Shrimad Rajchandra Vachanamrut
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0:01श्रीमद् राजचंद्र पत्रांक 371 भाग दूसरा।
0:06तारीख 3-11-2000 श्री देवचंद भाई।
0:13णमो अरिहंताणं णमो सिद्धाणं णमो आयरियाणं णमो उवज्झायाणं
0:20णमो लोए सव्व साहूणं नमः समयसाराय
0:25स्वानुभूत्या चकासते । चित्स्वभावाय भावाय
0:31सर्वभावान्तरच्छिदे मंगलं भगवान वीरो,
0:36मंगलं गौतमो गणी। मंगलं कुन्दकुन्दार्यो,
0:41जैनधर्मोऽस्तु मंगलम्॥ सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं
0:47सर्वकल्याणकारकम। प्रधानं सर्वधर्माणां
0:52जैनं जयति शासनम॥
0:54ॐकारबिन्दुसंयुक्तं नित्यं ध्यायन्ति योगिनः।
0:57कामदं मोक्षदं चैव ॐकाराय नमो नमः राजचन्द्राय चन्द्रावत।
1:00पत्र क्रमांक 371, 371। तो कनौज के जिज्ञासु
1:05कुंवर जी भाई के
1:07प्रति यह कथा है। जिज्ञासु
1:10का मतरा अभी मुँह में तो
1:14नहीं हुआ है। जिज्ञासु का मतलब अभी
1:18मुमुकसु नहीं हुआ
1:24है। जिज्ञासु
1:27का मतलब अभी खोज
1:31चालू है। सही क्या है गलत क्या है अभी पक्का नहीं है। लेकिन खोज खोज है।
1:37और उसको बोलते हैं जिज्ञासु तो सवाल बहुत होते हैं mind के अंदर।
1:41ये सही कि वो सही कि ऐसा। ऐसे जिज्ञासु भाई कुंवर जी को भी पत्र लिखता है।
1:48और कुंवर जी का ये बहुत lucky है कि पत्र में उन्होंने अपनी भी
1:51बात घेर ली। पत्र में उन्होंने अपनी भी बात कह दी है अंदर की बात।
1:55कि निरंतर जिन्हें अभेद ध्यान वर्ते
1:57छे। एवा श्री बोध पुरुषना यथा योग्य वांस। और विश्वास दिलाने
2:03के लिए भी हो सकता है।
2:05उनकी भी ऐसी योग्यता होगी और सामने वाले को मेरे पे trust रखो।
2:10मेरे को प्राप्त हो चुका है ऐसा कहने पर भी होवे। कहीं भटक ना जाओ ऐसा भी होवे।
2:16इसलिए बात कह दी है यहाँ पर।
2:18कि निरंतर जिन्हें अभेद ध्यान वर्ते छे एवा श्री बोध पुरुषना।
2:21वर्ते छे एवा स्त्री बोध पुरुषना यथायोग्यमां ज. अत्र भाव प्रत्ये तो समाधि
2:27वर्ते छे. अने बाह्य प्रत्ये
2:29उपाधि ज वर्ते छे. तमारा आवेला
2:323 पत्रो प्राप्त थया छे ते कारणथी प्रत्युत्तर
2:36लख्यो नथी. आ काळनुं विषमपणुं एवुं छे के जेने विशे घणा वखत
2:42सुधी सत्संगनुं सेवन थयुं होय. तो ज जीवने लोकभावना ओछी थाय
2:47अथवा लय पामे. भावना उचित
2:49है अथवा लय भावना। तो जीव को आत्मकल्याण की भावना नहीं होती
2:54इसमें सबसे बड़ा काम है तो लोभ भावना का है।
2:58असत्संग के कारण लोभ भावना develop होती है।
3:01लोगों को जो अच्छा लगे वो करना। लोग राजी हो गए ऐसा करना।
3:06प्रतिष्ठा मान सम्मान कहीं भी धब्बा ना लगे ऐसा कार्य करना।
3:12परिग्रह भी इतना होना।
3:14उसके पास गाड़ी है तो मेरे पास भी गाड़ी है उसके पास ये है तो मेरे पास भी है ऐसा।
3:18एक race।
3:20तो लोक भावना ना आवरण नलीदे ऐसे race में जीव लगा है तो आत्मकल्याण कहाँ सुझेगा?
3:25लोक भावना ना आवरण नलीदे परमार्थ भावना प्रत्यय जीवने उल्लास परिणति थाए।
3:31बात सुनते ही खुशी हो जाना चाहिए कि मेरे आत्मकल्याण की बात हो रही है।
3:35मेरे हित की बात हो रही है। ये मैं जो अभी तक किया हूँ सब सब रखड़पट्टी का धंधा है।
3:43राजी खुशी से कर्म बांधते जा रहा हूँ मैं। रोके रोके भी छूटने वाले नहीं हैं वो पोटले।
3:50भोगना तो पड़ेगा ही पड़ेगा। वो विचार नहीं आता है। जीव बंध बांधते वक्त
3:56ज़रा भी सावधान नहीं है। जब भोगना पड़ता है तो बहुत रोता है।
4:02लेकिन फिर भी वो छूट नहीं सकता। ऐसे जीवों को जिसको लोक भावना ज़्यादा है।
4:08लोगों को राजी रखने का, कुटुंब वालों को राजी रखना, सभ्य संबंधी को राजी रखना।
4:14समाज में भी कि सब आना जाना व्यवहार सब संभालना।
4:19इसके पीछे जो ये पड़ा है तो इसके कारण
4:22परमार्थ भावना प्रति। जीव ने उल्लासपूर्ण थी था नहीं।
4:27अपना आत्म अंतरुचि नहीं होती
4:29और वहां आत्मकल्याण की बात चलती है तो match कहां से होगे?
4:32ये आवे 1 दिन 2 दिन बाद में। अच्छा लगे सुने
4:36बाद में नहीं लगे बाद में याद भी नहीं आवे
4:38इतना काम में उलझ जावे। और जीव ने उल्लासपूर्ण। जीवने उल्लास परिणति थाए नहीं चढ़ते
4:42परिणाम नहीं होवे। चढ़े कभी गिरे ऐसा।
4:47और त्यहाँ सुधी जब तक जीवको आत्मकल्याण के अंदर से रुचिपूर्वक भावना न जागे
4:52तब तक। लोक सहवास ते भव रूप होए छे। तब तक उसको बहुत संभालना है।
4:59अगर वो contact रखेगा तो बहुत तकलीफ हो जाएगी। बेनसी का वतन मत निकारो।
5:09आत्मभावना एक... आत्मभावना एक
5:10बख़्त 100% की हो जाए ऊपर तुम्हारे हाथ के पास।
5:13छोटी मुँह पे ना। आइए।
5:18छोटी मुँह। आइए। आत्मभावना एक बख़्त 100% की हो जाए
5:24बाद में तो कहीं भी जावे तो
5:26सबके पास बल आता है एक। एक बक्सर पहन लेता है।
5:30कहीं भी जाता है गलत जगह पे फस गया असत्संग में फस गया कुसंग में फस गया तो
5:35ये जीव सावधान देता है। लेकिन अभी... दान देता है। लेकिन अभी 100% आत्मभावना नहीं है।
5:40तब तक बहुत problem है। किसका संग करना, कैसा करना, सब में बहुत ध्यान रखना पड़ता है।
5:47एक तो आत्मभावना कमजोर हो उसमें। ऐसे लोगों का संग कर लेवे, जिनको संसार पसंद है।
5:54इनको कुसंग, कुवार्ता, राजकीय, political pictures की, उसकी, उसकी।
5:59ऐसी कथाएं पसंद हैं। आप कैसे हो,
6:01हम कैसे हैं, लंबी-लंबी party पंचायत पसंद है। ऐसे लोगों का... पसंद है। ऐसे
6:05नंगासन करोगे तो क्या होता है?
6:07त्यँ सुधी लोक सेवास्ते भव रूप में।
6:12आत्म कल्याण की 100% की भावना नहीं है उसका रोग बहुत भयंकर है।
6:17उसको ICCU में डालना
6:18चाहिए। 24 घंटे का सत्संग चाहिए। 1 घंटे का वश नहीं होता है उसको। नहीं
6:23ऐसे भैया अब सत्संग बोले तो हम तो अकेले रहते हैं। दूसरे तो किसी को आता ही नहीं होता।
6:27तो फिर वहां तो फसना ही हो जाता है। फसना होता है किसको?
6:31जिसको आत्म भावना नहीं है
6:32उसको। आत्म भावना वाला... भावना नहीं है उस आत्मभावना वाला पचता नहीं है। जिसको
6:36ये मार्ग पसंद है अंदर से रुचि है।
6:39वो पचता नहीं
6:40है वो तो उल्टा वैराग्य में आता है कि देखो बेचारे अभी हँसते
6:43हैं लेकिन कल क्या होगा उनका।
6:45अभी तो मोह शौक में 5 इंद्रिय के विषयों में आत्मा की बात भी सुनना पसंद नहीं करते।
6:50चर्चा करें तो तकलीफ हो जाती है।
6:52एक नाटक वैसा लगता होगा वो सब नाटक लगेगा किसको
6:55आत्मारथी। जिसको आत्मकल्याण करना है वो तो सब।
6:58आज हँसने के दिन हैं कल रोने के दिन इनके ही आने वाले हैं।
7:02आत्मार्थी होगा वो हँसता भी नहीं रोता भी नहीं वो neutral है।
7:06वो संसार का नाटक देखता है। नाटक में क्या हँसना क्या रोना। कुछ नहीं वो भिन्न है।
7:13बाकी जो दूसरे लोग हैं जिसको आत्म कल्याण नहीं करना है संसार की रुचि है।
7:18उसको तो अपनी बात जमेगी भी नहीं कैसे जमेगी वो बात
7:21दोनों बात opposite हैं एक डूबने की बात है एक तैरने की बात।
7:24सीटों में रहना तो पड़ता है ना। रहना पड़ता है वो तो हमको सजा मिली है।
7:29भूतकाल में। भूतकाल में हमने विराधना
7:32की है, असत्संग बहुत किया है, कुसंग बहुत किया है। तो नहीं चाहते हुए भी ऐसे संग
7:36में रहना पड़ता है। रहना पड़ता है वो
7:38दूसरी बात है और रहते हैं वो दूसरी बात।
7:41जबरदस्ती से रहना। हाँ जबरदस्ती से रहना पड़ता है तो ही
7:43बच जाएगा जीव। गुलामगिरी जैसा लगता है।
7:48जेल में पत्थर फोड़ने पड़ते हैं, फोड़ना फोड़ता नहीं है वो।
7:53फोड़ने पड़ते हैं अगर जेलर आजूबाजू जाए तो। ध्यान नहीं रखे तो।
7:57बैठे रहते हैं। ध्यान नहीं रखे
7:59तो बैठे रहते हैं आराम से। कौन फोड़ेगा? फोड़ना पड़ता है
8:01नहीं तो डंडा खाना पड़ता है फिर। इसीलिए फोड़ना पड़ता है।
8:05ऐसे हमको भूतकाल में जो हमने गलती की है उसकी सजा रूप में ये
8:10विराधक जीवन के साथ रहना पड़ता है,
8:11असत्संग रहना पड़ता है। नहीं बताई थी बात कि इस काल में जो
8:15जीव जन्मते हैं वो विराधना करके आए हैं तभी तो इधर आए हैं।
8:18नहीं तो नहीं रहते वहाँ चौथे काल में महावीर क्षेत्र
8:20में नहीं रहते जहाँ चौथा काल ही है
8:21दूसरा पंचम काल ही नहीं है कोई। एक दो तीन काल भी नहीं है पाँचवा छठा भी। एक दो
8:24तीन काल भी नहीं है, पांचवा छठा भी नहीं है, चौथा काल ही है।
8:28वहाँ दूसरा धर्म भी नहीं है। तो choice का कोई सवाल नहीं है,
8:32सुखी होना है तो एक के पास ही जाना पड़े। एक ही doctor है वहाँ।
8:37तो वहाँ तो easy है लेकिन यहाँ easy नहीं है।
8:40यहाँ तो जैन धर्म में भी सच्चा कौन सा हो, दिमाग खराब हो जाए।
8:45जो हम करते आए, हमारे पिताजी जो करते थे वही करना है।
8:49डेरावासी, थानाकवासी को लड़की नहीं देवे,
8:51थानाकवासी डेरावासी लड़की नहीं देवे, लड़की का भी... थानकवासी
8:55देहरावासी लड़की नहीं डबे। लड़की का व्यवहार
8:58भी नहीं। अभी अभी थोड़ा छूट हुआ है पहले तो नहीं। कौन से पंथ को मानते हैं?
9:03जैन भले हो लेकिन देहरावासी है कि थानकवासी है? थानकवासी में भी बड़े हैं
9:07कि छोटे हैं? छोटे बरके
9:08हैं? तो भई क्या करना है
9:09आपको? लेकिन सब तलाशते हैं। लड़की लड़के की
9:11बात आए तो भी पहले वो पूछते हैं कि छोटे
9:13नन्हे बरका है कि बड़े बरके हैं? छोटे बरके हैं तो जाते
9:16हैं बड़े बरके हैं तो जाते हैं ऐसा। matching करते हो?
9:21देखो कैसा है। देखो कैसा है, कैसा द्वेष पैदा हो गया एक दूसरे के प्रति।
9:24जहां तमाम जीवों के प्रति
9:26परमात्म दृष्टि होती है ज्ञानियों की। शीश भगवान हमको कैसे देखते हैं?
9:31पैतांबर, दिगंबर ऐसा देखते हैं कि भगवान देखते
9:34हैं। हमको सबको समान दृष्टि से देखते हैं। वो हमारी अवस्था को नहीं देखते हैं।
9:39इसमें भी आया है 14 number का बोल। नहीं, अहिंसा में
9:42रहेंगे तो ऐसा भगवान ही लगते हैं, फिर भी
9:43ऊपर वैराग में ऐसा लगता है ऐसा। अहिंसा में भगवान है
9:47तो बस राग द्वेष नहीं करना, अपने को सजा मिली है वो काट... सजा नहीं करना अपने को सजा
9:50मिली है वो काट लेगा। एक भाव ही रहना है ना
9:52अंदर में interest नहीं है तो दूसरा भाव में साथ में रहने को मिलेगा भी।
9:56ऐसे लोगों के साथ दोबारा रहने को नहीं मिलेगा। चाहेंगे तो भी नहीं मिलेगा क्योंकि आपको
10:00अभी वर्तमान में खुशी नहीं है जबरदस्ती दिन काटते हो।
10:04वर्तमान में तो आपको सत्संग चाहिए था जैसी भावना होगी वैसा आगे
10:07होता है। हमें बताने सिद्ध गणेश देखिए
10:11अभी तो चौथे गुणस्थान में है केवल ज्ञान भी नहीं हुआ है लेकिन। आपको देखते हैं तो
10:15कैसा देखते हैं। हमें तो बता...
10:17अमे तो बधाने चैतन्य ज देखी रह्या छीए. कोईने अमे रागद्वेष वाळा देखता ज नथी.
10:20ए भलेने पोताने गमे त्यां मानता
10:22होय. पण जेने चैतन्य आत्मा उघड्यो एटले दर्शन थया.
10:24एने बधुं चैतन्यमय ज भासे छे. तो बेनश्री के वचनामृत. 18
10:27साल की उमर में आत्मा अनुभव किया हनो. उनके वचन है. अभी भी
10:31present जी. उनको मिले है बात भी
10:36किया है. कभी भूतकाळ
10:39की पुराण नहीं है
10:42उसे दी. ये भूतकाल की
10:44पुराण नहीं है, दूसरे देवों की कथा नहीं है।
10:47ये जिनको हमने देखा है उनकी कथा है। बात भी किया है, दर्शन भी किया है।
10:53ऐसे इनकी कथा है। यहाँ क्या कहते हैं कृपालु देव?
10:57कि जब तक 100% की आत्मभावना नहीं होवे,
11:01अंश मात्र भी संसार में रहने का अभिप्राय होवे, अभिप्राय, रहना तो पड़ता है।
11:06सजा के लिए। लेकिन हमको रहना है। हमको कुछ करना-धरना है।
11:11रुचिपूर्वक। इसका मतलब अभी... पूर्वक। इसका मतलब अभी आत्म भावना में खोट है।
11:16तब तक लोक सेवा से बहुरूप होय।
11:19तब तक लोगों का संग करना जिनको हमारा अभिप्राय मैच नहीं होता है।
11:23जो ज्ञानी के मार्ग पे रुचि नहीं रखते हैं।
11:26ऐसे लोगों का संग करना करना पड़ता है और दूसरी बात हम करें।
11:31वो बहुरूप होता है। बहुत danger है ये। ये जीव को बहुत नुकसान करने वाला है।
11:37जीव गिरेगा गिरेगा गिरेगा क्योंकि
11:38अभी चलना ही नहीं आता है। चलना नहीं आता। चलना नहीं आता है और खड़े टेकरे के
11:43वहां जाएगा तो गिरेगा ही गिरे।
11:45छोटा बच्चा अभी चलना
11:47चलना नहीं सीखा और रेंगता रेंगता दरवाजे के पास चले जावे तो सीढ़ी के तरफ।
11:52तो उसके तो हाथ पैर टूटे। ऐसा हाल है यहां पर अभी आत्मभावना इतनी जबरदस्त नहीं है।
11:58और संसार की रुचि वाले जीवों के
12:00साथ रहना पड़ता है। और हम भी उसमें involve हो जाते हैं जागृति में नहीं रहते हैं।
12:06तो ये हमारा भव बढ़ाने वाला है।
12:09ऐसे जीवों... आने वाला है। ऐसे जीवों को तो चाहिए कि 24 hours सत्संग चाहिए। तो
12:13पहले 24 hours सत्संग हो करके ICU में डाल करके,
12:17थोड़ा ठीक होवे अभी बाहर जा सकता है, चल फिर सकता है, तब बाहर निकालना।
12:21room में तब shift करना तब तक नहीं करनी। फिर वहां भी ठीक हो गया तब घर पे जाने देना।
12:26अब जाओ कहीं भी जाना है। ऐसी हालत है group of day के पास।
12:30यह सब कहते हैं। यहां पर बहन जी भी कहते
12:33हैं, मुनिराज की बात
12:34करते हैं, 229 number का बोल। 30 number का बोल। मुनिराज को संयम नियम और
12:40सब में आत्मा ही समीप होता है।
12:42आत्मा की दृष्टि होती है बाहर में कुछ भी करे। अहो तू तो आत्मा की साधना करने निकल्यो।
12:48क्या लौकिक जनना परिचय रस केम? ऐसे मुनिराज को आचार्य देव कहते हैं कि भैया तुम कहाँ?
12:55आहार लेने गया था इतनी देर कैसे
12:57लगा दी? कहीं परिचय तो नहीं किया ना किसी से बातचीत तो नहीं किया है ना वहाँ पर?
13:02बिल्कुल मौन रहना है। आहार लेने जाओ शहर में तो।
13:05आर लेने जाओ शहर में तो बिल्कुल मुँह से
13:07नहीं ये नहीं दाल नहीं तो रोटी दो ऐसा नहीं बोल सकते।
13:10और बर्तन तो होता ही नहीं है कि भई चलो stock में लेके जाएंगे। वो तो
13:14यहीं खाना है जो भी खाना है।
13:17जो देवे वो choice नहीं बिल्कुल मौन इशारा भी नहीं कर सकते। जो दिया वो लेना है।
13:23ज़हर भी दिया तो लेना पड़ता है अगर हाथ में आ गया तो
13:25ये तोड़ना नहीं है। कुछ भी दिया हाथ में आ गया लेना
13:29पड़ता है। और 32 कोड़िया। इससे ज़्यादा नहीं। इससे ज्यादा
13:35ले गए तो फिर
13:36शरीर का मोह आ गया, इतनी ही छुटी है। इससे ज्यादा छुटी नहीं है। तो
13:42तो फिर जेल लग गई तो आचार्य देव पूछते हैं कि भैया कहाँ
13:44खो गए थे, इतनी देर क्यों लगा दी?
13:47सब पूछते हैं, तारे शुद्धि वधारवी होय, दुखती छुटवानी भावना होय, तो
13:54अधिक गुणवाला
13:56के सरखा गुणवाला ना संग में
13:57वस जे। जिसको आत्मा की भावना है ऐसे जीव, उनके... आत्मा की भावना है ऐसे जीव
14:01उनके साथ में रहना या ज्ञानी पुरुष के साथ में रहना। लेकिन दूसरे
14:06का संग तो तुम नहीं करना।
14:08दूसरे का संग तुझे दुखदाई लगना चाहिए। ये jail में पड़े हैं तो कैसा दुखदाई लगता है?
14:12ऐसा लगना चाहिए। इतना दुख लगेगा तो तुम बच जाओगे। नहीं चलो अभी
14:17सुबह शाम तो कर लिया ना सत्संग कर लिया थोड़ा ध्यान कर लिया अब थोड़ा
14:22ये भी संभालना पड़ता है
14:24संसार का भी। नहीं गड़बड़ हो जाएगा बहुत। इसको भी ध्यान देना है इधर भी। इसको
14:28भी ध्यान देना है इधर भी व्यापार में
14:30घर गृहस्थी में सब में ध्यान देना है।
14:33ये काम नहीं चल रहा ध्यान देना नहीं है ध्यान देना पड़ता है।
14:37मजबूरी हो लेकिन ध्यान देना नहीं है हमारे को ध्यान तो एक ही जगह देना है।
14:41लौकिक संग तारो पुरुषात मंद पड़वानो कान।
14:45नीचे जिनको आत्मा की रुचि नहीं है ऐसे लोगों का संग करोगे तो क्या होगा?
14:50तेरा अपना पुरुषा कमजोर हो जाएगा
14:52वो तो डूबेंगे लेकिन तेरे को साथ में लेके
14:53डूबने वाले का साथ कोई लेता नहीं है क्यों नहीं लेता है?
14:58जिसका गंदा loss मिल जाता है मालूम पड़ गया उसको कोई loan देता है?
15:05लौकिक संग तारो फुर्सत मंद पड़वानु कारण था। तू उसका संग करेगा तो तू गिर जाएगा।
15:10वो तो गिरा हुआ ही है। लेकिन तू नीचे से ऊपर से नीचे गिरेगा। विशेष गुणीनो संग।
15:17तारा चैतन्य तत्वों ने निहारवानी परिणति विशेष बढ़वानु कारण था।
15:22एक तो तू कार्य कर ही रहा है फुर्सत कर रहा है छूटने के
15:24लिए। इसमें तुम... छूटने के लिए। इसमें तुमको बड़े ज्ञानी का साथ मिल जाए।
15:27मेरी fast... वो आगे है ना तुमको race लगाना पड़ेगा।
15:32ये गांधी जी जब चलते थे दौड़ते जाते थे दांडी यात्रा में।
15:36गांधी जी की चाल देखो तो ऐसे के दौड़ते हैं दूसरे लोगों को दौड़ना पड़ता था उनके साथ।
15:41देखो
15:42ऐसे विशेष ज्ञानी के संग में रहे
15:43अपन। तो हमारे पुरुषार्थ कम होता तो हमको पुरुषार्थ बढ़ाना पड़ता है।
15:47तो जल्दी हमारा progress होता है।
15:50अचानक आवी पड़ेला असत्संग में तो पोते पुरुषार्थ राखेने झूठे रहे।
15:54सत्संगमां तो पोते पुरुषार्थ राखने जतुं रहे. पण अमे चाहीए नहीं पछी उपाधि आ
15:59पडी सरफे. तो अच्छा नहीं
16:01लागे. अच्छा नहीं लागे एनो मतलब
16:03जुदो रहेतो छे. सुवाता नहीं एनो मतलब शुं
16:05थयो? तो भिन्न छे. सुवातो मरी गयो समज लो. सुवातो
16:09नहीं एनो मतलब अमे भिन्न छे. लचेपचे नहीं छे एनी अंदर. पण
16:13पोते जो रसपूर्वक असत्संग करे. तो तेनी परिणति मंद पडी जाय.
16:16पुरुषार्थनी मात्रा नबळी थई जाय.
16:18ए तो संसार सागर तरे. ज़रूर हो जाए। ये तो
16:21संसार सागर तैरना है, कोई छोटा-मोटा काम नहीं है।
16:24अनंत भाव में जो गलती की है उसको एक भाव में सुधार देना है।
16:28और अल्प समय में परम तत्व को पाना है। पुरुषार्थी भैया ऐसा करना पड़ेगा।
16:34कुछ पाने के लिए कुछ खोना भी पड़ता है।
16:37तो खोने में इसमें क्या है? अपनी दोषों को खोना है।
16:40असत्संग को खोना है, कुसंग को खोना है।
16:43और इसमें कोई नुकसान नहीं है, कचरा कचरा खोना है। घर में कचरा बाहर
16:46फेंक के आते हैं, ऐसे
16:47हमारे दोष। घर में कतरा बाहर फेंक के
16:48आते हैं, ऐसे हमारे दोषों को बाहर फेंकना है।
16:52कुसंग को छोड़ देना है, असत्संग को छोड़ देना है।
16:55अपने दोष, क्रोध आदि भावों को छोड़ देना है।
16:58तो इसमें हमारा कोई नुकसान नहीं, उल्टा हमारा नुकसान तत्व जो
17:01है वो बाहर निकलता है हमारे।
17:04शरीर में रोग हो, कोई जीवाणु घुस गया हो, तो दवा लेना है ताकि वो बाहर निकल जाए।
17:10ऐसे ये भी परमात्मा बनने की साधना में ये भी जरूरी है।
17:15तो ये करना पड़ेगा, नहीं अगर रसपूर्वक
17:17उसमें जुड़े... पडेगा नहीं अगर रसपूर्वक उसमे जोडेगा संसार के कार्यो में. तो
17:22तेनी परिणति मंद पडी जाय.
17:25आ तो स्वरूपमां झूलता मुनिओने. आ
17:27तो स्वरूपमां झूलता मुनिओने आचार्य देवनी भलामण छे. मुनिराज को
17:32warning दी गई है वो तो दिन में हजारो बार अनुभव करते है आत्मा का उनको
17:35warning है. के एसा नहीं समजना के मुजे आत्मा का दर्शन हजारो बार हु रहा है तो में
17:40अभाई कही भी जा सकता हुं
17:41आ सकता हुं. समजदार. कोई दूसरे मुनि के
17:43संग में रहो. तुम दूसरे मुनि के संग में रहो।
17:46या
17:47दिनेश्वरो देव के संग में रहो
17:48लेकिन लोगों के संग में तुमको नहीं रहना है, बातचीत भी नहीं करना है।
17:52हार लेने को जावे और आत्मा संबंधी चर्चा करे वहां पर कोई हार देने वाला।
17:58धर्म संबंधी बात नहीं करना, नहीं अब
18:02धर्म की बात तो करें कि नहीं वो भी नहीं। मुनिराज तो बिल्कुल मौन। जिसको
18:06धर्म की बात सुनना हो
18:07जंगल में जहां मुनिराज का संग हो वहां आवे।
18:10और आचार्य से सुन, उपाध्याय से भी नहीं, मुनिनाथ से भी नहीं।
18:16मुनिराज को तो अपना काम करना है।
18:18उपाध्याय तो सिर्फ मुनियों को समझाते हैं, दूसरों को नहीं समझाते।
18:22एक आचार्य को आज्ञा है। जन समुदाय को अगर कुछ बोध देना है, किसी का अगर
18:27भावना होवे तो धर्म की बात दो शब्द कहे।
18:30बाकी किसी को आज्ञा नहीं है। ऐसा रहता है इसके अंदर। अपने यहाँ भी जो
18:36आते हैं मुनिराज फिर साथ में उनके चेले भी रहते हैं तो कौन व्याख्यान कौन देता है?
18:42Mostly जो गुरु होते हैं वही देते हैं। वैसे
18:46फिकत के अंदर तो आचार्य देव को ही जनसमुदाय के साथ बातचीत करने का धर्मों के बारे में
18:51कुछ छूट दूसरे को छूट नहीं है। साथ में दूसरे शिष्य मुनिराज हैं उनको
18:55कोई छूट नहीं है बातचीत करने का कोई भी प्रथा का संबंध रखने में।
19:00तो यहाँ ये बात है कि आतो स्वरूप मा झुलता मुनियों ने आचार्य देव ने बलामाछा।
19:05निश्चय व्यवहार की संधि जेवी छे। निश्चय में तो कोई
19:07संबंध... निश्चय में तो
19:09कोई संभालना नहीं है किसी को भी। क्योंकि कुछ करना धन्ना रहता ही नहीं है।
19:13निश्चय माने मैं परमात्मा हूँ, मेरा कुछ बिगड़ने वाला नहीं है। ये निश्चय है।
19:18सच्ची है, तुम्हारा स्वरूप तो ऐसा ही है, स्वभाव तो ऐसा ही
19:21है, उसमें कुछ हलचल नहीं चलती है। लेकिन तेरी अवस्था कैसी है?
19:27अवस्था जब तक अवस्था में तुम परमात्मा
19:29नहीं हुए तब तक तुमको सावधान रहना है। ये व्यवहार। ऐसा नहीं करना और ऐसा
19:34करना ये व्यवहार है। ये व्यवहार। है।
19:37ये व्यवहार की भाषा है।
19:39और मैं परमात्मा हूँ वो निश्चय की भाषा है। गुरुदेव की भाषा कैसी है?
19:44सौगानी जी की गुरुदेव की भाषा कैसी है? वो द्रव्य स्वभाव की बात करते हैं।
19:48उनकी बातों में 90% तो द्रव्य स्वभाव की बात चलती है कि तू परमात्मा हो
19:53तू दुखी नहीं हो। तो यार गुरु टूटा फूटे की बात आएगी व्यवहार की बात आएगी
19:57भले ही तू परमात्मा हो लेकिन तेरे लक्षण कैसे हैं अभी?
20:01तेरे आचार विचार कैसे हैं तुझे आत्मा की रुचि है कि संसार की रुचि
20:04है? तू सत्संग करता है कि... वो सत्संग करता है कि कुसंग करता है?
20:07सही। क्योंकि इस काल में ये ज्यादा important है। क्यों?
20:13कि हम लोग प्रमाणित नहीं हैं, बेईमान हैं।
20:16सद्गुरु की बात सुनी और यहाँ तक ही रहेगी, नीचे उतरे तो खत्म।
20:21हमको आत्मभावना नहीं है, इस अभिराधना ज्यादा करते हैं, पल-पल में अभिराधना करते हैं।
20:26ऐसे जीवों को तो बिना सत्संग के सहारे, सद्गुरु के सहारे
20:30संसार सागर तैरना बहुत मुसीबत
20:32है। इसलिए कृपा उदय तो बात... इसलिए कृपा उदय तो बात सत्संग और सद्गुरु की करते हैं।
20:35वो भले सिद्धांत में वो निमित्त रहे कि निमित्त की बात ज्यादा करते हैं क्यों?
20:40हम हैं ही ऐसे। हमारे दोष इतने ज्यादा हैं। कि पहले तो हमको ICSI में ही डालना पड़े।
20:47पल पल में दोष कर लेते हैं पल पल में आत्म कल्याण की भावना को खो देते हैं।
20:51थोड़ा अच्छा हुआ कि नहीं आत्म भावना की वृद्धि हुई कि
20:53नहीं कि कोई ना कोई काम में ऐसा जुड़ जाता है। कि 6 महीने तक
20:58कहीं क्या हुआ एक दो
20:59दिन में खत्म कर देते हैं। ऐसा है। 20 बाल्टी अच्छे पानी से नहाओ और 1 साल गटर के
21:05पानी से, 1 लोटा से डाल देते हैं।
21:07क्या होता है? हाँ साहब। इस काल में अधिकतर लोग का
21:14संग भी ऐसा है। संग का भी असर होता है ना? संग पे और प्रभव पे भी असर।
21:22जैसा पिए पानी वैसा पिए,
21:23बोले वाणी। जैसे के संग में रहोगे वैसी वाणी निकलती है। ये अड़त
21:29एक दूसरे... एकदसरीनी आदत आ जाय छे. लोक picture जाता देखते है तो वहा जो नई
21:34style आई है देश की वोही style
21:36चालु हो जायेगी. ओर market में माल आ जायेगी. जिस्का नाम चला उसका photo
21:41आ जायेंगे poster आ जायेंगे. ओर
21:43picture में वोही देखो जीन रात में सपने में वोही देखो बार भी देखो तो
21:47वोही देखने को मिलेगा. एक
21:48change होता है. वातावरण का असर है ए सब. विशेय व्यवहारनी संधि जेवी छे आ
21:53प्रमाणे पोतानी भूमिका अनुसार बधाए समजी
21:55लेवानुं छे. के अनुसार बधाई समझी देवानुठे।
21:58जिनको आत्मा का दर्शन हो चुका है, दिन में हजारों बार आत्मा का दर्शन करते हैं।
22:03ऐसे मुनिराज को भी इतनी चेतावनी है तो फिर हम जैसा का क्या हाल है?
22:08हमको कितना संभालना पड़ेगा?
22:10ये बात कुंवरजी भाई कहते हैं। किसको कहते हैं? कुंवरजी भाई। अपने को नहीं कहते हैं।
22:15हम कुंवरजी भाई थोड़े हैं? ये पत्र किसको लिखा है?
22:19जिज्ञासु कुंवरजी भाई। जो आत्मकल्याण कैसे करना उसकी खोज करने
22:23निकले उनको ये पत्र। भैया सत्संग के बीच... उनको ये सत्संग के
22:25बिना तेरा उधार नहीं। थोड़ा भी अगर दूसरों का परिचय करोगे
22:29उल्टा सुल्टा कहीं टेढ़ा मेढ़ा चलोगे तो जाओगे सीधा 12 के भाव में। ये कोई इतना
22:34आसान काम नहीं है basement में बहुत मेहनत है।
22:37जिसका पाया मजबूत उसको आगे कोई problem नहीं लेकिन पाए में ही जब कचास हो जाती है।
22:43Furniture में सागवान की लकड़ी नहीं दूसरी लकड़ी चलेगी।
22:47लेकिन basement में cement में एटी हजार लगा दिए तो क्या होगा? वो building...
22:53वो building 10 साल भी नहीं टिकेगी। गिर जाएगी। यहाँ basement की
22:58बात करते हैं गुरुपा लोग।
23:00और आगे basement तैयार हो गया उसको आत्मा का दर्शन कैसे करना वो
23:03गुरुदेव के पास बात है।
23:05दोनों बात। पहले ये तो पूजनीय हैं,
23:08उनके एक-एक वचन पूजनीय हैं। एक-एक लिटी, एक-एक शब्द
23:12हमारे लिए उपकारी हैं। ये हमारे
23:14कारण आ रहे हैं ये लोग।
23:17तो यहाँ कहते हैं।
23:18कि लोक भावना ना आवरण न लीधे, परमार्थ भावना प्रत्यय।
23:21आवरणने लीधे परमार्थ भावना प्रत्ये जीवने उल्लास पण नथी थाय. अने त्यां सुधी लोक सेवा
23:27प्रत्ये भवरूप थाय छे. हवे
23:29आगे कहेते है. सत्संगनुं सेवन जे निरंतरपणे
23:31ईच्छे छे. एवा मुमुक्षु जीवने त्यां सुधी ज्यां
23:34सुधी ते जोगनो विरह रहे. हवे कोई मुमुक्षु एवो छे के नहि सत्संगनी
23:39importance तो समजता है. सत्संग के बिना तो मेरा संसार में रस आ जाता है. उधर उधर
23:43फस जाता हुं जागृति रहेती नहि
23:44है. लोगो की बातो में उसमे उसमे
23:46कोई ना कोई करना धरना में फस जाता हुं.
23:48उसमें उसमें कोई ना कोई करना धरना में फंस जाता हूँ।
23:51और मेरा बोल भूल जाता हूँ मुझे तो आत्मदर्शन करना है संतों का तीरना है।
23:55तो मैं भूल जाता हूँ। तो सत्संग तो मुझे चाहिए
24:01ही चाहिए। 2 time खाने को चाहिए। 6 घंटा नींद चाहिए। आत्मा के लिए क्या ये तो
24:06सब शरीर के लिए हुआ। आत्मा
24:07के लिए सत्संग चाहिए ये उसका खुराक है।
24:10तो ही आत्मा जिंदा रहेगा नहीं तो मर जाएगा।
24:13क्षण क्षण भयंकर भाव मरणे कहाँ
24:16हो रहा है। पल पल में मौत। कहाँ हो रहा है जी? पल-पल में मौत है अगर सत्संग नहीं है,
24:19जागो तेल नहीं है तो।
24:21तो सत्संग नु सेवन जे निरंतर पड़े
24:23छे जे, 1 घंटा और ऐसा नहीं, 24 घंटा मिले ऐसा जिसकी भावना है।
24:28ऐसे मोक्ष जीव को जब तक ऐसे योग का विरह रहता है,
24:33उसे एक ही घंटा मिलता है, आधा घंटा मिलता है, या कभी मिलता है, कभी नहीं मिलता है।
24:38क्या? तो उसका जीव है ना वो, सब प्राणवायु नहीं मिले तो कैसा होता है?
24:44डंगड़ा में। मुंगड़ा में। जब जिंदा रहना मुश्किल है, बहुत तकलीफ हो रही
24:48है। कब प्राण छूटेंगे नहीं मालूम, ऐसे
24:50सत्संग के बिना लोगों को ऐसा लगता है। मुमुक्षु जीवों को ऐसा लगता है।
24:55सच्चे मुमुक्षु को ऐसा लगना चाहिए, अगर हमको लगता है,
24:58तो समझना कि हमारी कुछ योग्यता है, बेजमेंट में तैयारी है।
25:02अगर सत्संग छूटता है किसी कारण से और हमको तकलीफ नहीं होती है,
25:06चाहे जितना important काम हो, करोड़ों ₹ का dealing होती हो,
25:10लेकिन जिससे सत्संग छूटता है वो हमारा, तो व्यवहार
25:13निभाने... कोई व्यवहार निभाने गया हो सत्संग छूटता हो।
25:17और ऐसे घूमना फिरना कि आज खाने को नहीं मिला। क्या?
25:21खाना खाने की इच्छा हो और उपवास करना पड़े तो क्या होवे हाल?
25:26कितनी बार याद आवे कि आज तो खाया ही नहीं आज तो खाया ही नहीं। कितनी बार याद
25:31आवे। असोस होवे।
25:32और 2-4 दिन निकल जावे तो दुबलापन weakness सब आवे ना। पसंद नहीं आवे जीव।
25:40सावधान हो जाए कि। सावधान हो जाए। अपने हाथों से कोई मरना नहीं चाहता,
25:43जबरदस्ती रोग आ जावे, कुछ हो जाए और होवे,
25:46लाचार होवे अलग बात है, बाकी कोई अपना मरना चाहता?
25:49ऐसे आत्मार्थी जीव को सत्संग नहीं मिले तो नहीं चाहिए।
25:54तो वो तो चाहता है सत्संग को, फिर भी पूर्व कर्म के उदय, पाप का उदय हो।
25:58तो जब तक जो चाहता है ऐसा 24 घंटे का सत्संग नहीं मिलता है, तो जीव को क्या करना?
26:05क्योंकि कुपाड़ा बम्बई में रहते थे, ये पत्र बम्बई से लिखा
26:08है, 25 साल की उम्र में। और वो रहते हैं कलोल में। तो एतरा की दूरी है, चाहते तो हैं।
26:14लिख तो दिया दबा तो।
26:16कि आपको 24 घंटे का सत्संग चाहिए।
26:18लेकिन वो दूसरा सवाल करेगा कि भई मेरे को तो मिलता नहीं है।
26:22यहाँ सब पूछेंगे और आपका सत्संग करना है तो आप बम्बई में हो। तो
26:25हमारे लिए कोई flat की व्यवस्था करो कि हम आ जाएँ वहाँ।
26:29कि flat की नहीं फिर व्यापार धंधे
26:30भी करना साथ में क्योंकि हम वहाँ आके फिर खर्चा आपके ऊपर डाले तो।
26:34तो इतनी उपाधि ज्ञानी लेते हैं सर पे।
26:37कि आपको... सर पे। कि आपको आपके बगल में मकान दिला देवे।
26:40दुकान दिला देवे, धंधा करा के देवे। तो ज्ञानी अज्ञानी हो जाए।
26:44तो अपना नहीं करते हैं तो दूसरे का क्या करेंगे?
26:48एक सत्संग के लिए ये सब आपको करना है। तो लेकिन बोल दिया इधर।
26:52कि 24 घंटे का आपको सत्संग चाहिए। नहीं तो आपको गड़बड़ है।
26:55वो बोलेगा हमको चाहिए, हमको आपके साथ में रहना है।
26:58बोलो कैसे आ जावे क्या कल? बिस्तरा पोटला ले करके?
27:03क्या करें?
27:04तो वो possible नहीं है।
27:05तो वो possible नहीं है. तो भई इलाज क्या करे है? उत्संग में नहीं रहेना है 24 कलाक
27:11का सत्संग चाहीए लेकिन क्या करे है अभी
27:14हमारी हालत एसी है तो क्या करे? तो इसकी बात
27:18है. के सत्संगनुं सेवन जे निरंतरपणे ईच्छे छे एवा मुमुक्षु जीवने, ज्यां
27:22सुधी ते जोकनो विरह रहे छे, त्यां सुधी सत्संग नहीं मिलता हो तो क्या करवुं?
27:28alternative क्या है? त्यां सुधी द्रढ भावथी आत्मभावना ईच्छवी सत्संगने ईच्छवा.
27:32ना ईच्छवी सत्संगने ईच्छवा. नथी
27:34मळतो तो जवा दो हवे. ज्यारे
27:36मळशे त्यारे जशुं. नहीं, एवुं नहीं चाले.
27:38क्यां करे? अमे तो चाहता छे. लेकीन मळे तो
27:41आवे ने, नहीं मळे तो क्यां घूमे? अमे शोध्या, बहु कोशिश
27:45करी, नहीं मळ्या तो घरमां बेसी गया, शांत. ज्यारे मळतो होय तो देखाडो, अमे
27:50अत्यारे ज आवीए, अमे तैयार छे. अमे चाहता छे, लेकीन नहीं मळता तो अमे एवा बेठा छीए,
27:55क्यां करीए? बहु शोध्या, लेकीन क्यांय अमारा माटे कोई मळ्यो नहीं
27:59सत्संग. बेसी गया घरमां.
28:00नहीं सर। बैठ के ऐसा घर में।
28:02तो ऐसा नहीं करना है आपको। नहीं मिले तो भी भावना तो दृढ़ता से रखना है।
28:07भावना नहीं छूट जाओ ऐसा नहीं करना है। तो नहीं मिलता है इसलिए छोड़ दो।
28:12खाना नहीं मिलता है पानी नहीं मिलता है तो अब नहीं मिलता है तो
28:14क्या करें नहीं पीना। नहीं
28:16ऐसा नहीं चलेगा कहीं से भी ढूंढो।
28:18हाथ पैर मारो। और पानी तो ऐसी चीज है कि वो।
28:22कहीं भी हो ना अगर प्यास लगती है और ऐसे जगह में हो तो।
28:25गरीब के पास से भी गरीब के झोपड़ी में जाकर के ही मांग लेता है
28:28भैया एक गिलास पानी लेना मेरे।
28:31भैया एक गिलास पानी देना
28:33मेरे। कोई भी hotel में घुस जाता है चाहे वो मुसलमान की हो, हिंदू
28:36की हो, गुजराती की हो,
28:37किसकी भी हो, मारवाड़ी की हो। पानी एक
28:38गिलास में। मांगने में शर्म नहीं होती है। दूसरा कुछ
28:41मांगना है तो शर्म भी आवे लेकिन पानी की चीज ऐसी है,
28:43किधर भी मांगने का।
28:46रास्ते में traveling करते
28:47हैं तो अपनी water bottle में पानी खत्म हो गया है तो क्या करते हैं?
28:49बाजू में मुसलमान बैठा है तो।
28:52नहीं नहीं देखता है, बहुत प्यास लग रही है, क्या
28:54करें हम? तब वो मुसलमान, हिंदू, जैन, तो मुसलमान हिन्दु जैन धर्म बधुं भूली जाता
28:59छे. तो प्राण बचाववा छे ने?
29:02एसे आत्मा को बचावो है. ए आत्मा
29:05को बचावो है. क्या कहेते है इधर? सत्संगनुं सेवन
29:08जे निरंतर करवा ईच्छे छे एवा मनुष्य जीनने ज्यां सुधी ते जोगनो विरह
29:13रहे त्यां सुधी द्रढ भावे ते भावना ईच्छवी. एक वात भावनाने ताव
29:18न थवा देवी. सत्संग तो
29:20जोईए नहीं मळे तो पण भावना नहीं छोडवी. सत्संग तो चाहिए
29:24नहीं मिले तो भी भावना नहीं छोड़ देना भावना तो
29:27एक बात दूसरी बात प्रत्येक कार्यकर्ता विचारती वर्तु।
29:32कोई भी कार्य करे संसार के कोई भी प्रसंग। शरीर संबंधी हो
29:35कुटुंब संबंधी हो समाज संबंधी हो।
29:39कोई भी कार्य के अंदर हमको जागृति में रहना है जागृति विचार माने क्या?
29:44कि विचार वाला जीव तो कदम कदम पे देख देख के चलता है फूँक फूँक के।
29:49तो दूध नो धारियो हो तो छाछ ने पर फूँक
29:51के न पिए। इसका नाम विचार शक्ति। इसका नाम विचार शक्ति वाला।
29:54सावधान, विचार वाला कौन? सावधान। कर विचार तो काम।
29:58रूपा उडे का मंत्र है एक।
30:00एक मंत्र वो है
30:05आत्म भावना
30:21भावता। जो कहे
30:22केवल ज्ञान। दूसरा मंत्र ये है कर विचार तो। ये उनके patent हैं
30:24रूपा उडे के। तो कर विचार तो काम
30:25जो है इसमें भी ये बात की है कि हर कदम में कोई भी कार्य भले ही करना पड़ता हो,
30:30हम उलझे हैं। हमारे अवाक्पा
30:32के अंदर हम उनी नहीं बन गए हैं। एक बारी सत्संग मिलता नहीं मतलब आत्म भावना
30:37को support करने वाला कोई मिलता नहीं। दूसरे बारी
30:39सत्संग में इस प्रकार से खड़े रहना पड़ता है। जीना इतना नहीं। Action में भी
30:44आना पड़ता है। जैसे कि तमाशा देखो ऐसा नहीं होता है। आपको खुद को वापस मंच पर
30:48जाना पड़ता है। आपको खुद को ऐसे करनी पड़ती है। ऐसे नहीं कि चुपचाप बैठे
30:53हैं तमाशा देखने। क्यों भी नहीं पाए फिर।
30:55नीमन जाएंगे तो कोई दिक्कत नहीं। नुकसान होता है तो भले ही होता है लेकिन देखना है।
31:01फायदा होता है तो भले ही होता है लेकिन देखना है। नुकसान होता है तो
31:04भले ही होता है लेकिन देखना है। पहले मैं पैसा काम करता था। अब मैं देखता हूँ।
31:09फिर नुकसान में रहना नुकसान हो रहा तो भी देखना है। नुकसान होने की
31:13जरूरत नहीं है नुकसान हो रहा है उसमें बस।
31:16नहीं रहेवानुं. दूर मरजाव, देश संवळजाव, सादळजाव. देशमां संतोषमां न रहेवानुं. अने दूर
31:22मरजावने आमां ज नेक्स्ट संवर्ग
31:24आगळ वधवानुं. ए बेमां ज problem
31:27छे. फक्त विचारथी रहेवुं, विचारथी वर्तवुं, फक्त जागृतिमां रहेवुं. देशमां
31:31मात्र रहेवुं. आज. पोताना
31:32विशेने लघुपणुं मानी करवुं. अने
31:34जे करता होय ने. जागृतिमां तो खाली
31:36आ ज छे के ते ज पोतानामां. अब
31:39तो मेरा खत्म हो गया था, तो फिर अपना आत्मा में जाने
31:43से अपना खत्म हो गया था। फिर मैं अपने आप से कहा कि आत्मा में जाने
31:47से। फिर मैं आत्मा में जाने लगा। फिर आत्मा में जाने लगा। फिर
31:49आत्मा में जाने लग गया। फिर
31:53आत्मा में जाने लग गया। बहुत सालों से एकाग्रता
31:57खत्म हो जाता है। उम्र तो किसी अंदर में आत्मा जाता है।
32:01क्या करना है, क्या करना है। फिर आत्मा में जाने
32:08लगा। फिर आत्मा में
32:10जाने लगा। फिर आत्मा में जाने लग गया था। कौन करता
32:13है? फिर से बात करता है। क्यों करता है?
32:17तो फिर से करता है। तो ऐसा दूसरा कहता था ऐसा होगा।
32:21एक सारी कहानी। लेकिन मैं इधर-उधर देखने गया। तो मुझे चिंता सटकने लगता है कि
32:27finally तीन दिन। और बाकी के नियम-नियम से। और गांव में सब तंग
32:33करते हैं, गांव में सब दिन में करते हैं। उससे तो चिंता सटकने लगता है।
32:37हमारा तो जी तगड़ा हो जाएगा।
32:39तो धन-धन दो-दो तो नहीं करता हूं, तो लोग तो।
32:43परमात्मा होगा, लेवा पे चढ़ी नेगन लगाएंगे। बड़ा थोड़ा।
32:47आत्मा की बात करें चिंता, दूसरी बात चिंता भी नहीं है। लेवा चढ़ा के
32:52अरे चढ़ गया कपड़े पे तो क्या हो जाएगा?
32:57किसमें कर दिया कि पोता मैं उसे मजबूत बनूं मान लो। नीचे वाले को मत देखना।
33:02हम तो साधक को देखो साधना करने वाले। क्या साधना की उन्होंने? इस पंचम
33:05काल में बन गए। और
33:06आत्म कल्याण की कैसे साधना की? और
33:08आत्म कल्याण की कैसे साधना की वो बोल रहा था। हम
33:11कहते थे। नीचे वाला तो बैठे ही बैठे हैं,
33:15नीचे दिमाग आए तो मरेगा नहीं। अब दिमाग में आ गया तो हम
33:18तो वही राजा राजा हैं, जो थोड़े आगे से बोले हैं।
33:21तो भी मर जाएगा वही। तो गिरने का स्थान बस
33:25और चढ़ने का स्थान तो ऊँची है। कल चढ़ना गिरना कब हो जाएगा पता नहीं चले।
33:31बेकार है सब। इतना होने के बाद हमने फिर अपना दुख देखा है। हम।
33:38जल्दी से जल्दी पसंद हो जाए ऐसी भावना बनाओ। रोष में नहीं करनी, रोष में मतलब?
33:43बर्दाश्त करो, दूसरे को हटाने का प्रयत्न नहीं करना,
33:45हटाने का काम नहीं करना। एकदम भावना बनाओ। सबका दिन आवे तो ऐसा
33:50एक भी गलती मेरे साथ ना हो।
33:52मेरे साथ गलती ना हो लेकिन मेरे कारण दूसरे को भी जरा भी दुख ना हो।
33:56ऐसा मेरा व्यवहार कब बनेगा? ऐसी मेरी स्थिति कब बनेगी?
33:59तब मेरा ऐसा व्यवहार बनेगा ऐसी भावना बनाओ।
34:02होय होय, 40 वर्ष। समझ में आ रहा है? कहीं भी आग्रह नहीं आता ग्राम में जिती नहीं।
34:07चोर अंदर झगड़ा करते अपने। दूर जाता आजूबाजू वाले जाता अपने को नचाने नाचने। तो क्यों
34:11नाचना है? और जब तक पाप का उदय है तब तक उसी नाचना है।
34:13पुण्य का उदय है तो हम नचाते हैं। उसका
34:16पूरा का कब्बूस है तो क्यों दूसरे को नचाते हैं? तो दूसरा नाचते हैं।
34:18पाप का उदय आता तो हमको नाचना पड़ता है।
34:25पुण्य का उदय आता
34:31हमको नाचना नहीं। तो आपके कर्मों में कर्म आपको नचाते हैं। आपके किए
34:35हुए कर्म आपको नचाते हैं।
34:36शांति बिल्कुल शांति समता भाव। मुझे
34:38गलत तो नहीं करेंगे भैया करना पड़ेगा गलत हो सही
34:41हो। आप कोई ऐसी बात नहीं अभी।
34:44घोष मत करो कोको
34:45टेढ़ा। मैं ऐसा नहीं ऐसा ही करूंगा नहीं नहीं। आपके
34:50शुक्रिया आपके आजू-बाजू वाले भले गलत भी करते
34:53हों। आपको करना पड़ता है जबरदस्त। शांत शांत
34:58रहें। तकल में नहीं तकल में है तो और मरोगे। घरवाले। घरवाले
35:01ऐसा बोले हम ऐसा नहीं ऐसा नहीं ऐसा करना
35:06है मरे। नहीं उपाधि और लोगे करके। सरलता हर जगह सरलता कोई अपना आग्रह नहीं।
35:11जहां जैसा चला गया चल देना। तूफान आता है तो बड़े-बड़े झाड़ उखड़ जाते हैं।
35:16रात का तूफान ही
35:18वो। वो ऐसा तो कलामत करता है क्यों भैया आप? क्योंकि वो शक्ति use करते हैं।
35:23बड़े झाड़ अपने को नहीं गिरे शक्ति use करता है। तो double धक्का होती
35:27है बरखाण होता है इसमें गिर
35:31जाते
35:32हैं। चक्कर होती है, भड़कन होता है, इसमें गिर जाते हैं।
35:34भगवान जो है अपनी शक्ति use नहीं करता है, वो यहाँ से आया तो
35:36ऐसा घुस जाता है। क्या होता है, मार ही नहीं लगती है। यहाँ गलत
35:41कर रहे हैं, कुछ कर रहे हैं, नहीं सोचना है। बस
35:47फरेश्ता अनुसर ही, बुझाया नहीं कभी 232, 332, 232 का। सुपारे
35:50भी ऐसा रहते थे। सुपारे भी कौन
35:52ऐसा रहते थे, जो जैसा सामान
35:58रहता है। अमर में
36:00सजा काटना है। हमारे में सजा काटना है। गलत हो सही हो action
36:03में। सिद्धांत तो ऐसा कहते हैं सिद्धांत तो ऐसा बाद में practice
36:06क्या करते हो? practice क्या
36:08करना है? जैसे कट्टा को ले
36:09आ सकते हो। एक दिन तक तो
36:11नहीं करोगे तो क्या होगा? तब तक नहीं रह
36:13सकते। Okay? अंदर में तकलीफ हो जाएगी लेकिन बाहर नहीं है। हमने कहा कि क्या
36:19है? इसको बोलते हैं पड़े रहने का। यहाँ क्या कह दिया है? रले पड़े रह त्याग करो।
36:26सत्संग नहीं मिले तो
36:27इतना देखो football में guidance कितना भगवान का है। कहीं भी किसी को
36:31दुख नहीं होता है ऐसा वादेन का है। तो
36:33जीवन को बदलना है बहुत तकलीफ होती है।
36:35ये तो बोलते हैं उसका अंगीकरण करने में तकलीफ तो बहुत है।
36:39बहुत घर्षण अंदर में बनाएंगे। लेकिन क्या करें
36:42अगर हमको कुछ पाना है तो। क्योंकि आज्ञा मन नहीं करना है।
36:47और जे कार्य करी ते भावनानी उन्नति थाए ऐसी ज्ञान वार्ता।
36:52के ज्ञान ले। के ज्ञान ले के ज्ञान सुनूं कहीं कहीं विचार हो राखूं ते योग्य से।
36:57Addition support चाहिए सत्संग तो मिलता नहीं addition support चाहिए तो
37:00क्या करें फिर? तो अपनी भावना बढ़े ऐसी कोई वैराग्य की पुस्तक है पढ़ लें दूसरा समझें।
37:06तो ऐसे ज्ञानी हो के जो अपने को छुवावे अपने रुचि को बढ़ावे ऐसे कोई phone से।
37:10और कभी कभी time मिले तो पढ़ें तो support लिया करें।
37:13सत्संग नहीं मिले तो क्या करें निसादा जी?
37:16सत्संग मिले तो क्या होता है क्या सत्संग में तो
37:17असल में ऐसा होता है सत्संग में। सत्संग की
37:20पद्धति में एक बोले और दूसरा
37:20सुन। सत्संग की पद्धति में बोले और सुनें ऐसा नहीं होता है।
37:23सत्संग की पद्धति ये है कि अपना problem रखना है। इस मार्ग में आगे बढ़ने के लिए हमको
37:28क्या-क्या problems आते हैं। ऐसे कौन से दोस्त हैं जो निकलते नहीं हैं। जो
37:33हमको समझ में तो आए।
37:35लेकिन छूट तो नहीं है दोस्त छोड़ना है तो भी छूटते नहीं हैं ऐसे कौन से दोस्त
37:39वो सामने लाओ। तो सत्संग में उसका
37:43सभी लोगों को जो इलाज लगे वो बताएंगे। इसका ये इलाज। उस दिन practice शुरू
37:47होगी उसी दिन को। उस दिन practice शुरू करो उसी दिन से।
37:49वो निकल जाए। सही निकलेगा। वापस पूछना कि भई हमने प्रयास किया हम कर नहीं।
37:54इसका ऐसा चलता है doctor और मरीज का जो व्यवहार चलता है। ऐसा system का व्यवहार।
38:00सुनना सुनना सुनना कोने में कंटाला अपना problem रखे और इसका
38:04इलाज समाधान ढूंढे और practice करे।
38:07ऐसा system चलता है। इसमें
38:10ऐसा नहीं सोचना कि हम बीच में प्रश्न करेंगे तो वो disturb हो जाएंगे सामने वाला।
38:13और कभी-कभी ऐसा नहीं भी होता है।
38:16तो हम बीच में नहीं बोलना कभी knock
38:17कर लेना। तो हम बीच में नहीं बोलना कभी note कर लेना बाद में पूछना बाद में
38:21वक्त मिलता नहीं है। बीच में जो topic है बीच में ही
38:24पूछ लेना। तो हम बस
38:26बाद में याद कभी कभी तो हम याद नहीं रहता वक्त में भूल जाते हैं। ऐसा
38:29होता है disturb नहीं करने के बाद ऐसा नहीं पूछना।
38:33और अपना जिंदगी को आगे बढ़ाना है तो सत्संग करने का ही तरीका है। जब हम लोग
38:38यात्रा पे आते हैं तो ऐसा ही होता
38:40है। इस तरह से problem है तो हम पूछ लेते हैं।
38:43फिर वहां 24 घंटे का बात रहता है। 20 घंटा का साथ रहता है। एक से
38:47एक घंटा 8 घंटा नहीं बाकी सब साथ रहता है। भक्ति
38:49के अलावा जिसको जो कुछ में है जब भी कुछ में है तो।
38:53चुप रहता है तो बड़ा फायदा होता
38:58है यहाँ पे। इतनी ऊँची रहती
39:02है। सत्संग में। तो जल्दी भावना बढ़ती है। एक तो भाव भावना control में आ जाए अपना
39:06भेद में तैयार हो जाए। तो
39:07आदमी एक तो तकलीफ नहीं बढ़ती है।
39:09पहले बोल सकते हैं। ना तो रख सकते हैं।
39:14सुख धाम
39:17अनंत सुसंत चाही।
39:23दिन रात्रि रहे
39:27तद ध्यान मही।
39:32पर शांति अनंत सुधा
39:38मय जी। प्रणमु पदते
39:45वरते जयते। प्रणमु
39:52पदते वरते जयते।