Avlokan Discourses of Shri Devchand bhai Shah The book Search Photographs About

Shri Dravya Drushti Prakash

13 February 2002 · Patra 22 · 45 minutes

Transcript

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Recitations restored to their canonical wording: Mangalacharan — Mangalam Bhagavan Viro, Mangalacharan — Sarva Mangala Mangalyam, Namokar mantra, Omkar bindu sainyuktam, Samaysar mangalacharan.

0:13णमो अरिहंताणं णमो सिद्धाणं

0:17णमो आयरियाणं णमो उवज्झायाणं णमो लोए सव्व साहूणं

0:25नमः समयसाराय

0:28स्वानुभूत्या चकासते । चित्स्वभावाय भावाय

0:35सर्वभावान्तरच्छिदे मंगलं भगवान वीरो,

0:42मंगलं गौतमो गणी। मंगलं कुन्दकुन्दार्यो,

0:49जैनधर्मोऽस्तु मंगलम्॥ सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं

0:56सर्वकल्याणकारकम। प्रधानं सर्वधर्माणां

1:03जैनं जयति शासनम॥ ॐकारबिन्दुसंयुक्तं

1:10नित्यं ध्यायन्ति योगिनः।

1:14कामदं मोक्षदं चैव ॐकाराय नमो नमः

1:26श्रीद्रव्यदृष्टिप्रकाशः। श्री द्रव्य

1:30दृष्टि प्रकाश। पूज्य निहालचंद सौगानी जी के आध्यात्मिक पत्र, पत्र number

1:35है 22। कल चौथा चला था आज पाँचवा चलेगा।

1:42प्रश्न ऐसा है कि किस प्रकार आत्मा अपनी और पुरुषार्थ की

1:49वृद्धि करने का प्रयोग करता है? जिसको आत्मज्ञान हो गया है।

1:55उसको परमात्मा बनने के लिए किस प्रकार का प्रयोग करना चाहिए वो प्रश्न चल रहा है।

2:03उसमें जो कल बात आई थी। कि पुरुषार्थ करने में केंद्र बिंदु में

2:11सिर्फ अपना आत्मा है। तो कैसा है आत्मा? कि अखंड

2:18one piece ज्ञान घन माने अंदर बाहर सब जगह। अंदर बाहर सब जगह ज्ञान है।

2:25बीच में खाली जगह नहीं है पूरा solid piece घन माने solid piece। भूंगड़ी नहीं

2:32pipe में भूंगड़ी है वो नहीं। Solid piece माने लोहे का टुकड़ा सड़या होवे ना

2:38ऐसा। वो ज्ञान घन पुरुषाकार माने देहाकार।

2:45और शरीर अंदर के कर्म इसके अंदर में राग

2:49द्वेष के। इसके अंदर में राग द्वेष के जो ढेर सारे भाव हैं वो। उसके अंदर

2:56वहां से और आगे गए तो blankness।

2:59निर्विकल्पता शून्यता। उससे भी गहरा। उंडा।

3:07शुद्ध पर्याय से भी उंडा। वो कह नहीं सकते कैसा तो चैतन्य तत्व।

3:13चैतन्य जानने देखने वाला तत्व माने। विश्व में जितने भी जीव अजीव पदार्थ

3:21हैं। इन सभी

3:27जितने भी पदार्थ हैं उन सबका सार तत्व है।

3:32चैतन्य तत्व, इतना ही नहीं, मैं हूँ, उसमें मैंपन लगा है।

3:38यही मेरा अस्तित्व है, बस यही, ये मेरे से कभी नहीं बिछड़ता, क्योंकि ये मेरा

3:44अस्तित्व है, ये मेरे original रूप हैं। Original रूप है। वो अजर अमर है।

3:49वो कभी नहीं मरने वाला है।

3:52कर्म change होते हैं, राग द्वेष change होते हैं,

3:55शरीर change होता है, अवस्थाएं बदलती यह नहीं बदलता।

4:02वो है केंद्र बिंदु साधना का। मतलब आगे बढ़ना है तो,

4:07परमात्मा बनना है तो किसी के help की जरूरत नहीं है। अपना परमेश्वर जो स्वयं है,

4:14जो अपना अस्तित्व है। जो अपना अस्तित्व है वही helpful हो।

4:17कोई external help की ज़रूरत नहीं। क्योंकि आत्मा से परमात्मा बनने में

4:25हम totally किस पे depend हैं? आत्मा पे depend हैं।

4:30आत्मा नहीं मिला था उसके पहले आत्मा कहाँ है कैसे ढूंढना उसके लिए सद्गुरु की ज़रूरत

4:38और सद्गुरु का उपदेश हमारे जीवन में उतरे उसके लिए सर्वसमर्पण भाव... उसके

4:42लिए सर्वसमर्पण भाव और भक्ति की ज़रूरत थी।

4:46Contact के लिए सत्संग की ज़रूरत थी। लेकिन अभी आत्मा का दर्शन हो गया।

4:54तो फिर अब कौन हमारा केंद्र बिंदु है? अब किसी की ज़रूरत नहीं।

5:00आत्मा से परमात्मा बनने के लिए किसी की ज़रूरत नहीं, हमारा आत्मा ही काफ़ी है।

5:06कैसा आत्मा? ऐसा। जो blankness को भी देखने वाला है, उससे भी गहरा है। देखने वाला है

5:10उससे भी गहरा है शुद्ध पर्याय से भी गहरा है

5:17वो वो आत्मा है वो कभी हमको नहीं छोड़ेगा क्योंकि यही हमारा अस्तित्व है

5:22तुम्हारा नाम क्या नाम बोलेंगे तो वो तो शरीर का नाम है

5:27तुम्हारा काम क्या तो ये जो बाहर में शरीर करता है वो

5:29तो अपना काम है ही नहीं देखो असल में परमात्मा को

5:36इतनी शांति है कि उसको

5:37कोई काम करने की जरूरत

5:38ही नहीं। कोई काम करने की ज़रूरत ही नहीं। या। वो निष्क्रिय तत्व है।

5:46वो उसकी निष्क्रियता को बताने के लिए कहते हैं वेदांत में कि

5:50कुछ नहीं कर सकते परमात्मा की इच्छा के बिना।

5:55उसमें ये नहीं कहना है कि परमात्मा कोई है और वो करता है।

6:01या ये कहना है कि तुम निष्क्रिय तत्व हो। तुम कुछ भी नहीं कर सकते।

6:04ना तुम... नहीं कर सकते।

6:07ना तुम बाहर का कुछ कर सकते। ना शरीर का कुछ कर सकते।

6:12ना राग द्वेष के भावों को तुम आगे पीछे change कर सकते।

6:16ना वेदन को जब चाहे तब ला सकते। तुम क्या कर सकते?

6:22कुछ नहीं कर सकते। क्योंकि परमात्मा को जरूरत ही क्या है?

6:26जो अपने आप में परिपूर्ण है उसको जरूरत क्या है कुछ करने की? कौन करेगा?

6:32कुछ करेगा तो कौन करेगा?

6:34जिसको कोई इच्छा होगी। करेंगे जिसको कोई इच्छा होगी वो करेगा। करना और नहीं करना

6:39उसका base है इच्छा है। परमात्मा अधूरा नहीं है।

6:46परमात्मा 90% नहीं है कि 10% के लिए उसको कुछ करना पड़े।

6:51परमात्मा 100% परिपूर्ण अपने आप में शुद्ध और परिपूर्ण है।

6:57उसको कुछ करने की जरूरत नहीं है। और ये मेरा अस्तीत्व है। शुद्ध पर है।

7:03शुद्ध पराय का अर्थ जब व्याह नजर जाती है। ऐसे तत्वों के ऊपर।

7:09आगे बढ़ने के लिए। तब 100% वेदन आता ही है।

7:16ऐसा कभी नहीं बनता। कैसे परम तत्वों के ऊपर नजर पहुंचे और हमको वेदन ना आवे

7:22ऐसा कभी नहीं बनता है। आता ही है।

7:27क्योंकि जो उसको देखेगा। वो धन्य हो जाएगा। वेदन माने क्या? खुशी का अनुभव।

7:34धन्यता का अनुभव, सौभाग्य का अनुभव। चिंताओं के मुक्त ऐसा अनुभव है, वेदन क्या चीज है?

7:42जब वेदन आता है तो कोई चिंता नहीं होती किसी प्रकार की। उस क्षण के लिए।

7:50क्यों ऐसा होता है चिंता मुक्त? संसार में तो इतने लफड़े हैं।

7:55कि इतने चिंता मुक्त क्यों हो जाते हैं?

7:57वही दुकान पहले थी, अभी भी वही दुकान है। वही दुकान पहले थी अभी भी

8:00वही दुकान है अभी चिंता क्यों नहीं है देखो

8:04पहले धंधा अच्छा चलता था तो अभी और बड़ा हूँ अभी नहीं अभी target और बड़ा हूँ

8:10अभी धंधा नहीं चल रहा है मंदा है कोई फिक्र नहीं और क्यों

8:15लोग मंदिर में tape बजाते हैं भजन की कीर्तन की प्रवचनों की और हम लोग पागल लोग

8:21दुकान पर tape लगाते हैं दुकान पर धर्म की book रखते हैं क्यों ऐसा? क्यों ऐसा?

8:29खाली बैठे तो उधर उधर गप्पे मारना रहता है, उसके जगह पे ऐसा क्यों change आया?

8:36नहीं, ये जीवन बदलता है। जीवन सुखमय है, शांतिमय है।

8:43व्यर्थ की चिंता हम नहीं करते, इसका ये सबूत है। ये चक्की ऐसे ही चलने वाली है दुनिया।

8:51संसार नहीं बदला है, दुनिया नहीं बदली है, लेकिन हम बदल गए हैं।

8:58क्यों बदल गए? जिसको परमात्मा मिल जाए उसको क्या फिक्र? जो जिस

9:05जो अवस्था जो ज्ञान परमात्मा को देख लेवे, वो तो नाचने लगे।

9:11उसको काहे को फिक्र किसी बात की भी? ये वेदन सबूत है।

9:17कि हमको परमात्मा मिल गया

9:19है। सीधी बात है। वेदन की अपने आप में कोई value नहीं है। तरंग की...

9:21अपने आप में कोई value नहीं है

9:23तरंग की अपने आप में कोई value नहीं है।

9:26लेकिन ये तरंग इसलिए उठी है क्योंकि समुंदर है। ये अब value है उसकी।

9:33असल में value हम किसकी करते हैं?

9:37समुंदर की करते हैं। वेदन की value नहीं है वो। वो समुंदर की value है।

9:44या ये बात कहते हैं।

9:46कि शुद्ध परायण तो होगी ही आनंद तो आएगा ही अशांति तो दूर

9:50होगी। ही अशांति तो दूर हो ही जाएगी

9:53शांति तो मिलेगी। लोग रोते हैं उस वक्त हमको कोई tension नहीं होता है।

10:00गंदा नहीं चल रहा है वो नहीं हो रहा है

10:02ये नहीं हो रही परेशानी वो परेशानी। लेकिन हमको कोई तकलीफ नहीं होती।

10:09तो वेदन आएगा लेकिन ये तत्व कैसा है शुद्ध पर्याय का अस्तित्व भी उसी वक्त है

10:17मालूम भी पड़ता है कि

10:18वेदन आया है। पता है कि वेदन आया है एक साथ में दो मालूम पड़ता है

10:23एक तो परम तत्व जो है जिसमें कोई अवस्था नहीं है जिसमें कोई लहर नहीं है

10:29कोई वेदन नहीं है ऐसा

10:31और एक जब उसको देखते हैं तब जो आनंद आता है जो वेदन होता है वो

10:37दोनों साथ में दिखता है परम तत्व तो अजर अमर है लेकिन ये वेदन है वो क्षणभंगुर है

10:45वो आएगा चले जाएगा आएगा। वो आएगा चले जाएगा ऐसी practice करते करते करते करते

10:52फिर 1 minute 1 second का रहेगा फिर 2 second का रहेगा फिर 1 minute का रहेगा

10:55फिर 4 minute का रहेगा ऐसा करते

10:58करते अगर continuous 48 minute रह गया अंदर में

11:04तो आप परमात्मा बन जाओ इतनी बात है परमात्मा बनने के लिए इतना लगता है

11:10लेकिन 48 minute तक पहुँचने के लिए हमको जो कोशिश करनी पड़ती है

11:13उसमें हो सकता है। उसमें हो सकता है कि दो चार भाव भी निकल जावे

11:16या एक भाव निकले। लेकिन बहुत बहुत कोशिश करनी पड़ती है। और यही प्रश्न है

11:23कैसे कोशिश करते हैं ज्ञानी पुरुष? कि ज्ञानी पुरुष वेदन आता है तो वेदन को

11:29अपने अस्तित्व से मिलाते नहीं हैं।

11:32ये बात है। इधर ये बात है। वेदन जरूर आता है उनको।

11:37जब भी आत्मा को देखते हैं तो वेदन जरूर आता है।

11:40लेकिन वो दोनों अस्तित्व

11:42अलग-अलग हैं एक... वो दोनों अस्तित्व अलग-अलग है। एक permanent अस्तित्व है

11:45और एक temporary अस्तित्व है। वेदन है वो temporary अस्तित्व है।

11:52वेदन नहीं है ऐसी अवस्था है, शून्यता वो भी temporary है।

11:58राग द्वेष वाली अवस्था है भी temporary है। तीन अवस्था होती है। राग द्वेष वाली हो,

12:06या blankness हो, या फिर, वेदन हो, पात्... वेदन हो आत्मा का।

12:13तीन में से कोई भी एक होती है अमर। लेकिन ये तीनों भी temporary है।

12:20और परमात्मा तो अजर अमर है। तो

12:25जब हम अजर अमर तत्व को देखते हैं

12:28अंदर में भीतर में परमात्मा को शरीर से भिन्न कर्म से भिन्न

12:32भाव कर्म से भिन्न वेदन से भी भिन्न। तब हमको वेदन आता है।

12:38तो ज्ञान दोनों को जानता है, परमात्मा को भी और उसके

12:42आनंद को भी। दोनों को जानता है।

12:46ताजमहल भी दिखता है और ओ भी होता है। दोनों साथ में।

12:53ऐसे परमात्मा भी दिखता है और आनंद भी आता है। और दोनों चीज़ का भान

12:59ज्ञान को है। लेकिन ज्ञानी क्या करते हैं?

13:07वेदन में नहीं मैं तो ये। कि इतना ही मैं वो है लेकिन गौन

13:14है मना नहीं करते हैं। लेकिन मेरे में नहीं है।

13:19और मुझे उसकी कोई value नहीं। क्योंकि मैं तो परमात्मा हूँ।

13:26वेदन नहीं था तब भी मैं था। मैं राग द्वेष करता था तब

13:32भी था। जन्मों के पहले भी मैं कहीं था। और अब वेदन आ रहा है तब भी मैं हूँ।

13:39वेदन छूट रहा है तब भी मैं हूँ। वेदन और ज्यादा बढ़ जाएगा तब भी मैं रहूँगा।

13:45मैं मुनि बनूँगा तब भी रहूँगा। और मैं सिद्ध भगवान बनूँगा तब भी मैं रहूँगा।

13:53जो भी change आया वो किसमें आया? संयोगों में, अवस्था में।

13:59और मैं, मेरे में कोई change कभी आया नहीं। मैं change...

14:02आया नहीं। मैं change हो सके ऐसा हूँ ही नहीं, मैं तो अपरिणामी तत्व हूँ।

14:06मेरे में change कैसे आएगा?

14:09हम पत्ते खेलते हैं तो 52 पत्ते रहते हैं,

14:12एक एक को चार चार जने बैठे हैं धीरे-धीरे पत्ते मिलते हैं।

14:17क्या एक game हुई फिर दूसरी game हुई फिर तीसरी game हुई। ऐसे game बदलते रहती है।

14:24पत्ते उतने के उतने रहेंगे कितने? वो interchange

14:29होते रहते हैं। change होते रहते हैं।

14:31next game में हमको काली का एका आया तो

14:34next game में नहीं आया वो लाल का एका आ रहा है।

14:36या नहीं आया। सब एके एक को चले जा रहे हैं ऐसा ही मन है।

14:41लेकिन पत्ते तो वही के वही रहते हैं। वो बदलते नहीं।

14:47कायम भी रहना है और बदलते रहना है।

14:52स्थिर भी रहना है और तरंगे भी उठ रही हैं।

14:56तो जब हम आत्मा को देखते हैं जो स्थिर तत्वों को देखते हैं। देखते हैं

14:59जो स्थिर तत्वों को देखते हैं जो परमात्मा को देखते हैं तब आनंद जरूर मिलता

15:05उसको भी हम जान लेते हैं। लेकिन मेरा अस्तित्व अलग और आनंद का अस्तित्व

15:12अलग। आनंद है मेरी boundary के बाहर।

15:17मेरे में किसी का प्रवेश नहीं। समुंदर में तरंगें नहीं होती हैं।

15:23दिखाई देती हैं।

15:25तरंग अलग समुंदर अलग। समुद्र अलग, समंदर अलग। क्योंकि समंदर तो

15:28स्थिर तत्व है, विशाल है।

15:30तरंगें तो हैं छोटी-छोटी। इतना समंदर विशाल है, उतना थोड़ा विशाल।

15:37इसीलिए समंदर में तरंगें लाखों रह सकती हैं, करोड़ों रह सकती हैं। लेकिन एक तरंग में

15:44समंदर नहीं रह सकता है। देखो।

15:48एक साथ अनंत गुण की अनंत पर्यायें हैं आत्मा में। अभी इसी वक्त।

15:55लेकिन एक तरंग में आत्मा नहीं है। ये जबरदस्त तत्व है।

16:02ये परमात्मा की शक्ति जबरदस्त है। और वो परमात्मा कौन है? किसकी बात चल रही है?

16:09कि ऐसा उम्दा चैतन्य तत्व मैं हूँ।

16:15दूसरों की बात नहीं चल रही है। ऐसा परमात्मा मैं इस देव मंदिर में

16:21कर्म से शरीर... कर्म से, शरीर से, राग द्वेष के भावों से,

16:27और आनंद की पर्याय से

16:28सबसे भिन्न अंदर

16:29में बैठा हूँ। अजर अमर तत्व। ऐसी प्रथम श्रद्धा

16:37जब ही कही जाती है।

16:40कि ऐसी श्रद्धा के प्रसार के साथ, प्रसार क्यों लिया श्रद्धा?

16:47श्रद्धा का प्रसार क्यों लिया? क्योंकि असंख्य प्रदेश में फैलती है श्रद्धा।

16:56क्या एक प्रदेश नहीं है कि ये है ऐसा नहीं। नहीं लेकिन इतना बड़ा area जो है पूरे

17:02प्रदेश में अहमपना करती है।

17:08देवचंद भाई कहते हैं तो आँख नाक कान सब साथ में आ जाते हैं।

17:14अभी आँख का अलग निकाल के photo डालो। कि हे देवचंद

17:17भाई। हे देवचंद भाई। हे देवचंद भाई नहीं।

17:21सिर मुंडी लगाओ इधर और बाकी सब निकाल दो। हे देवचंद भाई। वो

17:25देवचंद भाई का सर का photo है।

17:27चेहरे का। देवचंद भाई नहीं। देवचंद भाई कहते हैं ये पूरा body है।

17:33ऐसा मैं आत्मा कहते हैं। ये श्रद्धा जो है

17:39जहाँ अपनापन करती है। वो पूरे body में प्रसरती है।

17:43चैतन्य की body में। एक तो अंदर में

17:44ऊपर दिखती है वो तो शरीर जड़ की body। ऊपर दिखती है वो तो शरीर जड़ की body है।

17:48अंदर एक one piece ज्ञान की body है। invisible। क्या?

17:55आँखों से नहीं देख सकते, कानों से नहीं सुन सकते,

17:58ऐसी invisible body ज्ञान की है। वो ज्ञान की body पूरी जो है

18:04यहाँ से लेकर के वहाँ तक पूरा।

18:07सर से लेकर के नीचे तक पूरी body

18:09आगे पीछे सब अंदर बाहर सब। तो अंदर डालते हैं ना।

18:14अंदर डालते हैं ना पानी डालते हैं

18:16तो अंदर गुड़गुड़ करके जाता है ना अंदर तो जैसे खाली जगह में जाता है।

18:21पानी नली के द्वारा। लेकिन आत्मा वहां पर है।

18:27आत्मा देखो। ये हर front portion एक portion है।

18:34बीच में हवा है। नलियां हैं ढेर सारी। ऐसी रचना है।

18:40लेकिन आत्मा one piece है। उसमें

18:42कोई हवा... One piece है उसमें कोई हवा बीच में नहीं है

18:46छाती का भाग और पीठ का भाग इन दोनों के बीच में जितना भी gap है

18:51उसमें भले ना करोड़ों नलियां हो तो भी आत्मा one piece है

18:55यहां से लेकर के वहां तक का पूरा ज्ञान वहां रहता है

19:00total रहता है वहां कोई pollution नहीं है शरीर का pollution है

19:05लेकिन अंदर में जो ज्ञान body है

19:06उसमें कोई pollution नहीं इसीलिए पेट में जब आवाज आती है ऊपर। पेट में जब

19:10आवाज़ आती है ऊपर नीचे होती है gas जैसा तो हमको मालूम पड़ जाता है।

19:15क्यों मालूम पड़ता है? ऐसा करे तो, ऐसा करे तो ऐसा।

19:22तो मालूम नहीं पड़ता है क्योंकि ये touch नहीं करता है।

19:26इतना 1 mm का भी फर्क होगा तो मालूम नहीं पड़ेगा।

19:31ऐसा करते ही मालूम पड़ जाता है। इसका मतलब क्या हो गया? कि

19:35जहाँ ज्ञान है वहाँ मालूम पड़ता है।

19:37जहाँ ज्ञान नहीं है वहाँ मालूम नहीं पड़ता है। ये prove करता है कि अंदर में

19:42शरीर की body पोली है। लेकिन अंदर में जो आत्मा है

19:47वो पोला नहीं है वो ज्ञान पिंड है। One piece। ऐसे श्रद्धा

19:52में ये आत्मा ऐसा जो आता है।

19:55तो श्रद्धा पूरी body में ऊपर से नीचे

19:57तक प्रसरती है हर प्रदेश में प्रसरती है। Outer look

20:02नहीं सिर्फ। Outer inner outside। Outer,

20:06inner, outside सब, all round, front, behind, side,

20:13पूरा, ऐसे पूरे असंख्य प्रदेश में श्रद्धा फैलती है और कहती है,

20:18ये मैं चेतन तत्व हूँ, ऐसा करो। विश्वास कहाँ करती है?

20:24ऐसी, ऐसा विश्वास करती है। कौन से area में और कैसा विश्वास करती है?

20:30तो ऐसी श्रद्धा के प्रसार के

20:32साथ जब लीनता का अनुभव होता है... हीनता का अनुभव होता है। तब यथार्थ श्रद्धा

20:38कही जाती है। ये तो beginning हुई।

20:40अब यहाँ से आत्मा के दर्शन हुए। नजर वहाँ जाई और वेदना आया। पूरे

20:46सर्वांग, सर्वांग श्रद्धा प्रसर गई। और आनंद आया, विश्वास आया कि मैं परमात्मा हूँ।

20:53ये तो यहाँ से शुरुआत हुई।

20:56अब इसमें आगे बढ़ना है तो

20:58जैसे वो शुरुआत किया है ना वैसे ही दोबारा, तीसरी बार, चौथी क्योंकि... क्योंकि अभी हम

21:04आत्मा को तो जान लिए हैं

21:06लेकिन परमात्मा बनना बाकी रह गया है। तो बार-बार बार-बार परमात्मा बनने के लिए।

21:15जैसे एक बार पहली बार आत्मा को देखा तो सारे tension खत्म सारी इच्छाएं खत्म।

21:20अब सुख-दुख या मोह परवाह नहीं होती। क्या चाहिए कि नहीं कुछ नहीं चाहिए सब है।

21:27कुछ चाहिए भई ये नहीं अब। सब कुछ मिल गया है। जो मिलना... सब कुछ मिल गया।

21:31जो मिलना था वो सब मिल गया। लेकिन अभी...

21:37अभी पूर्व कर्मों के कारण किसी के ऊपर dependence रहना पड़ता है जैसे doctor के ऊपर,

21:42दवा के ऊपर। चलना है तो vehicle चाहिए, auto चाहिए।

21:47भूख लगे तो पीड़ा खत्म करने के लिए खाना चाहिए, रोटी चाहिए।

21:53परमात्मा है फिर भी वो सब चाहिए। पूर्व कर्म भी है।

21:58वर्तमान में... वर्तमान में अनंतांदु मंदी के अलावा

22:01दूसरा कर्जा भी

22:02है। 99,999 बोला था ना?

22:11इसमें 90,000 चुका दिया तो एक नौ कम करो।

22:14कौन सी side से

22:15कम करना? 99,999। इसमें

22:21एक नौ निकाल दो।

22:24कौन सा नौ निकालो

22:25अब? Left side। Left

22:29side का कि right side का? आत्मा का दर्शन हुआ।

22:33तो left side का नाव निकल गया। निकला तो नाव ही निकला है।

22:38लेकिन कौन से side का निकला है? Left side का। और आत्मा का अनुभव नहीं हुआ।

22:44तो आप कुछ भी कर लो।

22:46वो figure वैसा ही रहेगा। Main figure तो

22:49नाव है left side। वो निकल गया आत्मा का अनुभव होते

22:53ही लेकिन अभी भी। आत्मा का अनुभव होते ही लेकिन अभी पूर्व कर्म के कारण

22:57और वर्तमान में अस्थिरता के कारण

22:59इतनी जबरदस्त practice नहीं है कि हम निरंतर अंदर में रहे

23:03इसी कारण अभी ₹9999 का कर्जा बाकी है

23:12बस वो चुका देगा ना तो परमात्मा बन जाएगा चुकाना तो पूरा पड़ेगा

23:20एक भी चुकाए बिना तो नहीं चलेगा पूरा खत्म करना पड़ेगा। पूरा खत्म करना

23:25पड़े। तो परमात्मा बनने के लिए यात्रा करना है।

23:28और इसके लिए हमको एक ही काम करना है, जिस तरीके से हमने

23:33left side का नाव निकाला है, उसी तरीके से कमाई करते जाओ। और देते जाओ।

23:40दूसरा क्या रास्ता है? आत्मा को देखना वो सबसे बड़ी कमाई है।

23:48चैत,

23:49बाहर की संपदा कोई संपदा नहीं। विपदा कोई संपदा नथी अने

23:53बहारनी विपदा कोई विपदा

23:56नथी पूज्य गुरुदेव श्री के वचन है

24:00चैतन्य का स्मरण ओर संपदा है
00:24:02.1000 --> 00:24:08.714
ओर चैतन्य का विस्मरण वो विपदा है में परमात्मा हुं संपदा है ए तुमारी कमाई है पैसा

24:10कमाना तो क्यां करना

24:13तो दुकान जाना

24:16ओर परमात्मा. दुकान जाना और परमात्मा बनना है तो क्या करना?

24:21कहीं जाना मना की ज़रूरत नहीं है। मैं परमात्मा हूँ plus गाड़ी आगे चलेगी।

24:28इतना ही है इतना easy है परमात्मा बनना बहुत easy है।

24:33क्योंकि परमात्मा कोई factory में manufacture नहीं किया जाता है। क्या?

24:40जैसे steel के बर्तन बनाते हैं या plastic की थैलियाँ बनाते

24:44हैं ये manufacture होता है।

24:47कोयला manufacture होता है लकड़ी को जलाओ तो कोयला बनता है।

24:52बिजली manufacture होती है। परमात्मा कभी manufacture नहीं होता है।

24:59कोई बनाना चाहे तो बना नहीं सकता कितना मिलाना कितना ज्ञान मिलाना कितना आनंद मिलाना।

25:04कितना गेलो अंदर में।

25:07कैसे बना सकते हो? नहीं नहीं बना सकते। इसीलिए

25:13परमात्मा बनना माने क्या? फिर परमात्मा कैसे बनने को बोलते हो?

25:18कि परमात्मा बनना का मतलब ये है कि तुम परमात्मा को देखो और मानो

25:21कि मैं परमात्मा हूँ, बन गए परमात्मा। अब कितना easy है।

25:27परमात्मा बनने के लिए क्या करना कि तुम मानो कि मैं परमात्मा

25:30हूँ, हो गए परमात्मा। वो कोई factory में थोड़ा बनता है। 1 kilo 2 kilo लेके आवे

25:34ऐसा थोड़ा बनता है, 1 liter half

25:36liter कुछ। ऐसा कुछ भी नहीं होता। मानने में है।

25:43मानने में है पूरा चीज़। जो भी कमाल है मानने में है। इसीलिए दंशन मुलो धम्म।

25:50वस्तु सहो धम्म। और दंशन मुलो धम्म। वस्तु का स्वरूप समझो।

25:57पैसा में पदार्थ हूँ, हो गया धर्म, शुरुआत हो गई।

26:01धर्म का मूल की शुरुआत हो गई, धर्म माने शांति का रास्ता खुल गया।

26:06दंशन माने दर्शन। आत्मदर्शन। आत्मदर्शन माने... आत्मदर्शन माने आत्मश्रद्धा

26:12कि मैं परमात्मा हूँ।

26:15वो धर्म का मूल है। दंशन मूलो दम। चारित्र खलु दम।

26:21बार-बार दर्शन करते रहो, बार-बार, बार-बार। इसको बोलते हैं action,

26:26चारित्र। वो साक्षात धर्म है। बस ये रत्न

26:32सम्यक दर्शन ज्ञान चारित्राणि मोक्ष

26:37मार्गः। यही मोक्ष का मार्ग है।

26:42और जो परमात्मा भिखारी बन करके घूम रहा था संसार में,

26:47वो जैसे अपने

26:48में परमात्मा वैसा देखता है तो धीरे-धीरे practice करते-करते करते-करते करते,

26:54वो परमात्मा बन जाता है। परमात्मा बनना मांगना क्या?

26:58अभी थोड़ा भी भीख मांगना नहीं

27:02बचा। थोड़ा भी कर्जा नहीं बचा। किसी का लेना-देना नहीं कुछ नहीं।

27:04सारे... ना नहीं कुछ नहीं

27:07सारे दिखते नाते खत्म

27:09और अंश मात्र भी दुख नहीं है संपूर्ण सुख है ऐसी अवस्था पा लेता है जीव

27:16इसको बोलते हैं परमात्मा वो परमात्मा है पहले से इसीलिए परमात्मा बना है

27:22क्योंकि इसको बना नहीं सकते

27:25क्या invention और discovery में फर्क

27:31परमात्मा की discovery होती है invention नहीं होता है।

27:37America का Columbus ने discovery की थी, invention नहीं किए हैं।

27:43Vasco da Gama ने हिंदुस्तान की खोज की थी, लेकिन invent नहीं किया था।

27:51बनाना और invent करने में फर्क है खोज करने में।

27:58इसीलिए हमको परमात्मा बनना है तो क्या करना है?

28:03invention करने की जरूरत नहीं है क्योंकि तुम परमात्मा तो हो ही हो।

28:09अब फर्क कहां पड़ता है?

28:10फिर हो तो भिखारी क्यों हो? मानते नहीं हो कि मैं परमात्मा हूं।

28:14नहीं तो भिखारीपना नहीं रहता।

28:16आप मानो तो नहीं रहता। लेकिन... तो नहीं रहता। लेकिन मानने के लिए क्या करें?

28:22तो मानने के लिए पहली बार देख लेना पड़ेगा। First time बाद में नहीं देखोगे चलेगा।

28:27एक बार तो देखना पड़े।

28:30और अगर एक बार देखा मैं परमात्मा को। तो

28:34सांस हर सांस में मानोगे कि मैं परमात्मा हूँ।

28:37कोई बोलेगा कि नहीं तुम देवचंद भाई हो कि नहीं मैं देवचंद भाई नहीं हूँ मैं तो

28:40परमात्मा देवचंद भाई कहना अपमान है।

28:44परमात्मा को देवचंद भाई कहना वो... परमात्मा को देवचंद भाई कहना वो अपमान है

28:48क्यों? कि देवचंद भाई तो आज है कल नहीं है। लेकिन परमात्मा...

28:57परमात्मा को इतना छोटा मान लिया अगर देवचंद भाई माना तो।

29:01समुंदर को बूंद मान लिया। अपमान कर दिया।

29:09इसीलिए

29:10परमात्मा बनना है तो... लीनता की वृद्धि का पुरुषार्थ... लीनता की वृद्धि

29:14का पुरुषार्थ कैसे करना के?

29:16परमानंद रूप हरि को एक क्षण भी नहीं भूलना। ये कार्य करना।

29:24हर सांस में मैं परमात्मा हूँ, मैं परमात्मा

29:28हूँ। ये ये भूले बिना सब करो जो करना है करो। उठा पटक घेरा फेरी picture देखो

29:35दुनिया का धंधा करो सब करो। उसको उसको साथ में रखना। क्योंकि ये bodyguard है।

29:41कौन? अपना परमात्मा अपना bodyguard है।

29:48वो अगर साथ में रहेगा ना तो एक भी गोली नहीं लगेगी।

29:51गोलियां सब मारेंगे लेकिन लगेगी नहीं।

29:55पूर्व कर्म में अपराध किया है तो शरीर बीमार भी पड़ेगा।

29:59कोई गाली भी देगा, कोई विरोध भी करेगा, कोई सबको सम्मान थोड़ी करते हैं।

30:04तो गोलियां तो चारे ओर से आएंगी। अच्छे दिन भी आएंगे और बुरे दिन भी

30:09आएंगे। लेकिन अगर मैं परमात्मा हूँ ऐसा

30:14स्मरण bodyguard को हमेशा साथ में रखोगे

30:21तो ना खुशी के प्रसंग में खुशी हो जाओगे ना दुख के प्रसंग में दुखी हो जाओगे

30:26कभी खुशी कभी गम नहीं होगा

30:30क्या वितरागता रहेगी समता भाव

30:35रहेगा ऐसा हो जाएगा। ऐसा हो जाएगा

30:39और जल्दी से आप मोक्ष में चले जाओगे।

30:42ये परमात्मा बनने का और कोई तरीका नहीं है। अब आकर कहते हैं।

30:49कि ये स्मरण कौन करेगा?

30:53कि लीनता का पुरुषार्थ कौन करेगा?

30:55बार-बार देखेगा कौन परमात्मा को? क्या परमात्मा देखेगा?

31:01ये वेदन को लाएगा कौन? कौन परमात्मा? कौन लाएगा?

31:07Online। परमात्मा तो वो भी काम नहीं करता है।

31:11ये लीनता का फुर्सत बार-बार परमात्मा को देखना।

31:16और उसमें वृद्धि करना कि 1 second अंदर नहीं 2 second 4 second

31:20minute 2 minute continuous रहना है अंदर। अंदर जम के रहना है।

31:24देखा और बाहर आना ऐसा नहीं है। तो लीनता का फुर्सत

31:29और उसमें वृद्धि करना है लीनता का। ये सब पर्याय के काम। ये सब

31:34पर्याय के कार्य हैं। अब बोलना भी नहीं कि आत्मा में श्याम।

31:41क्योंकि वो कौन करेगा? जितना भी tension खत्म कर लो, ध्यान करना है।

31:48अरे वेदन नहीं आया। या पार, वेदन नहीं आया। क्या जरूरत है?

31:56परमात्मा को वेदन की भीख मांगता है। नहीं आया तो नहीं आया। वो काम... नहीं आया।

32:02वो काम किसका है? पता है क्या है?

32:07कौन करेगी लीनता? कौन करेगी लीनता में वृद्धि?

32:11कौन देखेगा परमात्मा को? परमात्मा अपने को थोड़ा देखता है।

32:14उसको क्या ज़रूरत है? उसको पता नहीं है कि मैं परमात्मा हूँ। उसको

32:18कभी doubt नहीं होता है। किसको?

32:21परमात्मा को। कि मैं परमात्मा हूँ कि नहीं हूँ। doubt किसको

32:25आता है? वो देखे जा करके बार-बार।

32:28जिसको doubt आवे ना वो बार-बार देखे

32:30कहीं कथरी... आवे ना वो बार-बार देखे कहीं कथरी कहीं खो तो नहीं गई है ना। कहीं इतने

32:36दिन से वेदन नहीं आया तो कहीं भूल तो नहीं गया हूँ ना किधर।

32:39office देवेचन भाई तो नहीं बन गया है ना। किसको doubt आया है?

32:44अब अवस्था को तो फिर अवस्था क्या

32:45करेगी? देख लेगी अंदर से। हाँ आया। हाँ जी।

32:52ठीक है भैया।

32:54तुम दुखी हो जाओ और तुम राजी हो जाओ। यहाँ वेदन नहीं आया तो दुखी हो जाना।

33:00क्या वेतन नहीं

33:02आया तो दुखी हो जाना? अरे नहीं आ रहा है इतने दिन से। हो गया।

33:06आ जाए, राजी हो जाना। कौन

33:07राजी होता है, कौन दुखी होता है?

33:09कभी खुशी, कभी गम, कौन? व्यवस्था।

33:16ये लिखा है इसमें, इसमें लिखा है ये

33:19सब। कि लीनता का पुरुषार्थ अथवा उसमें वृद्धि,

33:24ये सब पर्याय के कार्य हों। पर्याय के कार्य हो। मेरा पना।

33:30मेरा अस्तित्व पना। अथवा व्यापक पना।

33:35अस्तित्व के साथ क्या दूसरा लिया है? एक तो मैं पना लिया।

33:41दूसरा अपना अस्तित्व पना लिया और तीसरा एक शब्द लिया। व्यापक पना।

33:46क्योंकि एक point नहीं है परमात्मा। असंख्य प्रदेश में है। व्यापक। है फैलना।

33:53विस्तृत विस्तार। विस्तृत विस्तार है। क्या? बहु व्यापकता है।

34:02तो मेरा मैंपना भी यहाँ ही होगा परमात्मा में।

34:06मेरा अस्तित्व भी मैं उसको ही मानूँगा, दूसरा आते हैं जाते हैं।

34:11दूसरा तो आवे जावे। आया राम गया राम है। हाँ आया राम गया राम है। एक friend

34:16की मुसाफ़िरी में सब आया राम गया राम है।

34:19आज है दुकान कल नहीं है। आज है परिवार वाले कल नहीं है।

34:24सब एकोका है कल नहीं

34:28रहेगा। ये आयाराम गयाराम। क्रोध क्षमा आदि भाव है आयाराम गयाराम कभी आए

34:34कभी जाए। वेदन आयाराम गयाराम।

34:38लेकिन जो परमात्मा है हरि नथ। वो आयाराम गयाराम नहीं है।

34:45वो सुशासक है कुटस्थ है ध्रुव है। उसका एक नाम दिया है शास्त्र। उसका एक नाम दिया है

34:52शास्त्र में क्या दिया है? ध्रुव का तारा change नहीं होता है होता है?

34:57North में ध्रुव तारा रहता ही है। इसलिए आत्मा को एक शब्द दिया आचार्य भगवान ने ध्रुव।

35:05कभी नहीं बदलने वाला। कभी ओझल नहीं होने वाला।

35:11ये तो सूर्य का प्रकाश बढ़ जाता है तो दिखता नहीं है

35:15बाकी अभी दिन में भी रहता है वो ध्रुव का तारा।

35:19रात को क्यों दिखता है? क्योंकि सूर्य का प्रकाश इतना उसको आच्छादित नहीं करता है।

35:24लेकिन वही जगह पे रहता है।

35:29सारे direction को वो control करता है ये ध्रुव तारा। ऐसे ये परमात्मा है जो ध्रुव है।

35:35सारी अवस्थाओं को control करके बैठा है।

35:39अनादि अनंत सभी पर्यायों का जो पिंड है वो आत्मा है।

35:45ट्रॉयमल जी ने ऐसा कह दिया।

35:48अनंत भूतकाल, अनंत भविष्यकाल और वर्तमान, तीनों काल की जितनी भी अवस्थाएं हैं, ये

35:54सबको bundle बनाओ तो एक आत्मा है।

35:57वही आत्मा है। और वो पर्याय के angle से बोलते हैं। और इन्हें बोलते हैं

36:03पर्याय मेरे में है नहीं, तो किसके angle से बोलते हैं?

36:06ध्रुव के angle से बोलते हैं, द्रव्य के angle से बोलते हैं। बात दोनों एक ही है। एक

36:12द्रव्य से... एक द्रव्य से बात करे एक पर्याय से बात करे।

36:17एक बोले कांटा है एक बोले नहीं छाप है। लेकिन भैया सीखा तो वही है।

36:24इस प्रकार से।

36:26कि दीनता का पुरुषार्थ। अथवा उसमें वृद्धि।

36:32यह सब पर्याय के कार्य हैं। मेरापना मैं जहां अपनापन करूंगा ये मैं।

36:39मैं जहां अपने अस्तित्व को

36:41मानूंगा स्वीकार करूंगा। को मानूँगा स्वीकार करूँगा कि ये मेरा अस्तित्व है।

36:45और मैं जहाँ फैलता हूँ जो मेरा area है क्षेत्र है। तो मेरापना

36:52मेरा अस्तित्वपना और मेरा व्यापकपना। तीनों।

36:59वो तो केवल त्रिकाली

37:02ज्ञानघन अखंड चैतन्य में ही है।

37:08अवस्था में नहीं। नहीं। मैं तो अपना

37:12मेरापना तो उधर ही करता हूँ जो बिना अवस्था का है।

37:17मैं मेरा अस्तित्व उसको ही स्वीकार करता हूँ जो आवे जावे वो आयाराम दयाराम वो

37:22वो मेरा अस्तित्व नहीं है।

37:24राग द्वेष मेरा अस्तित्व नहीं है और वेदन मेरा अस्तित्व

37:27नहीं है। ब्लैंकनेस भी मेरा अस्तित्व नहीं है।

37:30मैं तो शाश्वत हूँ। वो मेरा अस्तित्व है। मैं तो उसको अपना अस्तित्व मानता हूँ। मैं

37:37रहता... मैं रहता भी वहीं है

37:40व्यापकता प्रसाद। मेरा पना मेरा अस्तित्व पना

37:46मेरा व्यापक पना तीनों। तीनों का एक sentence दो क्या है? त्रिकाणी

37:53ज्ञानघन अखंड चैतन्य। ओ मैं

37:59जो अंदर विराजमान है अभी इस वक्त।

38:03इस दृष्टि में हम ऐसी दृष्टि करोगे ऐसा ध्यान। दृष्टि करोगे ऐसा ध्यान रखोगे

38:08ऐसी नज़र रखोगे एक नज़र बाहर घूमते रहती है

38:13और एक नज़र अगर ज्ञानी की अगर आत्मदर्शन हो जाए तो एक नज़र कहाँ रहती है

38:19परमात्मा में। कौए को है ना एक आँख होती है

38:27कौए को दो आँख नहीं होती तो भी। लेकिन आपको

38:31पता भी नहीं चलता है देखना ध्यान से देखना। देख लो।

38:35कौवा का दो आँख नहीं होती, एक ही आँख होती है। खोखे दो होते हैं।

38:40ये जो खोखे हैं ना ऊपर के, वो दो होते हैं। लेकिन आँख एक ही होती

38:46है। ऐसा करे तो वो लोलक जो किसका है ना इधर आ जाता है, तो इधर से देखता है।

38:50ऐसा करे तो लोलक जो है किसका इधर आ जाता है, तो उधर से देखता है। क्योंकि खोखे

38:55window दो है,

38:57लेकिन computer एक है अंदर में। देखने वाले। दो। दो

39:03windows हैं। इसी प्रकार से

39:06यहाँ पर भी ऐसा है।

39:08अवस्थाएं अनंत हैं। लेकिन आत्मा एक है। एक

39:12ही आत्मा है। क्या कहते हैं इधर?

39:18कि ऐसी दृष्टि में ज्ञान है ना, ये ज्ञान main computer है।

39:25और नज़र दो जगह करता है।

39:27एक ही ज्ञान दो जगह नज़र करता है,

39:29कभी परमात्मा के ऊपर कभी... कभी परमात्मा के ऊपर कभी

39:32अवस्था के ऊपर कभी बाहर boundary के बाहर।

39:38जब ये ज्ञान अपने को देखता है परमात्मा को अंदर आए हुए स्वयं को देखता है।

39:43और ये ज्ञान अगर अवस्था को देखता है, राग द्वेष को देखता है, कर्मों को देखता है,

39:51शरीर को देखता है, अन्य पदार्थों को देखता है या दुनिया में किसी को देखता है

39:56तो वो अपने से बाहर है।

39:59दो ही angle है स्व पर। स्व पर।

40:06तो स्व मा बस। मतलब स्व को देख। परती कस। पर को मत देख।

40:12इतना ही बस। टुक का touch। यही टुक का touch है।

40:17short में कहो भाई क्या करना है हमको शांति के लिए। बोल रहा हूँ। स्व मा बस।

40:22परती कस। आटलू बस। टुकू touch।

40:26इतना ही के लिए। इतना ही कहना है।

40:30इसका विस्तार करो तो बहुत बड़ा है और short में कहो तो इतनी बात है।

40:35तो क्या करना है? क्या हो

40:36रहा है इधर? के मैं परमात्मा हूँ

40:38त्रिकाली ज्ञानघन अखंड चैतन्य। यही मेरा

40:44मेरा मैं हूँ यही मेरा अस्तित्व है और यहीं मैं रहता हूँ। ऐसी दृष्टि में

40:51पर्याय का पुरुषार्थ सहज स्वभाव है। सहज स्वभाव क्या

40:58ऐसी दृष्टि अगर हुई तो पर्याय में लीनता पर्याय में वृद्धि

41:04आत्मा से परमात्मा बनने का जो रूपांतर है वो अपने आप होगा वो automatic होने वाला है

41:10वो आपके बस की बात नहीं

41:13परिणाम को आप control नहीं कर सकते कि उपयोग ए भैया बाहर मत देख अंदर देख नहीं कर सकते

41:20क्या। अगर आप चाहते हो कि आप परमात्मा के दर्शन करो तो आप

41:26मानो कि मैं परमात्मा हूँ।

41:29ऐसा मानते ही, ऐसी दृष्टि करते ही, आपका जो उपयोग है

41:34वो बाहर नहीं रहेगा, अंदर आ जाएगा। क्योंकि ये automatic है।

41:39आप परमात्मा को याद करो और वो उपयोग बाहर रहे कैसे बन सकता है?

41:44ये impossible है, बन ही नहीं सकता। मैं परमात्मा हूँ।

41:51यही मेरा अस्तित्व है और यहीं मैं रहता हूँ।

41:55मैं ही चैतन्य हूँ, मैं ही ज्ञान घन हूँ, ऐसा feeling करते ही

42:02पर्याय में अपने आप लीनता और वृद्धि automatic होती है।

42:06वो करने का नहीं होता है कुछ। फिर जब ऐसा होता है,

42:12तब ऐसा कहने में आता है, बाहर के angle से। फिर देखो पुरुषार्थ किया।

42:19देखो पहले वो ज्ञानी हुआ अब श्रावक बना अभी मुनि बना।

42:23अभी हर्यण बन गया अभी सिद्ध भगवान बन गया। देखो पुरुषार्थ किया।

42:27असल में उसने क्या किया है?

42:30ना वो श्रावक बना है, ना वो मुनि बना है, ना हर्यण बना है, ना सिद्ध बना है।

42:35असल में उसने एक ही काम किया है।

42:39कि मैं परमात्मा हूँ, मैं उसने बनाया नहीं परमात्मा को।

42:42मैं परमात्मा हूँ, मैं परमात्मा हूँ, एक ही line। एक ही line ऐसा करते

42:49ऐसा चालू रखने से क्या हो गया बाद में वो

42:52ज्ञान दशा में आया फिर श्रावक बना फिर मुनि बना

42:56फिर अरिहंत बन गया फिर भगवान हो गया

43:03उसने कोई कपड़े वगैरह छोड़ने नहीं पड़े वो अपने आप हो गया वो सब काम अपने आप होता है

43:08क्या रात को नहीं खाना

43:10नहीं ऐसा उसने खाने को छोड़ा नहीं लेकिन वो मैं परमात्मा हूँ ऐसे

43:12में रहा ना तो। तो मैं परमात्मा हूँ ऐसे

43:14में रहा ना तो अपने आप गुण प्रकट हो गए।

43:17प्रायश्चित का करना छूट गया, कर्म मूल छूट गए। वो अपने आप हुआ।

43:22किसी को छोड़ना नहीं है, किसी को पकड़ना नहीं। वो अपने आप हो गया पूरा।

43:27श्रावकपणा अपने आप आया, मुनिपणा अपने आप

43:32आया। घर बार अपने आप छोड़े, कपड़े लत्ते अपने आप छोड़े, जंगल में अपने

43:35आप चले गया। सेणी अपने

43:36आप लगा दी, हरिहर भगवान भी अपने आप बन गया।

43:39और भगवान भी अपने आप बन गया। कुछ करने... कुछ करने धरने का है ही

43:43नहीं। अब क्या करूँ? प्रश्न करते हैं, अब क्या करूँ?

43:48अभी क्या समझा रहे हैं इतने दिनों से कि कुछ करना धरना नहीं।

43:51सिर्फ ध्यान ध्यान देखना है। नहीं आप बोलो मैं क्या करूँ? मेरा सर खा जाओ।

43:57देखो।

44:02असल में कुछ परमात्मा बनने के लिए कुछ करना नहीं।

44:07बस मानना है कि मैं परमात्मा हूँ। देखो

44:09कितनी बड़ी बात है। इस दृष्टि... कोई बड़ी बात नहीं। इस दृष्टि में

44:11पर्याय का पुरुषार्थ सहज स्वभाव है, automatic है।

44:15पर्याय अपेक्षा से फिर कहते हैं कि पुरुषार्थ किया, पुरुषार्थ हुआ, वृद्धि हुई।

44:21उसने ऐसा पुरुषार्थ किया, ऐसी लीनता करी, ऐसी स्थिरता की, ऐसा कहने में आता है।

44:30ध्यान पूरा करें और आगे 2-3 letter आया है। कल बाकी का कर लेते हैं। ये जो