Avlokan Discourses of Shri Devchand bhai Shah The book Search Photographs About

Shri Dravya Drushti Prakash

29 March 2002 · sitting 1 of 2 · Patra 17 · Cinchani · 60 minutes

Transcript

Transcribed automatically and lightly corrected. The recording is the authority where they differ.

Recitations restored to their canonical wording: Mangalacharan — Mangalam Bhagavan Viro, Mangalacharan — Sarva Mangala Mangalyam, Namokar mantra, Omkar bindu sainyuktam, Samaysar mangalacharan.

0:12णमो अरिहंताणं णमो सिद्धाणं

0:16णमो आयरियाणं णमो उवज्झायाणं

0:21णमो लोए सव्व साहूणं नमः समयसाराय

0:29स्वानुभूत्या चकासते । चित्स्वभावाय भावाय

0:37सर्वभावान्तरच्छिदे मंगलं भगवान वीरो,

0:44मंगलं गौतमो गणी। मंगलं कुन्दकुन्दार्यो,

0:51जैनधर्मोऽस्तु मंगलम्॥ सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं

0:59सर्वकल्याणकारकम। प्रधानं सर्वधर्माणां

1:07जैनं जयति शासनम॥ ॐकारबिन्दुसंयुक्तं

1:15नित्यं ध्यायन्ति योगिनः। कामदं मोक्षदं चैव

1:23ॐकाराय

1:24नमो नमः श्री

1:41द्रव्य दृष्टि प्रकाश।

1:45पूज्य निहालचंद जी सौगानी जी के आध्यात्मिक पत्र।

1:50पत्र number है 17। Seventeen। आज

1:56से 48 साल पहले

1:57Kolkata से ये पत्र सोनगढ़ के

2:00मुनि सौगानी जी...

2:05सौगानी जी बहुत

2:07निकट भविष्य में

2:08भूतकाल में हो गए ऐसे महाज्ञानी।

2:13गुरुदेव जी कहते थे कि एक बहुत आ रही है।

2:18मुनि नहीं बने थे लेकिन संसार में रहकर के भी मुनि तुल्य साधना कैसी होती है।

2:25वो हमको इनके पत्रों से देखने में मिलती है।

2:31उनके वचनों के ऐसे जादू है कि। में ऐसे जादू है उस वचन में आसना का कितना प्रेम है।

2:39वो झलकता है। और बहुत प्रेरणा मिलती है।

2:44तुझे भी गुरुदेव ने।

2:47उनके वचनामृत वाला तीसरा पाठ जो है वो मेरे को दिया था gift में।

2:52और फिर Om लिख कर के दिया।

2:57पत्र अपुन पढ़ेंगे पहले बांधनी में पढ़े

2:59थे अपुन। वापिस बहुत दिनों के

3:02बाद अभी वापस पढ़ रहे

3:06हैं। 25 July 1954। कलकत्ता से लिखा है।

3:12ओम श्री कान गुरु देवाय नमः जो उनके गुरु थे।

3:17सौगानी जी के और मेरे दोनों के एक ही गुरु हैं। कान गुरु।

3:25आत्मार्थी नाम लिखा है। लियांचंद्र

3:29का धर्म... निहालचंद्र का धर्म स्नेह। आशा है पूज्य गुरुदेव

3:35सुख शांति में विराजते होंगे। मुमुक्षु मंडल प्रतिक्षण

3:42आत्मा आश्रित सुख की वृद्धि में रत हो।

3:48जिन्होंने गुरुदेव को सुनने वाले जितने भी मुमुक्षु वा संग में हैं वो सब।

3:54कौन से सुख की वृद्धि करें? आत्मा आश्रित। आत्मा आश्रित गुरुदेव आश्रित नहीं।

4:03रास्ता रास्ता बताने वाले गांधी स्वामी हैं।

4:06और उनके जो शिष्य मंडली है वापस सोनगढ़ में।

4:11जो सुबह दोपहर शाम उनकी दिव्य वाणी सुनती है।

4:19और अपनी आत्मभावना अपना आत्मपुरसाद अंतर्मुखी पुरुषार्थ बढ़ाती है।

4:26उन सभी के लिए मेरी ऐसी भावना है। वे प्रत्येक क्षण,

4:32सुबह, दोपहर, शाम, ऐसा नहीं, ध्यान का समय कौन सा, अवलोकन का समय कौन सा,

4:39हर पल और अवलोकन क्षण।

4:43हम लोग तो सुबह-शाम प्रतिगमन करते हैं।

4:47दिन में पाप किया तो रात को कर लेना प्रतिगमन। रात को जो

4:51पाप किया होगा वो दिन में सुबह उठकर के... क्या होगा और दिन में

4:53सुबह उठकर के एक पटी ग्रहण कर लेना।

4:57और समझते हैं कि हमारे सारे पाप। Only दो दाले लेकिन ऐसा नहीं है।

5:06तो गुरुदेव के शरण में

5:08उनके दर्शन वाणी का लाभ लेने वाले मुमुक्षु

5:11मंडल। मोक्ष की आशा रखने वाले जीव

5:16उसको बोलते हैं मुमुक्षु।

5:19और एक से ज्यादा है तो क्या बोलते हैं मुमुक्षु। या तो क्या बोलते हैं मुमुक्षु मंडल।

5:24क्या करें उनकी भावना कैसी है? कि प्रत्येक क्षण मतलब हर पल।

5:31कैसे सुख की वृद्धि में रत हो जाए?

5:34आत्मा आश्रित सुख की वृद्धि में रत हो जाओ।

5:39गुरुदेव को ही देखता रहे गुरुदेव को ही देखता रहे। नहीं ये गलत।

5:46गुरुदेव के पास गए तो फिर किसको देखना है? गुरुदेव को। फिर किसको देखना?

5:49गुरुदेव को देखना कि अपने आत्मा को देखना? लेकिन आत्मा की बात तो

5:55सद्गुरु ही बताते हैं। गुरु को ही देखो ना।

5:59क्या करना?

6:02वो बात आती है ना एक सोने का अंडा देने वाली मुर्गी।

6:07कि क्या करना? जो सोने

6:09का अंडा देवे। और फिर उसको

6:12लोभ हो गया कि हम इसके... और

6:16फिर उसको लोभ हो गया कि अब इसके अच्छा तो मुर्गी को ले लो ना।

6:21और वो लेके कौन धीरज रखे? तो क्या हुआ?

6:28कि जो एक मिलता था ना वो भी नहीं मिलता है। ऐसे सद्गुरु के मुख से

6:34जो वाणी निकलती है। वो वाणी में से जो आत्मा का तत्व निकलता है।

6:42वो हमको ले लेना। और सद्गुरु। और सद्गुरु पर से दृष्टि हटा देना है।

6:48और कहाँ लेके जाना है? अपने आत्मा में ले जाना है।

6:53तो रोज़ नए-नए, नए-नए अमृत अंदर से भंडार खुलते जाएंगे।

6:58और सुख-शांति बढ़ती जाएगी। लेकिन हम क्या करते हैं?

7:04हम हमारे आत्मबल को खोल दिए हैं। इसीलिए

7:09गुरु की वाणी मिली, दर्शन मिला तो उनके वाणी के

7:11पीछे जो मर्म है... उनके वाणी के पीछे जो मर्म है कि तुम अपने आत्मा से प्रेम करो,

7:16अपने आत्मा में लीन हो जाओ। वो कठिन लगता है।

7:23किसको पकड़ लिया हमने? गुरु को पकड़ लिया। कि अभी आप ही घर भर दो।

7:30हम तो आपके चरणों में हैं। गुरु

7:35के चरणों में रहने से एक फायदा है कि संसार के

7:39चक्कर से बच जाओ, बच जाओ। बच जाओ। ज़्यादा विकल्प नहीं चलता है।

7:44देखिए शुभ तो नहीं मिल रहा, शुभ काम मिलता है।

7:49नहीं हमको तो बहुत अच्छा लगता है आपकी वाणी, आपकी शांति,

7:55वो अच्छा लगता है वो क्या चीज़ है? पितृभाव है,

8:01या धर्म भाव और पुण्य भाव है? कौन सा है धर्म भाव है कि अधर्म भाव है?

8:08गुरु की भक्ति अच्छी लगती है। कौन सा भाव है? पुण्य भाव है?

8:14कि संवर भाव है? कि मुक्ति कैसे मिलेगी?

8:20पुण्य से तो स्वर्ग मिलता है।

8:24और धर्म भाव से मुक्ति मिलती है। संवर निजरा मुक्ति

8:26का कारण है। पाप और पुण्य बंध का कारण है। पाप और पुण्य दोनों आश्रय।

8:34तो सौगानी जी ने क्या भावना पाई है मुमुक्षु मंडल के

8:37लिए? मुमुक्षु मंडल के लिए। कि मुमुक्षु मंडल प्रतिक्षण।

8:43गुरुदेव का प्रवचन 3 time ही होता है।

8:45उसमें 2 प्रवचन और 1 चर्चा, चर्चा में तो बहनों को आना नहीं होता है रात के

8:49time। 2 ही time होता है,

8:52पुरुषों के लिए 3 time। और इन्होंने क्या बताया है?

8:59साधना का time क्या बताया है? सुबह 8 से 9 प्रवचन में, दोपहर में 3

9:05से 4 प्रवचन में, शाम

9:06में 7:30 से। छे 4 लोको छे

9:08ने सामे 5:30 ने पोणा 8 चर्चा. ए

9:09time बताव्या ने सौगानीीजीने क्यां बताव्या? के साधना करना आज्ञा कीधी तो

9:15प्रतिक्षण करना प्रतिक्षण जागृति होना छे.

9:21फिर आम खाना कैसे खाईंगे TV कैसे देखी? मोक्ष जाना है तो

9:28TV देखते देखते आत्मसाधना करनी

9:31खाना खाते खाते आत्मसाधना करनी. प्रतिक्षण. उतारना पड़ेगा। प्रत्येक क्षण

9:35करना। अगर मोक्ष चाहिए मुक्ति चाहिए तो। और कैसे

9:39सुख मिलेगा फिर? आत्मा आश्रित गुरु आश्रित नहीं।

9:44सुख जो मिलेगा वो आत्मा से निकला है आत्मा का आधार लेके निकला

9:50है। ये सही है कि हमने आत्मा को जाना नहीं है गुरु की वाणी सुने बिना लेकिन अब गुरु

9:55की वाणी ने जो बता दिया ना।

9:58तुम्हारा आत्मा कैसा है और कैसे

9:59प्रयोग करना। अब गुरु को क्यों... अब गुरु को क्यों चिपक गए हो?

10:04अब और सुनो और सुनूं काहे के वास्ते? अब गुरु ने जो कहा है वो

10:09हमारा आत्मा बताया, तुम्हारा घर बताया, तुम्हारा address

10:11बताया, वहां पहुंचने का रास्ता

10:13तरीका बताया, अब तुम क्या कर?

10:16कि गुरु ऊपर से दृष्टि हटा ले

10:18अपने आत्मा में लगा, यही गुरु की भक्ति है। नहीं हम तो आपको देखेंगे।

10:25ये भक्ति नहीं है। गुरु की आज्ञा उठाना वो भक्ति है। गुरु

10:30की आज्ञा उठाने वाली भक्ति है। गुरु की आज्ञा ये है कि तुम अपने परमात्मा को अंदर में

10:34दर्शन करो, उनकी शरण में जाओ।

10:38तो आत्मा आश्रित सुख की वृद्धि में रत हो जाओ। सारे मुमुक्षु

10:42गुरुदेव की वाणी सुनकर के, फिर वाणी पर से भी लक्ष हटा करके,

10:48वाणी में जो आज्ञा दी गई है, उस प्रकार से,

10:52अपने अंतर में अपने भगवान आत्मा को देख करके,

10:56आत्मिक सुख... आत्मिक सुख के आनंद की वृद्धि करे।

11:01ऐसी भावना सौगानी जी ने इस पत्र में भाई starting में।

11:08आपका पत्र यथा समय मिला था।

11:12मेरा अजमेर में तो लगभग 15-20 दिन रहना हुआ था क्योंकि परिवार वाले अभी भी बाहर थे।

11:19अजमेर में।

11:21Business के लिए उनको कलकत्ता जाना पड़ा। 8 साल बिना

11:25परिवार के उनको कलकत्ता... 8 साल बिना परिवार के उन्होंने

11:28Kolkata में रहे 58 तक। Mostly सभी के starting में

11:32आज से 20 40 साल पहले के देखेंगे तो ऐसा ही था। हमारा भी

11:37बचपन में ऐसा था तो हम गांव में रहते थे पिताजी वहां Kolkata में रहते

11:42थे business करने। Business के लिए देश विदेश जाना पड़ता था और गांव में रहना होता

11:46था। पढ़ाई वगैरह गांव में हो।

11:48इनका भी यही हाल

11:50है। कुटुंब परिवार सब Rajasthan में है husband। और... और कमाई करने के लिए

11:55पारिवारिक बोझ उठाने के लिए

11:58उनको कहाँ जाना पड़ा?

12:00Kolkata। और बिना परिवार के वहाँ धर्मशाला में रहते रहते उन्होंने 8 साल बिताए

12:07सौगानी जी में। वहाँ कमाई करना money order भेज देना

12:12परिवार वालों को। साँझ में एक या दो बार

12:16फुर्सत मिले तब परिवार वालों को मिलकर के वापस चले जाना।

12:23कभी-कभी दो-दो तीन-तीन साल निकल जाते हैं

12:25पत्र व्यवहार से चलते हैं परिवार वालों के

12:26साथ रोज़ का मिलना-जुलना नहीं होता। Husband-wife के

12:30बीच में पत्र व्यवहार चलता है।

12:34रोज़ का देखना मिलना साथ में रहना ऐसा दिन नहीं होता। हमारे घर में ऐसा हमारे पिताजी

12:40माताजी सब इस प्रकार से हैं।

12:43धीरे-धीरे फिर परिस्थिति सुधरती

12:46है। धीरे-धीरे फिर वो। Mumbai जैसे। बम्बई से आते हैं

12:51बम्बई में तो जगह कितनी मिलती है।

12:53दस बा दस की जगह मिले

12:55तो बहुत नसीबदार। उसमें 25 जने रहते हैं। क्या और यहाँ तो

12:59परेशानी है यार। जा रहते हैं वहाँ तो

13:05अलग अलग bedroom अलग अलग सब कुछ चाहिए latrine bathroom सब वहाँ 40 system में।

13:10पूरी building वाले 4 latrine में ही। सिवा कर लेते हैं। ऐसे दिन गुजार रहे हैं।

13:18बम्बई में। Mumbai में CP tank base है ऐसे जगह में

13:20पढ़ाई वगैरह किए तो ऐसा। बहुत याद आ गई है उसे।

13:26मेरा अजमेर में तो लगभग 15-20 दिवस ही रहना हुआ था।

13:30आपने लिखा। कि विकल्प में काई कार्य आवे नहीं। बार बार वो

13:38सोनगढ़ से लिखते थे कि आप क्यों नहीं आते हो।

13:41गुरुदेव के प्रवचन बहुत जबरदस्त है। सुनते हैं आप जैसे

13:44तो अंदर। सुनते हैं आप जैसे तो अंदर में उतर जाओगे

13:47बहुत फायदा होगा जल्दी से आ जाओ।

13:50और बार-बार लिखते तो फिर।

13:53हाँ आता हूँ आता हूँ लेकिन जाते नहीं तो फिर उन्होंने क्या लिखा था अनगढ़ से?

13:58कि हम बेकार के विकल्प करते हैं आपके लिए फायदा नहीं हो रहा लिखने का।

14:03कोई फल नहीं मिला हमको विकल्प लिख करके लिख तो

14:06दिया लेकिन कोई फल नहीं मिला। आपने लिखा कि

14:11विकल्प नु काई कार्य हयु नहीं। खाया नहीं।

14:15जवाब देते हैं हम उसका। So हमारा तो सिद्धांत भी यही है। क्या सिद्धांत है?

14:22के विकल्प के अनुकूल कार्य होवे ही यह आवश्यक नहीं

14:27है। हम विकल्प करें करने-करने के।

14:32चाहे करें लेकिन चाह पूरी हो नहीं हो, वो हमारे हाथ में थोड़ी है।

14:38वो हमारे पूर्व में जैसे हमने कर्म किए थे वो हिसाब से। ये थे वो हिसाब से।

14:42जो film पहले से बन गई है इस प्रकार से कार्य होता था।

14:48हमारी जो आयुष्य है और आयुष्य दरमियान में जो भी कुछ करने वाले हैं।

14:52उसकी पूरी film बन गई है वो। अब हम विकल्प करें चाहे जितने।

14:58उठा पुटक तो कितना भी कर ले वो। वो

15:02Chinese थोड़ा होने वाली है एक film बन गई है वो Chinese थोड़ी होती है। नहीं

15:08होती है। तो हमारा तो। तो

15:09हमारा तो सिद्धांत भी यही है और बिल्कुल सही हुआ है जो हुआ है।

15:13आपने बुलाया इतना लिखा और हम नहीं आए। क्या

15:18जरूरी थोड़ा है कि आप बुलाए और हम आवे।

15:22हमारा आने का जब लिखा होगा ना shooting हो गई होगी ना तो हम

15:26आप नहीं करोगे तो भी आ जाए। क्या

15:29नहीं लिखो तो भी आ जाओ। ये जो

15:32भी film बन चुकी है वो हिसाब से होगा। तो

15:36विकल्प के अनुकूल कार्य होवे ही। विकल्प के अनुकूल कार्य हो

15:38गए ही ये आवश्यक नहीं है क्यों?

15:41कि विकल्प विकल्प है और कार्य कार्य।

15:45अगर इस सिद्धांत को हमको सिद्ध करना है तो अवलोकन करके देखो।

15:51आधे घंटे में कितने विचार आते हैं ये करो

15:53वो करो ये नहीं करना है वहाँ जाना है इधर जाना है। कितना कार्य करते हो?

15:59जितने कार्य करने हैं और जितना नहीं करना है उसमें से कितना सफल होता

16:05है? अब आधे घंटे में पता

16:06चल जाता है। वो आधे घंटे में पता चल जाता। दिन भर में करोड़ों विचार आते हैं,

16:09ये करूँ ये नहीं करूँगा, काम कितना

16:11होता है? 24 घंटे से ज़्यादा तो नहीं है, उसमें 8 घंटे तो नींद में

16:17जाते हैं, बाकी रहे कितना?

16:1916 घंटे में आप दिन भर के

16:20करोड़ों काम कैसे करोगे? कभी-कभी तो सभी 8-10 काम एक ही time पे होते हैं।

16:28कैसे करोगे अकेले? फिर हमको choice करनी

16:32पड़ती है अपनी। इतनी इच्छा बढ़ गई है, हमको रा... इतनी इच्छा बढ़ गई है हमको राग

16:36द्वेष करने पड़ते हैं कि नहीं

16:37अब ये काम pending रखो इसको कर लो।

16:39जो कर लो जिसको प्रधानता दी है वो राग किया।

16:42और जिसको neglect किया वो क्या किया? बस हमारी गाड़ी ऐसे ही चलती है। इच्छा

16:50मोह के खत। और फिर इतनी सारी इच्छा कर लेते हैं

16:55ये भी ये भी कर तो नहीं सकते फिर क्या करें? इतना करना है राग किया और

16:59इतना नहीं करना है नहीं। क्या किया और इतना नहीं करना है,

17:02नहीं कर सकते हैं। तो क्या किया?

17:06बाकी चक्की चलती है। रोज ऐसा चक्की चलती है। अभी

17:10एक second की, एक घड़ी की भी आराम नहीं है,

17:13मन को शांति नहीं है जरा। कर्म बनता ही रहता है

17:17हर पल, हर second। पाप पुण्य,

17:24पाप पुण्य, पाप पुण्य, पाप पुण्य क्या ratio

17:26नहीं है वो? 1:1 नहीं है। ये 50% पाप के

17:29हैं, 50... 50% पाप के हैं 50% पुण्य के हैं ऐसा थोड़ा है।

17:32जरा जीवन को देखना अंदर में तपासना।

17:35क्या position है? कौन सी चीज ज्यादा है? पुण्य ज्यादा है?

17:43पाप ज्यादा है? फिर पाप का ज्यादा है तो चार गति में कौन सी गति है? स्वर्ग मिलता है?

17:49मनुष्य गति मिलती है?

17:57क्या मिलता है? सीरंद गति और नरक गति मिलती है।

17:59ये अपने... ये अपने अवलोकन से पता चलता है कि हमको

18:02मोक्ष की तरफ जा रहे हैं कि नरक की पीर गति की तरफ जा रहे हैं

18:07वो पता चल जाता है। बाहर

18:09से शांत रहते हैं लेकिन भावों से

18:12हम क्या करते हैं? तो विकल्प विकल्प में है।

18:16और कार्य कार्य में है जितना हम विकल्प करते हैं उतना कार्य थोड़ा कर सकते

18:21हैं। नहीं कर सकते।

18:23जरूरी नहीं कि जितने हमने विकल्प किए उतने... कि जितने हमने विकल्प

18:25किए दिन भर में उतने

18:26सब के सब हम कार्य कर सकें।

18:29इसीलिए हमेशा मन की गति fast है। पर काया की गति कितनी है?

18:35बहुत slow है। मन की गति तो बहुत fast है।

18:39अभी 1 second में America भी जाके आ सकते हैं, Hyderabad घूम के आ

18:42जा सकते हैं। जहां जाना है वहां 1 second में

18:48जा रहे हैं लेकिन। कि practically जाना है तो Hyderabad पहुंचना है तो।

18:52कि पहले यहां से bus

18:53करके वहां जाना। ये पहले यहाँ से bus करके वहाँ जाओ फिर VT तक पहुँचो

18:55फिर VT से। Train की राह देखो अभी train जब आवे तब उसके बाद बैठने के बाद 18 घंटा।

19:04इतना time लगता है जाना है वो तो 10 बार विचार करो 10 बार plan करो जितनी बार

19:09विचार किया ना उतनी बार plan करो।

19:11जाना है जाना है जाना है। अभी यहाँ उल्टा हो गया

19:14ना कोई Hyderabad जाने को तैयार नहीं

19:18है यहाँ से। यहाँ से नहीं जाना है नहीं जाना है ticket cancel करा दो

19:24अभी तो 2 ही दिन बच गए। करा दो अभी तो दो ही दिन बच गए। उल्टा हो गया। phone में

19:30भी ऐसा हुआ। आखरी दिन

19:31सबने बोला प टाए का puncture हो जाए। train miss हो जाए, train cancel हो जाए। आप थे

19:36phone में नहीं थे। आप नहीं थे।

19:38देखने जैसा था सब नजारा। कैसा भी करो अभी

19:41cancel करा दो, फिर भी

19:45करो। जाना तो नहीं। ticket के ₹250 गए तो गए पानी

19:47में। लेकिन घर... लेकिन घर वापस नहीं जाना

19:52है। ₹1500 का ₹1800 हो गया।

19:55और क्या, ₹1500 तो खर्च करना ही है, ₹300 और पकड़ लेंगे और क्या। जाना नहीं है एकदम।

20:01अभी वो अभी से कल सुबह से वही बात चल रही है कि अभी नहीं जाना

20:04है, ticket cancel करा के आते

20:07हैं। दूसरे ticket निकाल के आते हैं। मैं एक दिन waste करने को तैयार

20:10हूँ। ticket निकाल के आने के लिए मैं तैयार हूँ। और सब

20:13ticket करने को तैयार है वो। अगर आप permission दो तो मैं

20:16जाके... जाके ticket cancel करा के नई ticket लेके आता हूँ। सबको दिल में वही

20:23है। अब जाना नहीं है जाना नहीं उल्टा है।

20:25जाना है तो पाप है और नहीं जाना है तो पुण्य है।

20:30लेकिन कहा है तो जो होने वाला है picture बन गया हमेशा होने वाला है।

20:34अपने विकल्प से कुछ मतलब नहीं। चाहे पाप के हो चाहे

20:39पुण्य के विकल्प तो धर्म के विकल्प तो success होंगे ना? जरूरी नहीं है।

20:45धर्मों के आत्मा... धर्म के आत्मा के लिए किए गए विकल्प भी होवे success को जल्दी

20:51नहीं होवे। विकल्प विकल्प में और कार्य कारण में। विकल्प की मन की गति

20:56fast है और काया की गति slow है। तो

20:59ये दोनों का match

21:01नहीं है। भावना जो है वो पूर्ण का पूर्ण है। भावना है सो आत्मकल्याण की भावना

21:07है। उसको संयोग नहीं चाहिए ऐसी भावना। कि मुझे कोई संयोग मिले।

21:12इसीलिए वो भावना शुद्ध भावना। इसीलिए वो भावना शुद्ध भावना है।

21:18आत्म भावना कोई आत्म दर्शन नहीं है इसलिए है तो

21:21पुण्य है लेकिन इसकी जाति अलग प्रकार की संयोग वियोग से

21:26पार वो भावना भाई करे कि मुझे मेरा शांति

21:28चाहिए, मुझे आत्मा चाहिए। तो ये pure भावना है।

21:33और pure भावना सफल होती है। ये 21 number में मेंसी के वचन ग्रंथ में आता है कि

21:38जिसकी शुद्ध भावना है आत्मा की। वे शुद्ध है कि नहीं वो। फिर शुद्ध है कि

21:42नहीं वो अपने को शुद्ध लगती है लेकिन है कि नहीं वो

21:44तो फिर testing करेंगे तो मालूम पड़ेगा।

21:47हमको तो ऐसा लगता है कि हमारी भावना शुद्ध है।

21:49हम इतने शास्त्र पढ़ते हैं, यात्रा में आते

21:52हैं, इतना दान देते हैं,

21:55त्रिकरण पूजा भक्ति इतना सारा करते हैं, अन्नमूल नहीं खाते, रात्रि भोजन नहीं करते।

22:01लेकिन हमारी भावना सच्ची है। वो तो भैया सच्ची है आप कहते हो लेकिन अवलोकन करके

22:07मालूम पड़ेगा। आत्मा के लिए जान देने... आत्मा के लिए जान देने को तैयार हो?

22:12क्या? जब परीक्षा आती है ना तो मालूम पड़ जाता है। तब लगता है कि नहीं हमको आत्मा से

22:19कोई प्रेम नहीं। ये सब X-ray निकालना है तो

22:24अवलोकन करना पड़ेगा। हमारी भावना हमको लगती है अच्छी है, perfect है।

22:28लेकिन सही में

22:30जैसी कृपा हुई उन्होंने

22:31भावना पाई थी कि आंधी आओ, तूफान आओ, सुख आए, दुख आए, उपसर्ग आए। क्या?

22:35भले तो जीवन एक समय... क्या

22:37भले तो जीवन एक समय का हो फिर भी हमको आत्मकल्याण करना है।

22:41क्या इतनी तैयारी है क्या हमारे

22:45पास? प्रभुपाद ने और भी एक भावना इसी इसी पत्र में आगे और लिखा

22:49है। सन सन पलटी सभा घुटी नहीं चाहिए।

22:55कि कुछ समय तक शून्य सिवाय निरंतरता सिवा कुछ नहीं चाहिए।

23:00वो नहीं मिले तो हमको

23:02फिर third point में क्या? संत सिवा कुछ नहीं चाहिए सद्गुरु। संत सिवा

23:05कुछ नहीं चाहिए, सद्गुरु चाहिए।

23:08चलो सद्गुरु भी नहीं है तो फिर सत्संग के बिना कुछ नहीं चाहिए।

23:13चलो सत्संग नहीं मिलता है तो फिर विरक्त प्रभु की भक्ति के बिना

23:17कुछ नहीं चाहिए। वो भी नहीं है तो फिर...

23:22तो ज्ञानी पुरुषों ने जो आचरण की रेखाएं बताई हैं, वो व्यवहार धर्म।

23:28उस रेखा से बाहर नहीं जाना। अब

23:32वो भी नहीं है तो... अभी हमको... है तो अभी हमको कुछ नहीं चाहिए

23:36क्योंकि और अभी कुछ चाहेंगे तो क्या दुखना ही दुखना है और हमको गिरना है

23:42तो इससे कम तो

23:43कुछ नहीं चाहिए अब हमारी भावना को tally कर लो 23 साल की उम्र में

23:50परम कृपालु देव को ऐसी भावना हुई अनुभव के पहले

23:55ऐसी भावना होने के बाद 3 महीने में अवलोकन और भेद ज्ञान के माध्यम से
00:24:01.1000 --> 00:24:07.714
उनको आत्म। वे ज्ञान के माध्यम से उनको आत्मज्ञान हुआ था। Check करना ऐसी भावना है।

24:07सबसे पहले किसको रखा?

24:11क्षण क्षण पलटने वाली स्वभाव वृत्ति नहीं चाहिए मतलब परमात्म दशा ही चाहिए।

24:16जो शाश्वत एकरूप रहती है पलटी नहीं है दशा।

24:20हमको सिद्ध भगवान से कम कुछ नहीं चाहिए भई नहीं मिले तो? तो निरविकल ध्यान चाहिए

24:26सम्यक दशा। नहीं मिले तो? तो... मिले तो शास्त्र नहीं चाहिए क्या चाहिए?

24:33सद्गुरु चाहिए। और हमको शास्त्र मिल गया तो बस।

24:36पढ़ रहे हैं ना हम आत्मा का ही पढ़ रहे हैं ना। नहीं चलता है।

24:42सद्गुरु नहीं मिले तो फिर क्या चाहिए? अगर नहीं मिले तो alternative में सत्संग।

24:49वो नहीं होवे तो वितरागी पुरुषों की भक्ति।

24:53वो नहीं होवे तो वितरागी पुरुषों ने जो boundary बनाई है शुद्ध व्यवहार की वो चाहिए।

25:00तो वो नहीं मिले तो कुछ नहीं चाहिए। ऐसी भावना के सामने हमारे अपने आप को रखो

25:04और तोल माफ़ करो तो हम कहाँ हैं? लगता कैसा है?

25:10हमारी भावना तो शुद्ध है।

25:12लेकिन वो अवलोकन से मालूम पड़ेगा कि हमारे शुद्ध है कि अशुद्ध है।

25:16हमको सही में अपने आत्मा से प्रेम है या नहीं, अब अवलोकन करोगे तो पता चलेगा।

25:24फिर उन्होंने

25:25letter में वो भी लिखा। फिर उन्होंने letter में वो

25:31भी लिखा होगा सोनगढ़ से। कि आपने मनुष्य भव से पहले, जिस कुटुंब के

25:35लिए इतनी हजामत करते हो,

25:37मारे मारे फिरते हो, कमाई करते हो और गुरुदेव से दूर रहते हो।

25:44ऐसे भूतकाल में आपने अनंत कुटुंब को छोड़ा है।

25:47और आज गुरु मिलने के बाद भी आप वही गलती करते हो।

25:51कि कानी स्वामी को मिलने भी नहीं आते हो, दर्शन करने

25:54भी नहीं आते हो। तुम्हें तो मिलने भी नहीं आते हो, दर्शन करने भी नहीं आते हो साल में

25:59एक बार। और क्या करते हो? बस अपने कुटुंब, कुटुंब परिवार के पीछे ही पड़े हो।

26:03सुविधा जुटाने के लिए। घरभस्ती में फंस गए हो। आप सच्चे आत्मार्थी नहीं हो।

26:11आपको ऐसा कौन सा सुख मिल रहा है? जब गुरु के दर्शन करने के लिए भी नहीं आते हो।

26:17ऐसे गुरु के जिनके पहले प्रवचन से ही आपको आत्मज्ञान हो गया

26:22है। पहला ही lecture सुना उन्होंने चौगाणी जी ने।

26:26और सोनगढ़ की धरती पे 14 घंटे के अंदर निर्विकल्प समाधि दर्शन प्राप्त किया।

26:33दर्शन करते ही line मिल गई पूरी। अब आपको

26:38ज्ञान दशा के बाद भी गुरु के दर्शन की

26:40पड़ी नहीं है कुछ, गुरु की महिमा नहीं आती है, भक्ति नहीं आती है,

26:44गुनाह तो अभी साल में एक बार भी नहीं आते हो।

26:47और दूसरे पाप के द्वारे तो

26:49करना है। आपके द्वारा तो करना है, कुटुंब परिवार उसको सबको पालना पोषना है।

26:53तो सोनगढ़ वालों ने उनको जो उनको मित्र थे आत्माते मनुष्य

26:59थे उन्होंने लिख दिया। आपको क्या सुख मिल रहा है इतना? तो उसका जवाब मैं और आगे

27:05लिखते हैं सोनगढ़ में। मोक्ष मार्गी को

27:08जिसको जल्दी से मोक्ष में जाना है, जन्म मरण से छूट जाना है,

27:13उस रास्ते पे चलने वाले को। कुटुंबी

27:15जनों के मध्य सुख। कुटुंबी जनों के मध्य सुख मिलता होवे।

27:20ये कल्पना ही गलत। कि आपको लगता है कि

27:26मुझे आत्मज्ञान होने के बाद भी मुझे

27:29कुटुंबी जनों से प्रेम है और वहां मुझे सुख मिलता है। तो

27:35आपकी ये कल्पना गलत। सुख मिलता है इसलिए मैं कुटुंबी जनों के बीच में नहीं हूं।

27:41कहने का मतलब क्या है आप?

27:43कि आप जो मुझे tone मारते हो, उलाहना देते हो। टोन मारते हो उलाहना देते हो

27:47कि मुझे कौन सा सुख मिलता है। कि सुख मिले तो ही मैं रहता हूँ ऐसा थोड़ा है।

27:55मैं गुरु के पास नहीं आ जाता हूँ दर्शन करने के

27:57लिए। इसका मतलब ये नहीं कि मुझे कलकत्ता में या अजमेर में मुझे सुख मिलता है।

28:02कुटुम्बजनों के बीच।

28:03और कुटुम्ब तो वैसे भी मेरा कहाँ है यहाँ है कलकत्ता में। वो तो कहाँ है?

28:08अजमेर में था वो। और मेरा दिल तो मैं जानता हूँ। कि

28:15मैं कैसे गुरु के दर्शन के बिना रहता हूँ। गुरु

28:19के दर्शन के लिए मैं कैसे छटपटाता हूँ तो मेरा दिल जानता है। तो उन्होंने

28:24इतना लिख दिया कि मोक्ष मार्गी को।

28:27कुटुंबी जनों मध्ये सुख मिलता होवे

28:31ये कल्पना ही गलत है। बनास दास जी के पद लिखा है।

28:37जाल सो जग विलास। भाल सो

28:41भुवनवास। बाल सो भुवनवास। काल सो कुटुंबकार।

28:45लोक लाज नारसि।

28:48ज्ञानी पुरुष के दर्शन हम पढ़े थे ना इधर आ गए थे उत्तम पुरुषों के लक्षण।

28:54किच को कनत जाके करके पद है। उसमें बीच वाली line है। कि ज्ञानी पुरुष को

29:02जगत के 5 इंद्रियों के जो विलास हैं वो कैसे लगते हैं?

29:07जाल के समान मछली को पकड़ने की जाल होती है ना। को पकड़ने की जाल होती है। ऐसे हमको

29:11नरक में लेके जाने के लिए यमराज ने

29:13कर्मराजा ने जाल फेंकी। लेओ

29:16लेओ अच्छा अच्छा खाना खाओ अच्छा अच्छा पहनो अच्छा अच्छा देखो TV पीवी। और हमको

29:23हम लुभा जाते हैं। वो अच्छा लगता है। सब अच्छा मजा मजा आती है और फिर होता क्या है?

29:31जा हम फस गए फस गए कहाँ लेकिन ऐसा है अपने को नरक।

29:35जा जूते खाओ। वो पहले तो अच्छा अच्छा लगता है।

29:41ये जाल सो जग विलास।

29:43बाल सो भुवन वास। अच्छे घर में रहना, free bedroom, kitchen, hall, क्या,

29:50बड़ा बंगला, terrace, सब facility, car, park, सब।

29:56ये भुवन में रहना।

29:59ये भुवन में रहना उसको

30:00कैसा समझते हैं? बाल सो भुवन वास। बाला नहीं मारते हैं।

30:04पणी वाला होता है आगे

30:08त्रिशूल के जैसा रहता है। वो बाले की नोक पे रहते हैं।

30:15ऐसा उनको ज्ञानी पुरुष को। अपने बंगलों में रहने में इतना दुख तकलीफ होती है।

30:22वो तो चाहते हैं कि कब निवृत्त होकर के ऐसे ही।

30:26निर्वृत्त क्षेत्र में जाऊं अपने आत्मसाधना बढ़ाऊं घर में रहना पसंद नहीं करते हैं।

30:31ज्ञानी पुरुष की आत्मा घर में नहीं। घर में नहीं

30:34एक तो already एक cab तो है ही है ये भी कोजा room लगता है।

30:37फिर इसके अंदर 3 bedroom kitchen और AC room। मर गया।

30:44एक cab में और एक cab।

30:46क्योंकि हम दूसरे room में भी नहीं जा सकते दूसरे

30:48room तो गरम रहते हैं और AC room में ठंडा ठंडा रहता

30:50है। एक तो एक cab है फिर अंदर AC room लगा है ना room

30:56के अंदर AC लगा है ना अभी। अरे

30:58साहब। अब दूसरे room में जाना है तो नहीं जा सकते AC room में। नाही

31:03तो नहीं मैं सीधा हूँ।

31:05AC में रहो ठंडे ठंडे में रहो। दूसरे room में जाना है तो भी नहीं अब कैद खाना मिला है

31:09एक के बाद एक कैद खाना कैसा मिलता है। अरे भैया उसको घर में ही नहीं रहना है।

31:15उसको तीर्थ स्थानों में इधर इधर मुमुक्षुओं के संग में उधर उधर

31:19निवृत्ती स्थान में रहना है। लेकिन इसको तो और फसाओ और फसाओ कैसा लगता है।

31:25बाल सो भुवनवास। काल सो कुटुंबकाल। काल

31:31से कुटुंब काज। कुटुंब के कार्य करना है तो उनको काल के बराबर लगता है

31:37कि मेरी मौत आई है

31:39अब। Exam के time में बच्चों को

31:40बोलो जरा साग भाजी देखियो और सब्जी नीचे से।

31:45कैसा दम पछाड़ करते हैं। तो मेरे को पढ़ने भी नहीं देते हैं साल में एक बार exam आती

31:52है। हम एकदम पढ़ने में लग जाते हैं। खाने पीने में time पे नहीं आते हैं उनको

31:57थोड़ा भी काम दो तो

31:58क्या। पे नहीं आते उनको थोड़ा भी काम दो तो क्या होगा? tension में आ

32:01जाते हैं। दम पछाड़ कर देते हैं। और बोझ लगता है।

32:05इनको कुटुंब के काम करना ज्ञानियों को कैसा लगता है? यमराज के समान लगता

32:11है। और लोगों को लाज लाज़ है

32:13जगत में मेरी इज्जत।

32:15इज्जत बिजत की परवाह नहीं करते क्या नहीं। वो मुक्की ला के समान हैं।

32:34लोक लाज लागसी बनारसीदास जी की ये जो

32:36पंक्तियां हैं। वो मैंने रख दी यहां पर

32:40letter के ऊपर। अब अपने

32:45खुद के विचार बताते हैं ज्ञानी को क्या चाहिए?

32:49अरे उसे तो निरंतर आत्मरमणता चाहिए क्या चाहिए? ज्ञानी। क्या चाहिए?

32:54ज्ञानी को तकलीफ किस बात की है?

32:57कि वो चाहते हैं कि निरंतर मैं मेरे सुखधाम में जमे रहूं। मेरा उपयोग यहां ही रहे।

33:04लेकिन, वो अपनी अस्थिरता, अपनी कमजोरी जो भी समझो,

33:10या भावना में कमी, या अपने आत्मा के प्रेम में कमी,

33:14इसी कारण से उपयोग बाहर ज्यादा रहता है। और दूसरे-दूसरे काम में फंस जाते हैं।

33:20तो वो अच्छा नहीं। तो उनको अच्छा नहीं लगता है। क्या?

33:27उनको तो आत्मरमणता चाहिए। ज्ञानी को तो निरंतर, नहीं सुबह दोपहर शाम ऐसा नहीं,

33:33निरंतर क्या चाहिए? आत्मा की स्थिरता चाहिए, अंदर में उपयोग हो।

33:39कहते हैं कि अरे, जिसे धार्मिक जनों के संग भी नहीं रूजते।

33:46यहाँ आए तो आत्मा के बारे में

33:48lecture नहीं जानना है। Lecture नहीं जानना है। आपस में मिलकर के

33:52गुरु की तारीफ करना और आत्मा की तारीफ करना।

33:55तारीफ कितनी भी करो भैया, सुख कैसे मिलेगा? तारीफ करने से मिलेगा?

34:01ये सर्व सिद्धि में स्वर्ग में देवता है, भगवान जी ने पीछे लिखा है।

34:07सब एक भवतारी है। ये उनका आदि भाव है। वहां से निकल करके

34:13मनुष्य बन करके, मोक्ष जाने वाले हैं। वो

34:18जीव सर्व सिद्धि के देव वैसे होते हैं।

34:22सब अहम विंद्रण। उनके नीचे भी कोई नहीं ऊपर भी कोई नहीं। सब समान।

34:29और कुछ चाहिए भी नहीं। और भगवान की वाणी सुनने के भाव भी उनको नहीं आते हैं।

34:35इतने वो

34:36कि करते क्या 33,00,000 उनका आयुष्य रहता

34:38है। इतना time क्या करते हैं? बहुत लंबा आयुष्य।

34:42इससे ऊंचा आयुष्य किसी गति में नहीं होता। उनो... उनो

34:46चर्चा करते आत्मा की गुणों की चर्चा। आ आपस में मिलकर सभी आत्मज्ञानी एक भवतानी।

34:55और आत्मा की चर्चा करते और

34:57करते रहते करते रहते करते रहते और कोई भी चर्चा दोबारा repeat नहीं होवे।

35:03Next time. हर वक्त नई बातें।

35:09वो सर्वा सिद्धि का एक एक time पूरा हो गया वो आगे

35:11से पूरा हो जाता है फौरन दूसरा आ जाता है तो। हो जाता है फौरन दूसरा आ जाता है

35:14वो भी उसमें शामिल हो जाता है।

35:17मतलब ये चर्चा कभी खत्म नहीं होती है आत्मा के महिमा की चर्चा।

35:24फिर भी सोहरावन जी ने अफसोस व्यक्त किया है कि इतनी आत्मा की चर्चा करने से भी उनको

35:29चौथे में से पाँचवाँ गुणस्थान वहाँ नहीं आता है।

35:33फायदा क्या?

35:37इसीलिए ज्ञानी नहीं चाहते कि मुझे... कि मुझे

35:42आत्मा की महिमा की चर्चा

35:44शास्त्र में लिखा है इसका ये अर्थ है उसके बाद इबादत और उसके बाद detail में भाषण

35:51कहना सुनने के लिए

35:54मुझे संसारी जीव तो चाहिए नहीं वो तो आत्मा की बात सुनने को तैयार नहीं।

35:58लेकिन मेरी बात आत्मा की बात सुनने के लिए मुझे

36:01कौन चाहिए? मुमुक्षु लोग आजू-बाजू चाहिए धार्मिक जनों के संग चाहिए।

36:08वो ज्ञानी पुरुष की ऐसी भावना नहीं होती। जिसे

36:13धार्मिक जनों के संग भी नहीं रुचते क्यों?

36:17कि आत्मा की चर्चा करने से आगे नहीं बढ़ना होता है। आत्मा में

36:20लीनता होगी ना उपयोग यहाँ जाएगा ना

36:23लीन हो जाएगा ना तो आगे बढ़ना होगा। चर्चा करते रहेंगे तो पुण्य होगा धर्म नहीं होगा।

36:30और हमको मोक्ष में नहीं जाना है, स्वर्ग में नहीं जाना है। हमको तो मोक्ष में जाना

36:36है। मुक्ति चाहिए बंधन नहीं चाहिए।

36:39तो ऐसा कोई भी कार्य करना नहीं चाहते हैं भगवान की भक्ति। साधर्म्यों में

36:44तत्व की चर्चा आदि।

36:47कुछ भी नहीं करना चाहते। ऐसे लोगों को संग भी नहीं चाहते मुनिराज तो

36:50संग छोड़ के चले गए।

36:52जंगल में अकेले। लेकिन ज्ञानी की ये भावना की बात करते हैं मुनिराज तो practical है

36:59आचरण में भी। लेकिन यहाँ

37:02सौगानी से ज्ञानी की भावना अंतर की क्या है वो बताते हैं। क्या है वो बताते हैं

37:06कि उनको तो धार्मिक जनों के संग भी नहीं रुचते

37:11तो ऐसी जो भावना है कि जिनको धार्मिक लोगों के संग भी नहीं चाहिए उसे

37:17कुटुंब का संग तो रुच ही कैसे सकता है तो बहुत तकलीफ देता है

37:23कुटुंबीय जनों का संग तो बहुत तकलीफ देता है क्यों

37:28कि जितने भी झगड़े पंचायत तकलीफें होती है ना

37:32तो अपने बाजू में पड़ोसी रहते हैं उससे। अपने बाजू में पड़ोसी रहते हैं उससे कुछ

37:36भी नहीं होगा कभी। लेकिन घर

37:38में तो रोज़ की राह नहीं घर घर की।

37:41रोज कुछ ना कुछ बनता है। घर ही नहीं है अगर आप लोग नहीं है तो

37:47घर ही नहीं है समझ। वापस मिलते हैं मिलते हैं उनके साथ।

37:53और माथा भी एक दूसरे का वहीं फोड़ते हैं। फिर एक दूसरे के बिना चलेगा भी नहीं

37:57खाने के time पर फिर वापस साथ में ही रहना। और झगड़ा भी रोज़ करना। और झगड़ा भी

38:02रोज करना है। क्यों ऐसा होता है?

38:04एक घर बाजू में है, एक ही दीवार है,

38:06पड़ोसी के साथ कभी भी ऐसा नहीं होता है। वो

38:09बीमार पड़े तो उनको कोई तकलीफ नहीं। वो बहुत कमाई कर लेवे तो ही तकलीफ है।

38:14खुशी नहीं होती।

38:16किसी पड़ोसी के लड़के को fracture

38:18हो गया तो कोई तकलीफ नहीं। घर में किसी को होवे तो क्या हो?

38:22कोई बीमार पड़े तो क्या हो? पड़ोसी में घर के अंदर

38:27नौकर चाकर काम पे बराबर नहीं आवे। बराबर ही आवे। काम वाली नहीं आए।

38:31अपने को क्या तकलीफ? लेकिन अपने घर में नौकरानी नहीं आए तो क्या होता है? Dance

38:37कर लेते हैं। कितने राग द्वेष करते हैं

38:42हम देख। घर वालों से कितनी अपेक्षा?

38:47एक ही दीवाल में एक एक ही दीवाल है बीच में। दो बाजू पड़ोस रहते हैं एक बाजू हम रहते

38:53हैं। अब देखो तगड़ा दिन कैसा होता

38:56है। अपेक्षाओं के अंबार हैं इतने लोगों से। अपेक्षाओं

39:00के अंबार हैं अपने लोगों से। अपने लोग हैं ना? तो

39:02उसको बात नहीं करने से नहीं चलता है। पड़ोसी से भले रोज नहीं जाना तो कुछ बात

39:06नहीं। बात नहीं करो तो कोई

39:07कुछ नहीं। वो भी हमारे से बात नहीं

39:08करता हमको तकलीफ नहीं होती है। नहीं करे तो

39:10नहीं करे उसके घर में। लेकिन यहाँ परेशानी घरवाले मेरे घर में रह कर के

39:15बात नहीं करे तो परेशान। क्या क्यों बात नहीं कर रहे? मेरे से क्या गलती हुई भाई?

39:25तुम्हारे कोई ego है तो मेरे को भी है। तुम्हारे को ego

39:26है तो मेरे को भी है फिर वो भी शुरू करता

39:28है। आप दोनों ने लगाई पहले। ऐसा करके वो fighting शुरू हो जाती

39:33है अंदर। हर चीज़ के लिए problem है।

39:39एक घर में अपेक्षाएं बहुत होती हैं और फिर झगड़ा, राग,

39:42द्वेष, तकरार। फिर रहना वहीं है office।

39:47घर छोड़ के जा नहीं सकते

39:52office रहना तो इधर ही रहना। इच्छाएं

39:53टकराती। उसकी... नाई टकराती। उसकी ये हिस्सा है उसकी अब channel एक TV एक होता है।

39:57अब तो ऐसा जमाना आ गया हर bedroom में हर घर में TV होना है।

40:01घर में एक TV नहीं अब क्या होना हर bedroom में अलग-अलग TV।

40:06तो अच्छा है अभी ऐसा हो गया मामला। और कितनी channel मालूम

40:12है 200 channel। पागल नहीं होए तो क्या होए।

40:15Picture देखना पहले theater में महीने में एक बार कभी जाते हो।

40:19Line में खड़े रहना मगजमारी करना अभी तो क्या है

40:24रोज का 3-3। बेइज्जती करना अभी तो

40:26क्या है रोज का तीन तीन चार

40:29चार जो चाहे picture देख लो पुराने picture के अलग channel लगते हैं उसके अलग

40:32उसके अलग अंग्रेजी picture जो पहले कभी जाते ही नहीं थे सुना ही नहीं था कौन

40:36सी picture है अभी तो लगा

40:38दो button धनाधन देखो 200 channel है

40:40time इधर pass चला जाता है रात

40:42को 12 कब बजते हैं कब दिन उगता है पता ही नहीं चलता है

40:48ऐसा हो जाता है। तो

40:51ऐसे ज्ञानी पुरुषों को तो कुटुंब का संग रुजता ही

40:53नहीं। जब धार्मिक संग नहीं रुजता है तो ये कहाँ

40:59से रुजता है? उनको तो निरंतर आत्मब्रह्मणता चाहिए।

41:02अरे, विकल्प आश्रित पदार्थ से भी लाभ नहीं। अगर विकल्प के अनुसार हमारा

41:09पदार्थ मिल भी जाए ना, तो भी लाभ किससे है हमें? उससे थोड़ा होने वाला

41:14है। चलो मान लो सामने वाले ने विकल्प किए

41:17कि भई आप आ जाओ home guard। विकल्प किए कि भई आप आ जाओ सोनगढ़ और ticket मिल गए और

41:19आ भी गए। लेकिन फायदा किससे होगा गुरुदेव से होगा?

41:23उनकी वाणी से होगा? किससे होगा? सोनगढ़ में पाँव रखने से होता है?

41:30लाभ किससे होगा?

41:33खुद से ही होने वाला है। जब खुद अंदर आत्मा में दर्शन करेगा

41:37तो ही होने वाला है। ना गुरु से

41:39लाभ ना गुरु की वाणी से ना सोनगढ़ से।

41:43वहाँ जाकर के भी उपयोग बार-बार रख के आ गए तारीफ करके।

41:45बार बार रख के आ गए तारीफ करके भक्ति करके आ गए क्या हुआ?

41:49क्या फायदा?

41:52दीन सेवा तो हुई नहीं आत्म शांति मिली नहीं ध्यान तो जमता नहीं है

41:56भैया ऐसे जगह पे ध्यान नहीं जमता है तो घर में क्या जमेगा काम? निवृत्ति

42:02में ध्यान नहीं लगता है। नहीं बहुत मेहनत करते हैं लेकिन परिणाम जमते नहीं फिर बाहर

42:07आ जाता है 1 second में

42:08अंदर से आता है। ऐसे पाप के

42:10विचार नहीं आते हैं अच्छे अच्छे भक्ति। आते हैं

42:13अच्छे अच्छे भक्ति के

42:14उसके विचार आते हैं लेकिन आत्मा

42:17उनको अभी जमा नहीं आता। फिर क्या

42:22ज्ञान नहीं मिलता तो घर पे जाकर मिलेगा क्या?

42:26अभी आखिरी गीता तो दिन है अभी। Last इसलिए मैं बोला अभी इसके

42:31थोड़े जूते खा लेने इनके। अभी वो मुनिराज के बाद में वो

42:38वो तो हवा में उड़ जाते हैं ऊपर से जाता है। मुनिराज के तकला।

42:41गुड़िया की तरफ लात मारी। पर इनके जूते खावे ना तो पछाड़े। सीधे हो जाए।

42:49अरे विकल्प आश्रित पदार्थ से भी लाभ नहीं। मिल भी गया तो क्या हुआ?

42:53यात्रा यात्रा यात्रा हो गई ने 5 दिन। फिर क्या ने वातावरण चाहिए लेकिन अंदर गए क्या?

43:01ये क्या फायदा? विकल्प आश्रित पदार्थ से भी लाभ नहीं।

43:06साथ ही विकल्प से भी लाभ। ना विकल्प पुण्य से लाभ है।

43:13ना वैसे संबंध संयोग मिल जाए तो उससे लाभ है। लाभ तो केवल। Only

43:20द्रव्य दृष्टि से ही होता है। आत्मा की दृष्टि करोगे कोई

43:24लाभ नहीं। बाकी लाभ होता ही नहीं। वो अंदर का दरवाजा खुले बिना कुछ भी कर लो।

43:30शांति नहीं है। अंदर का दरवाजा खुलना। ज्ञानियों ने भी अपनी अंदर की बात कही। जो

43:37अपनी अंदर की बात कही सौगानी को। अब और आगे।

43:42आपने लिखा है कि सोनगढ़ वाले ने बहुत कुछ लिखा है। ये तीसरा point।

43:48कि निमित्त नैमित्तिक संबंध ऐसा है। कि तीव्र भावना होय ने।

43:54तो पाप न उडे पलटी ने पुण्य न उडे थई जाए।

44:00लिखने वाले ने ऐसा लिखा है कि आपका पाप का उडे बहुत।

44:05इसीलिए आपको गुरु के सानिध्य।

44:06इसीलिए आपको गुरु के सानिध्य नहीं मिलता है और बार-बार सोनगढ़ आने का नहीं होता है।

44:10बहुत पाप का उदय चल रहा है आपका। लेकिन गुरुदेव ऐसा कहते हैं कि आप तीव्र भावना भावो

44:18कि मुझे उधमगढ़ जाना है, गुरु के दर्शन करना ही है, ऐसा भी करते हैं।

44:22मुझे आत्मशांति चाहिए, चाहिए, चाहिए, ऐसे जोरदार भावना भावो।

44:27तो आपकी भावना के कारण से क्या हो जाएगा?

44:31तो पाप का उदय पलट करके काह का उदय हो जाएगा? करके काहे का उड़े हो जाएगा?

44:34पुणे का उड़े हो जाएगा। और जैसा पुणे का उड़े हो जाएगा,

44:39आप सीधा कलकत्ता में नहीं रहोगे फिर किधर रह जाओगे?

44:44तो आपको बहानाबाजी करने का भी मैं अवसर नहीं देना चाहता।

44:48लिखने वाले ने ऐसा। कि

44:50आप अगर बोलते हो कि मेरा बाप का उड़े है तो हम नहीं मारेंगे। मैं उसकी दवा लिखता हूँ।

44:55दवा लिखा उसको जो उसने क्या लिखा है? आप बहुत जबरदस्त भावना हो। तो

45:04आपके पाप का उदय पलट करके पुण्य का उदय हो जाएगा। और फिर कलकत्ता रह जाएगा

45:09और आनंद में आ जाओगे, गुरु के दर्शन होंगे,

45:12गुरु की वाणी सुनोगे और मजे में रहोगे। जैसे कि सब कुछ मिल जाएगा।

45:18फिर मोक्ष क्या मांगू मैं, मुझे मोक्ष जो मिल जाए।

45:22गुरुवर तेरे चरणों की एक धूल जो मिल जाए, सब कुछ भी नहीं मिलेगा।

45:29भक्ति से ऐसा कहा जाता है। एक भक्ति से ऐसा कहा जाता है व्यवहार

45:30की भाषा है। क्या? गुरु की थाली धोने से

45:36मोक्ष पुण्य मिलता है ना आत्मा मिलता है। फड़ाकड़ी करते हैं

45:39मैं आज से थाली नहीं ले रहा हूँ। नहीं नहीं नहीं मैं धोऊंगा आज तो मेरे को chance

45:45है। अच्छा बैठे हो तुम chance है तुम जल्दी जाना मोक्ष में। क्या

45:50गुरु की थाली धोने से मोक्ष मिलता है? मिलता है?

45:55नहीं मिलता है ऐसा ज्ञान मिल जाए होता क्या? प्राप्त

45:59हो जाते हैं। पाप धुल जाते हैं। पाप धुल जाते हैं। इतना धुल जाते

46:02हैं। इतने कच्चे नहीं होते हैं पाप गुरु की थाली धोने से धुल जाते

46:07हैं। गुरु की थाली धोना होता है पुण्य का भाव

46:10है, भक्ति का भाव है। तो पाप भी भोगना पड़ेगा और ये भक्ति हुआ है,

46:16उसका जो पुण्य बांधा है ना वो

46:17भी भोगना पड़ेगा। इतना मोक्ष धुल जाएगा। खबरदार जो किसी ने हाथ लगाया थाली

46:23में। क्या तो। या तो मरते हैं मेरे को मेरे को मेरे को।

46:32गुरु को लड्डू खिलाओ,

46:33पेड़े खिलाओ, क्या क्या खिलाओ। क्या मिलने वाला है भैया? देखो अब

46:39यहाँ आपको लगता है भक्ति का निषेध।

46:43भक्ति का निषेध है ये बात क्यों? अभी कोई मेरे को

46:46थाली लेगा नहीं, मेरे को धोना

46:47पड़ेगा। परेशानी हो जाएगी किसी की। कुछ बोले तो तकलीफ हो जाएगी, नहीं बोलने में ही

46:51मज़ा है। तो तकलीफ नहीं बोलने में ही मज़ा

46:55है। नहीं नहीं कच्चा। नहीं नहीं। आज तो आज तो आज तो मेरी पराली भर धुलाई होने वाली है।

47:01नहीं नहीं इतने कच्चे नहीं। एक sample तो

47:06कराएं। अब देखेंगे कितने सारे जोने आते

47:09हैं। अब सबका चेहरा देखूंगा मैं अब तो मेरे को मालूम नहीं कौन लेके जाता था।

47:13आज सबका ऊपर से देखना पड़ेगा फिर।

47:16कौन लेके जाता है थालो। परेशानी है। क्या

47:22कहते हैं। क्या कहते हैं? कि तीव्र बांधना होता है तो क्या होता है?

47:27कि पाप का उदय पलट करके पुण्य का उदय हो जाता

47:31है। ऐसा उसने शिखामण दिए किसको? स्वच्छंद को। और खुद को

47:35आत्मा को नहीं जानता और शिखामण किसको देता है? स्वच्छंद को। एक भवता

47:39इस ज्ञानी पुरुष को देता है शिखामण देखो।

47:43क्या? देखना है कि ये स्वच्छंद नहीं तो क्या है?

47:47ये स्वच्छंद है। ये ज्ञानी पुरुष को

47:54सिखाता है। ज्ञानी पुरुष सिखाता है तो आपको क्या करना चाहिए?

47:59सिद्धांत लिख करके भेजा है, सिद्धांत को तो ज्ञानी

48:01पुरुष भी माने करेंगे तो

48:02नहीं करेंगे? मेरा मैं सिर्फ advice नहीं देता हूँ। मैंने advice में क्या कर दिया

48:06है? सिद्धांत रख दिए हैं कि तीव्र

48:07भावना हो तो पाप का उदय पलट करके

48:09भी पुण्य का उदय हो जाता अब इसको

48:12ज्ञानी कैसे मना करे? अब सौगानी जी की कुछ नहीं चलेगी। क्या? भक्तों उनको

48:19मानना ही पड़ेगा और उनको

48:20भावना करना ही पड़ेगा। लेकिन सौगानी जी कम नहीं

48:24थे। उन्होंने उसका जवाब दिया है। और जवाब बहुत जबरदस्त है। Fantastic जवाब

48:31है। क्या लिखते हैं देखो। विकल्प करें और विकल्प के अनुसार पदार्थ की प्राप्ति हो जाए।

48:37ये कोई पुण्य नहीं है, ये तो पुण्य का

48:40फल है। भूतकाल में बांधे हुए

48:43पुण्य का, वो भी भूतकाल में बांधे हुए पुण्य का फल है। वर्तमान में पुण्य का फल

48:46फल है। वर्तमान में विकल्प का फल नहीं है। इसका तो अभी मिलेगा। अभी समझो आपने

48:50वर्तमान में कोई चीज की भावना की

48:52और वो कुछ पदार्थ मिल भी गया। तो

48:56इच्छा की इसलिए नहीं मिला है। भूतकाल में

49:00कोई अच्छा कार्य किया है पुण्य बांधा है उसका उदय भी उस time में है। इसीलिए आपको

49:06ये इच्छा करते ही उसकी delivery आ गई। तो ये

49:11पुण्य है कि पुण्य का फल है? ये पुण्य... पुण्य का फल है। ये पुण्य का फल

49:15है। अभी वर्तमान में जो भावना भाई है उसका फल तो कब मिलेगा?

49:19भविष्य में मिलेगा। पुण्य और पाप के जो

49:23हम भाव करते हैं उसका जो फल मिलता है वो immediate नहीं मिलता

49:27है। इसका पहले कर्म बंधन होता है।

49:31और फिर अबाधा फल पूरा होने के बाद उसकी delivery आती है जब तक नहीं

49:36आती। पुण्य और पाप करोगे तो

49:38उसकी सजा या फल जो भी मिलना है अनुकूलता प्रतिफल तो बाद में मिलती है।

49:40अनुकूलता प्रतिफलता वो बाद में मिलती है अभी नहीं मिलती।

49:43Immediate नहीं है। आप advance booking करा के बाद में मिलता है।

49:47अभी कोई समझो मुझे स्वर्ग में जाना जा सकता हूँ।

49:51स्वर्ग में और नरक में जितनी भी सीटें हैं

49:53totally full हैं। आप कितना ही पाप करो आपको नरक में जाने को अभी नहीं मिलेगा क्यों

50:00seat book खाली नहीं है कोई ज्यादा।

50:04और extra वो खड़े

50:05वो खड़े खड़े नहीं रखते हैं वहाँ bus में खड़े खड़े नहीं ऐसा नहीं होता

50:09है वहाँ। हाँ एक particular seat... वहाँ एक particular seat होती

50:11है, उसमें जाना पड़ता है। अब जब तक वो जीव सजा भुगत कर बाहर नहीं निकलेगा, तब तक

50:17उसकी seat पर हम जा नहीं सकते। ना स्वर्ग में, ना नरक।

50:22वहाँ पूरी संख्या fix है। कैसे जा कर बताइए आप?

50:26तो पाप और पुण्य के जो भी भाव होते हैं, हम करते हैं दिन भर, उसकी सजा,

50:31उसका फल अभी का अभी नहीं मिलता है। ये करुणा योग का

50:35विषय है। लेकिन अगर हम आत्मदृष्टि

50:38करें... लेकिन अगर हम आत्मदृष्टि करें तो आत्मा का आनंद

50:41सम्यक निजरा के परिणाम अभी इसी वक्त मिलते हैं।

50:46इसमें आपको कोई waiting नहीं है। अगर हम आत्मा में लीन हो जाएं तो

50:51उसका जो सुख मिलता है वो

50:52अभी का अभी मिल जावे। तो आपको

50:56ऐसा करें कि अभी आप एक काम करो आप

50:59पैसे दे दो खाना एक साल के बाद आना खाने

51:03के लिए। ₹15 थाली के जमा करो। जमा करो। क्या होता है? अभी भूख लगी है।

51:10खाना अभी खाना है और आपको बोलते हैं लाओ कोई sir booking कराओ।

51:14अगले साल ये time में आ जाना क्या करोगे?

51:19मुझे तो अभी चाहिए भूख अभी लगी है।

51:22तो इसकी booking आपको एक साल पहले करानी थी। ऐसा कोई बोले तो?

51:27तो मिलता था अभी खाना अभी आपके लिए नहीं है। ये पुण्य आपका इस प्रकार का खेल

51:32है। जबकि धर्मों का... जबकि धर्मों का ऐसा नहीं है। इसलिए सौगानी ने

51:36जवाब दिया है कि विकल्प अनुसार पदार्थ की प्राप्ति होना वो पुण्य

51:40नहीं कि पुण्य किसका नाम है?

51:43कि जब भी कोई प्रसंग आता है हमारे सामने।

51:47तब हम तीव्र हर्ष में नहीं जाते हैं, तीव्र शोक में नहीं जाते हैं।

51:51मंदता में रहते हैं।

51:54कषायों को तीव्र नहीं करते हैं, कषाय मंद रहते हैं,

51:57तो पुण्य बंधता है। पुण्य बंधने की ये रीति।

52:02के प्रतिकूल प्रसंग में तीव्र शोक नहीं करना।

52:05अनुकूल प्रसंग में तीव्र हर्ष नहीं करना और समता भाव में रहना maximum।

52:11जितना समता भाव जितनी degree में होता है ना उतनी degree में उसका पुण्य बनता

52:15है। ये पुण्य बांधने की कला है।

52:20देखो क्या कहते हैं। विकल्प अनुसार पदार्थ की प्राप्ति होना वो पुण्य नहीं है।

52:27वरन

52:28तीव्रता पलट कर मन... तीव्रता पलट कर मंदता होना वो पुण्य है। अतः राग छूटने

52:36या कम होने में सुख है।

52:38राग खत्म हो जाए या फिर उसकी degree कम हो जाए तब सुख मिलता है।

52:44पदार्थ के मिलने से सुख नहीं मिलता है।

52:47ये सिद्ध किया वो। वो क्या कहते थे song number में जो मुझे लिखे हैं वो।

52:54कि आप इधर आओ Kolkata छोड़कर के गुरु के दर्शन करो तो सुख मिलेगा।

52:59और वो उसके लिए आपको पुण्य का उदय चाहिए और पुण्य का उदय के लिए क्या करना है?

53:04तीव्र भावना भावना है ताकि आपको पुण्य का उदय हो।

53:07या पाप का उदय collect करके पुण्य का उदय हो। फिर आप इधर आओगे। आओगे तो क्या होगा?

53:13गुरु के दर्शन करके आपको आनंद मिलेगा। सौगानी जी का क्या कहना है?

53:20अगर हमने

53:22अभी वर्तमान में ऐसी तीव्र भावना भाई पुण्य की भावना... भावना भाई पुण्य की भावना

53:26सफल होने में देर लगती है।

53:28वहाँ पर वो भावना पे भी आरोप लगा रहे हैं।

53:31स्वार्थी। आपकी भावना ही नहीं है। भावना नहीं है। वो ऐसा

53:36indirectly कह दिया कि आपको तीखा भावना नहीं है अगर होती,

53:39तो आपका ये पाप का उदय पलट करके पुण्य का उदय होता

53:42और आप Kolkata में नहीं रहते और Sonbhadra में आते।

53:47लेकिन भावना अभी कर रहे हैं तो उसका फल तो बाद में मिलेगा।

53:51कि आप नहीं आ रहे इसलिए आपको

53:53भावना नहीं है ऐसी

53:53थोड़ी बात। इससे आपको भावना नहीं है

53:56थोड़ी बात। भावना अभी

54:00आप अंदर में होगी भी। और जो

54:02उदय चल रहा है वो भूतकाल के पाप का फल है। ठीक, अब कैसे होगा मेल बताइए।

54:08अभी तो जो delivery आती है वो अभी जो भावना करेंगे

54:11उसकी delivery 3 महीने के बाद के 6 महीने के

54:14बाद कब आएगी? लेकिन अभी अभी किसका उदय चल रहा है? भूतकाल में

54:20किए गए अंतराय कर्मों का उदय चल रहा

54:22है। अब क्या करो? किसी के

54:25अंतराय कर्मों के उदय चल रहे हैं और हम आपको उनको ऐसा कहें कि आपको भावना ही नहीं है।

54:31तो ये क्या कर दिया है? ये judgment सही नहीं दिया है। Judgment सही है?

54:38तो ज्ञानी के ऊपर आरोप भी लगाया है और ऊपर से शिखामण का ये दिया है।

54:43कि आप ऐसा करो ये भी गलत किया है। शिखामण जो दिया है ये

54:47भी गलत किया है। मतलब सिडॉन को तोड़ मरोड़... मतलब सिद्धांत को तोड़ मरोड़ दिया है।

54:51वितराग के जो सिद्धांत है, उसको गलत ढंग से बताया गया

54:56है। तो उनको चौका नहीं पटने वाले थोड़े। उन्होंने clear कर दिया है।

55:01कि विकल्प अनुसार पदार्थ की प्राप्ति होना वो कोई पुण्य नहीं है। वरन

55:06तीव्रता को उलट कर मंदता होना उसका नाम है। कि जैसी भी स्थिति हो हम संभव।

55:13हम भावना भाते हैं।

55:15अगर हमको गुरु का दर्शन का योग है, इस प्रकार से हम... का योग है इस प्रकार से

55:18अवसर मिलते हैं तो ज्यादा खुशी नहीं।

55:21नहीं मिलते हैं तो ज्यादा गम नहीं। ना खुशी ना गम।

55:27balance में रहते हैं।

55:28तो ये balance में रहना उससे

55:30क्या होता है? पुण्य का बंधन होता है। अगर तीव्र शोक किया,

55:35तीव्र हर्ष हुआ,

55:36तो ये तीव्र कषाय के परिणाम, पाप के परिणाम। ये पुण्य के परिणाम

55:41नहीं हैं। तो क्या लिखा है कि

55:44सिद्धांत ऐसा है कि राग, द्वेष... ऐसा है कि राग होवे ही नहीं।

55:48सोनगढ़ जाने का, गुरु की वाणी सुनने का,

55:51दर्शन करने का, राग ही नहीं होना। राग होने का होना, कुछ करना।

55:57वो होना ही नहीं चाहिए।

56:00द्रव्य दृष्टि से ही जवाब देते हैं, उनकी style वही है। कि अभी जो आपका

56:06जुड़ाव नहीं होना, समभाव में रहना। द्रव्य दृष्टि के

56:10बल से ही, आत्मबल से

56:11ही बोलता हूँ। वो तो जवाब पूरे आत्मबल से ही आते हैं। राग पूरे वातावरण से ही

56:16आते हैं। तो राग छूटने अथवा कम होने में सुख है।

56:19राग पहले तो होना ही नहीं चाहिए अंदर में ही रहना चाहिए। तो राग यहाँ मिले।

56:25फिर भी चलो हम अंदर में नहीं रह सकते हैं तो भावना होती है लेकिन ऐसा नहीं होना चाहिए

56:29कि इसके बिना चलेगा नहीं हमारा। इतना dependence नहीं चाहिए तो

56:33राग आएगा लेकिन इतना जोर नहीं होना चाहिए।

56:37तो सुख मिलता है।

56:38पदार्थ मिले चाहे ना मिले। हमारे सुख का... हमारे

56:42सुख का आधार पदार्थों के मिलने पर नहीं है। पदार्थ नहीं मिले तो दुख नहीं है,

56:48पदार्थ मिले तो सुख नहीं है।

56:51राग कम होवे तो सुख है, या नहीं होवे तो सुख है। ये सिद्धांत होता है। अतः

56:58आत्मा स्थित राग की मंता होवे यही

57:00भावना है। मुझे गुरुदेव के दर्शन की भावना नहीं है। मुझे कौन सी भावना है? आत्मा के

57:06लक्ष्य से। आत्मा के लक्ष्य से

57:09समस्त प्रकार के... समस्त प्रकार के पाप और पुण्य के राग की ममता हो जाए।

57:14ये मेरी भावना है। देखो भावना कैसी भावना? मुझे गुरु

57:20के चरण मिलते रहे मिलते रहे।

57:22आप ऊपर बिराजो और मैं नीचे बिराजूं। पूजा करते रहो।

57:30अपना आता है ना? पुजारी मान रहा था लेकिन मैं तो भगवान को...

57:37वीर प्रभु के...

57:39वीर प्रभु के। तू मान बैठा पुजारी हूँ बस में। मानो धन्यवाद। ऐसी तू मान्यता को।

57:46हाँ भगवान बनने की ताकत है तुझ में।

57:49तू मान बैठा पुजारी हूँ बस में। ऐसी तू मान्यता को। छोड़।

57:53के तेरा प्रभु। तुझमें ही। एक बात। सौगानी जी एक बात कहते।

58:00के मुझे लाभ मिलना है तो कैसे मिलेगा? मुझे लाभ

58:03तो एक ही। मुझे लाभ तो

58:06एक ही पदार्थ से मिल सकता है। मेरी आत्मा की दृष्टि होगी तो

58:10लाभ होगा। मेरी आत्मा की दृष्टि

58:12नहीं होगी तो लाभ नहीं मिल सकता। इसीलिए वहां आने

58:16की भावना मेरे को नहीं है, मेरी भावना एक ही है, कौन सी?

58:20आत्मा के आश्रित, आत्मा का आधार लूं, द्रव्य दृष्टि करूं और उसके बल से

58:26समस्त प्रकार के राग टूट जाएं या कम हो जाएं

58:32at least अपने आप, automatic कम करूं नहीं, राग... Automatic कम करूँ नहीं। राग

58:35को कम करूँ ऐसा नहीं,

58:36हटाऊँ ऐसा नहीं। आत्मा का आधार दो।

58:39आत्मा को नज़र में रखो, धरती इधर की रखो। और इसके बल से

58:44जितने भी राग हैं, पाप के,

58:46पुण्य के, जो भी राग हैं, वो अपने आप खत्म हो जाए या कम हो जाए।

58:50मैं तो ऐसी भावना पाता हूँ। मैं कोई और दूसरी भावना पाता,

58:55ये भावना कैसे बाना चाहिए नमुक सुत की

58:57बात। अभी आगे तो बहुत है 17 number के अंदर। अभी यहाँ तक। अभी

59:04यहाँ तक रखेंगे।