के लिए। Bag ले लेगी। और रात के time में होंगे

33:10hostel पे भी अकेला वो सुनसान रहते हैं। कलकत्ता में तो क्या है 7:00 बजे के बाद तो तो

33:17full रात जैसा अंधेरा हो जाता है।

33:20कहीं गली से निकले होंगे तो

33:22main road पे तो अभी कोई

33:23दूसरे भी होते हैं लेकिन गली में तो कौन है। और पड़े होंगे बहुत खून बह गया।

33:30डॉक्टरों को easily pulse तक हाथ नहीं आई थी। हाथ नहीं आई थी

33:35hospital पहुंचे तब तक बहुत खून बह गया और main जो

33:40जहां operation करना था वो ठिकाना नहीं मिल रहा था डॉक्टरों को बहुत परेशानी हो गई

33:46operation आदि होकर अस्पताल में रहना पड़ा

33:52आज ही घर से बाहर निकला

33:55July 20 तारीख 61 इस accident के

33:59बाद पहले पहले निकल रहा। ये कहानी है।

34:06आश्चर्य होता है कि ऐसे परम ज्ञानी की एक बहुत तारीख को भी ऐसे तकलीफ होती है।

34:13फिर ज्ञानी को क्या मतलब, ज्ञान दशा को क्या मतलब क्या?

34:18हम तो ये समझते हैं आत्मज्ञान होने के बाद तकलीफ ही नहीं आना

34:21किसी प्रकार की। नहीं ऐसा नहीं है, prepare, be prepared.

34:28आत्मज्ञान होने के बाद भी तकलीफ आएगी। भूतकाल में किए हुए कर्मों को

34:33चुकाना ही पड़ेगा। अब विचलित होते हो तो नए कर्म बांधो।

34:39विचलित नहीं होकर के हँस के निकाल दोगे, जान करके छोड़ दोगे।

34:44tension नहीं लोगे, विकल्प के विकल्प, विकल्प के विकल्प नहीं बढ़ाओगे।

34:48तो आपकी साधना अच्छी चलेगी। दुनिया में,

34:53समूह शरण में बैठे-बैठे तीर्थंकर देव को मन में गाली देने वाले भी बहुत रहते हैं।

34:59क्या तीर्थंकर तो। और सातवीं नरक में जाते हैं।

35:06हाँ विराधक जी। विराधक जी रहते हैं जहाँ आराधना करने वाले हैं तो

35:10विराधना भी करने वाले हैं।

35:12जाहर में तो देवे तो उसकी बोटी बोटी काट देवे इंद्र महाराज।

35:17उठा के जंगल में डाल देवे उठा के।

35:19टुकड़े टुकड़े कर देवे लेकिन जाहर में तो हिम्मत कैसे रहे।

35:24लेकिन मन में तो वहाँ पे विराधना करके सातवीं नरक में। वहाँ पे विराधना करके साथ

35:28ही नरक में जाते हैं। तीर्थंकर जैसे

35:30जिसमें एक अंश मात्र भी दोष नहीं है।

35:33कितना? अंश मात्र भी।

35:37और भक्ति करने वाले भी नहीं हैं। कितने? 100 इंद्र द्वारा

35:43पूजते हैं रोज। इंद्र घुंघरू बांध करके नाचता है।

35:48असंख्य देवों का स्वामी। झुक-झुक के

35:52प्रणाम करता है, वैसे बैठता भी

35:56नहीं है। ऐसे बैठता भी नहीं

36:00है। एक बड़े आदमी के

36:02पास कैसे खड़े पाँव पे रहना पड़ता है ना। और वाणी सुनने के लिए बैठना है तो इस प्रकार

36:07से तो नहीं बैठता है। पलठी लगा कर

36:09टेका लेकर के। ऐसा ऐसा ऐसा नहीं होता है वो।

36:12इंद्र क्यों नहीं होता है ऐसा। कितना alertness रहता है।

36:18गुरुदेव की tape में सुनना video cassette। जैसे वो

36:24कुत्ते का छोटा बच्चा जो होता है। गुलुड़िया।

36:29गुलुड़िया, गुलुड़िया बोलते हैं जुजाती को। वो कैसे बैठता है? डर डर के, डर डर के।

36:35कहीं मेरे से mistake हो जाएगी और साधुदेव भगवान डांट देंगे तो?

36:42मेरे से एक भी mistake, डर डर के, ऐसा। और नज़र उधर से उधर नहीं हो।

36:49नेत्र के साथ नेत्र मिला। सर्वज्ञ भगवान के साथ। कैसा?

36:56और कितनी निर्माणता हूँ, वो भूल जाता है कि मैं स्वर्ग का इंद्र हूँ। देवेंद्र हूँ।

37:04करोड़ों देवों का मैं स्वामी हूँ, सौधर्म इंद्र का हूँ, मैं राजा हूँ।

37:09स्वर्ग का, वो भूल जाता है, मेरी करोड़ों अप्सराएँ हैं।

37:13कितनी रानियाँ हैं, इंद्राणियाँ हैं। मैं अब आत्मा हूँ, परमात्मा हूँ। परमात्मा।

37:20और उधर नज़र रखती है भगवान। ऐसा

37:24ये जो है ना पाँव भी नहीं हिलती है, ऐसा भी नहीं होता है।

37:28इतनी नज़र मिलती है। और उबड़क बैठता है, उबड़क। उबड़क

37:34बैठने का होता है।

37:36पलाठी मार कर के

37:37आराम से बैठने का नहीं होता। प्रमाद मतलब प्रमाद नहीं। अपने

37:42दुकान में नहीं, वो बड़े गरा की कुछ भी नहीं हो, लेकिन नौकर लोग... कुछ भी नहीं हो

37:46लेकिन नौकर लोग तो खड़े ही रहना चाहिए।

37:48नहीं अगर खड़े नहीं रहे तो क्या होता?

37:54counter के पीछे बैठ जाते

37:56समझो अगर तो counter दिखता और ग्राहक क्या समझता कि कोई है ही नहीं

38:01बताने वाला माल। चलो बाज़ू की दुकान में जाओ।

38:06इसीलिए ग्राहक हो या नहीं हो आप counter पर खड़े रहना है

38:11नौकरों को तो और इतना ही नहीं वापस। और इतना ही नहीं वापिस

38:15कुछ काम नहीं हो तो पीछे लेकर के झटका मारना है।

38:18खाली बैठे खाली पगार कैसे लेते हो भैया तुम? खाली काहे को? चलो काम करो

38:24सब जमाओ माल सब। नहीं जमा लिया है दोबारा जमाओ note करो।

38:28नहीं काम होगा तो भी देगा वो। हैरान शांति से बैठना नहीं आप।

38:33पगार लेते हो ना नहीं बैठना। क्योंकि वो आलस

38:38उस नौकर में घुस जाती है तो सेठ को परेशानी होती है।

38:42इसलिए काम... इसलिए काम नहीं है तो उठ बैठ करो

38:44ऊपर से नीचे जाओ नीचे से ऊपर आओ ऊपर से नीचे जाओ ऊपर आओ

38:47जब तक नहीं बुलाऊं तब तक उठ बैठ करो बस

38:50लेकिन तुम नीचे तो नहीं बैठना खाली। ऐसे

38:55दास भगवंत के रहते हैं। एक

38:59भव तारी सौ धर्म इंद्र लेकिन कैसे बैठे? उसका जो वर्णन करते हैं

39:04गुरुदेव अलौकिक है। बात सुने तो अपने को लगे कि क्या।

39:10क्या गुरुदेव। क्या गुरुदेव की भगवान की वाणी होगी और क्या

39:13सुनते होंगे ऐसे विंध्य लोग।

39:15एक भव तारी उनको भी मालूम है आत्मा का दर्शन क्या होता है। शासिक समय दृष्टि है।

39:21सौधर्म इंद्र। उसका मोक्ष निश्चित है ये आखिरी भव है उसका स्वर्ग का।

39:29लेकिन भगवान की वाणी सुनें तो इतना निर्माणता इतनी विनय भक्ति। गजब की।

39:36अलोलुकिक रहती है। यहाँ ये बात लेते हैं

39:42कि घर से बाहर इस accident के बाद पहले-पहले निकल रहा हो।

39:47ज्ञानियों को भी तकलीफ आती है इस प्रकार से। लेकिन तकलीफ आती है तो विचलित नहीं हो।

39:55आए जाने। ज्ञान में उसको weightage नहीं देना।

40:00अपनी आत्मा को weightage देना,

40:01अपनी आत्मा बोले वैसा करना, खत्म हो गया वो। ऐसे तो कई लोग कुछ ना कुछ... ऐसे तो

40:06कई लोग कुछ ना कुछ बोलते रहते हैं

40:08शरीर में रोग भी आएगा और भी बहुत कुछ होगा।

40:11क्या ऐसी साधना है कच्ची कि हमको कोई भी हिला देवे?

40:16कोई भी कुछ भी बोले और हम हिल जावे? शरीर में थोड़ा रोग आवे और हिल जावे?

40:23Heart और 50% काम करता है और हम हिल जावे

40:25फिर हमारी क्या साधना

40:26है? 50 नहीं 10% भी काम करे तो भी हिलने का सवाल

40:32नहीं। हम इसके बल पे थोड़े...

40:34हम इसके बल पे थोड़े जीते हैं।

40:37Art के बल पे जीते हैं।

40:42Art हमारा नहीं है, body हमारा नहीं है। हम तो अपने ज्ञान प्राण से जीते हैं।

40:50और जब तक समय नहीं आएगा,

40:53कोई touch भी नहीं करेगा हमारा। पीड़ा हो सकती है, आएंगी,

40:58हम तैयार हैं face करने के लिए। लेकिन weightage नहीं दे सकते।

41:04Weightage देवे तो फिर साधना हमारी कमज़ोर है।

41:08तकलीफ़ आएगी। ज्ञानियों को भी तकलीफ़ आती है, सौगानी जी को भी आएगी तकलीफ़।

41:14Weightage नहीं। अब मूल बात के ऊपर आते हैं, main विषय अब चालू है।

41:22किस प्रकार आत्मा अपनी ओर पुरुषार्थ की वृद्धि करने का प्रयत्न करता है।

41:31अपने आत्मा में दर्शन करना उसमें लीन होना

41:37ये किस प्रकार करता है ज्ञानी किस प्रकार से पुरुषार्थ करते हैं

41:44आगे बढ़ने के लिए ये प्रश्न पूछा है किस प्रकार आत्मा

41:51अपनी ओर पुरुषार्थ की वृद्धि करने का प्रयोग करता है

41:56तकलीफें तो आती हैं इस प्रकार। है इस प्रकार। ऐसे तकलीफ में वो कैसे आगे बढ़ता है?

42:03ज्ञानी हुआ तो मुक्ति थोड़ी हो गई। परमात्मा थोड़े हो गए?

42:07सारे कर्मों का भूखा थोड़ा हो गए? सारे कसाय थोड़े मिट गए?

42:13ज्ञानी का मतलब क्या कि जिसने अपने परमात्मा को देख लिया है।

42:19और अब वो स्वीकार करता है कि मैं कोई ordinary नहीं हूँ। इस world का सबसे

42:26top most... Top most

42:28सबसे अत्यंत महिमावान मैं ही हूँ, भगवान से भी अत्यंत महिमावान मैं ही हूँ।

42:33मैं ही परमात्मा हूँ।

42:36मुझे किसी का आधार लेने की कोई ज़रूरत नहीं, किसी पे depend रहने की कोई ज़रूरत नहीं।

42:41शांति के लिए भी मुझे कहीं भी भीख मांगने की ज़रा भी ज़रूरत नहीं,

42:45क्योंकि मेरे पास अनंत भंडार भरे पड़े हैं। मैं कोई भिखारी थोड़ा हूँ?

42:52मैं कोई शरीर वाला थोड़ा हूँ,

42:53मन वाला थोड़ा हूँ, वचन वाला... थोड़ा हूँ मन वाला थोड़ा हूँ वचन

42:57वाला थोड़ा हूँ काया वाला थोड़ा हूँ कुटुंब परिवार वाला थोड़ा हूँ

42:59सबसे तो मैं भिन्न हूँ

43:04ये मेरे कुछ लगते बगतते नहीं हैं

43:07मैं तो परमात्मा हूँ ये ज्ञानी हुआ तो

43:09परमात्मा को देख करके ऐसी अनुभूति ऐसा विश्वास आता है

43:15और पहले मैं इनके बिना नहीं रह पाऊँगा उनके बिना नहीं चलेगा इसके

43:18बिना नहीं चलेगा उसके बिना नहीं चलेगा

43:21वो जो डर वो जो आधार बुद्धि पर। डर वो जो आधार बुद्धि परकी जो दीनता

43:28क्या भविष्य का

43:30डर क्या होगा क्या होगा कैसे करूंगा मैं वो सब खत्म हो जाता है

43:36सकल जगत ते एठवत अथवा स्वप्न समान

43:42ते कहिए ज्ञानी दशा

43:44बाकी वाचा ज्ञान ज्ञानी हुए तो परमात्मा

43:49नहीं हुए लेकिन मैं परमात्मा। परमात्मा नहीं हुए लेकिन मैं

43:51परमात्मा हूँ ऐसी श्रद्धा हुई।

43:54परमात्मा अवस्था में भी होना बाकी है।

43:57वो साधना करते करते करते करते वो अवस्था में भी परमात्मा बनेगा।

44:02जो परमात्मा को देखता है वही साधना करके।

44:07बार-बार परमात्मा की आराधना करके एक दिन वो स्वयं परमात्मा बनेगा।

44:13देखा है तो बनेगा ही बनेगा।

44:16लेकिन। हो सकता है कि। हो सकता है कि परमात्मा को

44:19देखने के बाद साक्षात परमात्मा बनने में

44:22थोड़ा समय लगे। थोड़ा समय लग सकता है।

44:28कोई कोई तो अंतर्मुहूर्त में केवल ज्ञान पा लेते हैं। किसी किसी को समय भी लगता है।

44:35वो अपने पुरुषार्थ के ऊपर आधारित है।

44:37यहाँ यही प्रश्न है कि ज्ञानी किस प्रकार से पुरुषार्थ करते हैं आगे बढ़ने के लिए।

44:43आत्मज्ञान तो हो गया। आत्मा के दर्शन तो हो गए। मां के दर्शन

44:47तो हो गए। दूसरों की आधार बुद्धि छूट गई। शरीर आदि

44:52सब मेरे हैं ऐसी जो मान्यता थी वो भी छूट गया। अब तो मैं परमात्मा हूं

44:58ऐसा हो गया। फिर अब आगे बढ़ने का कैसे पुरुषार्थ करते हैं?

45:04आपके इस प्रश्न पर मेरा तो इतना ही लिखना है।

45:10अब उनका उत्तर देता हूं।

45:13कि प्रथम की यथार्थ श्रद्धा समय... प्रथम की यथार्थ श्रद्धा समय श्रद्धा की पर्याय

45:20का अखंड की ओर जो झुकाव अथवा लीनता का पुरुषार्थ होता है

45:27उसमें काल भेद नहीं है। वो यथार्थ श्रद्धा में जो पुरुषार्थ का प्रयोग है

45:34बारंबार उसी प्रयोग की वृद्धि होती रहती है उसे वृद्धि का पुरुषार्थ कहते हैं।

45:39थोड़ी शास्त्रीय भाषा भी इसके अंदर है, art लगता है। है hard रखता है

45:43लेकिन अपन उसको clear करें कि आत्मज्ञान के पहले

45:49उसने कभी परमात्मा को नहीं देखा था। सद्गुरु को

45:54guide के रूप में रख कर

45:58आत्मज्ञान के नजदीक जब जाता है तब संसार से छूट करके वो किसका हाथ पकड़ लेता है?

46:04सद्गुरु को क्योंकि

46:07सद्गुरु best guide है। बोले घबराओ मत संसार। बोले घबराओ मत संसार छूट गया।

46:12तेरा बाल भी बांका नहीं हुआ। तुम आगे बढ़ो आगे बढ़ो और भीतर जाओ और भीतर जाओ।

46:18डरो मत। निराश मत हो जाओ।

46:23परमात्मा क्यों नहीं दिखते हैं मैं हूँ तेरे साथ। ऐसा करके वो

46:27दरवाजे तक तो आते हैं। सद्गुरु साथ में रहते हैं दरवाजे तक क्यों आते हैं?

46:35परमात्मा मिलने के पहले अगर। सद्गुरु अगर। सद्गुरु अगर साथ में नहीं रहेंगे

46:41तो परमात्मा नहीं मिल रहा है करके वो हार करके वापस संसार में आ जाएगा।

46:46इसलिए क्या करते हैं वो सद्गुरु का साथ लेता है। इसलिए भक्ति में आता है जीव।

46:51भक्ति में आने से बहुत आसानी इसलिए हो जाती है।

46:57कि अगर भक्ति में नहीं आए तो अकेले को लड़ना पड़ता है। और परमात्मा नहीं मिले तब तक वो

47:04अंदर और संसार परमात्मा और संसार परमात्मा। परमात्मा और संसार उसमें

47:09उसकी ताकत बहुत खर्च होती है और लोगों में इतनी ताकत नहीं है कि अकेले लड़ पाए।

47:17इसलिए वो भक्ति का सहारा लेता है। अगर बुद्धि वाला है तो क्या करता है बुद्धि वाला है।

47:24कि भले अंदर में तो मेरे को अकेले को जाना पड़ेगा लेकिन बाहर तक तो आप साथ दो।

47:29भले आप चक्र नहीं चलाना लेकिन रथ का रथ की लगाम तो हाथ में ले लो आप परमात्मा।

47:37इतना काम करोगे तो बस है मेरा। तो मैं पूरा महाभारत जीत लूँगा।

47:43आप आप किसी को मारना नहीं आप भगवान हो आप कैसे मार सकते हो?

47:47लेकिन हमारी गाड़ी कहाँ लेके जाना क्या करना कम से कम घुटना तो संभालो।

47:52As a guide तो रहो। तो कृष्ण भगवान सारथी हो गए अर्जुन के।

47:59क्या होता है अब? ये रथ कहाँ लेके जाना? रथ कहाँ लेके जाना है उसकी पंचायत लेने की

48:05ज़रूरत नहीं रही अब कि कहाँ

48:06लेके जाना है किसको पहले मारना है कि

48:08उसको पहले मारना है। उसको तो दनादन मारते जाना है।

48:10अब वो फिकर कौन किसको

48:14कहाँ लेके जाना है रथ को

48:15और किसको मारना है उसकी फिकर कौन करेगा? पार्थ को। कितना आधा बूढ़ा कम हो गया।

48:24इसको तो दनादंक

48:26एक के बाद एक machine gun डालते जाने का है और कुछ नहीं। speed कितनी...

48:30Speed कितनी बढ़ जाती है।

48:32और फिर जिसके रथ के सारथी भगवान हो,

48:37उसको negative thoughts नहीं आते हैं।

48:40मेरा होगा कि नहीं होगा, परमात्मा मिलेगा कि नहीं मिलेगा।

48:44कहीं मैं fail तो नहीं हो जाऊंगा, हार तो नहीं जाऊंगा।

48:48जब तक भगवान मेरे रथ पे हैं, मैं मैं हारने वाला नहीं हूँ। विश्वास। विश्वास? नहीं, ये

48:54और भी ज्यादा जबरदस्त benefit होता है इसका। एक तो हमको कहाँ

48:55जाना है, कैसे जाना है, वो... तो हमको

48:57कहाँ जाना है कैसे जाना है वो पंचायत करने की ज़रूरत नहीं है

49:00क्योंकि best guide हमारे साथ में है।

49:04और उसके रहते हुए हमको हार का तो कोई प्रश्न दिमाग में भी नहीं आता।

49:11विश्वास कितना जम जाता है। इनके रहते हुए मेरा बाल भी बांका नहीं हुआ।

49:18ये ये सद्गुरु का महत्व। तो बुद्धि वाला आदमी क्या करता है?

49:23कि लड़ना तो है लेकिन जब मुफ़्त में जब साथ मिलता है।

49:27उपध में जब साथ मिलता है, कृष्ण भगवान

49:33ने एक पैसा नहीं लिया था। क्या? रथ के सारथी बनने। कितना पैसा लिया था? 1,00,00,000?

49:37अर्जुन के पास है। कितना लिया?

49:39अरे भगवान तो सबके पक्ष में ही रहते हैं। और धर्म के पक्ष में रहते हैं।

49:45कि भई अब मैं तुमको जीता दूंगा, आधा राज मेरे को दे देना।

49:50क्या? fifty-fifty कर लेंगे आप।

49:52तोड़-तोड़म-तोड़ ही करेंगे। 40-60 करेंगे। ऐसा नहीं। 40 60 करेंगे कि ऐसा नहीं

49:57होता है। अगर ऐसा एक

49:59एक inch भी जगह मांगना तो भगवान नहीं है वो भगवान भिखारी नहीं होते हैं।

50:04भक्त के पास से कुछ लेते वेते नहीं है कुछ। लेकिन धर्म

50:08की रक्षा यदा यदा। यदा यदा

50:09धर्मस्य रक्षणाय। धर्म

50:16की रक्षा करने के लिए अर्जुन का पक्ष लिया था।

50:19क्या?

50:20उसको अर्जुन से बहुत राग

50:21था दुर्योधन से बहुत द्वेष था। राख था दुर्योधन से बहुत द्वेष होगा।

50:24ऐसा कुछ था? सही सही। अगर ऐसा था तो फिर दुर्योधन को अपनी सेना क्यों देते?

50:32और पहले मांगने को क्यों बोला उसको? क्योंकि पहली नज़र मेरे तुम्हारे पर पड़ी है।

50:38कहानी मालूम है ना वो

50:39कैसे हुई थी? अभी आप लोगों को

50:42सबको मालूम है 1-2 बार बोला है ऐसा।

50:46पीछे से अर्जुन आता है आगे से दुर्योधन आता है।

50:49मांगने के लिए। आपका support चाहिए।

50:54अब नज़र दोनों एक ही time में पाँव रखते हैं।

50:57लेकिन वो पीछे था अर्जुन तो कृष्ण भगवान को देखा दिखने में नहीं

51:03आया दुर्योधन दिखने में बोलो

51:05दोनों बोलते हैं कि पहले मैं माँगूँगा बोला नहीं ऐसा नहीं।

51:09भले ही दोनों साथ में आए हो लेकिन मेरी नज़र किस पे पड़ी है? दुर्योधन के ऊपर।

51:16तब पहले माँगने का

51:18अधिकार किसको है? मांगने का अधिकार किसको है? दुर्योधन को। अर्जुन प्रिय होगा।

51:26सद्गुरु अन्याय नहीं करते ना? यहाँ तो

51:29फिर सद्गुरु अन्याय करते हैं ऐसा भी लोग बोलते हैं।

51:32बोलते हैं, नहीं समझ में आता तो बोलते हैं। पक्षपात करते हैं।

51:36मेरी डायरी नहीं देखते हैं, ऐसा भी होता है। उसकी डायरी देखते हैं। मेरी नहीं देखते।

51:44अब वो पक्षपात तो करते नहीं हैं। बात तो करते नहीं हैं। और फिर क्या हो गया?

51:52दुर्योधन को बोला लेकिन फिर बोला देखो अभी दोनों को तो

51:54हम खाली नहीं बिठा सकते, दोनों को देना तो पड़ेगा।

51:57तो मैं मेरा बटवारा करता हूँ। एक बाजू में बिना शस्त्र का।

52:02और एक बाजू... पूरे

52:04शस्त्र सेना के साथ 18,00,00,000 अक्षौहिणी पैदल सब मिल जाएगा। अब जिसको जो

52:11चाहिए ले लो तो। दुर्योधन पहला तुम्हारा chance है क्या चाहिए?

52:14दुर्योधन को... क्या चाहिए? दुर्योधन को कुबुद्धि हुई। कुबुद्धि

52:18अधर्मी को कुदरती कुबुद्धि होती है। जिसका खड्डा जाने वाला है, नरक जाने वाला है,

52:24उसकी बुद्धि कैसे साफ हो सकती है? उसने बोला

52:28भगवान शस्त्र भी नहीं उठाएंगे, सुदर्शन चक्र भी नहीं है, कहीं

52:32नाटक देखने थोड़ा जा रहे हैं,

52:33लड़ाई करने जा रहे हैं, उसमें तो लड़ाई करना है, मारामारी करना है।

52:38बिना शस्त्र के भगवान भी हो तो क्या कर लेंगे? क्या?

52:44क्या? भगवान को भी मार मार डालेंगे लोग शस्त्र,

52:46वो तो शस्त्र उठाने वाले नहीं हैं। और मैं यहाँ से तीर छोडूँ तो उनको लग जाएगा।

52:52और वो तो मर जाएँगे, पहले धड़ाके मर जाएँगे तो बाद में तो मैं फिर भिखारी हो जाऊँगा।

52:56इसलिए क्या करें? ऐसे भगवान हमको नहीं चाहिए, भगवान ऐसे चाहिए कि हमको जीता दें।

53:03हमारे दुश्मनों को मारे ऐसे चाहिए, ऐसे भगवान किस काम के?

53:07उसने क्या किया? नहीं नहीं आप नहीं चाहिए,

53:09क्या फायदा? अगला चक्र... क्या फायदा अगला चक्र उठा सकते हो?

53:12नहीं मैं किसी को मारूंगा नहीं। अच्छा भैया

53:14आपकी जरूरत नहीं है। एक कुबुद्धि हुई।

53:21ठीक है तुम लेके जाओ सेना। अर्जुन को डर लग रहा था कहीं वो भगवान को मांग लेगा तो।

53:27लेकिन आज उसने भगवान को नहीं मांगा।

53:31भगवान भले शस्त्र नहीं चलावे कोई बात नहीं लेकिन best guide है।

53:36मेरे रथ के सारथी बन जाना। और लड़ाई। और लड़ाई में साथियों को नहीं मारा जाता है।

53:43असु भक्ति लेकर आए थे। भक्ति लेकर। उसके दिल में भगवान थे।

53:47उसको भगवान चाहिए, उसको कुछ नहीं चाहिए। ऐसे जो पहली बार जो आत्मज्ञान होता है,

53:55तो जो

53:57बुद्धि वाले मुमुक्षु होते हैं,

53:59वो झुक जाते हैं। सद्गुरु के शरण में चले जाता हूँ।

54:05आज देखा है मैंने, Ek Onika। देखा है second volume।

54:09और श्री श्री रविशंकर का लेख है surrender

54:11वाली बात है अंग्रेजी में आया है।

54:13मेरे को बहुत अच्छा लगा वो आज कुदरती नज़र गई थी। के surrender तो होना ही पड़ेगा।

54:19आज झुको या कल झुको। एक दिन तो surrender होना ही पड़ेगा।

54:24Surrender होकर झुकोगे

54:25तो फायदा है। नहीं तो शर्म से झुकना पड़ेगा। क्या ऐसा

54:31अच्छा लेख देखना देखना अच्छा लेख।

54:35जो बुद्धि वाला होता है मुमुक्षु, बोलता है जब free में सलाह मिलती है,

54:40कोई अपने को परमात्मा के दर्शन तक, दरवाजे तक पहुँचा सकता है,

54:44भले अंदर मैं चले जाऊँगा लेकिन दरवाजे तक तो रहे।

54:48तो वो क्या करता है भक्ति में आ जाता है और भक्ति में आने से उसको बहुत फायदा होता है।

54:55बार-बार जो संसार disturb करता था वो नहीं करता है क्योंकि दरवाजे पे

54:58कौन खड़ा है? कि तुम जाओ

54:59अभी अंदर में हम काम करो। कि तुम जाओ अभी अंदर में काम करो और मैं यहाँ खड़ा हूँ।

55:04किसी को अंदर नहीं आने दूँगा।

55:09पर उसको time बहुत मिल जाता है।

55:12अंदर में परमात्मा को ढूँढने के लिए। क्योंकि 1 second में ढूँढना है तो कैसे?

55:16अब तो बहुत time है। क्योंकि दरवाजे पे सतगुरु खड़े हैं, किसी को अंदर आने नहीं देंगे।

55:21और मैं... पूरा घूम करके ढूँढ ही लूँगा कैसे भी करके। ढूँढने में तो मेरी आँख चाहिए।

55:29लेकिन disturb कोई ना करे इसके लिए दरवाजा... Disturb कोई ना करे इसके लिए दरवाजे पे

55:33प्रभु चाहिए। इसलिए सद्गुरु क्या है?

55:36कि परमात्मा नहीं मिले तब तक सद्गुरु दरवाजे पे खड़े रहते हैं तो

55:40कोई आता नहीं, घुसता नहीं है।

55:43बिना permission कोई आ नहीं सकता है। और मेरे को time मिल जाता है, मैं कमजोर हूँ,

55:49मुझे ढूंढने में बहुत time लगता है।

55:52लेकिन अब मेरे को कोई फिकर नहीं है क्योंकि कोई घुसने वाला नहीं है अब।

55:57और आसानी से मैं ढूंढ लेता हूँ। इसीलिए भक्ति के बिना मुक्ति नहीं इसका कारण ये।

56:05जो सद्गुरु को पहचानता है, उसके सर्वसमर्पण भाव करता है, उनके शरण में जाता है,

56:10उसको मुक्ति तो 2-4 दिनों में हो जाती है, चुटकी में हो जाती है।

56:15वो तो उतने दूर से आए और फटाफट काम करके चले गए, हम यहाँ बैठे हैं विधवा।

56:21और इतने साल से सुनते हैं फिर भी काम नहीं होता है, कैसे होगा?

56:25Surrender ship से काम आसानी से होगा। Surrender ship से काम

56:28आसानी से होता है। उनको तो office जाना है,

56:30आपके इतने भाग्यशाली नहीं हैं कि रोज मिलें।

56:33तो उन्होंने जल्दी surrender कर लिया अपने आप। जल्दी करके चले गए।

56:38अब हमको तो रोज मिलता है ना, रोज मिलते तो भाई कीमत नहीं रहती है।

56:42रोज सुनने को मिले क्या कीमत रहती है? बाहर गाँव वालों को तो office जाना पड़ता है।

56:47या do or die करना पड़ता है, या मरो या करो। फिर वो तो कर लेते हैं।

56:53अपने को तो रोज मिलता है,

56:54आज नहीं तो कल। अपने को तो रोज़ मिलता है आज नहीं तो

57:01कल कल नहीं तो परसों। इसीलिए तो ये प्रथम अभी इसको खुलासा करना है समय नहीं है।

57:05पहली बार जो अनुभव होता है

57:06वो और अनुभव होने के बाद दोबारा

57:07पिछली बार चौथी बार बार-बार अनुभव होता है जिसको वृद्धि का पुरुषार्थ कहते हैं वो।

57:13इन दोनों में difference क्या है? ये प्रश्न है।

57:17ये प्रश्न को सौगानी जी क्या जवाब देते हैं वो अपन कल खुलासा करेंगे।