Shrimad Rajchandra Vachanamrut
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0:01श्रीमद् राजचंद्र पत्रांक 371 तीसरा भाग तारीख 4-11-2000 श्री देवचंद भाई।
0:13णमो अरिहंताणं णमो सिद्धाणं णमो आयरियाणं णमो उवज्झायाणं
0:20णमो लोए सव्व साहूणं नमः समयसाराय
0:25स्वानुभूत्या चकासते । चित्स्वभावाय भावाय
0:31सर्वभावान्तरच्छिदे मंगलं भगवान वीरो,
0:36मंगलं गौतमो गणी। मंगलं कुन्दकुन्दार्यो,
0:41जैनधर्मोऽस्तु मंगलम्॥ सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं
0:47सर्वकल्याणकारकम। प्रधानं सर्वधर्माणां
0:52जैनं जयति शासनम॥ ॐकारबिन्दुसंयुक्तं
0:57नित्यं ध्यायन्ति योगिनः। कामदं मोक्षदं चैव ॐकाराय नमो नमः राजचन्द्र वचनामृत।
1:01पत्र number 371। 371।
1:02विकल्लोल के जिज्ञासु मुमुक्षु कुंवर
1:03जी भाई को पत्र लिखा है।
1:04इसमें सत्संग की महत्ता बताई
1:19है। और सत्संग नहीं मिलता हो तो क्या करना हो बताता
1:26है। और तीसरी बात।
1:29ऊपर जाना नीचे से ये वार्ता।
1:33ऊपर जो दो बात बताई एक सत्संग करना। और सत्संग में निरंतर आत्मजागरूकता में।
1:39रहना सखलता से। कोई भी कार्य करना पड़ता है तो कदम कदम कूट कूट के रखना।
1:49सत्संग की भावना रखना।
1:51प्रत्येक कार्य करते समय विचार से
1:52चलना। कार्य करता विचारथी वर्तन. पोताने विशे लघुपणुं मान्य करवुं. पोताना जोवामां आवे
1:58ते दोष तेनी विभूति ईच्छवी.
2:00सरळपणे वर्त्या करवुं. सत्व नहीं मळे तो भावनाओ
2:04राखवी के कार्य करवुं. ए दोनो जो उपाय छे basic
2:09पाया के. ए वात उपर जणावी छे जे वार्ता. ए दोनो उपाय
2:14जे बताव्या तेने विशे वात
2:16करनारा एवा घणा प्रथमतम जीवोने वर्ते
2:19छे. न सत्संग होता है, न जागृति
2:22रहेती है. पप्पाए तो बताव्या लेकिन हमारे से होता
2:25नहीं. क्यो नहीं होता है? के तेने विषे बात करनारा एवा घणा
2:30प्रसंगो तुम जीवोने वर्ते छे एम जाणीए छीए. सत्संग करना है तो बी नहीं
2:36होता है. ओर, जागृतिमां रहेना है तो बी नहीं रहेता. केमके एसे प्रसंगो
2:41उदे प्रसंग आते रहेते है
2:43एक के बाद एक. तो सबमे ममता होती है. very beginning
2:47में क्या होता है? होती है very beginning में क्या होता है?
2:51ध्यान नहीं दूंगा तो नुकसान हो जाएगा कुछ तो करना पड़ेगा
2:53व्यवहार में ये सजा देता है ये नहीं देता है ऐसा करके
2:57जीव स्वयं घबराता है। अगर मैं
2:59ऐसा नहीं चलूंगा तो सामने वाला क्या सोचेगा क्या बोलेगा पता करके
3:03वो बोले नहीं सोचे नहीं तो कुछ नहीं
3:05खुद को ही लगे। खुद को ही डर लगता है।
3:10खुद को ही डर होता है। इसीलिए क्या होता है कि
3:13खुद ही बंधन कारक है हरि
3:15की तो है ही है ऐसी। भाई है ऐसी। कि पंचम काल विसम काल में परिस्थिति तो है ही है।
3:20लेकिन स्वयं ही इतने घबराहट में इतना जुड़ा हुआ है मोह के कारण। तो
3:25इतना तो करना ही पड़ता है ऐसा नहीं करेंगे तो वो क्या करेंगे?
3:28ध्यान नहीं रखेंगे तो नुकसान होगा ध्यान तो
3:30रखना पड़ेगा। ध्यान नहीं रखेंगे तो नुकसान हुआ तो फिर डांट सुननी पड़ेगी डांट के
3:35बाद। सामने वाले के गुस्से के डर से। ये
3:38कई प्रकार का अपने में प्रतिबंध रहते हैं। ये हमारी कमजोरी है
3:44मोह भाव जितना ज्यादा हो उतना ज्यादा। मोह भाव जितना ज्यादा उतना ज्यादा
3:47डर वगैरह रहता है ज्यादा व्यवहार निभाना
3:49होता है। तो ऐसे प्रसंग हैं जो सत्संग को और जागृति को दोनों को रोकने वाले ये
3:55संसारी उदय भाव है। ऐसे प्रसंग इसके बाद एक आते रहते हैं।
4:00कभी-कभी तो उनका कदम डगमगाते हैं कि इतना
4:03महंगा अगर मोक्ष मिलता है।
4:06कि starting में इतना तकलीफ उठानी पड़ती है तो भैया ऐसा तो मोक्ष नहीं चाहिए हमारे।
4:10ऐसा हो जाता है। उपवास करना है तो हम... उपवास
4:14करना है तो हम तो
4:14अभी कर लेंगे, 28 कर लेंगे। आज तो मंदिर करने को तैयार है। क्यों इसमें तो
4:19सामने वाला भी समझता है कि इसने
4:22उपवास किया है, अभी इसमें तो कोई उपवास करने का है ही नहीं। घंटी बंद करके
4:27खाने में बैठे हो तो सामने वाला disturb नहीं करेगा लेकिन
4:29ऐसे ही जागृति में रहो तो कई प्रसंग आएंगे। पता नहीं क्या क्या धरे बैठे हो। घंटी
4:34बंद करके 2 घंटा बैठो महाराज,
4:35घंटी में तो कोई नहीं बोलेगा कुछ
4:36भी। और हम लोग... और हम लोगों ने तो
4:38फिर ऐसा कि हम तो
4:43करते ही नहीं हैं। और किया है ही नहीं ऐसा।
4:47इस इतनी तकलीफ उठानी पड़ती है जागृति में रहने के लिए। लगता है कि इससे
4:51तो हम जो निर्वत्ता नियम करते थे।
4:53दान-धर्म जो भी करते थे वो अच्छा है इस समाज में। इसमें क्या है लोगों को
4:58लगता भी था कि हम धार्मिक हैं।
5:00ऐसा मान भी मिलता था। कोई हमको टोकता नहीं था। यहां तो
5:05एक तो हम जागृति में रह नहीं सकते ऊपर से लोगों को
5:08लगता है कि हमको जैसे। परंतु लोगों को लगता है कि हम कुछ करते ही
5:11नहीं हैं। ऐसा लगता है। ऐसे स्वयं के ही विचार, संकल्प, विकल्प, प्रतिबंध।
5:18एक तो समाज का प्रतिबंध रहता है। एक
5:20परिवार वालों का प्रतिबंध रहता है, एक शरीर संबंधी प्रतिबंध रहता
5:25है। और चौथा रहता है वो संकल्प, विकल्प, प्रतिबंध, स्वयं ही
5:29कुछ मन में गड़ लेवे और फिर डरता रहे। तो वो क्या समझेंगे सब? ऐसा होगा तो?
5:34ये ऐसा हो जाएगा तो? अभी हुआ नहीं, हुआ
5:35नहीं, अभी नहीं। अभी हुआ नहीं हुआ नहीं अभी लेकिन डर के मारे
5:39वही संकल्प विकल्प करते रहता है।
5:41ऐसे 4 प्रकार के जो प्रतिबंध है समाज, कुटुंब, देह और संकल्प विकल्प स्वयं के।
5:47इसके कारण जीव को जो है basic उपाय करना है सत्संग में आना है रहना है। या फिर
5:53जागृति में रहना है वो कर नहीं सकता
5:59है बहुत मुश्किल है।
6:00तथापि ऐसी जो हालत तो है लेकिन कहते हैं। तथापि तेते
6:03बात करने वाला प्रसन्न होते। नरा प्रसंग सते. जेम बने तेम सदुपयोगे विचार ही
6:08वर्तमान होईशुं. एसे प्रसंग आते
6:10रहेंगे सदगुरुना. हमने बांधे है तो
6:12एक के बाद एक उदय में आयेंगे ही
6:15आयेंगे. ओर भोगना भी पडेगा. ओर पाधा भी पोहचेगी. अंतराय
6:19कर्म बांध्या है तो पल पल अंतराय है. करने में बहोत
6:24मुसीबत है, ओर challenge.
6:26एसे मोक्ष मार्ग में कदम आने में बहोत तकलीफ है. तो एमां तो एक दो जीव आ सकता
6:30है. इसमे किसी का दोष नहीं
6:31है. स्वयं का... किसी का दोष नहीं है।
6:33स्वयं का अपराध है।
6:35हम समझते हैं कि बहुत मुश्किल है, इसलिए मुश्किल कुछ भी नहीं है।
6:37लेकिन स्वयं में दोष इतने भरे पड़े हैं।
6:41इसीलिए वो पार नहीं सकते। कोई जीव वैसे एकाध दो,
6:45अपने प्रतिबंध को हटाते हैं।
6:48बाहर से कोई प्रतिबंध नहीं, अंदर में भावों का प्रतिबंध है।
6:52खुद में इतने दोष भरे पड़े हैं, कि खुद छूटना चाहे तो भी छूट नहीं सकता।
6:57और कोई संयोग प्रतिकूलता, योग
6:59आदि, शत्रु आदि कोई निकला नहीं सकता है। शत्रु आदि कोई निगा नहीं शकता है.
7:02अने मार्ग बी बहु सरळ है. कुछ
7:05ना कुछ करना नहीं करना है ही नहीं,
7:07बस जाणना देखना ही रहेता है. इतना सरळ है. लेकिन फिर
7:11भी भागता होती है, अंतराय होते है, एसे प्रसंग बी बंते है. तथापी
7:16तेसे भाग करनारा प्रसंग प्रत्ये अंतराय की अंतराय आता है सब.
7:19जेम बने तेम सदउपयोगे विचारी
7:21वर्तमान बीचे. बहोत विवेक से चलना. ईधर गये तो भी खाई, उधर गये तो भी
7:26खाई, तुं ना पाछुं खाई,
7:28ओर बीच में से चल. तो भी खाई तुं ने पाछुं खाई ओर बीच में चल ना. धार तलवारनी
7:34सोयली रे. दोई ती चौदमां जीन
7:36तणी चरणनी सेवा रे. एसा बात नहि है. तो माल कठिन की लगे एसा गिरे तो भी गिरे.
7:42एसा होगा तो भी गिरे. तो
7:45तारक और अविनाशी. तारक और बेनक पुरुषार्थ. तारक
7:47के उपर बेठा गया तो भी काम रूक जाता है और पुरुषार्थ के उपर बेठा गया
7:53तो भी काम रूकता है. तो
7:55दोनो की एक संधि होती है. दोनों
7:57की एक संधि होती है। cycle के दो handle रहते हैं।
8:01दोनों की संधि बीच में से ना निकलना
8:04है। ऐसा झुके तो भी गिरेंगे, ऐसा झुके तो भी गिरेंगे।
8:08जहाँ झुकना है वहाँ झुकना भी है वापस।
8:11ऐसा delicate है ये रास्ता जो है मुक्ति का बहुत delicate।
8:15पल पल में हम गलती करते हैं। पल पल में हम प्राय आते हैं।
8:19उस वक्त जेम बने सेम। तो
8:22क्या होगा वो तो नहीं
8:23मालूम कितनी ताकत है, ताकत कितनी अलग कोई। ताकत है ताकत तो फिर अलग हुई है।
8:25लेकिन फिर भी try करना कोशिश करना जेम बने तेम।
8:30इतनी कोशिश इतनी जागरूकता रखने के बाद भी गिरोगे आकड़ोगे भटकोगे। सब होगा।
8:36बच्चा जब चलने सीखता है। तो रेंगते रेंगते गिर भी जाता है।
8:42लेकिन वो हिम्मत नहीं हारता है फिर चलता है।
8:45उसको मालूम है कि मैं बार-बार गिर रहा हूँ फिर भी वो कोशिश करते रहता है।
8:50कोई चीज को पकड़ के खड़ा होने का प्रयत्न करता है।
8:54फिर वो चीज बराबर नहीं होती है तो गिर जाता है।
8:57ऐसे कभी ठोकरें खाता है तभी जाकर के रास्ते में आता है। Practice तभी होती है।
9:03तो यहाँ ये बात लिया है।
9:06के ते ते बात करना रा प्रथम प्रत्यय जेम बने तेम सदुपयोग जेम बने तेम मतलब कोशिश करना।
9:12Success होगे हो भी सकते हो नहीं भी हो सकते हो। कोशिश तो करना।
9:17जेम बने तेम सदुपयोग है बिचारी सदुपयोग मतलब क्या। सदुपयोग मतलब क्या?
9:22आत्मकल्याण को लक्ष्य में रख करके विचारना करना। नुकसान बाहर का, लाभ बाहर का, वो
9:28नहीं देखना। हमारे आत्मा को क्या फायदा,
9:30क्या नुकसान, वो देखना। इसको बोलते हैं सदुपयोग। हर action
9:34के अंदर कोशिश ये करना कि हम हमेशा अपने आत्मकल्याण
9:37करने के लिए तैयार रहें।
9:39कोई भी कार्य करें तो मेरे आत्मा को क्या फायदा, मेरे आत्मा को क्या नुकसान,
9:43ऐसा जो thinking चलता है, उसका नाम है सदुपयोग। सदुपयोग के विचार ही
9:47वर्तमान में हैं। अंतराय आएगी... अंतराएं आएंगी,
9:49बाधाएं आएंगी, तकलीफें आएंगी। ठोकर खाते-खाते चलना है।
9:55लेकिन हमको क्या करना है? बाधा को तो हटा नहीं सकते। वो तो जब हटेंगे तब हटेंगे।
10:01अपने दोषों को भी हटा नहीं सकते, वो भी जब हटेंगे तब हटेंगे।
10:04लेकिन कोशिश क्या करें? ना बाहर वाले को हटा सकते
10:08हैं, ना अंदर में अपने दोषों को एक साथ में हटा करके रख देते हैं।
10:11घर में कतरा हो तो झाड़ के बाहर फेंक देवे।
10:14ये अंदर में कतरा पड़ा है तो न जाने कितना time लगे निकालने
10:19में। पहली बात तो अपनी गलती किसी को दिखती ही नहीं, स्वयं की गलती। हमेशा ऐसा होता है।
10:24दूसरों की गलती जल्दी दिखती है, अपनी गलती दिखती नहीं। इसलिए भी देर लगती है।
10:30कतरा अंदर पड़े रहता है और देख नहीं सकते हैं तो निकाल नहीं सकते हैं। ऐसा बनता है।
10:36तो ऐसे प्रसंग में क्या करना है? अंतरा आएंगी तो ठोकर आएगी तो,
10:40जेम बने तेम सदुपयोगे विचारी वर्तमानो इस।
10:45सदुपयोग रखना। आत्मकल्याण का विचार मेरा क्या फायदा मेरे को क्या फायदा ऐसा करके सोच।
10:50ते अनुकरण बने है उसे। क्या बोले?
10:54आप बोलो कि अभी का अभी result नहीं मिलता है इसकी तो practice चलती है। ये जो
10:59ये जो है practice की theory है।
11:02सिद्धांत नहीं है। कि one और two एक द्रव्य दूसरे द्रव्य का कुछ कर सकता नहीं है।
11:07कोई किसी को मार नहीं सकता है कोई किसी को
11:09जिंदा नहीं रख सकता है कोई किसी की सेवा नहीं कर सकता है।
11:11उंगली को जीव हटा नहीं सकता ऐसे। उंगली को
11:12जीव हटा नहीं सकता ऐसे कोई सिद्धांत नहीं है।
11:16ये सिद्धांत को कैसे हम अपने जीवन में उतारें इसकी practice है ये।
11:21और practice करने में वक्त लगता है क्योंकि उल्टी practice बहुत कर लिया है।
11:25उल्टी practice इतनी कर ली है कि आदत पड़ गई है अब। जैसे बीड़ी का रोग लग जाए आदत।
11:31Doctor भले ही बोले लेकिन छूटे नहीं। और छोड़ना है दृढ़
11:35दृढ़ निर्णय करके धीरे-धीरे छोड़ सकता है एकदम तो नहीं छूटता है।
11:39किसी को दारू पीने के किसी को अपींग का आता है। कोई
11:41दारू पीने के कारण किसी को अपेंडिक्स होता है। कोई कुष्ठ होती है तो एक दफे बंदा नहीं
11:46मरता। छुटना मुश्किल है।
11:47ऐसे ये भी हमारी अनंत काल की गलतियां हैं। हम कभी भी आत्मजागृति में नहीं रहे।
11:52उपवास तो बहुत कर लिए और मुनिराज भी बन गए जंगल में भी चले गए।
11:56वो practice तो आसान है।
11:58लेकिन ये जागृति में रहने वाली जो practice है। It's very very difficult.
12:03शुरुआत में बहुत difficult. अपूर्व आत्मभावना होगी ना तो ही आप
12:08इसके अंदर... आप इसके अंदर प्रवेश कर पाओगे।
12:12अपूर्वा आत्मभावना के बिना आप जागृति में रहे नहीं सकते।
12:16बार-बार छूट जाएगी, बार-बार छूट जाएगी।
12:19शुरुआत में भले ऐसा होवे लेकिन हमारा प्रयत्न चालू रहे तो
12:22धीरे-धीरे 2 में से 4, 4 में से 8 ऐसा करके पूरा दिन जागृति में रहना है।
12:27कि पूरा दिन जागृति में रहना है, बाहर में किसी को
12:29दिखता नहीं है। ये अंतर की साधना है। बाहर में नहीं खावे
12:33तो दिख जावे, माला किने तो दिख जावे।
12:36मोमबत्ती बंदे तो दिख जावे लेकिन ये
12:37तो दिख... मोमबत्ती बंदे तो दिख जावे लेकिन ये तो दिखे ही नहीं। ये
12:40अंतर की साधना से अंदर का कचरा बाहर निकलता है।
12:44अपने आप निकालने की मेहनत भी करने की जरूरत नहीं है, अपने आप निकलता है।
12:48अपने आप गुण प्रकट हो जाते हैं। तो लेकिन इसके लिए अनुक्रम से।
12:53आजकल 24 घंटे की जागृति तो नहीं होती है। धीरे-धीरे।
12:58जितना जितना time मिले उतना उतना time।
13:01इंत निकाल करके या दो gap होता है। दो ग्राहकों के बीच gap होता है,
13:03बीच में lunch... ग्राहकों के बीच gap होता है। बीच में lunch break में एक
13:07दो घंटे का होता है तो आधे घंटे में खाली है बाकी डेढ़ घंटा मिल जाता है।
13:10जहां जहां traveling में चले गए तो वहां भी अपन free रहते हैं। तो वहां भी अपन
13:15thinking में रहते हैं।
13:17scooter नहीं चला करके car में जावे के driver चलावे
13:19उसको बोल दे यहां लेके जा बीच में time मिलता है।
13:23दुनिया भर की सोचता है इसके बदले जा गुत्ती में आ जावे।
13:25तो time निकालना है किधर से भी। रोज की जिंदगी में से हमको time निकालना है।
13:30जहां जहां से time मिले वैसे वैसे। और वर्तमान... ले वैसे बस और वर्तमान में मुझे
13:34कौन से विचार आ रहे हैं?
13:36क्या क्या विचार आ रहे हैं वो जानना देखना।
13:38किसी को आगे पीछे नहीं करना सिर्फ देखना मात्र। अपना परिचय करना अपने
13:44भावों का परिचय करना है।
13:46परिचय ही करना है देखना मात्र है। ऐसा क्यों हुआ ऐसा नहीं ऐसा कुछ नहीं सिर्फ देखना
13:52है। Time मिल मिल के।
13:54ये ये practice का काम है ऐसा करते करते 24 hours की जागृति होनी चाहिए।
13:59ते अनुक्रमे बने हुए हैं। ए अनुक्रमे बने एवुं छे. कोई प्रकारे मनने विशे संताप पामवा
14:05योग्य नथी. तकलीफ ए आयेगी sir
14:07दुखेगा या रोना आयेगा या और भी. और भी कई प्रकार की बाधा ए होगी,
14:13गलतिया हो जायेगी. अमारे. दुखी होने
14:15की कोई जरूरत न होये. आपने इसमे
14:17108 में भी आता है निराश न थवो करेंगे.
14:20एसे प्रसंग बनेगे की हम हार जायेगे हमारी जागृति छोड जायेगी.
14:24पुरुषार्थमां जय न थाय एवी निराशा स्मरीश नई. देखो कैसी बात लीखी ए बात.
14:29देखो कैसी बात लिखी है, ये बात इधर है। कि आप
14:32गिरोगे, बार-बार गलतियां होंगी, बार-बार जागृति छूटेगी, कोई घबराने की बात नहीं है।
14:36परिणाम बिगड़ जाएंगे, आपको लगेगा कि मैं तो
14:38आत्मकल्याण करने जाता हूँ और ऐसे संसार के रंग में
14:40कैसे आ गया? ऐसी रुचि कैसे आ गई मेरे को, होनी ही नहीं चाहिए थी। ऐसे ऐसे
14:46action कैसे हो गया? ऐसा मुँह में से हेल-फेल कैसे निकल गया? नहीं निकलेगा।
14:51अब दुखी होने की कोई जरूरत नहीं, पुरुषार्थ चालू रखो। जागृति वाला पुरुषार्थ चालू रखो।
14:56बाकी ये गलतियां भी होंगी तो देख... बाकी ये गलतियां भी होंगी तो देखना है उसको
15:01भी, नहाने धोने की कोई जरूरत नहीं। कोई प्रकारे मन ने विशेष संताप
15:05कमा योग्य ना। पुरुषार्थ जे
15:06कहीं थाय ते। देखो इसमें भी
15:09छुट्टी छुट्टी कितनी दे रही है? कितना free रखा है mind में।
15:13ठीक है आप 2 घंटा कर सकते हो 2 घंटा सही। 15-15 minute करके 8-10 बार करते हो okay ये
15:19लेकिन करो बस इतनी बार।
15:22एकदम नहीं होवे तो कोई बात, हंस जाते हो बार-बार तो
15:25कोई बात। हसता हो बार बार तो कोई बात नहीं. लेकिन आप practice चालु राखो. पुरुषार्थ जे
15:28कई थाय ते. करवानी द्रढ ईच्छा
15:30राखवी योग्य छे के मेरे से इतना पुरुषार्थ
15:33नहीं होगा. 24 घंटे तक कब पहोंचुंगा? इटने उपाधि
15:37इतने चंकर इतने वो. नहीं कोई धरने की बात नहीं. पुरुषार्थ जे कई थाय ते
15:42करवानी द्रढ ईच्छा राखवी योग्य छे. भावना बढावो के में 24 घंटे का
15:47साधना होवे. लेकिन नहीं होवे,
15:49फिसल जावे. तो गभरानो नहीं वापिस चालु कर देजो. चालू कर दें। ये तो
15:54कभी भी चालू कर सकते हैं। गलती मालूम हुई,
15:57जागृति आई, Quran अवलोकन चालू। कभी भी। इसके लिए
16:01कोई permission लेने की थोड़ी जरूरत है।
16:02कि रात को 12 बजे हैं तो मंदिर से नहीं जा सकते हो।
16:05लेकिन अवलोकन कर सकते हो। दिन में time नहीं मिलता, रात में कर सकते हो।
16:11रात में एक, दो, चार घंटा सो गए, बाद में 12 बजे, 1 बजे का alarm रख ली। फिर जाग गए।
16:17दिन भर का थकावट दो, चार घंटे में निकल जाता है।
16:19रात को एकांत रहता है, कोई आवाज नहीं, कोई भागम दौड़
16:22नहीं। रात को एकांत रहता है कोई आवाज नहीं कोई भागम दौड़ी
16:25नहीं कुछ नहीं। 12 1 बजे से चालू कर देवे 2 घंटा 4 घंटा जितना
16:29हुआ उसमें। वहां continuity भी रहती
16:33है। दिन के time में तो disturb बहुत है यहां तो continuity रहती है।
16:36टुकड़े टुकड़े में आप 4
16:37घंटा करो और 1 घंटा सड़ंग
16:38करो इसमें बहुत फर्क पड़ता है। सड़ंग की
16:40ताकत ज्यादा है। continuity की ज्यादा ताकत बहुत रहती है।
16:43फौरन स्पष्ट हो जाएगा संसार क्या चीज है शांति क्या चीज
16:47है अशांति क्या चीज है स्वयं को ही
16:49मालूम पड़ जाएगा। क्या चीज छे स्वयं को ही मालुम पड जाये. शास्त्र पढने की भी जरूरत
16:53नहीं पडेगी. इसी को पूछने की
16:54भी जरूरत नहीं पडेगी. अगर इस प्रकार की
16:56practice किया, स्वयं कोई दूध का दूध पाणी का पाणी हो जाता है. स्वयं को अपने बारे
17:02में बिलकुल ख्याल आ जाता है.
17:04या कहेते है की पुरुषार्थ जे कही
17:06थाय ते करवानी द्रढ ईच्छा राखी ए योग्य छे.
17:09अने परम एवुं जे बोध स्वरूप छे, तेनुं जेने ओळखाण छे. जीस
17:14मुमुक्षु को, जीस जीव को, सदगुरु की पहेचान... को सद्गुरु की पहचान हो गई है।
17:18कि ये तो आत्मज्ञानी ही है। मेरी आत्मा कहती है।
17:24इसमें मैं जरा भी भूल नहीं करता हूँ ऐसा जिसको पहचान हो गई।
17:27परम एवु जे बोध स्वरूप छे तेनु जेने ओड़खान छे।
17:32जिस मुमुक्षु को ज्ञानी पुरुष का परिचय हो गया है पहचान हो गई है। एवा पुरुष है तो।
17:39इन इन पुरुषों को तो ज्यादा अच्छा है।
17:42ज्यादा opportunity chances बहुत अच्छे हैं। कि वो जल्दी पास। अच्छे हैं।
17:45जो जल्दी पा सकता है। क्योंकि कहीं भी गड़बड़ हुई,
17:48कुछ भी तकलीफ आई, बाधा आई तो फौरन पूछ सकता है कि मेरे को ऐसे प्रसंग में ऐसा हुआ।
17:53बार-बार ऐसी गलतियां ऐसे प्रसंग में हो जाती। तो मैं क्या करना?
17:57वो फौरन पूछ सकता है। तो परम एहु जे
18:00बोध स्वरूप से, एनु जेने ओड़खान से, एवा पुरुष है तो। निरंतर
18:05तेम वर्त्याना पुरुषार्थ ने बिसे
18:07मुंजाहु योग्यनु। इसको तो सिर्फ काम ही करना है। कहीं भी रुकावट आई तो
18:11फौरन पूछ लेना। बाकी की line चालू हो जाती है
18:13अपने आप। पूछ लेना बाकी की line चालू हो जाती है अपने आप। कहीं
18:14भी कोई प्रसंग बने जहाँ अपना
18:16दिमाग काम नहीं करता है पूछ लिया काम चालू।
18:20इसको तो घबराने का है ही नहीं क्योंकि सर पे है ना। aid देने वाले हैं तो
18:26अपने आप रास्ता निकालने की मेहनत करने की जरूरत नहीं है।
18:29कहीं डर लगता हो कहीं अपने साधना में कमी लगती हो
18:31सही होगी कि नहीं होगी ऐसा लगता हो। तो आप
18:35phone करके पूछ सकते हैं personally जाके पूछ सकते हैं। आपको ठिकाना
18:38तो मालूम है किसको पूछना है किसको नहीं पूछना है। तो मालूम है किसको
18:40पूछना किसको नहीं पूछना। तो उसको तो
18:43निरंतर तेम वर्तयाना पुरुषार्थने विषय गुंजाउको योग्य नथी इसके लिए
18:47बहुत chances अच्छे हैं। ये
18:50बात कुंवर जी कोई यहाँ तक की
18:51है अब आगे कहते हैं सावधानी के बारे में।
18:54अभी ऐसा लिखेंगे इतना इतना free छोड़ दिया है ना बहुत free छोड़
18:58दिया है जितना होवे इतना करो भैया।
19:00कोई गड़बड़ नहीं भले time लगे।
19:03तो कुंवर जी भाई को ऐसा प्रश्न हो
19:04सकता है mind के अंदर। पहले तो सत्संग की
19:06बात करी। सत्संग नहीं हो। सत्संग की बात करें।
19:09सत्संग नहीं हो तो क्या करना वो बात बताएं जागृति में रहने की।
19:13फिर उसके अंतराय जो आती है उसको कैसे उसमें कैसा करना कितना करना वो बात बता दिए।
19:18अब सामने वाले को ऐसा प्रश्न होता है।
19:21कि ऐसा कर धीरे-धीरे करेंगे तो कभी भी death आ सकता है तो
19:24फिर मैं आखिर क्या करूंगा मैं? Death तो
19:27कभी भी आ सकता है। क्या guarantee देते हो क्या?
19:31तो फिर धीरे-धीरे क्यों 24 घंटे में आज का कार्य चल रहा है ऐसा क्यों
19:36नहीं कहते हो? तो करना तो
19:37आज का आज। करना तो आज का
19:39आज ही है लेकिन अंतरा आती है। तो हमको
19:41chances हैं कि हम पुरसादी जितना होवे उतना करते हैं यार। तो
19:46इसी को ऐसा लगे कि भई मेरा death कब आएगा मुझे पता नहीं है। और ऐसे आप ढीला छोड़ दोगे।
19:52धीरे-धीरे करो तो कोई परवाह नहीं ऐसा करोगे।
19:54तो मेरा काम ऐसा हो नहीं होवे कि भई हम पहुंचने से पहले ही हमारा ticket निकल जावे।
19:59और फिर चौरासी के चक्कर चालू हो जावे।
20:03एक डर लगता है इसके बारे में कुपा देव यहां कहते
20:05हैं। इसके बारे में कुपादेव यहाँ कहते हैं। अनंत काळे
20:07जे प्राप्त थयु नथी अपना स्वरूप पहचाना नहीं है जीव इसलिए तो दुखी है।
20:11अनंत काळे जे प्राप्त थयु नथी ते प्राप्तपणाने विषे अमुक काळ व्यतीत थाए तो।
20:18उसकी प्राप्ति होवे इसके लिए थोड़ी preparation में थोड़ा time जावे तैयारी में।
20:22तो हानि नहीं। तो नुकसान होने वाला नहीं है। ऐसी तैयारी तैयारी करते करते
20:28भावना में अगर दे छोड़ेगा ना।
20:29तो भी उसका नुकसान होने वाला नहीं है क्योंकि भावना में अगर। उसका नुकसान होने
20:32वाला नहीं है क्योंकि भावना में अगर देह छूटा।
20:35अभी आत्मदर्शन नहीं हुआ लेकिन भावना में देह छूट गया। पुरुषात करते कल।
20:40तो क्या होता है ऐसे जीव का तो दूसरा भाव सद्गुरु के समीप में ही होता है।
20:45तो हम कम से कम इतना तो कर सकते हैं कि ये तो lowest है ना।
20:48जो इन्होंने पुरुषात बताया ये तो lowest है कि आपको हर प्रकार की आजादी है।
20:54व्रत तप नियम का कोई बंधन नहीं है आपको।
20:56और जागृति जितनी हो सके उतनी maximum try करके करो जितना हो सके।
21:01अब इससे कम क्या... जितना हो सके। अब इससे कम क्या करेंगे बताइए? जिसके पल में
21:04हमेशा के लिए शांति मिलती हो।
21:08जन्म मरण के फेरे चल जाते हो,
21:09ऐसा जो अपूर्व पुरुषार्थ उसमें इतनी आजादी हमारे को दे दिया है।
21:14अब इससे ज्यादा क्या सरल करें?
21:16सबसे सरल रास्ता ये है अब। तो
21:19इसमें भले ही time जाता है
21:20तो भी घबराने की जरूरत नहीं है कि आप भावना पूर्वक पुरुषार्थ करते हो।
21:25तो घबराने की कोई जरूरत नहीं है हानि नहीं है। क्योंकि अनंत काल में जो
21:27प्राप्त नहीं हुआ है उसको... अनंत
21:28काल में जो प्राप्त नहीं हुआ है
21:29उसको प्राप्त करने में थोड़ा basic तैयारी करना पड़ता है।
21:33कभी भेद ज्ञान तो शुरू ही नहीं करा है अभी तो जागरूकता में ही रखे हैं।
21:37कब तक देखना अपने दोस्तों को थक गए हैं। बेजारगी आ रही है।
21:42कुछ नया बताओ। कोई घबराने की बात नहीं।
21:47preparation के अंदर basic foundation में थोड़ा दिन जाता भी लगता है।
21:51अमुक काल व्यतीत था के प्राप्त पढ़ाने विषय
21:54अमुक काल व्यतीत था तो हानि नहीं है। नुकसान नहीं है उल्टा।
21:56नथी. नुकसान नहीं, उलटामां फाया
21:58मजबूत थता. मात्र अनंत काळे जे
22:01प्राप्त थयुं नथी, तेने विशे भ्रांति थई जाय.
22:06Direction wrong हो जाय. के भई हवे एसा तो जागृति से कुछ मिलने वाला नहीं है, एसे
22:11तो उपवास करो कुछ. व्रत तप
22:13नियम करो कुछ, आत्र पढो कुछ. दान
22:15द्यो एसा करो वो करो, करने तरने में लग
22:18जावे. करने नहीं करने में. ओ जागृति छूट जावे. आत्मकल्याण के लिये
22:22कुछ करना है और कुछ नहीं करना है, एसे में चक्कर... करना है और
22:27कुछ नहीं करना है ऐसे में चक्कर में चले जावे। ये हो गई भ्रांति।
22:31जाने देखने मात्र रहना भ्रांति नहीं है ये पुरुषार्थ। कि हम हर हालत में चाहे कुछ भी
22:36हो जाए हम जानने देखने वाले
22:37रहेंगे और अपने भावों का अवलोकन करेंगे। ये
22:39तो हमारा पुरुषार्थ। लेकिन इससे क्या होने वाला है?
22:43ऐसा करके कुछ प्रवृत्ति तो करना लोगों को क्या समझेंगे कि हम तो कुछ करते ही नहीं हैं।
22:47पहले तो वो भी करते थे माला फेरते थे। ये जानने देखने वाला लोग नहीं है
22:50फिर। तो काहे थोड़ी कर रहे हैं? गायक थोड़ी बड़ी है। वही गायक है। गायक
22:55तो हो, गायक की practice।
22:58अंदर में जो परमात्मा है वो तो जानने देखने वाला है।
23:01लेकिन हमारी वर्तमान की एक-एक समय की जो practice है वो जानने देखने वाली नहीं है।
23:06वो करने धरने वाली है, कुछ करना है, कुछ नहीं करना है।
23:09घड़ी में देखना है, घड़ी में सुनना है, घड़ी में चखना है, घड़ी में।
23:13ये 5 इंद्रियों के व्यापार जो है, खेल होते हैं। थाली आएगी ना तो पहले
23:16ये खाना है, बाद में वो खाना है, ये
23:18नहीं खाना है, वो आ जाता है। अरे ज्यादा डाल दिए, इतना नहीं
23:20खाना है। अरे ज्यादा डाल दिए इतना नहीं खाना है निकालो करके बोले।
23:23देखो। Action reaction immediately चालू होते हैं।
23:28दूध का गिलास दिया अरे इतना नहीं थोड़ा कम करो।
23:31इतना ही इतना नहीं positive negative दोनों चालू है। हर बात में राग और द्वेष।
23:38कि भई इतना गिलास भरा है दूध का इसमें इतना पीना है तो राग। इतना निकाल दो द्वेष।
23:44करना नहीं करना।
23:46ये चालू पड़ा है पल पल में है ये। क्षण क्षण भयंकर भाव मरणे
23:54कहाँ हो राचे हो। सुख प्राप्त करता सुख टले से। ये क्षणिक सुख लेने को जाते हो
23:59आत्मिक सुख
24:00अविनाशी सुख टल जाता है। सुख प्राप्त करता सुख टले से लेस ए लक्षे रहो। क्षण क्षण
24:04भयंकर भाव मरणे कहाँ हो राचे
24:05हो। कोई बहु पुण्य केला पुंज में आता
24:07है अमूल्य तत्व विचार। इतने गंभीर
24:12वचन भरे पड़े हैं।
24:16इतने गंभीर वचन भरे पड़े हैं
24:17एक एक कविता में एक एक पद में एक एक वचन में। यहाँ ये बात कहते हैं।
24:23कि थोड़ी देरी लगे तो कोई परवाह की बात नहीं भ्रांति हो जाए तो बहुत मुश्किल है।
24:28जाने देखने में से करने करने चले गए।
24:31महा मुश्किल है। देखो व्यापार धंधा करते करते
24:34कोई ऐसा नहीं समझता है कि मेरा आत्म कल्याण होगा।
24:38खाने पीने
24:39मौज सो करने में कोई भी जीव ऐसा नहीं समझता है कि मेरा आत्म कल्याण होता
24:42है। वो करता रहेगा लेकिन उसमें मेरा आत्मा का उद्धार होगा। लेकिन उसमें
24:44मेरा आत्मा का उद्धार होगा
24:46ऐसा नहीं संभव।
24:48लेकिन जो दूसरी दूसरी जो बातें हैं उपवास करना, माला फेरना, भक्ति करना, सत्संग करना,
24:55देव दर्शन, यात्रा वगैरह, दान देना, इसमें तो हम
24:58समझते हैं कि हमारी आत्मा का उद्धार होगा।
25:00जैसे मानव सेवा करना, सेवा देना,
25:02किसी गरीब को help करना, जैसे मेरा आत्मा का उद्धार हो जाएगा। ये भ्रांति है।
25:08भ्रांति यह है
25:09कि जिससे फायदा होने वाला नहीं है
25:11उससे फायदा मांगना। पाप के काम से तो कोई अपना फायदा... पाप के काम से तो कोई
25:13अपना फायदा मानता नहीं है तो वहां तो
25:15कोई भ्रांति होने का सवाल नहीं है। बिल्कुल perfect है।
25:18कि ऐसे पाप की क्रिया से तो आत्मा उद्धार होने वाला ही नहीं है। खुद को ही पता है।
25:22शास्त्रों में भी लिखा है हर धर्म में ये बात। गड़बड़ होती कहां है?
25:28ये सत्संग भक्ति देव दर्शन देव गुरु की निकटता शरण भाव।
25:34ऐसे जो पुण्य के परिणाम हैं उसमें भ्रांति हो जाती है। उसमें ही मैं अच्छा कर रहा हूं।
25:39इससे मेरे आत्मा का उद्धार होगा ऐसा जो मान लेता है। आत्मा का उद्धार होगा
25:41ऐसा जो मान लेता है ये भ्रांति होगी ये नुकसान का कारण है।
25:44इससे मोह बढ़ता है। असल में इससे कोई फायदा नहीं होता है फायदा होता है
25:50कुछ भी नहीं करना नहीं देखना। करना नहीं करने से हट जाना सिर्फ जानने
25:54देखना वही अपना। ये हमारा पुरुषार्थ है।
25:58ये पुरुषार्थ कम होवे ज्यादा होवे तो भी कोई बात नहीं लेकिन इसके अलावा और कुछ भी करो
26:02मंत्र जाप करो समाधि लगाओ ध्यान लगाओ उधर जाओ
26:05इधर जाओ ये सब भ्रांति है। इससे आत्मकल्याण होने वाला नहीं है।
26:10ये यम नियम में आ गया, पांच उपदेश लिया है। यम नियम संयम आप कियो,
26:16पुनि त्याग विराग अथाग लयो। वनवास लियो मुख मौन रहो,
26:22दृढ़ आसन पद्म लगाए रहो। जप वेद जपे तप त्यों ही तपें।
26:27उनसे ही उदासी लई सब पे। वह साधन भार अनंत कियो,
26:33तदपि कछु हाथ अधूरा। ये सब जो कार्य किया... ये सब जो कार्य किया है
26:38आत्मकल्याण के लिए मुनि बना,
26:40लग्न दिगंबर, पंचमहाव्रत धारी, सब waste हो गया है क्योंकि भ्रांति थी वहाँ।
26:46ऐसा करने से मेरा आत्मा का उद्धार हो जाएगा, ऐसी जो मान्यता है वो भ्रांति है।
26:51देरी लगे उसका दर्द तकलीफ नहीं है, रास्ता अगर सही हो,
26:54थोड़ी देर लग जाए तो कोई बात नहीं है, इसमें कोई नुकसान नहीं है।
26:58लेकिन गलत रास्ता पकड़ ले
27:00तो कभी भी नहीं पहुँचेगा ना। गलत को सही मान लेना, खत्म हो गया
27:03हमारा। खत्म हो गया मामला।
27:05किसी ने ज़हर पी लिया,
27:08तो तो उल्टी करा देंगे। लेकिन
27:10ज़हर पीने के बाद ऊपर तेल पी लिया, अब क्या करोगे? अब उल्टी भी नहीं होगी।
27:14उसका तो देह पक्का है। ऐसे गलती होती है तो उसका निवारण होता है।
27:21लेकिन गलती होने के बाद उसको
27:23pack कर दिया, कभी छूटे ही नहीं। मतलब wrong side को सही मान लिया,
27:26अब छूटने वाली नहीं है वो गलती। इसको बोलते हैं भ्रांति।
27:30गलत को सही मान लिया,
27:32इसको बोलते हैं भ्रांति।
27:33इसमें... इसको बोलते है भ्रांति इसमे बहु तकलीफ है. अनंत काळे जे प्राप्त थयुं नथी
27:39ते प्राप्तपणने विषे अमुक काळ व्यतीत थाय
27:42तो जरा पण हानि ना थाय. इतना है
27:45के देर है लेकिन अंधेर नहीं है. हानि नहीं है
27:49कुछ. इसमे आप भटक नहीं जाओगे. मात्र अनंत काळे जे प्राप्त थयुं नथी
27:54तेने विषे भ्रांति थाय. भूल थाय ते हानि छे. जो परम एवो ज्ञानीनुं स्वरूप भासेमान थयुं
28:01छे. स्वरूप भाष्यमान थयुं छे. अगर किसी जीव को उत्कृष्ट आत्मकल्याणनी
28:05भावना हो करके ज्ञानी
28:07पुरुष के अंतर की साधना
28:09समज में आई है और ये ज्ञानी पुरुषे एसा अंदर से विश्वास राया है.
28:14परम एवुं ज्ञानीनुं स्वरूप भाष्यमान
28:16थयुं छे तो. तो पछी मार्गने
28:19विषे अनुक्रमे जीवनो प्रवेश थाय ए सरळ प्रकारे समजाए एवी वार्ता छे. कोन
28:24safe side में कोन नहीं है जिसको ज्ञानी पुरुष की पहेचान नहीं हुई
28:28है. उसके लिये अंधेरा है.
28:31उसके लिए अंधेरा है। भले अभी हमने पुरुषार्थ बराबर नहीं होता है अभी टूटक टूटक
28:35होता है लेकिन ज्ञानी पुरुष
28:36की अंतः साधना को समझ लिए हो।
28:38उस जीव को तो अनुक्रम से वो कार्य हो ही जाएगा।
28:42वो नहीं होगा ऐसा नहीं क्योंकि ज्ञानी पुरुष की पहचान ऐसे जीव को होती
28:46है। या पहचान होती है तो उसको ऐसा लगता है।
28:48कि मेरा मोक्ष निश्चित है। ऐसा ऐसा हो जाता है अंदर में ऐसा होता है। कि
28:54भले ही मेरे से गलतियां होती है भटकता हूं बार-बार होता है लेकिन मेरा। भटकता
28:56हूँ बार-बार होता है लेकिन मेरा मोक्ष निश्चित है।
28:59मुक्ति के बारे में जो उसका जो सोचना करना जो thinking था होगा कि नहीं होगा
29:04कैसे होगा ये सब बंद हो जाता है लफड़ा खत्म हो जाता है। वो safe side
29:07में है mind ही free हो जाता है। तो कतरा निकल जाता है हमेशा के लिए। तो समझना कि अंकु
29:13ज्ञानी प्रभु की पहचान अंदर से हुई है।
29:16नहीं तो क्या है नहीं तो विश्वास लगता है लेकिन पहचान नहीं है
29:19विश्वास में और पहचान में अंतर है। विश्वास में
29:23विश्वास में तो क्या है कि आप अपने कुछ सोच के रखा है। कि अपने कुछ सोच के
29:25रखा है ऐसी बात है सामने
29:26वाला बोलता है तो उसको विश्वास आ जाता है लेकिन पहचान दूसरी
29:28चीज है। ये पहचान एक दिन में नहीं होती है
29:31बार-बार परिचय करते-करते और अपनी अपूर्व आत्मकल्याण की भावना होवे
29:35तो ही होती है। पहचान बहुत valuable
29:39है। देखो सोने के पास सोना नहीं है लेकिन पहचान है।
29:43और करोड़पति के पास बहुत सोना है लेकिन पहचान पहचान का ऐसा subject है ये। पहचान
29:49देख करके पहचान लेता है कस के पहचान लेता है कि कितना धन संपत्ति है। चाहे धंधा से
29:53का है। भले उसके पास करोड़पति नहीं हो,
29:55वो रोज तो मजदूरी करता हो, फिर डागीना बना
30:02के, ₹20, ₹30, ₹50, ₹100 मिले। उसके पास कोई अंगूठी भी नहीं पहना है। भले में
30:06chain भी नहीं पहना है। सारा
30:08धागा बांधा है। दिन रात मेहनत करता
30:09है भट्ठी के पास। पूरे कपड़े काले-काले हो जाते
30:14हैं। ये भी उसको सोने की पहचान है,
30:16सोना पीतल समझ सकता है। file करके लाओगे
30:18तो भी समझ जाएगा कि इसमें गड़बड़ है। आत्मा... जाएगा कि इतना गड़बड़ है।
30:21हाथ में लेते ही मालूम पड़ जाता है। कि चांदी है polish किया हुआ।
30:25सोने का के बीच में सोना है। पहचान अलग चीज है।
30:29वो धोखा नहीं खाता है। पहचान वाला जीव क्या होता है?
30:32धोखा नहीं खाता। और उसका भले पुरुषार्थ में कमी होगी लेकिन वो धोखा नहीं खाता है।
30:38उसको भ्रांति नहीं होगी। कभी सपने में भी ऐसा नहीं होगा कि बाहर से कहीं से सुख आएगा।
30:44वो तो बोलेगा आत्मा में ही सुख है कहीं भी नहीं है सुख। ये
30:47दुनिया का राज मिल जाएगा तो भी मुझे सुख नहीं होगा। राज
30:50मिल जाएगा तो कहीं मुझे
30:51सुख नहीं होगा। सुख तो अंदर आत्मा में होगा कहीं नहीं। ये ये पक्का हो
30:54जाता है। दूसरे बात क्या पक्का होता है
30:56कि मैं दुखी होता हूँ, सुखी होता हूँ, सब में मेरा कारण है।
31:00मैं गलती करता हूँ इसलिए दुखी होता हूँ।
31:03कोई दूसरा मुझे दुखी करता है ये बात सपने में भी नहीं आती।
31:07तीसरी बात, मैं कुछ करूँ तो मेरे को कुछ हासिल होगा ये बात पूरी तरह चौंकने लग जाती
31:14है। आगे बढ़ना है मुक्ति के मार्ग में तो कुछ करना,
31:16कुछ नहीं करना दोनों को चौंकने... कुछ करना
31:19कुछ नहीं करना दोनों को चौंकड़ी लगाना। फिर जानने देखना
31:21कोई मारना। ये ये पक्का हो जाता है दृढ़ हो जाता
31:24है। Practice इतनी होवे नहीं होवे अलग बात। लेकिन अंदर में श्रद्धा के बीज।
31:28इसको बोलते हैं संस्कार।
31:30और संस्कार ऐसे होते हैं। अनादि
31:32से हमने ऐसा माना है कि बाहर से सुख आएगा कुछ करेंगे तो मिलेगा।
31:36ये संस्कार टूट गया। ये संस्कार टूटते हैं
31:39अंदर की निर्मलता अंदर में हो जाती है
31:41तब ज्ञानी पुरुष। ये ज्ञानी पुरुष है ऐसा अपने को
31:44अंदर में पहचान। आता अपने को अंदर में पहचान होती है। इसके पहले पहचान नहीं होती।
31:50बाहर की संसार की रुचि वाले जीव को, करने धरने की रुचि वाले जीव को,
31:54आत्मकल्याण में इतनी 100% की आत्मकल्याण की भावना नहीं है, ऐसे जीव
31:59ज्ञानी के वचन सुनने से पहचान नहीं होती। दिखता है सिर्फ सोना है।
32:03लेकिन सही में सोना है कि
32:05नहीं है वो मालूम नहीं पड़ता। दिल कहता है कि ज्ञानी लगते हैं लेकिन वो,
32:10दबा के पूछे तो, गड़बड़ हो जाए। तो गड़बड़ हो जाएगी।
32:14कभी वो ज्ञानी फिर motor में निकला आया।
32:17कोई मोक्ष करने लगा तो मालूम पड़ जाएगा कि नहीं ये
32:19ज्ञानी नहीं है हमने गलती किया था ऐसा हो जाएगा।
32:21पहचान वाले को ऐसा नहीं होता है।
32:23फरक क्या है दूसरा? ज्ञानी को
32:27अगर कोई ऐसे संसारी के वेश में आ जावे संसारी जैसा मोक्ष में।
32:31TV देख के picture देखने जावे।
32:33हम picture देखने गए थे वो theater में से आ रहे थे
32:35show देख करके हम जा रहे थे। अरे ऐसे ज्ञानी picture देखते हैं?
32:40नहीं नहीं वो ज्ञानी नहीं है। मैं कहा क्या होगा ये विश्वास था।
32:44ज्ञानी है ऐसा विश्वास था। ज्ञानी है इसकी पहचान नहीं।
32:49पहचान हो जाए। भाई आप जैसे उदय में रहते हो ऐसे वो भी उदय में
32:53है। आप जैसे पूर्व कर्मों को भोगते हो ऐसे उनके भी अभी कर्म बाकी हैं।
32:57भूतकाल के contract करके रखे हैं।
33:00ज्ञानी है तो शादी नहीं कर
33:01सकता, picture नहीं देख सकता, TV नहीं देख सकता, व्यापार बंद नहीं कर सकता, ऐसा
33:05तो ज्ञानी है नहीं तो
33:07ज्ञानी नहीं है। विश्वास वाले को... विश्वास वाले
33:09को डगमग होता है लेकिन बेचन वाले को डर नहीं
33:13होता। वो बोलता है कि कैसे भी वेश में हो। मान ले तो परमेश्वर है।
33:19ये उसकी लीला के स्वरूप में समझता है।
33:21क्या जैसे भागवत में आता है कृष्ण भगवान की लीला।
33:24को मट्टी फोड़े तो भी भगवान लगे। क्या झगड़ा भी करे फिर भी भगवान।
33:29रात में तो भी भगवान।
33:31धमाल करके आवे कुछ भी करके आवे तो भगवान लगे। वो सब इसमें किसमें गिना गया वो?
33:36भगवान का अवतार है। भगवान का अवतार है वो लीला कर रहे हैं।
33:40इको किसी को दुखी करने का नहीं है लेकिन वो लीला नाटक कर रहे हैं बस। ऐसा लगता है।
33:45ऐसे जिसको ज्ञानी पुरुष की पहचान होती है उसको हर हर स्वरूप में।
33:50उसका विश्वास कलमक नहीं करना। क्योंकि इनके वचन सुनने से इनके दर्शन मात्र से
33:56मुक्ति के लिए हमें अब क्या करना है वो प्रश्न नहीं रहा।
34:00रास्ता बिल्कुल साफ समझ में आया। बस अभी इतना
34:02रह गया है रास्ता तो बिल्कुल समझ में। अभी इतना रह गया है रास्ता तो
34:05बिल्कुल समझ में आता है।
34:07Problem है practice नहीं कर सकते हैं इतना। तो रास्ता हमको समझ में आ रहा है
34:11उसके लिए जितनी पर्याप्त मात्रा में हमको पुरुषार्थ करना चाहिए
34:14वो पुरुषार्थ हम नहीं कर सकते। एक ही समस्या है।
34:18बाकी कोई समस्या नहीं है नहीं होगा तो? ये बात नहीं
34:22है। होगा तो होगा ही थोड़ा हमको
34:24पुरुषार्थ बढ़ाना पड़ेगा। नहीं बढ़ता है तो कैसे बढ़ाना वो कुछ ना।
34:28इसके अलावा कुछ नहीं doubt नहीं है
34:33किसी प्रकार। ये बात यहाँ कहते हैं। कि परम... ए वात यहां कहेते है के
34:36परम एवुं ज्ञानीनुं स्वरूप वास्यमान
34:37थयुं छे. जे जीव कोण? तो पछी
34:40तेना मार्गने विशे अनुक्रमे जीवनो प्रवेश थवो थाय
34:44ज. ए सरळ प्रकारे समजाय एवी वार्ता छे. सही guide
34:48मिल गया है तो भटकने का सवाल ही नहीं है. हमको तो उंगली पकड के
34:52चलना है बाकी हमको क्यां करना
34:54है? जाउं जता बोले त्यां जते जना
34:56है. तो फिर तो कोई problem ही नहीं है.
34:59कईक Mumbai के train में बेठ गये तो फिर problem... कहीं
35:02Bombay की train में बैठ गए तो कोई problem नहीं। और Solapur की train
35:04में बैठे, विवाह Jain करने
35:04का जिम्मेदारी अपने पर आता है।
35:06लेकिन direct destination की train में चले गए तो?
35:09कहीं उतरना नहीं है, कुछ करना नहीं है। छोटा बच्चे
35:11को बिठा रहे हो तो वहां बोल दे train गोल करके तो
35:13लेने को आ जाते हैं, कोई problem नहीं है किसी बात की।
35:16ऐसा इसके अंदर है। कि जब ज्ञानी पुरुष का स्वरूप भाष्यमान हुआ है,
35:21मोक्ष कैसे होता है वो बिल्कुल स्पष्ट समझ में आया है, फिर तो क्या है?
35:24फिर तो हमारे पुरुषार्थ में जितनी बड़ी बढ़त हुई होगी, इतना जल्दी आगे
35:28बढ़ें। जल्दी आगे बढे. हा पहेलुं संकेत छे पहेलुं संकेत. ज्ञानीनुं
35:32स्वरूप परम एवुं ज्ञानीनुं
35:33स्वरूप भाष्यमां थयुं छे. तो
35:35पछी तेना मार्गने विशे अनुक्रमे भले एकदम
35:38नहीं आजकाल नहीं अनुक्रमे जीवनुं प्रवेशपणुं थाय मुक्तिने
35:41मुक्तिना मार्गमां अनुक्रमे जीवनुं प्रवेशपणुं थाय. ए सरळ प्रकारे समजावेली
35:45वार्ता छे. तो आप डेरी लगेगी तो इसके पहेले डेथ आ जायेगा तो एसा हो जायेगा
35:50तो सब भूसा निकाल दो. आ कितना सरळ कर दिया है. ए पत्र में छूटी
35:56कीदनी देती आझादी आझादी. ये
35:59पत्र में छुट्टी कितनी दे दी आजादी आजादी
36:02है। कोई बंधन नहीं है अब। मेरे सत्संग की बात करें लेकिन नहीं होवे तो
36:05आए alternative। क्या उसमें भी
36:07कोई बाधा आवे तो क्या करना चाहिए?
36:08हाँ उसका भी alternative है। कि जितना होवे उतना पुरुषार्थ।
36:11फिर उसमें हमारा यमराज आ जाएगा तो बीच में उसका भी है।
36:15देखो समाधान सब बात का समाधान करके एकदम जीव का mind जो है एकदम free कर दिया।
36:20मतलब मुक्ति है ऐसे तो बहुत आसान। आसान मतलब कठिन बहुत है।
36:25करोड़ों में से एक। कठिन बात है। करोड़ों में से एक आध को
36:27होवे समय का समय इस काल के अंत।
36:29फिर भी जिस प्रकार से इनका presentation है। इस मार्ग को जो स्पष्ट किया है।
36:34Practice कैसे करना वो स्पष्ट किया है सिद्धांत नहीं है।
36:37एक और एक वो चा रहता नहीं है practice कैसे करना।
36:41इसमें प्रवेश करने के लिए हमको क्या करना चाहिए। जितना सरलता से
36:44present किया है इतना कहीं भी नहीं है।
36:47सब प्रकार की आजादी से है।
36:49आप तो सिर्फ आत्म कल्याण की भावना रखो तो
36:51सीधा प्रवेश हो जाएगा। प्रवेश हो जाए। क्योंकि कोई कीमत चुकाने नहीं ऐसा लगे
36:55कि इतना सरल तो हम करेंगे।
36:58इतने ऐसे में अगर हमको परमात्मा बन जाना दिखा है तो तो हम क्यों
37:01ये भी कर सकते हैं साथ में। काम को धंधा छुड़ाते हैं।
37:05ये नहीं करना वो नहीं करना तो हम बोलते हैं।
37:08दोस्त अगर दिखे तो भी उसको हटाने का भी नहीं बोलते।
37:11अब अब इससे ज्यादा क्या सरल होना है। क्रोध आए तो क्या करना तो देखना।
37:15हटाना नहीं। नहीं हटाना। अब इससे ज्यादा क्या सरल कर रहे हैं
37:19हम। इतना सरल कर दिया और ऊपर से guarantee ऊपर से। इतना सरल कर दिया
37:21और ऊपर से guarantee ऊपर से कि नहीं गिरे। पैसा भी मिलेगा नहीं मिलने का क्या सवाल है?
37:25इना मार्गने विसे अनुक्रमे जीवनो प्रवेश पनु थाय।
37:28ये सरल प्रकारे समझाई वार्ता से। नहीं मिलने का कोई chances ही
37:32नहीं है। मिलेगा मिलेगा मिलेगा।
37:34आस्था मिलेगा मिलेगा मिलेगा ऐसा ऊपर से।
37:38इतना सरल और फिर guarantee ऊपर
37:41से। अब तो कोई हमारे हमारे को तो कुछ question भरे जाता ही नहीं है क्या
37:46कोई प्रश्न बाकी रह गया तो
37:47बताइए कि अभी मिलेगा कि नहीं मिलेगा। कि अभी कोई question... के नहीं
37:49मिलेगा। तो अभी कोई question करने की गुंजाइश ही नहीं रहती है।
37:52तब क्या करना अब क्या करना कुछ पूछने का नहीं रहा। सब सामने से ही बता दिया।
37:57तब ऐसा होए तो ऐसा करना ऐसा होए तो ऐसा करना। सत्संग मिले तो
38:01better नहीं मिले तो ऐसा करना।
38:05उसमें भी दिल में घबराहट हो गई कि मेरा क्या होगा तो।
38:08तो उसको भी बात समाधान कर दिया मतलब कोई बात से बाकी नहीं रखा
38:12है। इतना जबरदस्त letter आया है। पूरे प्रकार मन
38:14बरते तेन गतो ऊपर से आजादी। मन बरते तेन बरतो ऊपर से आजादी।
38:19जैसा दिल में हो वैसा बरतो। दिल क्या बोलता है मन क्या बोलता है ऐसा कर। क्यों?
38:26अगर मन में संसार के सुखों की इच्छा है अगर जीव को।
38:32मन में रुचि संसार की पड़ी है कहीं ना कहीं
38:34अंश मात्र में। उस जीव को कितना भी समझाओ तो पानी फिरने वाला है।
38:38क्या समझा के क्या फायदा?
38:40आखिर में कह दिया है खटकार।
38:41The end here have। इतना कहने के बाद फिर भी अगर नहीं होता है तो भैया। कहने
38:44के बाद फिर भी अगर नहीं होता है तो भैया जैसा दिल होवे ऐसा करो।
38:47क्या? इतना सरल रास्ता है समय दर्शन पाने का कि मुक्ति पाने का।
38:52फिर भी अगर आपको अगर नहीं होता है तो क्या करो?
38:56जैसा दिल है आपको जैसा रूढ़े प्रकारे जेम मन
38:59भावे तेम वर्त। रूढ़े प्रकारे मन वर्ते तेम वर्त। क्योंकि अगर अंदर में खोट है,
39:05तो तीर्थंकर की वाणी भी संभाल नहीं सकेंगे, सुधार नहीं सकेंगे। अंदर की खोट है ना,
39:11अंदर की खोट नियत बेईमानी अंदर में है।
39:14खुद को आत्मकल्याण करना ही नहीं है किसी भी कीमत में।
39:17क्योंकि संसार में कहीं ना कहीं रत बुद्धि है है है।
39:21और उसको तीर्थंकर भी नहीं तार सकते। और अगर मन में आत्मकल्याण की भावना है।
39:28तो बस मन की आवाज सुनो, ऐसा चलो, ऐसा पुरजोर करो।
39:31तो रास्ता अपने आप मिल जाएगा।
39:33रास्ता मिलेगा कि नहीं मिलेगा tension रखने की जरूरत नहीं है।
39:37रूड़े प्रकारे मन करते ते मन को।
39:41वियोग छे। वियोग छे, सत्पुरुषनो वियोग छे. सम्य दर्शननो वियोग छे,
39:45हजी मार्ग मळ्यो नथी.
39:46एनो वियोग छे, अंतराय छे.
39:48वियोग छे, तो तेमां कल्याणनो पण वियोग
39:51छे. ए वार्ता सत्य छे. आप कहेता हो
39:54के सत्पुरुषनो सत्संग रोज नथी मळतो, तो आपणुं शुं थशे? आपणुं
39:58कल्याण केवी रीते थशे? वात साची छे आपनी. सम्य दर्शन नहीं थशे तो
40:04मारुं शुं थशे? वात साची छे आपनी. कल्याण नहीं थवानुं. वियोग
40:08छे तो तेमां कल्याणनो... वियोग
40:10है तो उसमें कल्याण का कौन वियोग है, यह बात
40:11सत्य है। यह बात आपकी बिल्कुल सही है, आप घबराते
40:13हो यह बात भी सही है। कभी भी यमराज आ जाएगा,
40:16अभी 84,00,000 चक्कर चालू हो जाएंगे, बात बिल्कुल सही है। ऐसा ही है।
40:20सत्संग नहीं मिलेगा, जीव भटक जाएगा, सत्पुरुष नहीं मिलेंगे भटक जाएंगे।
40:24आत्मदर्शन नहीं होगा भटक जाएंगे।
40:27यमराज आके उठा के लेके जाएगा 84,00,000 चक्कर चालू हो जाएंगे वहां पे।
40:30यह बात आपकी बिल्कुल सही है। 3 letter लिखे हैं ना उसमें
40:32उन्होंने व्यथा लिखी होगी। मुझे
40:34जल्दी से आत्मकल्याण करना है रास्ता
40:35सुझाओ। जल्दी से आत्मकल्याण करना है रास्ता सुझाव
40:38तो सुझता नहीं है।
40:39ऐसी अपने अंदर व्यथा रखी होगी तो बोले आपकी बात बिल्कुल सही है गलत नहीं है।
40:45तो इसका एक उपाय क्या? ये danger point तो है सत्संग नहीं मिले तो भी जीव गया है।
40:51सत्पुरुख नहीं मिले तो? समय दर्शन नहीं होवे तो? यमराज आ जावे तो?
40:56ये सब हमारे minus point है साधना करने वाले के। या।
41:02इसका क्या उपाय करें अब हम? इसका उपाय बताते हैं। कि बात आपकी सही है तथापि
41:08जो ज्ञानी ना वियोग मा पण तेनेज विषये चित्त वर्ते। देखो क्या बात निकली।
41:15सत्संग नहीं मिलता है, सद्गुरु
41:16नहीं मिलता है, अभी आत्मज्ञान नहीं हुआ है, कभी भी यम यम आ सकता है।
41:20अब क्या करें हम, कैसे बचें? कहते हैं तथापि जो ज्ञानी ना वियोग मा पण।
41:28तेनेज विषये चित्त वर्ते।
41:30कुछ सुझे नहीं, खाना नहीं, पीना नहीं, बस सत्संग कब मिलेगा। ना नहीं बस सत्संग कब
41:33मिलेगा? सत्पुरुष के दर्शन कब होंगे?
41:35कब उनकी वाणी सुनने को मिलेगी? कब... दिमाग में वो भर गया है क्या? सत्पुरुष।
41:41जैसे गोपियां जाती थी तो मक्खन बेचने...
41:44तो मक्खन बेचना है वो भूल जाते थे। माधव ले लो, कोई माधव ले लो।
41:48व्यापार धंधे में भी उनको भगवान याद आवे, माधव ले लो। मक्खन को माधव कह दिया उन्होंने।
41:53किसी को होना है तो मैं दे देती हूं। लेओ लेओ जल्दी लेओ करके, कोई ग्राहक हो जाओ।
41:58तो अंदर में मटकी में तो मक्खन था लेकिन उनके
42:00दिमाग में... कौन था लेकिन उनके दिमाग में चित में कौन रहता था? कृष्ण।
42:05कृष्ण का दूसरा नाम माधव। तो बोले माधव लेओ कोई माधव लेओ। ऐसा ओतप्रोत
42:11चित्त अगर ज्ञानी के शरण में है।
42:13भले उनका वियोग है लेकिन ज्ञानी का शरण चाहता है वो जीव।
42:17निरंतर उसका तड़पन है अंदर में।
42:20तथापि जो ज्ञानी ना वियोगमा पर तेनेज विषये चित्त वर्ते से।
42:23तो मन है ना दो बाजू नहीं चलता है।
42:26जहां चित्त होता है वहीं बार-बार बार-बार जाता है। ऐसे किसी। बार
42:29आता है। जैसे किसी ने सुबह उठते ही गाली दे दी।
42:31अब देखो क्या होता है। दिन भर।
42:35क्यों गाली दी? इसका बता दूंगा। ऐसा करो। चालू। घड़ी घड़ी घड़ी घड़ी वो विचार है।
42:42ऐसे जिसको सद्गुरु बस गए हैं मन के अंदर। उसको हर काम में हर प्रवृत्ति में
42:48सद्गुरु सद्गुरु सद्गुरु सद्गुरु। उसको 1 घंटा बस नहीं
42:52हो रहा 24 घंटा रहना है। 1 घंटा मिला तो उसको तकलीफ। रोज का
42:55वियोग है 23 घंटे का। 1 घंटा। 23 घंटे का। एक घंटा ही मिलते
42:58हैं 23 घंटा भी हो गए। और खटकता है।
43:01और कब जल्दी दूसरा घंटा आवे next day का।
43:05क्या वो और फिर September ही ना उसे बस का हो।
43:08लेकिन सुबह 7:00 बजे से जाना है जाना है। आज कौन सी बात आएगी? कल
43:14कौन सी बात आएगी उसकी?
43:17फिर खुलने के बाद भी 3-4 घंटा क्या बात बोले क्या करे।
43:20अपने आप।
43:22ये कोई जबरदस्ती करने की नहीं है ये
43:24अपने आप इंसान का रस को। कि नहीं ये अपने
43:27आप संसार का रस को तोड़ती है। जिसके जिसके चित में
43:32वियोग में भी सब कुछ बचा है मन में। और उसका वियोग में तड़पता है जीव।
43:36तो भी कल्याण है। धीरज नो
43:37त्याग करवाने योग्य नहीं। मेरा क्या होगा?
43:39धीरज नहीं रहती है, घबराहट होती है, भई कुछ नहीं, धीरज रखो, सब ठीक हो जाएगा। क्यों?
43:45कि जिसको सद्गुरु चाहिए। उसका शरण में है जो जीव।
43:50भले साथ नहीं है, दर्शन नहीं, गुरु का मिलना जुलना नहीं, सत्संग नहीं
43:52है, बात... उसका मिलना जुलना अच्छा नहीं है, बाधाएं बहुत हैं।
43:54लेकिन चित्त सत्पुरुष में ही है।
43:57तो उसको कोई घबराने की जरूरत नहीं है,
43:59उसका रास्ता बिल्कुल साफ हो जाएगा। इसीलिए वो बात...
44:04बीजू काई सोधमा, कुछ करने डरने की जरूरत नहीं है। एक सत्पुरुष को ढूंढ...
44:09और उसके चरण कमल में सर्व भाव अर्पण कर दे। फिर मौत नहीं मिले, तो मेरे पास चले जाना।
44:15ऐसे कृपादेव का sign करके नहीं हटे हैं। अगर हमको
44:19कृपादेव पे विश्वास है, हमको तो यही काम करना है। तो विश्वास है। हमको तो
44:21यही काम करना है, दूसरा काम करना ही नहीं।
44:23आत्मध्यान तो अपने आप हो जाएगा, भक्ति अपने आप आ जाएगी।
44:26सत्संग अपने आप होगा, कोई बुलाता नहीं है, अपने आप आना होता है।
44:31ये सब बाकी का कार्य अपने आप होता है।
44:33करने धरने वाली बात नहीं है। भक्ति करो, नहीं, हो जाएगी।
44:37अब इतना दिन चल रही, कल हुई नहीं।
44:39सोचा कि बाद में करेंगे, लेकिन बाद में ये विचार नहीं आया कि...
44:42तो नहीं हुई। कोई नियम hard and fast थोड़ा है कि ऐसा ही करना है। वो अपने आप हो
44:47जाएगी, अपने आप नहीं हुआ तो... वो अपने आप हो जाएगी
44:49अपने आप नहीं होगा तो ही परवाह की बात नहीं।
44:51अगर सद्गुरु के चरण कमंडल में हमारा ध्यान है,
44:54उनके शरण भाव में हम हैं, कोई चिंता की बात नहीं।
44:58बिल्कुल ठीक ही हो जाएगा जो भी होगा। धीरज में वो त्याग करवाने
45:03योग्य नहीं बिल्कुल मन को
45:04शांत कर दो कि मेरा क्या होने वाला है। यहाँ ये पत्र पूरा होता है। Beginners को,
45:10क्या करना कैसे करना कितना कठिन माँ करोड़ में एकाध गया होगा। कहता है,
45:14काम बहुत कठिन है, विषम काल... बहुत कठिन है।
45:17भीषण काल है, सत्संग नहीं मिलता है, चारों ओर कुसंग असत्संग है,
45:20क्या करना? और सब समाधान इसमें आ गया है।
45:23आप फिर भी आत्मकल्याण कर सकते हो। फिर भी अगर आप पुरजोर,
45:28अपूर्व आत्मभावना होवे, 6 महीने की guarantee है।
45:32फिर भी ऐसी परिस्थिति में भी, और आप मुक्ति को प्राप्त कर सकते हो,
45:36कोई घबराने की बात नहीं है।
45:38घबरा करके फिर क्या होता है,
45:40doctor लोग घबरा देते हैं, फिर ये
45:42लो, वो लो। उल्टे पटी चढ़ावे तो भी
45:43हम मान लेते हैं, क्योंकि हमारा... जडावे तो भी हम मान लेते है. केमके
45:45हमारे हाथ में कोई choice
45:46नहीं है. या एसा कोई ठगने वाले नहीं है, कोई लेने वाले
45:51नहीं है. हे परम कृपाळु
45:53देव, जन्म जरा मरणादि सर्व दुःखोनो
45:55अत्यंत क्षय करनारो एवो मोक्षनो मार्ग आप
45:58श्रीमदे अनंत उपकार करी मने आप्यो. ते अनंत उपकारनो
46:02प्रति उपकार वाळो हुं सर्वथा अपमान. वळी आप श्रीमद कई पण लेवाना
46:06नहीं शुं होय तो. कोई चाहीए नहीं सत्पुरुष को बदले में. के में एटला
46:12रस्ता... बदले में एटलो रस्तो बतावता हुं मेरे को कुछ चाहीए. एथी हुं
46:17मन वचन कायानी एकाग्रताथी आपना
46:19चरणारविंदमां नमस्कार जाउं छुं. आप कुछ लेते तो होय ने तमे कम से कम ए करता
46:25होय अने क्यां करता. आपनी परम
46:28भक्ति अने वितराग पुरुषना मूळ धर्मनी उपासना. मारा हृदयने विषे भवपरे
46:32अने जागृत रहे. एटलुं
46:34मांगुं छुं के सफळ थाय.
46:36ए वात लखी छे. सत्पुरुष को कुछ
46:38नहीं चाहीए वास्तवमां. ए पत्र अहींया. ये पत्र यामुनाव।
46:46सुख धाम
46:48अनंत सुसंत जाही।
46:55दिन रात्र रहे
46:58तद ध्यान मही।
47:03पर शांति
47:06अनंत सुधा। सुधामय जे।
47:13प्रणमु पदते वरते
47:19जयते। प्रणमु पदते
47:26वरते जयते.
47:30जाई के।