Avlokan Discourses of Shri Devchand bhai Shah The book Search Photographs About

Shrimad Rajchandra Vachanamrut

2 November 2000 · Patrank 371 · 38 minutes

Transcript

Transcribed automatically and lightly corrected. The recording is the authority where they differ.

Recitations restored to their canonical wording: Mangalacharan — Mangalam Bhagavan Viro, Mangalacharan — Sarva Mangala Mangalyam, Namokar mantra, Omkar bindu sainyuktam, Samaysar mangalacharan.

0:13णमो अरिहंताणं णमो सिद्धाणं णमो आयरियाणं णमो उवज्झायाणं

0:20णमो लोए सव्व साहूणं नमः समयसाराय

0:25स्वानुभूत्या चकासते । चित्स्वभावाय भावाय

0:31सर्वभावान्तरच्छिदे मंगलं भगवान वीरो,

0:36मंगलं गौतमो गणी। मंगलं कुन्दकुन्दार्यो,

0:41जैनधर्मोऽस्तु मंगलम्॥ सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं

0:47सर्वकल्याणकारकम। प्रधानं सर्वधर्माणां

0:52जैनं जयति शासनम॥

0:54ॐकारबिन्दुसंयुक्तं नित्यं ध्यायन्ति योगिनः। कामदं मोक्षदं चैव ॐकाराय नमो

0:58नमः राजचंद्र वचनामृत. प्रकरण number 373. श्री कलोलवासी जिज्ञासु श्री

1:03कुंवरजी प्रत्ये. कलोल ते

1:06वासी कुंवरजी भाईजी भद्र. निरंतर.

1:10निरंतर जेने अभेद ध्यान वर्ते छे एवा

1:15श्री बोध पुरुषना यथा योग्य वास. बोध पुरुष

1:21एटले ज्ञानी पुरुष. स्वयं कुवशित करी दीधा यहां

1:27पर. अब कहेसे है

1:30के निरंतर जिनको अभेद ध्यान वर्ता है,

1:35अभेद ध्यान. इसमे द्रव्य

1:38और पर्याय का भेद नहीं

1:41है, विकल्प नहीं है, चिंता नहीं है,

1:47डर नहीं है,

1:49तकलीफे नहीं है. संपूर्ण

1:52safe है. संपूर्ण safe हैं।

1:54उनको देख लिया है परमात्मा ने तो।

1:56चाहे जैसी परिस्थिति में भी। मैं संपूर्ण सलामत हूँ।

2:02मुझे अपनी सलामती के लिए, रक्षा के लिए, अपने को संभालने के लिए,

2:08प्रगति करने के लिए,

2:09कुछ करने की जरूरत नहीं है क्योंकि प्रगति का

2:12limit आ गया है, प्रगति

2:13से ज्यादा हो नहीं सकता। बना

2:16बनाया भगवान है, भगवान से ऊँचा कौन? मुनि हो तो भगवान बनना

2:19पड़ेगा। बुद्धि हो तो भगवान बनना पड़े। भगवान हो तो कैसे बनना पड़े?

2:23कुछ करने का ही नहीं है।

2:25खजाने में कुछ कमी हो तो फिर भरना पड़े। कमी ही नहीं है।

2:30समुंदर को तलवा रहता है, ये ऐसा ज्ञान समुद्र है जिसका कोई तलवा ही नहीं है।

2:35कभी खत्म नहीं होने, जानना जानना जानना चालू हो लेकिन कभी खत्म नहीं होंगे।

2:41तो ऐसे स्वरूप का जिनको निरंतर ध्यान रहता है।

2:44अगर आत्मा में दृष्टि है तब भी व्यापार धंधा करते हैं तब,

2:48letter लिखते हैं तब, ये... Letter लिखते हैं तब निरंतर अभेद ध्यान बनता है।

2:52अभेद माने किसी प्रकार का भेद नहीं है। कोई दूसरा doubt, शंका, विकल्प,

2:58तर्कना कुछ भी नहीं।

3:00ऐसा नहीं लगता है कि

3:01मेरा उपयोग अंदर रहता है तो तो मैं आत्मज्ञान करता ही हूँ। और आनंद मिलता ही है।

3:06लेकिन बाहर जाता रहता है मेरा उपयोग।

3:09खाने पीने में, व्यापार धंधे में,

3:11पूजा भक्ति में तो मेरा फिर ध्यान वहाँ से हट जाता है,

3:14हट जाता है।

3:16और क्या करूँ मैं? और क्या करूँ मैं अब कैसे रखूँ निरंतर

3:19ऐसा निरंतर रहता ही है। उपयोग चाहे अंदर हो चाहे बाहर हो।

3:23ज्ञान निरंतर रहता है। ये बेन श्री के वचन में लिखा है

3:29पतंग की दौड़। जब तक पतंग की दौड़ हमारे हाथ में है तब तक control power है।

3:36पतंग नीचे भी आती है ऊँचे भी जाती है। लेकिन दौड़ हाथ में है तब तक सलामत।

3:42ऐसे बेन श्री कहते हैं कि तेरी दृष्टि

3:44का दौड़ चैतन्य से। कि तेरी दृष्टि का दौर चैतन्य

3:47से बांध ले। बस फिर उपयोग कहाँ है उसकी फिक्र करने की ज़रूरत नहीं।

3:52उपयोग अंदर है कि बाहर है,

3:54आत्मा का वेदन आ रहा है कि नहीं आ रहा है, इतना कोई फिक्र करने की बात नहीं है क्यों?

3:58जिसका दौर चैतन्य के साथ बंध गया है, उसका ध्यान निरंतर चालू रहता है।

4:05वो सलामत है तो कोई problem आने वाला ही नहीं।

4:08उपयोग बाहर गया तो उसको कोई फर्क नहीं है और उपयोग अंदर आया तो

4:11उसमें कोई गुण वृद्धि नहीं होती है। कम में कोई

4:14गुण वृद्धि नहीं होती है। बिल्कुल intact ही रहता है हर स्थिति में।

4:18भगवान की position अजेय ही रहती है।

4:22मंदिर में जाकर के पूजा करे तो भगवान और ऊँचे पूरे हो जाते हैं,

4:26उनके गुण बढ़ जाते हैं। कोई पूजा नहीं करे तो कम हो जाते हैं ऐसा नहीं है।

4:30भगवान तो भगवान है हर हालत में। कोई पूजा करो न करो।

4:35भगवान ऐसा ही अपना चैतन्य भगवान ऐसा है।

4:38आप उनके सामने देखो नहीं देखो भगवान का

4:40स्वरूप जैसा का वैसा है। भगवान का स्वरूप जेसा का वेसा है. एसे भगवान का

4:45अपने स्वयं का ध्यान निरंतर

4:47अभेद रूप से अपार लोको रहेता है.

4:50तो ए बात में कही है. के निरंतर जेने अभेद ध्यान

4:55वर्ते छे एवा श्री बोध पुरुषना यथायोग्यमां. अत्र भाव प्रत्ये तो समाधि वर्ते

5:00छे. में क्यां लख्युं भाव समाधिमां लख्युं? एक आत्म समाधि होती है

5:05एक भाव समाधि होती है.

5:07आत्म समाधि में... आत्म समाधि में उपयोग गिरिव्यकल्प अंदर में चैतन्य भगवान का

5:12प्रत्यक्ष दर्शन करता है आत्म समाधि के अंदर।

5:15स्वरूप का अतींद्रिय आनंद का वेदन आता है, अकर्मों की निद्रा होती है।

5:20और भाव समाधि में क्या होता है? तब उपयोग आत्मा में लीन नहीं होता है, उपयोग बाहर है।

5:26बाहर होने के कारण राग द्वेष के

5:30अल्प मात्रा में भाव होते हैं, जो

5:31भी भाव होते हैं व्यापार के, खाने के, पीने के। पत्र पढ़ना है,

5:35पत्र लिखना है। पत्र पढ़ना है, पत्र लिखना है,

5:38पूजा करना है, भक्ति करना है, ध्यान करना है, सब प्रकार के भाव आता है।

5:43कृपालु देखो भाव प्रत्यय समाधि वर्त है। आदि माने

5:48तकलीफी, आदि, व्याधि, उपाधि और ये क्या है? समाधि।

5:53चाहे जैसे भाव, चाहे जैसे परिणाम होवे।

5:57ये भाव क्यों आया, खराब भाव है, मुझे नहीं आना चाहिए था।

6:00मुझे ऐसा भाव करना है, ऐसा कुछ नहीं है। जैसा आया है।

6:06कोई हेराफेरी नहीं करना है, किसी भाव को हटाना नहीं है, किसी को लाना नहीं है।

6:10मतलब समाधि में बैठे हैं, शांति में हैं, कुछ करना-धर्ना नहीं है।

6:15जो आ रहा है picture में देख रहे हैं कि ये भाव आया है। खत्म।

6:20वो भाव अनुसार कार्य हो तो भी भले, न हो तो भी भले।

6:25कोई आकुलता, कोई tension, कोई अपेक्षा, कोई आग्रह नहीं है। इसको क्या बोलते हैं?

6:31भाव के प्रति समाधि है।

6:33कोई आकुलता व्याकुलता नहीं, ऐसा क्यों नहीं हुआ?

6:36ऐसे खराब भाव मुझे क्यों आ गए? नहीं आना चाहिए था,

6:39क्यों आए? भाव प्रत्यय समाधि है, तो क्या फायदा हुआ?

6:45तो फायदा ये हुआ कि हमारी भूमिका में हम निरंतर आत्मज्ञान नहीं कर सकते हैं।

6:50तो profit तो कर नहीं सकते हैं।

6:52Progress हमारा जल्दी से नहीं होता है, लेकिन कम से कम हम जब उपयोग हमारा बाहर हो,

6:57तब तो हम जागृति में रह सकते हैं ना? Loss

6:59तो नहीं करें कम से कम, profit नहीं करें। तो नहीं करें कम से कम profit नहीं

7:02करो तो कोई बात। लेकिन loss तो ना करें।

7:06loss करेंगे तो क्या होगा जब profit करेंगे तो

7:08profit loss को loss profit को खा जाएगा। अभी से जो कर्जा करोगे

7:13तो जब कमाओगे तब कमाई हाथ में नहीं आएगी। कम से कम neutral line में चलोगे

7:18loss नहीं करोगे। शांति में रहोगे आकुल-आकुल नहीं होगे। ज्ञाता-दृष्टा भाव को

7:25अभ्यास करोगे तो क्या होगा?

7:27तो profit करने में बहुत आसानी हो जाएगी उसमें loss... Profit करने में बहुत आसानी

7:32हो जाएगी उसमें loss तो हुआ नहीं। बहुत easily काम हो जाएगा। तो बीच

7:35में बीच वाला भाव है

7:36ये। इससे भी निजरा निजरा इसलिए होती है।

7:39कि कर्म का उदय कब कैसा आता है नहीं मालूम। और कब उपयोग वहां लग जावे जैसे दांत उंद

7:44हो गए, हाथ में दर्द हो गए,

7:46पैरों में हो गए और कोई भी problem आ पड़े। कभी कैसा उदय आएगा हमको नहीं मालूम।

7:52लेकिन हमारी practice अगर अभी से चालू हो गई कि हर स्थिति के अंदर।

7:56हमको समभाव में रहना है। हमको समभाव में रहना है पूर्ण जागृत। सुख के

7:59प्रसंग में हर्षित नहीं हो जाना, दुख के प्रसंग में रोना-बुनाना नहीं।

8:03बिल्कुल control होना चाहिए। लेकिन वो अपुन बातें करना नहीं है।

8:09बातें बड़ी-बड़ी करें लेकिन प्रसंग आए तो दिख जाता है। तो ये आत्मार्थी नहीं,

8:15आत्मार्थी तो अभी से ही practice करता है कि हर भावों के प्रति

8:18समता भाव में रहना। चाहे जैसे परिणाम आ, फिकर क्यों करें?

8:22हम हम ध्यान में देखें लेकिन फिकर नहीं करनी। देखें

8:25लेकिन फिकर नहीं करिए। ऐसे क्यों हुआ ऐसा क्यों हुआ ऐसा...

8:28जानने में रहना है हम। जानने में compulsory रहना है ये practice है।

8:33ये practice जब सही हो जाएगी तो हम हर अवस्था में neutral रह पाएंगे।

8:37कम से कम इतना तो करें हम। इतना हम कर सकते हैं।

8:42तो ये सत्र भाव प्रत्यय तो समाधि वर्तेस। कृपा करके ये

8:46practice रही। 10 साल की जो साधना हुई। इसमें बहुत दफे तो

8:52अंदर में आत्मा में लीन होते... तो अंदर में आत्मा में लीन होते

8:55थे लेकिन आत्मा में लीन नहीं होते तब भी

9:00कर्मों की निद्रा जबरदस्त होती। कैसे? कि हर्ष के प्रसंग में हर्षित नहीं होते तो

9:04कर्म नहीं बनते। बहुत सारी

9:05कर्मों की निद्रा होती लेकिन हर्षित नहीं

9:07होते। और दुख के प्रसंगों में दुखी नहीं होते।

9:12तो कर्मों की निद्रा जो ज्यादा बंधना था वो नहीं बंधा। अटक गए।

9:18नए-नए नहीं बांधे पुराने चुकता कर

9:19दिए लेकिन नए नहीं बांधे। ऐसे... लेकिन नए नहीं बांधे। ऐसे

9:21करके भी कई जन्मों के कर्मों को

9:23पा लिया उन्होंने। उपवास करने में तो आसानी है नहीं खाना।

9:27ये रसना इंद्रिय को जीता बाकी के आँख चालू है कान चालू है सब चालू है।

9:33उससे कोई आत्मकल्याण नहीं होता है। लेकिन यहाँ तो।

9:38निरंतर जागरूकता में रहना है

9:40कोई भी भाव आवे जागरूकता में रहना है। तत्र भाव प्रत्ययतो समाधि वर्तते कोई भी जाति

9:45आधी व्याधि उपाधि का अनुभव नहीं है।

9:49उठापठ। उठा पटक बाहर में बहुत हो रही है संयोगों में। लेकिन यहाँ नहीं हो रही है।

9:54पहले क्या था कि बाहर में उठा पटक होते ही

9:56यहाँ पर भी उठा पटक होती थी। यहाँ पर भी राग द्वेष रोना धोना हँसना

10:00चालू था। अब बाहर में सब कुछ हो रहा है लेकिन ऐसी practice हो गई है

10:04कि अंदर में बिल्कुल शांति। इसका नाम समाधि। इसको भाव समाधि कहते हैं।

10:09और दूसरा जो इससे ऊँचा है वो आत्म समाधि।

10:13अत्र भाव प्रत्यय तो समाधि वर्तेस। अने बाह्य

10:16प्रत्यय उपाधि योग होते हैं। अने बाह्य प्रत्ये उपाधि तो करता

10:18छे. बहारमां गरबड छे बहु.

10:19ए करना, वो करना, यहां से

10:21telephone आता, वहा जाना है. वहा माल पहोंचाडना है, उधर से आना है. इसको

10:25letter लिखना है, उसको ए करना है. बहुत उपाधि है. बहार में

10:31तो उठापटक बहुत है लेकिन

10:33अंदर में तो बिलकुल समाधि. तमारा

10:35आवेला 3 पत्रो प्राप्त थया छे. पण ए

10:38कारणथी प्रत्युत्तर लख्यो नथी. केम? अंदर में समाधि. बहार में

10:42तो पत्र लिखना, पत्र... बहार में तो पत्र लिखना पत्र आया तो

10:46पत्र लिखना है. एक अंदर में इतनी समाधि है. के वो विकल्प ही नहीं होता है के जवाब

10:52देना है. अभी विकल्प आया तो काम हो रहा है तीन पत्र लेने के लिखने के बाद.

10:58अब आगे कहेते है मूळ topic.

11:01आ कारणनुं विषमपणुं एवुं छे के. जेने विषे घणा वखत सुधी

11:07सत्संगनुं सेवन थयुं होय. तो

11:09जीवने विषेथी लोभ भावना ओछी थाय.

11:12ए कालकी बलि. ये काल की बलिहारी

11:15है। सर्वज्ञ भगवान नहीं है इनका उपदेश नहीं मिलता

11:19है। पिता चले जाते हैं तो बच्चों में लड़ाई हो जाती है।

11:22और सर्वज्ञ भगवान के भक्तों में आपस में लड़ाई फाटे पड़ गए।

11:27कोई तो झगड़ा देख करके धर्म को अपनाने में

11:29अपनाना नहीं छोड़ दिए अपनाना ही नहीं है।

11:31इसे नास्तिक अच्छे हैं। ये धर्म करके झगड़ा करना इसे तो नास्तिक अच्छे हैं

11:34नहीं मानना है। हम तुम्हारे से ज्यादा अच्छे हैं।

11:37हम धर्म नहीं करते हैं तो।

11:39ऐसा करके कोई दूसरे मतों में चले गए। अपना

11:40अपना। दूसरे मतों में चले गए अपना अपना हिसाब बना लिया।

11:45पिता नहीं और जो

11:46भक्त थे उसमें भी कोई श्वेतंबर, कोई दिगंबर, कोई

11:49कारणकवासी, कोई तेरहपंथी, कोई बीसपंथी, बस ऐसे वो झगड़े में पंचायत में पड़ गए।

11:54धर्म एक रहा नहीं।

11:56क्रियाकांड में रह गया असल जो जागृति का मार्ग था ध्यान का मार्ग था वो छूट गया।

12:01सब लोग क्रियाकांड पूजा भक्ति में। अब ऐसे इस प्रकार से turn हो गए। और मान लिए

12:05कि धर्म कर लिए। मंदिर जाके

12:06दर्शन कर लिए धर्म हो गया। अंधेरा के

12:08दर्शन कर लिया, धर्म हो गया ऐसा, ऐसा हो गया है।

12:11काल की बली आ रही है कि सत्संग मिलता नहीं है, सच्ची बात मिलती नहीं है समझें।

12:16और कुसंग और असत्संग तो चारों ओर है। घर-घर में TV और जेब में telephone आ गए हैं।

12:23किसी को भी contact करना है तो आसानी से

12:24कर सकते हैं, कहीं भी हो। पहले तो घर में telephone था तो घर में रहे तो भी मिलते थे।

12:30अब तो घर में हो चाहे train में हो चाहे गाड़ी में हो किधर भी हो।

12:34कभी भी contact कर सकते हैं, इतने

12:35परिचय बढ़ गए हैं। जितने contact ज्यादा उतना हमारा उपयोग बाहर रहता है।

12:43जैसे जितने व्यवहार बहुत करते हैं तो क्या होता है?

12:46फिर वो लोग भी हम भी बहुत ज्यादा व्यवहार करते हैं तो वो

12:48लोग भी अपने से व्यवहार करते हैं।

12:50तो बस ये व्यवहार निभाने में एक दूसरे का manners manners में

12:53ठीक-ठाक रखने में ही एक दूसरे को राजी करने में ही जिंदगी चले जाती है।

12:58नहीं हमारा ये जो मनुष्य भाव है।

13:02किसी को राजी करने के लिए नहीं बहुत राजी रख लिए

13:05सबको। बहुत राजी राखवी छे सबको. अनंत काळ में हमने यही धंधा किया है. तो पत्र नंबर

13:1137 में कहेते है. जगतने रूडुं

13:12देखावा माटे अनंत वार प्रयत्न करवी. बीजाने सारुं

13:14लागे बीजाने खराब ना लागे. बीजाने खराब लागे ए

13:16तो एना भावनी वात छे. ए एनी भूल छे. दूसरो को अच्छा लागे के

13:20नहि लागे उसकी फिकर हमको क्यो. हमने एक मार्ग तय किया है के हमको वितराग के पथ पे

13:24जाना है तो हमको आगे नहीं देखना है पीछे नहीं देखना है. तो

13:27हमको आगे नहीं देखना है पीछे नहीं देखना है।

13:34आजू बाजू नहीं देखना है हमारे को तो हमारा target देखना

13:37है। इस मनुष्य भव में आकर के हम आत्म कल्याण करते हैं कि नहीं करते हैं

13:41कि वापस ये भी चवालीस के चक्कर में जाए।

13:44आगे पीछे ऊपर नीचे आजू बाजू कहीं नहीं देखना है किसी को जोर लगना है समझ।

13:49ऐसे ही ये दुनिया का मार्ग और भगवान का मार्ग अलग अलग है।

13:53जिस मार्ग पे भगवान गए हैं उस मार्ग पे

13:56अनंत ज्ञानी गए हैं। अब अब इस काल

13:57में ज्ञानी का support कम मिलता है क्योंकि। काल में ज्ञानी का

14:00support कम मिलता है क्योंकि

14:01ऐसे ज्ञानी दिखते नहीं हैं ऐसे महामुनिराज नहीं दिखते हैं।

14:05सारोपा में भगवान नहीं है तो भी क्या है?

14:07नहीं दिखते हैं तो क्या हम उस रास्ते पर नहीं चलेंगे?

14:11तो हम भटकेंगे क्या? भटकना पसंद है क्या?

14:14हम अकेले तो अकेले सही हम उसी रास्ते पर जाएंगे जिस रास्ते पर अनंत तीर्थंकर गए हैं।

14:19अनंत ज्ञानी गए हैं। भले हम अकेले हैं तो क्या होगा? और इस काल में हम अकेले बहुत हैं।

14:26इस कृपावती के काल में भी ऐसा था वनमिनी नारी कोयल

14:29कृपावती के। नीनी मारी कोयल। प्रभुपाद कहते थे अपने बारे। वन्नी मारी कोयल।

14:33सारे जंगल के अंदर हिंसक प्राणी

14:36डरावने आवाज निकालते हैं। इसमें एक अच्छा गीत गाने वाली एक कोयल। पूरे जंगल के अंदर।

14:42ऐसे इस दुनिया में जहां देखो वहां अज्ञानता और असत्संग कुसंग चल रहा है।

14:48इसमें एक इनको अकेले को ज्ञान था उस समय।

14:51तो कभी-कभी अफसोस करते थे कि मेरी जिंदगी भर मैं किसी को कह नहीं सकता हूं।

14:56ना रखें हम। कहाँ रखें हमारा दिल? किसको कहें अपनी बात?

15:00क्योंकि किसी को कहे जैसा नहीं है, कोई समझेगा कैसे समझेगा? ज्ञानी के

15:04अंतर की बात समझने वाला भी तो कोई ऊँचा प्रकार का मुमुक्षु तो चाहिए

15:07ना, ज्ञानी नहीं मिले तो कोई बात नहीं।

15:10ऊँचे class का मुमुक्षु तो चाहिए ना, किसको कहें अपनी व्यथा?

15:13कि हम दुखी क्यों हैं, हम उदास क्यों हैं?

15:16हमको क्यों संसार में रहना अच्छा नहीं लगता है?

15:19क्यों हमारे में व्यवहार निभाने में गलती होती है?

15:22कभी तो अच्छा व्यवहार कर लेते हैं, कभी बिल्कुल

15:24उल्टा व्यवहार कर लेते हैं, ऐसा... कभी बिल्कुल उल्टा व्यवहार कर लेते हैं

15:27ऐसा क्यों? क्योंकि असल में

15:28व्यवहार करते ही नहीं हैं ज्ञानी।

15:31विकल्प आया तो करते हैं, जब 3-3 letter आया तो जवाब कहाँ दिए?

15:36और फिर विकल्प आया तो दिया, 7 letter आने के बाद भी जवाब नहीं आते कभी-कभी।

15:41कभी तो एक line का जवाब दिया है।

15:43कई पत्र ऐसे हैं इसके अंदर 972 के अंदर, कम से कम 50 पत्र ऐसे होंगे,

15:48जो एक ही line का जवाब। जिसका कोई जवाब ही नहीं है।

15:52और कभी लिखा तो देखो 400... और कभी लिखा तो देखो 449 अपुन देखे। तो

15:56भई postcard लिया वो पूरा नहीं हुआ दूसरा लिया वो पूरा नहीं हुआ तीसरा लिया

15:59एक साथ में 8 postcard का एक पत्र लिखा।

16:03चित्त है कब कैसा होगा क्या मालूम। ये उनकी सहज जगत से कटे हुए हैं।

16:09इसलिए जगत के व्यवहार उनको सुधरते नहीं ज्ञानी को।

16:13कभी मान सम्मान में बुलावे कभी नहीं बुलावे। और अपने में है तो कहाँ से बुलाएं।

16:18वो तो पहले लिख दिया क्या

16:19निरंतर अभेद्य ध्यान है। दूसरा। निरंतर अभ्यध्यान छे. बीजुं भाव प्रत्ये

16:23समाधि छे. एसा भाव

16:25क्युं आया एसा क्युं नहीं

16:26आया इतनी पंचात वो कैसे करेंगे? किसको

16:29अच्छा लगो किसको बुरा लगो इतनी पंचात ज्ञानी

16:32क्युं करेंगे? तो एसी पंचात नई करता है वो तो वीर

16:36के मार्ग पे चले है. अकेले तो अकेले सही. तो आजुबाजु नहीं देखते

16:40है. तो अहियां 37 में कहेते है के जगतने रूडुं देखाडवा अनंत वार प्रयत्न करे. पण

16:46तेथी कांई रूडुं थयुं? केमके परिभ्रमण अने परिभ्रमण... केमके

16:49परिभ्रमण और परिभ्रमण के हेतु हजू प्रत्यक्ष रहे हैं। अब क्या करें?

16:54एक भाव जो आत्मा का रूढ़ु थाए एम व्यतीत करने में जसे, तो अनंत भाव का साटु घड़ी देसे।

17:01अब कमसे कम जो गलती हो गई सो हो गई। अब हम दूसरे के लिए अपने आप को नहीं जलावे।

17:08दूसरे राजी रहो, नाराज़ रहो, जैसा रहना है रहो, अपुन अपने रास्ते पे चलना है।

17:13किसी को बुरा लगे, किसी को अच्छा लगे।

17:16हमने जो मार्ग choice किया है शांति का। हमने जो मार्ग choice किया

17:18है शांति को। जिस रास्ते पे आनंद ज्ञानी गए हैं वही मार्ग हमारा है।

17:21साथ में चले तो ठीक है नहीं चले तो भी हमको अकेले को ही जाना है।

17:26इतना हम संसार से कट जाना चाहिए तो ही मार्ग मिलता है।

17:29तो ही progress होता है नहीं तो नहीं होता है।

17:32तो यहाँ कहते हैं कि आकारणो विषमपणो एव च।

17:35कि धर्म करना है तो बहुत problems आएंगे

17:37बीच-बीच। अंतराय बहुत आएंगे। सबको निभाने जाओगे। तो तेरी

17:42पूरी तेरी झूठी हो जाएगी। पूरी तेरी जुटी हो जाएगी,

17:45तेरा काम नहीं होगा। समय तो रुकने वाला नहीं। समय addition किसी को मिलता नहीं।

17:52वही समय में 24 घंटे के अंदर ही होता है, 25 घंटा किसी को होता नहीं।

17:57ऐसे में व्यवहार भी निभाना है, भाई बहुत प्रकार के प्रपंच भी

18:00खड़े कर लेने हैं। और सब में हमारी हाजिरी देना है। और सत्संग

18:06छूट जावे। ज्ञानी प्रभु का

18:08साथ छूट जाए, 6 महीने में नहीं, 6 साल में, 6 भव में भी नहीं होवे। नहीं तो एक धारा...

18:13ये तो एक धारा चले तो होए।

18:15जैसे बादाम का तेल निकालते हैं ना। तो निरंतर वो चक्की चालू रहना, वो निकलता है।

18:22अगर वो थोड़ा बीड़ी में गया हो,

18:25पूरा वापस तेल आ जाता है बादाम में। पूरा चूट जाता है वापस।

18:30उसका निरंतर चलना चाहिए। बादाम का तेल इतना रहता है, निरंतर चलना चाहिए।

18:35ऐसे बहुत से आते हैं दृष्टांत। ये

18:37सियाढ़ का दूध होता है तो ये बर्तन नहीं चले, ये बर्तन फट जाते हैं। उत...

18:41पट जावे। तो ये तो वितराग सर्वज्ञ भगवान का बात है।

18:44पचाना मुश्किल है सबको पचती नहीं है ये बात।

18:48क्योंकि हम कायर हैं हमको संसार भी चाहिए ये भी चाहिए दोनों चाहिए। नहीं

18:52एक ही काम करना है।

18:54सर काट के रख देना है हरि ने मारक।

18:57तो ये ये नहीं ये संभाल के रखना है तो वो नहीं मिले।

19:02और इसको खो दिया तो वो मिल जाएगी।

19:05दो में से एक choice होती। तो शेर का दूध है तो वितराग। तो

19:08शेर का दूध है तो वितराग का मार्ग।

19:11सोने का बर्तन ही चाहिए।

19:14उसने बहुत विरक्ति की है देव गुरु शास्त्रों की। तभी पैदा होता है।

19:18आराधना करने वाला जीव यहाँ अभी इस काल में आता ही नहीं

19:23है। आराधना करने वाला महावीर क्षेत्र में जाता है वहाँ जहाँ

19:25कीर्तनकर हमेशा विराजमान रहते हैं।

19:28ज्ञानी पुरुषों

19:29का मुनिराज का सबका समागम आसानी से मिल जाए। ऐसे क्षेत्र में धर्म क्षेत्र

19:35में जाता है। लेकिन यहाँ

19:36धर्म क्षेत्र... लेकिन यहाँ धर्म क्षेत्र

19:38नहीं है आविष्कार में इसको कलयुग कहते हैं वेदांतों में।

19:41और यहाँ पर वेदों भाषा में कहें तो हुंडा अवसर पीढ़ी पंचम काल कहते हैं।

19:49अवसर पीढ़ी में हुंडे में हुंडा। खराब में खराब समय।

19:53ऐसा खराब समय अनंत काल के बाद एकाध बका जाता है ऐसा खराब समय।

19:57तो धर्म के लिए अनुकूल नहीं है आपका समय तो ऐसा चले आता है।

20:02प्रपंच नहीं करना है तो भी प्रपंचों में चले जावे

20:04ऐसा समय है। चले जावे एसा समय है. कही ना कही फसे विना नहीं रहुं.

20:09तो आ काळनुं विषमपणुं एवुं छे,

20:11आज से 100 साल पहेले 150 साल

20:14पहेले लीखी हुई बात. तो तब तो इतना विषमपणा नहीं था. लोगो की प्रकृति

20:19में सरळता थी, ईमानदारी थी,

20:21परिग्रह का इतना ममत्व नहीं था, इटने

20:24fan पतुरे महोत्सव के साधन भी नहीं था. TV वगेरा तो कहां से?

20:29TV radio games ए सब कहां से? ये सब कहाँ थे?

20:34अब साधन बहुत बढ़ गए हैं तो। 100-150 साल पहले उनको ऐसा लगता था।

20:38अभी तो क्या हालत है? और अभी भविष्य में क्या होने

20:41वाला है क्या मालूम? कितना खराब दिन आने वाला है।

20:45कि जीव को आत्मा में रूप-रंग रखना तो बहुत मुश्किल है, सत्संग में भी नहीं आ सकता।

20:50सत्संग को अगर 6 महीना भी संभाल के चले ना एकदम आत्मभावना से,

20:54वो भी possible नहीं है, बीच-बीच में कई काम आ जाते हैं।

20:57बहुत से लफड़े आ जाते हैं। लिंग टूट जाता है।

21:01और कई... अने continuity नथी रहेती. तो भाव चढता छे, पछी नीचे गीर जाता

21:05छे, पछी भाव चढवानी कोशिश

21:07करीए. गिरना आसानी से होता है

21:09और चढना... चढने में बहोत मुसीबत होती है.

21:12चढने में बहोत तकलीफ पडती है. और गिरना तो कहीं

21:15से भी कभी भी गिर सकता है. इतनी जागृति नहीं रही है तो

21:19कभी भी ए मार्ग हाथ से निकल जाय. आ कारणनुं विषमपणुं एवुं छे के जेने विषय

21:25घणा वखत सुधी सत्संगनुं सेवन थयुं होय, तो जीवने विषयथी लोभ... तो जीवन

21:29विशेष थी लोक भावना वो चीज। जो

21:32लोगों का जो हमारे पूरा अब तक जिंदगी में रंग चढ़ गया है।

21:37दुनियादारी का व्यवहार का जो लोभ।

21:39सबको संभालना करना लोगों को अच्छा लगे ऐसा पहरवेस

21:42थाट माठ। Furniture घर बाग। लोगों को अच्छा लगना।

21:47लोगों क्या समझेंगे हमारे बारे में।

21:49बाहर निकलेगी साड़ी कैसे पहनना क्या करना कपड़े कैसे पहनना boot कैसे पहनना।

21:53Matching कैसे करना वो सब। ये लोक भावना लोगों को अच्छा लगे। ये लोक भावना लोगों को

21:57अच्छा दिखना, लोगों में मान सम्मान इज्जत अनुग्रह प्रतिष्ठा।

22:01इसमें जीव इतना रसभज गया है, उसमें उसका इतना समय जाता है,

22:07तो आत्मा याद ही नहीं आता। अब क्या करें कि घणा समय सुधि सत्संगु सेवन थयु होय ने,

22:14तो जीवने विषेति लोक भावना वो चिता है। संसार का attraction ऐसा

22:20है। है कुछ नहीं सुख तो आता नहीं लेकिन जीव

22:23भ्रमित हो करके इतना पड़ा है। इतना पढ़ा है।

22:26से पतंगा दीपक की लौ को देखता है तो फटता है भले

22:29जल जावे तो जल जाए। मक्खी शक्कर के ऊपर बैठती है तो

22:33कितना भी हटाओ तो हटती नहीं है वापस बार-बार यहाँ आती है।

22:37कभी-कभी हाथ पकड़ हाथ को छू सकते हैं उसको आसानी से। पंखड़ी पे भिस आती है।

22:43दर्द होता है तो भी नहीं छोड़ती रस।

22:47ऐसे हमारा बहुत नुकसान होता है आनंद भाव बढ़ जाते हैं

22:50आनंद कर्मों का पोटला बनता है। फिर भी हमको... फिर भी हमको

22:53लोगों के नज़र में अच्छा रहने की जो भावना है,

22:56इसको लोक संगना कहो, लोक भावना कहो, तो हमारे में कम नहीं होता है।

23:03सिद्ध भगवान बनना है लेकिन सिद्ध भगवान कैसे बनेंगे जब लोगों का इतना परिचय पसंद है।

23:08लोगों के नज़र में अच्छा रहना पसंद है तो सिद्ध भगवान कैसे बनें?

23:12सिद्ध भगवान तो सबको छोड़कर चले गए।

23:15तो हमारा मार्ग कौन सा? लोगों का जो मार्ग है वो हमारा मार्ग?

23:18सिद्ध भगवान बनना है वो हमारा मार्ग? हमारा ध्येय कौन सा?

23:22हमने अवतार क्यों लिया? खाना पीना, कमाना दमाना और मौज करना और नींद लेना।

23:29ये जन्म मिला क्यों हमें? वो बढ़ाने के लिए कि वो खत्म करने के लिए?

23:33क्यों हम कृपालु जी की साधना नहीं कर सकते?

23:35क्यों हम सोघानी जी की साधना नहीं कर सकते? मौज

23:39तो हमारे से अच्छा करने वाले ही बहुत होंगे।

23:42सोघानी जी बनके दिखाओ कोई एक। कृपालु जी बनके दिखाओ कोई एक। तो

23:48हमको किस मार्ग पे चलना है? Competition में जाना ही नहीं है,

23:51कोई compete नहीं कर सके ऐसा मार्ग में जाना है।

23:54कोई हमारी बराबर का हो ही नहीं सके ऐसे मार्ग पे जाना है। क्या?

23:58हम लखपति बनते थे ऐसे लखपति होंगे दुनिया के अंदर। करोड़पति, अब्जोपति भी बहुत होंगे।

24:05घर के खुद के plane होंगे ऐसे भी जीव होंगे इस दुनिया में। और ऐसे भी कहीं जाना अच्छा,

24:12स्वर्ग में ये जीव अनंत बार जाके आया।

24:16ये दुनिया में जितनी संपत्ति है ना... ये दुनिया में जितनी संपत्ति है ना वो हल्के

24:18में हल्का जो देव है स्वर्ग का

24:20उसके जूते में उतने रत्न होते हैं।

24:22जूती में। पूरी दुनिया खरीद सकता है जूती बेचे तो।

24:27इतना एक हल्के में हल्के देव का रहता है।

24:30ये हम अनंत बार बन चुके हैं हम क्या मुँह रखना है इसमें। अब मिला मिला क्या हमारे।

24:36अब तक हम भटके हैं ऐसी सुख की लालसा में भोगने के लिए।

24:41आखिर कुछ नहीं आता है हाथ में कुछ नहीं हाथ खाली के खाली रहे। कुछ मिलने वाला नहीं।

24:47लेकिन ये लोभ भावना है वो कम नहीं हो रही है। जीव प्रांति में आ जाता है।

24:52एक बार वो उन्नीस सौ जैन धर्म में आता है वो। एक आदमी झाड़ पे लटक गया है।

24:59और मधुमक्खी का रस ऊपर से आता है। फोटू आ गया उसका। नीचे कुआं है।

25:05इसमें चार नाग हैं बड़े-बड़े। और एक बहुत बड़ा नाग।

25:10वो चार गति के चार नाग,

25:11एक बड़ा नाग है उन्नीगोट गति। अंधेरा। आगे उनकी गोद गति। अंधेरा कुआँ है नीचे।

25:15बराबर कुएँ के ऊपर लटका लटक गया दाढ़ी पे।

25:18दो चूहे दाढ़ी को काट रहे हैं, एक सफेद चूहा, एक काला चूहा।

25:24और वड़वाई पे लटक गया है। और एक हाथी आकर के झाड़ को हिला रहा है।

25:32बस ऐसा ही हमारी हालत है। देखो ऊपर से वो

25:38आता है देव बचाने के लिए।

25:40ईमान में बैठना। मेरा हाथ पकड़ ले मैं तुमको लेके जाता हूँ। नहीं तो

25:45तुम कभी भी गिर सकते हो,

25:46दाली कभी भी कट सकती है, तुम कभी ना कभी किसी के मुँह में चले जाओगे।

25:49चार धरती वाले नाग के मुँह में, अजगरों के।

25:52अंधेरे कुएँ में गिर जाओगे, कोई पता भी मिलेगा नहीं।

25:56क्योंकि हाथी भी कभी भी any moment झाड़ तोड़ सकता है।

26:00चूहे के अगर दाल दाल काट लिया तो तुम सीधा नीचे दाल से

26:03नीचे गिरोगे, कुएँ में ही गिरोगे,

26:05ज़मीन पे नहीं गिरोगे। बोले अभी आता हूँ ज़रा एक कीड़ा आने दो

26:07बस। बस मक्की। एक कीटा आने दो

26:08बस। मत मत कीटा। मत काटी। अभी आता हूँ, अभी आता हूँ।

26:12एक minute, बस एक minute। ऐसा ही हमारा...

26:18बेंसी के वर्तमान में भी है, शास्त्रों में तो हर जगह है। और फोटो भी

26:25है। तभी थोड़ा स्वाद लेना था, थोड़ा, बस अभी, अभी आता हूँ, अभी आता हूँ। मुझे तो

26:29आत्मकल्याण ही करना है, दूसरा है ही नहीं कुछ।

26:33थोड़े-थोड़े में जिंदगी चले जाती है।

26:36पछताए... पछताय होत क्या, दल तुरिया तूटी गई. एसा ही होता है. थोडा निपटा गया

26:42हता, अबके तो एसा करुंगा ने

26:45के बस, लेकिन थोडा निपटा गया, निपटाने में

26:48कुछ निपट जाता है सभी मोमेन्ट. इसीलीये क्या करना, कोण बचाएगा

26:52एसे भावना से? संसार की भावना से कोण छुडाएगा? घणा लांबा वकत सुधी

26:57सत्संगनुं सेवन थयुं होय, तो जीवने विषयथी लोभ भावना ओछी थाय एवो आ कळा काळ छे.

27:04काट काट।

27:06एक बचेगा तो सत्संग बचेगा। कैसे कि आपको कम से कम रोकेगा, टोकेगा।

27:11सत्संग के अलावा कोई रोकने

27:13वाला नहीं। कोई नहीं कहेगा कि भई अपना आत्मकल्याण करो। महाकुंभ महोत्सव

27:17करते हो कोई नहीं कहेगा। सद्गुरु कहेंगे सत्संग पे।

27:20आपकी दुनिया में कोई भी सके, कोई भी व्यक्ति, कोई भी।

27:24राख देख लो, व्यापारी देख लो, कोई अपने को ऐसा कहेंगे?

27:28व्यापारी नहीं बोलते हैं तो ही माल बेच देते हैं।

27:31क्योंकि बेचने वाला अच्छा मिल गया है पतरा। अच्छा मिल जाए बकरा। नहीं चाहते हैं,

27:35तुम बेच के पैसा देना तुम लेके जाओ भाई।

27:37ऐसा है। नहीं, order नहीं है तो भी माल भेजते हैं।

27:42और ग्राहक भी ऐसा है, लाओ, कभी शांति से बैठते खाने को भी नहीं देते हैं time।

27:47उस time में भी phone आ जाता है।

27:50ये माल भेजना है, हर दिन करो, ये करो। ये दमादम में हमारी जिंदगी निकल रहा है।

27:56control करना है हर चीज को, हमारा ध्येय ये नहीं है, हमारा ध्येय आत्मविकास करना है।

28:00बहुत संभालना। मैं तो खो जाऊँ।

28:03संसार भावना बढ़ती है, लोभ भावना बढ़ती है तो

28:06आत्म भावना कम हुए बिना नहीं रहती। लोभ भावना साथ में ही है।

28:10एक कम होवे तो दूसरी बढ़ जाती है। लोग आत्म भावना कम होते ही लोभ भावना बढ़ जाए।

28:17वो तो पहले से ही है रंग लगे हुए हैं, स्वाद चखे हुए हैं। थोड़े से स्वाद के लिए

28:23अच्छी hotel में 6 रुपये वाली इडली नहीं चलेगी, वही इडली वहाँ ₹15 का चखेंगे। अच्छी

28:30hotel में जाना। अच्छी hotel-मां जवुं छे. ओला line लगती हे वहा पर बार

28:34तक table भी 15-20 minute

28:35के बाद ही लेता हे. तो

28:36वहाई जना हे. क्या हिसाब क्या हो गया

28:39हे? इसको क्या हुआ हे? मति मरे गई हे. तो

28:43घना वखत सुधी सत्संगनुं सेवन थयुं होय तो जीवने विषयथी लोभ भावना

28:48ओछी था, अन्यथा नहीं. सत्संग का सेवन होता हे तो लोभ

28:52भावना कम होती हे या

28:54खतम हो जाती हे. खत्म होती है या खत्म हो

28:57जाती है। सत्संग नहीं है जिंदगी बेकार है समझ।

29:01आपको जगाने वाला भी कोई नहीं होगा। आप तो खुद तो जागने वाले नहीं।

29:05लेकिन आपको जगाने वाले का साथ भी आपने छोड़ दिया है। अगर सत्संग को छोड़ा है तो।

29:10लोभ भावना ना आवरण ने लिधे। परमार्थ भावना प्रत्यय जीवने उल्लास परिणति थाय।

29:17कि लोगों का असर इतना है संयोगों का। लेखा देखी का।

29:22तो इस भावना में जो जीव आ गया है। जो जीव आ गया है, ऐसे है।

29:27उसको आत्मा की बात कहो तो अच्छी समझ में नहीं आती। शुरुआत ही नहीं है।

29:32बात करते ही उसको दिल में उल्लास नहीं आता है, तो विराधना करता है।

29:36उल्लास आता है तो आराधना है, कम से कम उल्लास आवे तो।

29:39नहीं हुआ। कब बंद होवे, कब हमको जाने दो यहाँ से, late होता है।

29:43इधर जाना है, उल्लास

29:43नहीं आता है। विराधना। विराधनाक परिणाम है। इसको बोलना बेकार है। ये

29:49बोलेंगे तो और दुगना होगा। इसको दो

29:51शब्द बोलेंगे ना आत्मा के, तो वो

29:53विराधना कर... तो बोलेंगे ना आत्मा के तो वो अभिराधना करके ओर डूबे. एसे तो

29:58बोलना भी नहीं कुछ चूप रहेना.

29:59ए ज्ञान का स्नेह बना देना. कुछ

30:02केह नहीं सकता. तो लोक भावना ना आवराना लिधे

30:04परमार्थ भावना प्रति जीवने उल्लास पडने कीधा है. अने त्यां सुधी

30:08लोक सवास्ते भवरूप होय. जब तक आपनी द्रढ आत्मभावना नहीं होवे तब तक लोगो

30:12का परिचय. व्यवहार निभाना ए करना एसा होता है तो हमारा भव बढते है मन में. उनको

30:17अच्छा लगता होगा लेकिन हमारे भव बढते. उनको

30:20अच्छा लगता होगा लेकिन हमारे भाव बढ़ जाते हैं। ये पक्की बात है। जहाँ

30:24तक इ लोग सहवास पे

30:25बहुरूप हो जाते हैं। कोई छुड़ाने आने वाला नहीं है जिसको अच्छा दिखाने

30:30के लिए प्रयत्न करते हैं हम। जब हम दुर्गति में जाएंगे दुखों को सहन करेंगे जब।

30:36एक भी हमको बचाने को आने वाला नहीं

30:38है। हमारे दुखों का एक

30:39एक अति भर भी दुख कोई लेने वाला नहीं है। साथ छूटा कब कोई कहाँ गया कोई आने वाला

30:46नहीं है जिसका मिलना दोबारा होता नहीं है। होता नहीं। इतने

30:49बड़े जगत के अंदर 84,00,000 जन में कोई कहाँ चले आता है। पता

30:54ही नहीं लगेगा। इसीलिए

30:58बहुत जागृति चाहिए।

31:01और उस जागृति को निरंतर टिकाने के लिए सत्संग चाहिए।

31:06सत्संग मिलता हो तो छोड़ना नहीं किसी आध में पहले काम करो बाद में छोड़ो।

31:10इतना हमको सत्संग के प्रति

31:12रहना चाहिए। अब आगे कहते हैं। सत्संग नु सेवन जे निरंतर पणे।

31:15सत्संगनुं सेवन जे निरंतरपणे ईच्छे छे. एसे पात्र जीव है. उनको मालुम है

31:21के अगर थोडा भी miss

31:23करुंगा तो. मेरा बहोत नुकसान हो जाये. एक तो कुसंग है असत्संग है.

31:28इसमे सत्संग को में छोडुंगा

31:30तो में ओर फस जाउं. ए

31:32सत्संग मेरे को बचाने वाला है. तो वो

31:35हमेशा चाहते है के मुजे हमेशा सत्संग मिला करे. सत्संगनुं

31:39सेवन जे निरंतरपणे ईच्छे छे. एवा मुमुक्षु जीवने. आ ईच्छा तो होय

31:44भाव. जीवने. हा ईच्छा तो होय भावना होय लेकिन मळना नई मळना. हमारे हाथमां नई

31:49होय. भावना होने पर भी

31:51कभी कभी नई मळता. क्योकी मिलता है सत्संग वो तो पूर्व में पुण्य किये

31:56तो ही मिलेंगे. अभी वर्तमान

31:58में जो भावना करे उसका फळ

32:01भविष्य में आयेंगे. तो जरूरी नई है के भावना वाले को अभी का अभी सत्संग मिले. न

32:07भी मिले. सत्संगनुं सेवन जे निरंतरपणे

32:09ईच्छे छे एवा मुमुक्षु जीवने ज्यां सुधी ते

32:12योगनो विरह रहे... त्यां सुधी ते जोगनो विरह रहे. सत्संग न मिले भावना होने पर भी. तब

32:19तक क्यां करना का उपाय. त्यां

32:21सुधी द्रढ भावे. ते भावना ईच्छवी कई

32:24सत्संग मळ्या करे. अने प्रत्येक कार्य करता विचारथी वर्तवुं.

32:27कोई पण कार्य करो प्रसंगमां उलजोव. वेपार में धंधे में घर के कामे. ओर

32:32कोई भी काम आपडे हो.

32:34मकान बन रहा हो. नई factory

32:36बन रहा हो. कोई भी सादी देखा काम हो. ओर भी कोई.

32:40कोई भी शादी ब्याह का काम हो और भी कोई काम हो।

32:42कोई भी काम में विचार से बरतना मतलब जागरूकता में।

32:46अपने आप को क्या फायदा क्या नुकसान वो विवेक करना हमें।

32:50जागृति में रहोगे देखोगे अपने परिणामों को

32:53तो विवेक रहेगा कि कहाँ मैं slip हो रहा हूँ।

32:56कहाँ अपने फँसने का स्थान है।

32:59कभी कहाँ मेरे को लोभ आता है कहाँ मेरे को

33:01मान होता है कहाँ मेरे को क्या क्या अंदर में क्या क्या हो रहा है उसके प्रति निरंतर

33:05जागरूकता में रहना है। नहीं तो

33:06कब खो जाएगा कब slip हो जाएगा। तो

33:08कब खो जाएगा कब slip हो जाएगा कब गिर जाएगा पता नहीं है।

33:12क्योंकि सत्संग तो मिलता नहीं है भावना होने पर वो तो पूर्व पुण्य अधीन है।

33:18और भावना है छूटने की सत्संग को चाहता है लेकिन मिलता नहीं है तो

33:21फिर मिलता नहीं है तब तक क्या करना।

33:25अब तो वो भी जो बाहर का जो support था वो भी गया सत्संग नहीं मिलता मतलब क्या

33:29हमारी भावना को टिकाने बढ़ाने के लिए बाहर का जो support था वो हमारे पास नहीं है।

33:35अब अब जिम्मेदारी पूरी किसके ऊपर आ गई है? ज़िम्मेदारी पूरी किसके ऊपर

33:38आ गई है? अपने आप के ऊपर आ गई है। अब कोई जगाने वाला नहीं है।

33:41भावना है कि कोई मिले लेकिन नहीं मिले तो क्या करें? तब तक दृढ़ भाव से

33:47सत्संग की भावना, आत्मकल्याण की भावना की इच्छा करना। और हर एक कार्य में,

33:53कार्य करते-करते, सोच-विचार के कदम रखना। विचार-विचार से वर्तन करना।

33:59पैर तो बढ़ा रहा हूँ लेकिन कहीं पड़ तो ना जाऊँगा ना, मेरे

34:02आत्मा का नुकसान तो नहीं होगा ना? संयोग का नुकसान कौन है? व्यवसाय का नुकसान कौन है?

34:06पैसा थोड़ा कम मिलेगा, ग्राहक थोड़े कम आएंगे हाथ में।

34:11Business थोड़ा कम होगा लेकिन आत्मा का तो नुकसान नहीं होगा ना?

34:15आत्मा का नुकसान बड़ा है। ग्राहक नीचे चले गए तो कोई बड़ा नुकसान नहीं है।

34:20आत्मा का नुकसान ज्यादा हो रहा है।

34:22तो विचार से प्रत्येक कार्यकर्ता विचार से वर्तू

34:25और अपने विषय में लघुपन में मन नहीं करे।

34:28मैं तो हिला के रख दूंगा ऐसा करू।

34:30हमको हिला के रखने की

34:32ताकत है लेकिन हमको हिलाना ही नहीं है। ताकात छे देखे हमको हलाना ही

34:35नहीं. हम हिल जायेंगे पीछे.

34:36अभी हिलेने जायेंगे लेकिन बाद में हमारे कोई बडा भुगतना पडे. हमको

34:40नहीं बढना है आगे हम

34:42पीछे ही सही. पोताने विशे लघुपणुं

34:45मान्य करो. नीचे ही रहेना अपने उठने

34:47की कोई जरूरत नहीं है. नीचे ही रहेना. पोताना

34:51जोवामां आवे ते दोष प्रत्ये निरुति छे. जोवामां आवे ते. जोवाय पछी

34:56भावना राखवी के दोष जल्दी सडे. भावना. आडवानो प्रयत्न नहीं करवानो. खाली जो. प्रयत्न

35:01नहीं करवानुं. खाली जोवानुं ज छे. पण भावना एवी होय के ए दोष

35:06बीजी वार न थाय. पोताना

35:08जोवामां आवे ते दोष प्रत्ये निवृत्ति छे. सरळपणे वर्त्या करवुं. आडोळाई

35:13नहीं, वांधा वचका नहीं,

35:14आग्रह नहीं, अडाग्रह नहीं, सरळता. एसा

35:16एसा एसा एसा. Okay okay let go.

35:20इसको बोलते है सरळता. मतलब पल पल में वांधे है, एक घर में पाट मत रहेती है.

35:25पल पल में वांधे है. इसने

35:26एसा क्युं किया? इसने एसा क्युं किया?

35:28इतने ऐसा क्यों किया इतने ऐसा क्यों किया? जैसा किया है हमारे नसीब का खेल

35:33है। जो मिला हम इतना मिला संतोष है। बहुत बड़ी बात तो हमको

35:38हम फायदे में क्यों हैं कि हमको वितराग का मार्ग मिला ये फायदा है

35:41बाकी नहीं मिला तो नहीं मिला

35:43क्या करने का अपना।

35:45भौतिक ब्रह्मांड से छूटने का जो मूल मार्ग वो तो अपने को मिल गया ना

35:48वो तो इतनी सद्गुरु की कृपा है ना हमारे पर।

35:51फिर होना क्या। बाकी मिला मिला नहीं मिला नहीं मिला।

35:56ऐसे हमने पुण्य नहीं किए हुए। ऐसे हमने पुण्य नहीं किए हुए तो नहीं मिला। हमारे

36:02पाप का हो रहा है तो नहीं मिला तो क्या हो गया? कौन सा लूटा जा रहा

36:05है? अब लूटने वाला नहीं है

36:06क्योंकि हमको सद्गुरु का साथ है। इतरा

36:08की देव के आशीर्वाद है हम कैसे जुटेंगे? दूसरे

36:10लोग भी होते हैं ऐसा जिंदगी बिता रहे हैं ऐसा हम क्यों बिता रहे हैं?

36:14हम तो बड़े भाग्यशाली हैं।

36:16तो हमको जो चीज मिलनी चाहिए वो तो मिल गई है

36:18अब दूसरा मिले नहीं मिले कोई परवाह की बात नहीं।

36:21इतरा की देव गुरु शास्त्र मिल गए बहुत मिल गए हैं धन्य होता है। मन धन्य थयो आज

36:28अवतार। बढ़िया मने। अभी कोई चिंता की बात नहीं है। भव गिर जाएंगे।

36:35दुख में सुख में कैसे भी लेकिन भव गिर जाएंगे। आनंद भव खत्म हो जाएंगे।

36:40तो उनका तो खुशी होती है रोना धोना नहीं होता है।

36:43ये हमारी दृष्टि बदलना पड़ता है हवैया।

36:46दृष्टि बदलो तो संसार खत्म है। दृष्टि में फेर आया तो संसार खड़ा है।

36:51दृष्टि में ही है जो भी कमाल

36:52है सो या नजर में है। में ये जो भी कमाल है सो ये नजर

36:58में है. केसे देखते हो?

37:00हुं देखते हो के दोस्त देखते हो?

37:04दोस्त देखो तो डूब जाओ. हुं देखो के तो तीर

37:10जाओ. सरळपणे वार्ता करुं. अने जे कार्य करी ते

37:14भावनानी उन्नति थाय. एवी

37:17ज्ञान वार्ता के ज्ञान लेख के ग्रंथनुं कंई कंई विचारवुं ना

37:23जोईए. क्यारे? सत्संग न मळे

37:25तो त्यारे. भावनाओने सत्संग न मळे तो पछी एवुं ग्रंथ वांचुं.

37:31आपणी भावना वधे वैराग्य

37:33वधे. एवुं योग्य छे. कई

37:36विशेष नहीं. एवुं योग्य छे. हवे विशेष ना कही शकुं.

37:41सुखधाम अनंत सुसंत चाही.

37:44दिन रात्र रहे तद ध्यान

37:46मही. पर शांति अनंत सुधा. सुधामय

37:51जे। प्रणमु पदते

37:57वरते जयते। प्रणमु

38:03पदते वरते जयते.

38:10जाई के।